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Archive for the ‘Gorkha Adivasi Pradesh’ Category

Chances high of tribal company for Morcha

August 13, 2010 Leave a comment

Adivasis wait for invite to join Delhi talks

Siliguri, Aug. 12: The Gorkha Janmukti Morcha may include representatives of the Akhil Bharatiya Adivasi Vikas Parishad’s Terai-Dooars regional unit in the delegation for the August 17 tripartite talks in New Delhi.

A final decision will be taken at the Morcha’s central committee meeting scheduled to be held in a day or two.

“The Parishad’s letter to our president, Bimal Gurung, has been received well within the party, and their comments are being seriously considered,” said a Morcha insider. “At our central committee meeting, we will also decide whether to include Parishad members in our delegation for the Delhi talks.”

On August 7, the president of the Parishad’s Terai-Dooars regional unit, John Barla, had written to Gurung, expressing the desire to work closely with the Morcha, provided seven conditions were met. Among the conditions was a change in the nomenclature of the Morcha’s proposed Gorkha Adivasi Pradesh — the state that it wants — to one that did not include the name of any particular community.

“The central committee of our party will meet in a day or two as only five days are left before the next round of talks,” said Harka Bahadur Chhetri, the media and publicity secretary of the Morcha.

“A number of issues, including the Parishad’s letter, will be discussed in detail.”

Chhetri said as the Morcha and the Parishad had been “struggling on similar issues”, the two outfits could reach a consensus.

“There are a couple of demands like reservations and protection of interests, which we would have considered even if the Parishad had not mentioned them specifically. However, there are a few points we need to discuss before we convey our opinion to the Parishad leaders,” he said. “Nevertheless, we are positive that we can ultimately reach a consensus.”

A Morcha leader said after a consensus was reached, the party would consider whether the Parishad should be included for the next round of talks in Delhi.

“We could then inform Delhi that our delegation would include members of the Parishad as well,” the Morcha leader said.

Political observers said if Parishad leaders accompanied the Morcha, it would help the hill party prove its point on the issue of territory, one of the key stumbling blocks in the negotiation process.

The Morcha is demanding that the new state and the interim set-up should include not only the Darjeeling hills but also the Terai and the Dooars where the tribals are in a majority. Courtesy:TheTelegraph

गोजमुमो से दोस्ती को आविप तैयार

August 10, 2010 Leave a comment

सिलीगुड़ी : अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद गोरखा जनमुक्ति मोर्चा को सात शर्तो पर समर्थन देगी। काफी वैचारिक मंथन के बाद आविप की तराई-डुवार्स रीजनल कमेटी ने सोमवार को यह फैसला किया है। रीजनल कमेटी के अध्यक्ष जॉन बारला ने गोजमुमो के अध्यक्ष विमल गुरुंग को पत्र भेजकर आविप के फैसले से अवगत करा दिया है। पत्र में गोरखालैंड शब्द पर आपत्ति जताई गई है। कहा गया है कि किसी जाति विशेष पर अलग राज्य का नाम नहीं हो। साथ ही अंतरिम सेटअप में तराई-डुवार्स को आंशिक नहीं, बल्कि पूरी तरह शामिल करते हुए इस क्षेत्र में छठी अनुसूची लागू करने का प्रावधान करना होगा। यहां उल्लेखनीय है कि गोजमुमो ने प्रस्तावित गोरखालैंड राज्य का नाम बदलकर गोरखा-आदिवासी प्रदेश करने का प्रस्ताव दिया है, लेकिन आविप इसे नापसंद कर रही है। आविप ने पहाड़ पर बसने वाले सभी जातियों को गोरखा माने जाने पर भी आपत्ति जताई है। उसका कहना है कि गोजमुमो की पहाड़ के सभी जाति व समुदाय के लोगों को गोरखा मानने की मांग उचित नहीं है। आविप की चौथी शर्त है कि स्थानीय स्वशासी निकायों पर इलाके के बहुसंख्यक समुदाय का नियंत्रण होना चाहिए। इसी प्रकार अलग राज्य बनने पर पहाड़ व तराई-डुवार्स को प्रशासकीय दृष्टि से विभाजित करने की शर्त भी आविप ने रखी है। छठी शर्त के रूप में उसने कहा है कि प्रशासकीय क्षेत्रों में आदिवासियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए अनुसूचित जनजाति उत्पीड़न रोकथाम अधिनियम-1989 को लागू करना होगा। साथ ही आदिवासियों को न्याय दिलाने के लिए विशेष अदालत गठित करनी होगी। सातवीं शर्त होगी चुनाव या सरकारी नौकरियों में क्षेत्रीय आधार पर आरक्षण। पहाड़ और डुवार्स-तराई के लिए उरांव, मुंडा, खडि़या या संथाल जैसी जनजातियों के लिए अलग-अलग आरक्षण का प्रावधान करना होगा। बारला ने कहा कि राज्य सरकार ने आविप के साथ छल किया है। उसके खिलाफ संगठन दिल्ली चलो अभियान शुरू करेगा। हालांकि इस अभियान की तिथि तय नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि पिछले 32 वर्षो से आदिवासियों को मूर्ख बनाकर राज्य सरकार राजनीतिक रोटी सेंकती रही है। इस दौरान न तो उसने आदिवासियों से शिक्षा के बारे में सोचा और न रोजी-रोटी के बारे में। सरकार को यहां की शराब भट्ठी से राजस्व मिल रहा है, हमारे बच्चे पढ़-लिख नहीं पा रहे हैं। अब आदिवासी चुप नहीं बैठने वाले हैं। शिक्षा की मांग पर सभी आदिवासी दिल्ली सरकार के सामने गुहार लगाएंगे। उन्होंने आदिवासियों से दिल्ली चलो अभियान के लिए तैयार रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि आविप ने राज्य सरकार से अलग होने की नीति तैयार कर ली है।

 

प्रोग्रेसिव टी वर्कर्स की गेट मीटिंग आज से

बिन्नागुड़ : डुवार्स-तराई स्थित सभी चाय बागानों की गेट पर प्रागे्रसिव टी वर्कर्स यूनियन मंगलवार से की ओर से गेट मीटिंग की जाएगी। यह मीटिंग गुरुवार तक चलेगी। इसकी जानकारी प्रोग्रेसिव टी वर्कर्स यूनियन के जिला सचिव पारसनाथ बराइक ने दी है। बराइक ने बताया कि यह गेट मीटिंग प्रतिदिन दो-दो घंटे के लिए लगातार तीन दिनों तक होगी। जिसमें मजदूरों की मजदूरी में वृद्धि को लेकर चर्चा की जाएगी। इस गेट मीटिंग के बारे में प्रोग्रेसिव टी वर्कर्स यूनियन ने उत्तर बंगाल श्रम आयुक्त को पत्र देकर सूचित किया है। पत्र में प्रगतिशली चाय बागान मजदूर संगठन ने अपनी छह सूत्री मांगों की चर्चा की है। जिसमें चाय बागानों की न्यूनतम मजदूरी 250 रुपये करने व नई नियुक्ति को जल्द चालू करने की मांग की गयी जाएगी। इसके अलावा मजदूरों की घर की मरम्मत करने व नये घरों को बनाने व 20 प्रतिशत बोनस देने की मांग शामिल है।

आदिवासियों की रक्षा कवच है छठी अनुसूची : टोप्पो

बिन्नागुड़ी, : छठी अनुसूची आदिवासियों के लिए रक्षा कवच है। यह कहना है अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के राज्य कमेटी के सचिव तेजकुमार टोप्पो का। उन्होंने कहा कि छठी अनुसूची के बारे में बहुत लोग जानते ही नहीं हैं। केंद्र सरकार राज्य सरकार की मदद से छठी अनुसूची उस इलाके के लिए लागू करती है, जो इलाका अत्यंत पिछड़ा है। छठी अनुसूची में एक काउंसिल होता है। इस काउंसिल में इलाके के अनुसार प्रतिनिधि का चुनाव होता है। उन्होंने बताया कि हर पांच मौजे के अंतर्गत एक प्रतिनिधि का चयन होता है। जिस प्रकार ग्राम पंचायत में विकास के लिए धनराशि आती है, ठीक उसी प्रकार काउंसिल को भी रकम दी जाती है, जो इलाके के विकास के साथ पिछड़े जाति के लोगों की उत्थान हेतु खर्च किए जाते हैं। इस काउंसिल में राज्य सरकार की ओर से विधायक प्रतिनिधि के रूप में होते हैं। उन्होंने बताया कि डुवार्स में 318 मौजा हैं, इसलिए कई मौजा के ऊपर एक प्रतिनिधि होंगे। इस प्रतिनिधि के लिए चुनाव में किसी भी राजनीतिक अथवा गैर राजनितीक पार्टी का उम्मीदवार खड़ा हो सकता है। श्री टोप्पो ने कहा कि छठी अनुसूची के तहत शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क सभी के विकास के लिए केंद्र सरकार द्वारा पैकेज भेजा जाता है। छठी अनुसूची अर्थात छोटे राज्य की व्यवस्था होती है, इसलिए डुवार्स के लिए छठी अनुसूची ही जरूरी है। तभी यहां के लोगों को लाभ मिलेगा। गोजमुमो द्वारा डुवार्स-तराई के 150 मौजा को अंतरिम सेटअप में शामिल करने की मांग के बारे में श्री टोप्पो ने कहा कि डुवार्स-तराई इलाके के 315 मौजा (आईटीडीपीए) इंडियन ट्राइबल्स में डेवलपमेंट प्रोजेक्ट एरिया के तहत आते हैं। इसके बारे में भारतीय संविधान के 338-ए अनुच्छेद में जानकारी दी गई है। यह वह भूमि है, जिसे न कोई दे सकता है और ना ही कोई ले सकता है। इस बाबत राज्य सरकार, केंद्र सरकार तथा नेशनल ट्राइबल्स में एसोसिएशन और मानव आयोग को पत्र देकर इस बारे में बताया गया है। भारत का कोई भी व्यक्ति संविधान से अलग नहीं रह सकता और न ही उससे अलग कुछ कर सकता है।साभार:दैनिकजागरण

लंबे समय तक नहींचलता जातीय संगठन : कालिंदी

चामुर्ची  : जातिगत संगठन ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकता है, खासकर भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में। इसी उद्देश्य से डुवार्स-तराई के तमाम शोषित लोगों को एक छत के नीचे लाकर आंदोलन करने के लिए ही प्रोग्रेसिव पीपुल्स पार्टी का गठन 25 जुलाई को किया गया। उक्त बातें साक्षात्कार के दौरान पीपीपी के केंद्रीय अध्यक्ष किरण कालिंदी ने कही। उन्होंने बताया कि डुवार्स-तराई के विकास में सबसे बड़ी बाधा है पश्चिम बंगाल सरकार, जिसने हमेशा ही आदिवासियों के साथ विश्र्वासघात किया है। इसलिए हमलोग बंगाल से अलग होना चाहते हैं। कालिंदी ने कहा कि यदि छठी अनुसूची या स्वायत्त शासन भी बंगाल की हुकुमत के अधीन हो तो वह बेकार है। सीधा केंद्र सरकार इसे चलाए, तो हमें कोई एतराज नहीं है। यहां हमलोगों के साथ भेदभाव हो रहा है। हमारी संस्कृति बंगाल से नहीं मिलती है। हमलोग हिंदी के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन अभी तक कुछ भी नहीं मिला है। यहां न हम उरांव भाषा बोल पा रहे हंै और न ही संथाली भाषा। उन्होंने सवाल किया कि यहां कितने आदिवासियों को नौकरी मिली है? पंचायत कार्यालय से आंगनबाड़ी केंद्र की नौकरियों में बंगालवाद है। डुवार्स के विकास के लिए किसी भी राजनीतिक दल ने कुछ भी नहीं किया। इस महंगाई में चाय श्रमिक बेहाल हैं। चाय का उत्पादन करते हैं, इसलिए जीवित हैं। आदिवासी विकास परिषद से बहिष्कार किए जाने के प्रसंग में श्री कालिंदी ने कहा कि हम आपिव में हैं, लेकिन आविप के ही कुछ सदस्यों का कहना है कि हमलोगों को बहिष्कार कर दिया गया है। इसलिए अब आविप में शामिल नहीं हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें किसी भी दल से मनमुटाव नहीं है, बशर्तें डुवार्स के विकास के लिए कार्य करे। गोरखा-आदिवासी प्रदेश के प्रसंग में श्री कालिंदी ने कहा कि यह नाम उनसे पूछकर नहीं रखा, इसलिए कुछ भी नहीं कर सकते हैं। आजतक गोजमुमो ने हमलोगों से पूछकर कुछ नहीं किया। गोजमुमो के साथ बैठक के बारे में उन्होंने कहा कि यदि हमें निमंत्रण आता है तो अपने आउस में बैठक राज्य कमेटी से निर्णय लेंगे। बस हमें बंगाल की गुलामी से मुक्त होना है। ट्रेड यूनियन बनाने को लेकर उन्होंने बताया कि हमलोग उसी ट्रेड यूनियन को समर्थन करेंगे, जो श्रमिकों की हित में हो। विधानसभा चुनाव के बारे में श्री कालिंदी ने कहा कि अभी चुनाव आने में देरी है, समय आने पर इस विषय पर बात करेंगे।

अंतरिम सेटअप में तराई-डुवार्स का होगा विरोध

बिन्नागुड़ी,: अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद न तो अंतरिम सेटअप प्रस्ताव का विरोध करती है और गोरखालैंड राज्य की मांग का। मगर, यदि प्रस्तावित अंतरिम सेटअप अथवा अलग राज्य में तराई-डुवार्स को शामिल करने की जुर्रत की गई, तो हम उसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। इसके खिलाफ तराई-डुवार्स में जोरदार आंदोलन किया जाएगा। यह आंदोलन वर्ष 2009 में हुए आंदोलन की तर्ज पर होगा। ये बातें कहीं आविप के प्रदेश अध्यक्ष बिरसा तिर्की ने। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार द्वारा अंतरिम सेटअप के मुद्दे पर 3 अगस्त को आहूत बैठक में नहीं बुलाये जाने का आविप को मलाल नहीं है, क्योंकि यह स्वयंसेवी संगठन है। हम सिर्फ तराई-डुवार्स को प्रस्तावित गोरखालैंड अथवा अंतरिम सेटअप मंें शामिल करने का विरोध कर रहे हैं। हम इस क्षेत्र को किसी भी कीमत पर नहीं देंगे। उन्होंने कहा कि यदि केंद्र व राज्य सरकार अलग राज्य अथवा अंतरिम सेटअप देने पर सहमत हो गयी, तो भी तराई-डुवार्स उससे बाहर रहेगा। मगर, हमारी भावना को नजरअंदाज कर उसे उस प्रस्तावित क्षेत्र में शामिल कर दिया गया, तो जोरदार आंदोलन होगा। हम उसे 40 लाख आदिवासियों की भावना के साथ राज्य व केंद्र सरकार खिलवाड़ कर रही है। आविप का गठन ही आदिवासियों के हित में हुआ है। इसलिए हम उनके कदम के खिलाफ अपनी जान लगा देंगे। राज्य सरकार की आहूत बैठक में आविप को नहीं बुलाये जाने पर तराई-डुवार्स रीजनल कमेटी के अध्यक्ष जॉन बारला ने कहा कि यह राज्य सरकार की मर्जी है। राज्य सरकार की कथनी व करनी में बहुत अंतर है। छठी अनुसूची की मांग हमलोगों ने सरकार के सामने रखी है। उसने इसे लागू करने का वादा भी किया है। मगर, अबतक उस पर कोई काम नहीं हुआ। देखना है कि राज्य सरकार अपना वादा पूरा करती है या फिर आविप को आंदोलन में जाने के लिए मजबूर करती है।

अब नहीं सहेंगे उपेक्षा : मनोहर
सिलीगुड़ी  : को-आर्डिनेशन कमेटी आफ प्लांटेशन वर्कर्स की रविवार को हुई बैठक में उपस्थित विभिन्न श्रमिक संगठनों ने चेतावनी दी कि अब चाय बगान श्रमिकों की समस्याओं की अनदेखी हुई तो श्रमिक संगठन बर्दाश्त नहीं करेंगे तथा आर-पार के आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। बैठक में वक्ताओं ने कहा कि सरकार और चाय बगान मालिकों के साथ 27 जुलाई को हुई बैठक में आश्र्वासन दिया गया था कि श्रमिकों कर मांगों पर दस जुलाई तक अमल शुरू हो जाएगा, मगर अब मालिकों द्वारा इस पर टालमटोल किया जा रहा है। बैठक में सांसद मनोहर तिर्की ने कहा कि अब श्रमिकों की उपेक्षा नहीं सही जाएगी तथा यदि अविलंब मांगों पर अमल शुरू नहीं हुआ तो बगान श्रमिक आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। बैठक में घोषणा की गई कि 11 अगस्त से काम के बाद सभी चाय बगान गेट पर प्रतिदिन सभा की जाएगी। 22 अगस्त से काम के पहले ही सभा होगी।

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प्रोगे्रसिव पीपुल्स पार्टी की बैठक सम्पन्न

बिन्नागुड़ी : वीरपाड़ा प्रणामी मंदिर के प्रांगण में रविवार को प्रोग्रेसिव पीपुल्स पार्टी की दूसरी बैठक सम्पन्न हुई। इस बैठक की अध्यक्षता प्रोग्रेसिव पीपुल्स पार्टी के संस्थापन किरण कालिन्दी ने की। कालिन्दी ने के अलावा बैठक में सुरेश टोप्पो, गणेश उरांव, सोहन लाकड़ा ने सभा को संबोधित किया। सभा दोपहर एक बजे से शुरू हुई और शाम छह बजे तक चली। अपने भाषण में प्रोग्रेसिव पीपुल्स पार्टी के संस्थापक व केन्द्रीय कमेटी के अध्यक्ष ने आविप पर कई आरोप लगाए। अध्यक्ष किरण कुमार कालिन्दी ने कहा कि आविप जो झंडा लेकर घुम रही है वह सिक्किम डेमोक्रेटिक पार्टी ही है। हम किसी का झंडा चुराए है और न ही किसी को आधार बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि छठी अनुसूची मिले या गोरखा स्वायत्त प्रदेश जो भी हो बंगाल सरकार से अलग हो। कालिन्दी ने कहा कि जातपात की राजनीति हमारी संगठन नहीं करती है। हमारे संगठन सभी का स्वागत है। संगठन में बिहारी, नेपाली, आदिवासी, बंगाली सभी वर्ग शामिल है।

 

 

चालीस ट्रेड यूनियनों की बैठक बानारहाट में

बिन्नागुड़ी : डुवार्स इलाके के बानारहाट थाना के अंतर्गत मारवाड़ी धर्मशाला में प्रोग्रेसिव टी वर्कर्स यूनियन की ओर से सभी 40 ट्रेड यूनियन की समस्याओं को लेकर एक बैठक बुलायी गयी है। इस बैठक में मूल रूप से प्रोग्रेसिव टी वर्कर्स यूनियन एवं दार्जिलिंग तराई-डुवार्स प्लांटेशन लेबर यूनियन आदि के साथ मिलकर ज्वाइंट एक्सन कमेटी बनाने की संभावना है। संगठन के डुवार्स संयोजक गोविंद प्रधान ने दी है। वहीं को-आर्डिनेशन कमेटी के घटक ट्रेड यूनियन से मिली जानकारी के अनुसार इस बैठक में को-आर्डिनेशन कमेटी की शामिल होने की संभावना कम है। वहीं प्रोग्रेसिव टी वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष सुकरा मुंडा ने कहा कि चाय बागानों की स्थिति दयनीय है इसमें सुधार की आवश्यकता है। यह बैठक सोमवार सुबह 11 बजे से शुरू होगी।

 

 

चाहिए सिक्किम व भूटान के भू-भाग की जानकारी

कर्सियां  : गोरखा राष्ट्रीय कांग्रेस केंद्रीय कमेटी अध्यक्ष डी.के बम्जन ने प्रधानमंत्री कार्या8य के सीपीआईओ को पत्र भेजकर केंद्र सरकार से आरटीआई के माध्यम से सिक्किम व भूटान के भूभाग संबंधी जानकारी मांगी है। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर मेची नदी से तिस्ता नदी तक का संपूर्ण भूभाग (वर्तमान दार्जिलिंग, सिलीगुड़ी व कर्सियांग) 1788 वर्ष में नेपाल ने सिक्किम से हथियाया था। वर्ष 1815 के सुगौली संधी मार्फत उक्त भूभाग नेपाल ने ईष्ट इंडिया कंपनी के सुपुर्द किया। वही भूभाग वर्ष 1817 में हुए तितलीय संधि मार्फत ईष्ट इंडिया कंपनी ने सिक्किम को लौटा दिया। इसके बाद पुन: 1835 में ईष्ट इंडिया कंपनी ने अपने कर्मचारियों के लिए स्वस्थ अर्जनकारी स्थल का निर्माण करने के लिए वही भूभाग सिक्किम के राजा से डीड आफ ग्रांट के मार्फत लेकर वर्ष 1841 से इस भूभाग का टैक्स सिक्किम के राजा को देना शुरु किया। उन्होंने बताया कि ऐसे ही वर्ष 1706 में सिक्किम से भूटान द्वारा हथियाई गई तिस्ता से नेतु व डेचु नदी तक का संपूर्ण भूभाग (वर्तमान कालिम्पोंग व डुवार्स) भूटान ने 11 नवंबर 1865 में हुई सिंचुला संधी के माध्यम ब्रिटिश भारत के सुपुर्द किया व उसी वर्ष से ब्रिटिश भारत ने इसका टैक्स भूटान सरकार को देना शुरु किया। परन्तु 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र होने के बाद से स्वतंत्र भारत द्वारा सिक्किम व भूटान को टैक्स देने का प्रचलन रहने के बावजूद भी यह भूभाग स्वतंत्र भारत का अंग कैसे बना अब तक स्पष्ट नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि डीड आफ ग्रांट मार्फत सिक्किम से अन्तर्भुक्त भूभाग व सिंचुला संधि मार्फत भूटान से समावेश भूभाग अब तक कब और कैसे भारत में समावेश हुआ , जब कि इन दोनों संधियों को वर्ष 1950 में हुई, भारत-सिक्किम व भारत-भूटान के संधियों ने खारिज कर दिया है। उन्होंने बताया कि भारत के अन्य रजवाड़े के शासकों को स्वतंत्र भारत ने लैंड रिक्विजिशन (एनोसनमेंट आफ कंपन्सेशन एक्ट-1949 मार्फत हर्जाना देकर भारतीय संघ में सम्मिलित होने की सहमति दी परन्तु इन भूभागों के पूर्व शासकों क्रमश: सिक्किम व भूटान से स्वतंत्र भारत ने इस भूभाग के बारे में किस प्रकार की व्यवस्था दी। इसे सार्वजनिक करने की मांग को लेकर आरटीआई की। डीके बम्जन ने कहा कि इस भूभाग के स्वामित्व के बारे में फैसला नहीं होने तक इस भूभाग संबंधी किसी भी प्रकार की व्यवस्था व प्रशासनिक ढांचे को मान्यता देना केवल राजनीतिक भूल-भुलैया से भूलना मात्र है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार से जवाब मिलने के बाद गोरखा राष्ट्रीय कांग्रेस अगला कार्यक्रम तय करने के लिए तत्पर है।

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Tribal front disapproves state map

Siliguri, July 29: A new forum of the tribals today protested the map proposed by the Gorkha Janmukti Morcha for the separate state it wants.

“As the tribals are the majority in the Terai and the Dooars, they (Morcha leaders) are trying to create a rift in the community by sketching a map that covers certain portions of the Dooars and not the entire area,” said Suman Ekka, the general secretary of the Adivasi Democratic Front here.

The front was formed about a month ago comprising members of the political parties like the Congress and the RSP.

“The Dooars and Terai population have always been together and there is no question of separating these areas for the sake of the Morcha,” Ekka said.

After bringing out the map, the Morcha leaders had said they had included only the Gorkha-dominated areas of the Dooars in the map. “But we want to make it clear that there is no area in the Dooars where the Gorkhas are a majority. We have nothing to say if the Morcha continues its agitation for a separate state while keeping its territory limited to the three hill subdivisions.”

Ekka, who introduced himself as a Congress leader, said the tribal population of the Dooars and the Terai would prefer to stay within the administrative ambit of Bengal instead of the Morcha’s separate state. “We would be a minority then if the entire Dooars is not included in the territory (proposed by the Morcha).

Samuel Gurung, a Morcha central committee member in-charge of the Dooars, denied any intention to create a rift among the tribals.

“We have no such intentions. The territory of the proposed separate state that has been demarcated by our party leadership is based on certain facts and not something quirky,” Gurung said.Courtesy:TheTelegraph

Gurung eyes new party for alliance

 - To join hands (or not) for a new state
Morcha fuels tribal split for Dooars entry

 July 28: The Gorkha Janmukti Morcha is now hoping to divide the Adivasis with the help of the newly formed Progressive People’s Party and push ahead with its movement for a new state.

The attempt comes after the Morcha failure to stitch up an alliance with the Terai-Dooars regional committee of the Adivasi Vikas Parishad. Earlier, party president Bimal Gurung had re-christened Gorkhaland — the new state it is clamouring for — as Gorkha Adivasi Pradesh to woo the tribals. But that failed.

Now, the Morcha hopes to take advantage of the fact that the PPP consists of suspended and breakaway leaders of the Parishad who are in favour of a joint movement with the hill party, and gain a foothold in the tribal dominated areas of the Dooars and the Terai.

“This new development will allow the Morcha to make a backdoor entry to a region where it has failed to make major inroads despite repeated attempts,” a Morcha leader said.

The PPP was formed on Sunday after the Parishad’s organising secretary in the Dooars, Raju Bara, and senior party leader Kiran Kumar Kalindi were suspended for “indiscipline”: they had expressed their willingness to talk to the Morcha on the creation of Gorkha Adivasi Parishad.

Samuel Gurung, the organising secretary of the Morcha in the Dooars and Terai, said today: “The formation of the PPP is definitely an indication that the Adivasis have also started an exercise to carve an entity outside of Bengal. We are closely observing the development in the plains and we are willing to work with any party which espouses the cause of separation from Bengal.”

However on a different note, he said: “Leaders breaking away from the Parishad to form the PPP is an internal matter of the outfit. The Morcha would not want to interfere or comment on the development at the moment.”

The Morcha had earlier been hoping to launch a joint movement with the Dooars-Terai regional committee of the Parishad which is the principal outfit representing the tribals in the region. The president of the committee, John Barla, had even written to the Morcha in May saying that he had no objection to discussing a joint movement for statehood.

However, after this, Barla did not take matters forward and now appears to be following the state leadership’s line that the Parishad would have no truck with the hill outfit.

In the past, all attempts by the Morcha to find a toehold in the Dooars had faced resistance largely because of the Parishad’s strong opposition. In fact, there had been frequent clashes between the Gorkhas and Adivasis living in the Dooars. However, sources in the Morcha said the party would now try to cosy up to the PPP and garner Adivasi support for their cause of a separate state.

“If this move proves to be a success, then the Morcha can even use it as a bargaining tool at the tripartite talks or at a later stage, whenever the issue of territorial jurisdiction of the interim authority for the hills comes up,” a Morcha source said.

In fact, the Dooars-Terai Nagarik Manch, a conglomerate of 17 apolitical organisations in the region, has accused the PPP of being a front for the Morcha.

“The Morcha is using the PPP leaders to divide the Adivasis,” alleged Larry Bose, the Manch’s president. “We see no difference between the PPP and the Morcha.”Courtesy:TheTelegraph

अनुशासनहीनता से कडे हुए नेतृत्व के तेवर

बिन्नागुड़ी : अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद कि डुवार्स तराई रीजनल कमेटी व ब्लाक कमेटी में बढ़ती अनुशासनहीनता को देख आविप की राज्य कमेटी ने तेवर कड़े कर दिए हैं। दो सदस्यों की सदस्यता समाप्त कर दी है। इसके अलावा तराई के आविप प्रतिनिधि पर कड़ी नजर रखने की बात भी प्रदेश अध्यक्ष बिरसा तिर्की ने कही है। उन्होंने कहा कि अनुशासनहीनता हमें पसंद नही है। आठ अगस्त को राजस्थान के जयपुर में आल इंडिया ट्राइवल डे मनाया जायगा। इसके बाद डुवार्स तराई इलाकों में विकास व आंदोलन के लिए सभी उचित कदम उठाये जायेंगे। पिछले एक वर्ष से डुवार्स तराई के कई यूनिटों में अनुशासनहीनता की शिकायत मिल रही थी। उन्होने बताया कि जिस प्रकार हस्तिनापुर में पाण्डव कौरवों को अलग करने में शकुनी ने चाल चली थी ठीक उसी तरह से डुवार्स तराई से अखिल भारतीय विकास परिषद को जड़ से उखाड़ फेंकने की कोशिश कुछ लोग कर रहे है। यह सपना साकार नहीं हो पाएगा । अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद कि डुवार्स तराई रीजनल कमेटी के तहत 40 लाख आदिवासी समुदाय के लोग हैं। इन लोगों कि बारे में हमें सोचना है। 200 वर्ष अंग्रेजों की गुलामी मंें काटे, फिर राजनीतिक पार्टियों के, अब आदिवासी किसी के बहकावे में आने वाले नहीं हंै। श्री विरसा तिकर्ीं ने बताया कि प्रोग्रेसिव टी वर्कर यूनियन बनने के बाद आल इंडिया टी प्लांटेशन एसोसिएशन ने मजदूरों की समस्या हल करने के लिए सीधे मजदूरों से बात करने को तैयार है। अब किसी राजनीतिक पार्टी कासंरक्षण चाय बगान श्रमिकों को नही चाहिए। उन्होंने कहा कि चाय बागान श्रमिक यह समझ रहे हैं कि चाय बागानों में पहले क्या था और आज क्या है। एक आदिवासी के दर्द की पीड़ा आदिवासी ही जान सकता है। अर्थात श्री तिर्की ने अपने समर्थकों को सचेत करते हुए षडयंत्रकारियों पर निशाना साधते हुए कहा कि डुवार्स तराई क्षेत्र में आदिवासी समुदायों के हित की बात किसी राजनीतिक दल ने नहीं की। फिर हमारे समर्थक हमारे लोग क्यों राजनीतिक पार्टी के चक्कर में फंसे। देश के न्यूज चैनल व अखबारों की सुर्खियों ने आदिवासी विकास परिषद की नाम छाया रहता है। डुवार्स तराई इलाकों में गैर सरकारी व सरकारी क्षेत्रों में आविप को पहचान मिल रही है। इसी संगठन ने परिषद की प्रतिनिधियों को पहचान दी है। अभी बहुत कुछ मिलने वाला है। अनुशासित रहकर ही हमारे समाज समुदायों का उत्थान हो सकता है। इसलिए मेरा आविप के सभी समर्थको से अनुरोध है कि अनुशासन में रहकर काम करें।

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