कैसे निपटा जा सकता है भूमि संशोधन कानून से

ठीक है दिकुओं की नजर आपकी जमीन पर है। उसके लिए उन्होंने कानून में  छेद भी करवा लिया। तो अब क्या करना है – आंदोलन ??? कितने दिनों तक आंदोलन करेंगे ??? यहाँ कौन सच्चा नेता है जो कुछ करोड़ों में बिकने के लिए तैयार नहीं है ??? अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए आम जनता को किसने इस्तेमाल नहीं किया है ???

आप अंतहीन आंदोलन नहीं कर सकते हैं। आपके पास अपना सर्वस्व कुर्बानी देने लायक नेता नहीं हैं। आप अपने धर्म के खोल से बाहर नहीं आ सकते हैं। आपके पास सभी समाजों और धर्मों के लोगों का नेतृत्व करने वाले सर्वप्रिय और सर्व स्वीकृत नेता नहीं है। ऐसे में आप वोट की शक्ति का भी इस्तमाल अगले चुनाव में नहीं कर सकते हैं। अगले चुनाव तक न जाने कितने खेत खलिहान दिकुओं के भेंट चढ़ जाएँगे। आपके पास इतने पैसे भी नहीं है कि आप कानून की आखिरी मोड तक लड़ेंगे। देश में न्यायपालिका आदिवासियों को न्याय देने के लिए स्वयं आगे भी नहीं आने वाला है और न ही सब कुछ छोड़ कर आपके मामलों की सुनवाई करेगा।  ऐसे में आपके पास विकल्प क्या है ???

लड़ाई वजूद बचाने की है तो आप चुप भी नहीं बैठ सकते हैं। इसलिए कुछ तो करना ही चाहिए।  ऐसे में क्या क्या विकल्प हो सकता है ??? मेरे क्षुद्र दिमाग में एक दो बातें आई है जिसे मैं आपके विचारार्थ सामने रख रहा हूँ। आप दोस्तों के बीच इससे भी बढ़िया योजना हो सकती है जिसे आप कामेंट में दे सकते हैं।cntspt

  1. ऐसे पच्चीस उच्च शिक्षित एक्सपर्ट लोगों की एक समिति बनाइए जो हर सप्ताह कम से कम दस घंटे समाज को दे सकें। समिति में सिर्फ उन्हीं लोगों को शामिल किया जाए जिनमें राजनैतिक महत्वकांक्षा न हो और जो अगले दस सालों तक चुनाव नहीं लड़ें। उन्हें इस विषय पर शपथपत्र जमा करने के लिए कहा जाए । वे आम जनता के सामने इसकी घोषणा भी करें। धर्म और जाति और समुदाय के नाम पर कार्यकलाप करने वालों को इससे दूर ही रखा जाए। इन पच्चीस लोगों में कोई एकक्षत्र नेता न हो और सिर्फ सामूहिक नेतृत्व के अनुसार और आधार पर कार्य किया जाए। मसलन यदि कोई अध्यक्ष पद हो तो तीन लोगों को अध्यक्ष बनाया जाए, जिन्हें समान उतरदायित्व मिले और कोई भी एक सदस्य अकेले निर्णय न लें । इसी तरह हर कार्य के लिए पदनाम और उतरदायित्व दिया जाए।
  2. यह समिति जमीन की लड़ाई को हर स्तर पर लड़े साथ ही समस्या का स्थायी समाधान करने के लिए वह सब कुछ करे जो इसे करना चाहिए।
  3. सभी झारखण्डी कम से कम सौ रूपये इस समिति के कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए अंशदान दें।
  4. एक स्टडी ग्रुप बना कर जमीन से संबंधित तमाम कानूनों का अध्ययन किया जाए और ग्रुप के कार्यों पर किताब प्रकाशित किया जाए जिसे पूरे झारखण्ड में बाँटा जाए।
  5. तमाम झारखण्डी शहरों के आसपास की उन तमाम जमीनों का सर्वे किया जाए और सीएनटी और एसपीटी जमीन के कागजातों का एक डेटाबेस बनाया जाए और किसी भी जमीन को न बेचने के लिए रैयतों से शपथ पत्र लिया जाए।
  6. सभी ऐसे जमीनों को मिला कर एक जमीन बैक बनाया जाए और उन जमीनों के आधार पर एक रैयत कोऑपरेटिव बैंक बनाया जाए। सभी जमीनों को कोऑपरेटिव बैंक के अधीन रेहन रखा जाए और किसी भी तरह की कानूनी लड़ाई को ऑल झारखण्ड रैयत परिसंघ के बैनर तले लड़ा जाए।
  7. जो जमीन बिक चुकी है या गलत ढंग से दिकुओं के द्वारा कब्जा किया है उसे वापस करने के लिए कानूनी उपाय किया जाए।
  8. यह समिति राज्य भर में घुमे और लोगों को विभिन्न माध्यमों के द्वारा अपने साथ जोड़े।
  9. सभी रैयतों को कोऑपरेटिव बैंक का शेयरधारी बनाया जाए और सभी झारखण्डी इस बैक का शेयरधारी बने ।
  10. बैंक के शेयर राशि को रैयतों की आवश्यकता के आधार पर जमीन के टुकड़े की राशि के बराबर तक आग्रीम दिया जाए। इस प्रकार सब जमीन बैंक के अधीन आ जाए।
  11. समिति के सभी सदस्य हर महीने लोगों के साथ एक बैठक करे जिससे सभी उनके कार्यों से अवगत हो सकें। समिति अपने कार्यों को लिखित रूप से भी जनता को वितरित करें।
  12. यदि जनता चाहे तो समिति की कई उपसमिति और शाखाएँ बनाई जाए ताकि अधिक लोग इसमें अपनी सहभागिता दे सकें और अपने अधिकतम लोगों का लिखित सुझाव लिया जा सके।

वजूद की लड़ाई क्या दो तीन महीने चलने वाला कोई आंदोलन नहीं है । समस्या का स्थायी बंदोबस्त  करना ही  सतर्कता है ।