आदिवासी भाषाऍं, ग्रामीण पुस्‍तकालय और आदिवासी विश्‍वविद्यालय

 शिबु सोरेन की नयी सरकार बन गई है और विभागों को लेकर मचे मनमुटाव के बाद कार्य करते हुए दीख भी रही है। न्‍यूनतम साझा कार्यक्रम के अन्‍तर्गत नयी घोषणाऍं भी की जा रही हैं। जाहिर है कि नयी सरकार की नयी प्राथमिकताऍं हैं और उन्‍हें अपने वादों को पूरा करने और ठोस परिणाम प्राप्‍त करने के लिए कार्य करना होगा और इसमें समय भी लगेगा। मेहनत से किए गए कार्यो का सुपरिणाम भी होता है। यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि अलग झारखण्‍ड राज्‍य की स्‍थापना के लिए दिन–रात एक कर देने वाले शिबु सोरेन बार–बार हाथ से फिसलते हुए सत्‍ता को बरियार से पकड कर, जनता का कितना भला कर सकते हैं। जी हॉं, लगता है तो यही है कि इस बार श्री सोरेन को मुक्‍कमल रूप से सत्‍ता की लगाम हाथ लगी है। लेकिन देखना यह है कि वे कितने मुक्‍कमल रूप से शासक बनते हैं। झारखण्‍ड मुलत: एक आदिवासी राज्‍य है। आदिवासियों की एक अलग राज्‍य की मांग के औचित्‍य को गंभीरता से लेने के बाद ही इसका गठन किया गया था। लेकिन दुख की बात है कि झारखण्‍ड का गठन हुए एक दशक हो जाने के बावजूद आदिवा‍सियों के द्वारा मांगी गई विकास की स्थितियॉं जस की तस है। आदिवासियों की आकांक्षाओं को आज तक की सरकार पूरी नहीं कर पायी है। यह सच है कि पूर्ववर्ती सरकारों के मुखिया आदिवासी ही रहे हैं। लेकिन पूर्ववर्ती सरकारों के समय विकास की सच्‍ची मांगे और आकांक्षाऍं वियावन में खो गए। पूर्ववर्ती सरकारों के आदिवासी मुखियागणों की पृष्‍टभूमि ऐसी नहीं थी जैसी पृष्‍टभूमि से तप कर श्री शिबु सोरेन बाहर आए हैं। श्री शिबु ने जितना जुझारूपन का परिचय झारखण्‍ड की मांग के दौरान दिया था, यदि उतना ही अभी भी दे तो शायद झारखण्‍ड की तस्‍वीर ही बदल जाए। यह ठीक है कि लोकतंत्र में लोक की गणना अधिक होती है और गठबंधन और पैबंद लगे सरकार से अधिक की उम्‍मीद नहीं की जा सकती है। लेकिन विकास के लिए सच्‍चे मन से कार्य करने वाले से उम्‍मीद करना अनुचित नहीं कहा जा सकता है। पिछली सरकार में रहते हुए तत्‍कालीन शिक्षा मंत्री बंधु तिर्की ने आदिवासी समाज के हक में कई घोषणाऍं की थीं। लेकिन उन घोषणाऍं को कार्यरूप में पूरा करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए। इन्‍हीं घोषणओं में आदिवासी विश्‍वविद्यालय और आदिवासी भाषाओं में समुचित शिक्षण व्‍यवस्‍था थी। श्री बंधु तिर्की ने हर गॉंव में एक पुस्‍तकालय की स्‍थापना करने की भी घोषणा की थीं। लेकिन आकाशी घोषणाऍं धरातल में उतर नहीं पायीं। किसी भी समाज में समय पर उपलब्‍ध सूचनाओं का बहुत महत्‍व होता है। आदिवासी समाज जैसे पिछडे समाज में तो शिक्षा और सूचनाओं की उपलब्‍धता अमृत का काम करता है। आदिवासी भाषाओं का संरक्षण और संवर्धन का काम अत्‍यंत महत्‍व का है। इसमें समय पर उठाए गए कदमों से सुपरिणाम मिलेगा ऐसी उम्‍मीद की जा सकती है। अमरकंटक में अखिल भारतीय आदिवासी विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना की गई है। लेकिन यदि झारखण्‍ड की कला, संस्‍क़ति और भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन के लिए एक झारखण्‍डी विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना की जाए तो यह सोने पर सुहागा सिद्ध होगा। इससे एक ओर जहॉं सामाजिक प्रतिमानों की उचित विवेचना की जा सकेगी वहीं ज्ञान की प्रज्‍जवलता से रूढिवादी मानसिक बंधनों से आम जनता को मुक्‍त करने का महान कार्य किया जा सकता है। आदिवासियों के द्वारा आदिवासियों के लिए और आदिवासियत के साथ किए जाने वाले कार्यो से आदिवासी समाजों को अत्‍यंत लाभ प्राप्‍त होगा, इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए। गॉंव–गॉंव में पुस्‍तकालय की स्‍थापना हमारे नौनिहालों को ज्ञान के रास्‍ते उन्‍नति का मार्ग दिखाएगा। आज भी आम जनता सामान्‍य ज्ञान और सूचनाओं से रहित हैं। बिजली न होने के कारण लोगों के घरों में टेलिविजन का आगमन बडे स्‍तर पर नहीं हो पाया है। अखबार लेने की शक्ति और इच्‍छा सबमें नहीं है। ऐसे में वाचन की आदत का विकास ग्रामीण पुस्‍तकालय में कम से कम एक अखबार मंगा कर तो की जा सकती है। अखबार वाचन से ज्‍यादा उत्‍तम और क्‍या होगा ? यह सिद्ध हो चुका है कि बचपन से ही अखबार, पत्रिकाऍं और सामान्‍य पुस्‍तकें पढने वाले आगे चल कर एक जागरूक नागरिक बनते हैं और समाज और देश के विकास में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। ग्रामीण स्‍तर पर स्‍थापित पुस्‍तकालय ग्रामीणों में न सिर्फ जागरूकता बढाता हैं, बल्कि कालांतर में उच्‍च साक्षरता की दर को बढाने में भी सहायक होता है। ग्रामीण पुस्‍तकालयों की स्‍थापना और बिजली का आगमन से गॉंवों में कम्‍प्‍युटर ढाबों और ग्रामीण इंटरनेट केन्‍द्रों की भी स्‍थापना के लिए राह खुलेंगी। इससे न सिर्फ सामाजिक और राजनैतिक जागरूकता में वृद्धि होगी, बल्कि कृषि आधारित आर्थिक विकास को भी इससे गति मिलेगी। आदिवासी समाज सामाजिक और सांस्‍कृतिक रूप से बहुत सम्‍पन्‍न समझा जाता है। सम्‍यक शिक्षा और उचित स्‍तर के ज्ञान मिलने पर यह कई मामलों में अनेक समाजों से आगे निकल जाता है। अधिकतर शिक्षित आदिवासी सामाजिक रूढियों को तुरंत त्‍याग देते हैं और नई और आधुनिक चीजों और विचारों को दूसरे समाज की तुलना में जल्‍द अपनाते हैं। समाज में इस विषय पर अभी तक कोई विस्‍तृत अध्‍ययन नहीं हुआ है लेकिन यदि अध्‍ययन किया जाए तो यह बात साबित हो जाएगा। श्री बंधु तिर्की ने घोषणाऍं तो कर दी थीं लेकिन अपनी घोषणाओं और योजनाओं को असली जामा पहनाने के लिए उन्‍होंने किस स्‍तर पर कोशिश की थीं, यह तो ज्ञात नहीं है। लेकिन ये योजनाऍं बहुत महत्‍वपूर्ण हैं और इसकी दूरगामी सुपरिणाम से इंकार नहीं किया जा सकता है। समाज को दूर तलक तक ले जाने वाली घोषणाऍं अपनी धरातल पर उतरे यह इसके लिए प्रयास करना पूरा समाज का दायित्‍व बनता है। नयी सरकार की अपनी अलग योजनाऍं हो सकती हैं जिसे वह लागू करना चाहेगी। लेकिन मंत्रालयों में पहले से तैयार योजनाओं पर अब क्‍या रूख अपनाया जा रहा है। इसकी पडताल तो की जा सकती है। यह पडताल किसी भी स्‍तर पर की जा सकती है। यदि नये चुने गए जनप्रतिनिधि इस विषय को गंभीरता से लेते हैं तो यह साबित हो ही जाएगा कि वे समाज विकास में वकई गंभीर हैं। झारखण्‍ड की स्‍थापना के लिए अपनी जान लडा देने वाले शिबु सोरेन से इस विषय पर बात की जानी चाहिए और उन्‍हें समाज विकास के लिए अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण योजनाओं को पूरा करने के लिए सहमत किया जाना चाहिए।

1 thought on “आदिवासी भाषाऍं, ग्रामीण पुस्‍तकालय और आदिवासी विश्‍वविद्यालय”

  1. कुरुख भाषा की पुस्तक छत्तीस गढ़/झारखण्ड मे कहा मिलेगी?

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