सवाल नेता और भाषा का

एक समाचार

शपथ ग्रहण में दिखी भाषाई विविधता : झारखंड की तीसरी विधानसभा के प्रथम सत्र की औपचारिक शुरुआत सोमवार को प्रोटेम स्पीकर टेकलाल महतो के आसन ग्रहण के साथ हुई। पहला दिन होने के कारण पूरी कार्यवाही नव निर्वाचित विधायकों के शपथ ग्रहण के नाम रही। सात विधायकों ने संथाली में शपथ ली, जबकि चार ने उर्दू और दो ने बांग्ला में। दोनों पालियों में उपस्थित कुल 70 विधायकों में से शेष ने हिंदी में शपथ ली। विधायक टेकलाल महतो प्रोटेम स्पीकर की हैसियत से आसन पर थे इसलिए उन्हें शपथ लेने की जरूरत नहीं थी। दस विधायक सदन से अनुपस्थित रहे, जिनमें तीन एनोस एक्का, हरिनारायण राय और पौलुस सुरीन जेल में हैं। विधायकों के शपथ ग्रहण सत्र में मुख्यमंत्री शिबू सोरेन 11.40 बजे आए। वे सदन के सदस्य नहीं हैं। विधायकों के शपथ ग्रहण की शुरुआत उपमुख्यमंत्री पद के लिए नामित रघुवर दास से हुई। उनके पश्चात दूसरे उपमुख्यमंत्री सुदेश कुमार महतो ने शपथ ली।साभार-दैनिक जागरण

  एक विचार

झारखण्ड विधान सभा में नव निर्वाचित विधायकों द्वारा विधानसभा में सदन की सदस्यता ग्रहण करते समय लिए गए शपथ में प्रयोग किए गए भाषाओं पर एक निगाह देने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि आदिवासी समाज में अपनी आदिवासी मातृभाषा को लेकर कितनी जागरूकता है। सदन की सदस्यता ग्रहण करते वक्त संथाली भाषा के सिवा सदस्यों द्वारा और कोई झारखण्डी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया गया। सदन में नागपुरी, खोरठा, पंचपरगनिया, मुण्डारी, खड़िया, कुँड़ुख, हो आदि हर भाषा-भाषी सदस्यों ने (प्राप्त समाचारों के अनुसार) अपनी मातृभाषा से इतर भाषाओं में सदन की सदस्यता ग्रहण की। किसी भी व्यक्ति पर किसी भी भाषा को थोपना किसी भी प्रकार से उचित नहीं कहा जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति का यह अधिकार है कि वह अपनी पसंद की भाषा का प्रयोग अपनी मर्जी से करे।

इन पंक्तियों के बीच यह उल्लेख करना गलत नहीं होगा कि गद्दीनशीन होते ही झारखण्ड के मुख्यमंत्री शिबु सोरेन ने घोषणा की, कि भोजपुरी, मैथिली, बंग्ला और संताली को द्वितीय राजभाषा बनाने के लिए जल्द ही अधिसूचना जारी कर दी जाएगी। भाषा का सवाल झारखण्ड के लिए कितना तत्कालिक और दूसरे मुद्दों से कितना अधिक महत्व का है या तो श्री सोरेन ही बता सकते हैं। लेकिन आदिवासी भाषा और संस्कृति की रक्षा के लिए प्रयासरत लोगों को श्री सोरेन की भाषाई घोषणा और सदन के लिए नवनिर्वाचित आदिवासी सदस्यों के मातृभाषा में शपथ नहीं लिए जाने पर जरूर निराशा हाथ आई है। श्री सोरेन की घोषणा में संताली के रूप में एक आदिवासी भाषा जरूर शामिल है, लेकिन घोषणा में नागपुरिया, सादरी, खोरठा, पंचपरगनिया, मुण्डारी, खड़िया, कुँड़ुख, हो भाषाओं के लिए कोई संकेत मौजुद नहीं है। क्या इन भाषाओं को सरकारी मान्यता और राजाश्रय की आवश्यकता नहीं है ?

 झारखण्ड राज्य की स्थापना की मांग में स्वशासन के साथ झारखण्डी समाजों की भाषा-संस्कृति और अस्मिता की रक्षा भी शामिल था। आज एक ओर उन भाषाओं को झारखण्ड की द्वितीय राजभाषा के रूप में मान्यता देने की तैयारी चल रही है, जिनके बोलने वालों ने झारखण्ड को नहीं बनने देने के लिए दिन-रात एक कर दिए थे और झारखण्ड आंदोलन को देशविरोधी तथा विच्छिऩ्नतावादी कहते नहीं अघाते थे।   साथ ही उन भाषाओं को नेपथ्य में डालने की पूरी तैयारी की जा रही है, जिन्हें प्रयोग करने वालों ने अपना खून और सर्वस्व झारखण्ड की मांग को पूरा करने के लिए न्यौछावर कर दिए थे। आज झारखण्ड में राज करने के लिए जिन्होंने जनता का विश्वास और वोट लिया वही जनता की भाषा में बोलना भूल गए हैं। कहते हैं सत्ता बड़े-बड़ों के चरित्र में बदलाव ला देता है। इस कहावत को झारखण्ड में चरितार्थ होते प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। समाज शास्त्रीय नज़र से देखा जाए तो यह कहना गलत नहीं होगा कि पूरा  शिक्षित-आदिवासी-समाज का चरित्र ही बदल गया है। अपनी भाषा, परंपरा और अस्मिता को त्यागने में शिक्षित आदिवासियों का मुकाबला शायद ही कोई कर सकता है। ऐसे में आदिवासी नुमंइदों द्वारा अपनी भाषा में बातचीत न करने अथवा शपथ न लेने की घटना यदि आश्चर्य पैदा नहीं करता है तो दंग नहीं होना चाहिए। जब पैसा, शक्ति और सत्ता हाथ में आता है तो व्यक्ति का वर्ग चरित्र बदलता ही है। यदि ऐसे व्यक्तियों का नैतिक विचार मौलिकता से परिपूर्ण  और अपरंपारिक हो तो उससे सामाजिक और स्वीकार्य आचार-व्यवहार की आशा बेमानी ही होगी। तथापि सामाजिक रूप से ऐसे व्यक्तियों की सामाजिक और कानूनी प्रतिबद्धता पर सवाल उठाना अनुचित नहीं होगा। ऐसे लोग अपनी व्यक्तिगत विचारों के आधार पर जनता का विश्वास तो अर्जित नहीं ही किए होते हैं। वे अपनी व्यक्तिगत पसंद-नपसंद गोपनीय रखकर और एक छद्म रूप को जनता के सामने रखकर लोगों के विश्वास और वोट अर्जित करते हैं और नेता बनते हैं। यह सामाजिक आचार, नैतिकता और कानून के विरूद्ध है और ऐसे व्यवहार ठगी कहलाता है। जनता के वोट लेने के लिए सकारात्मक वादे करने और जन प्रतिनिधि बनने के बाद जनता की आकांक्षाओं के विपरीत व्यवहार करने को किसी भी तरह से नैतिक और उचित नहीं कहा जा सकता है।

झारखण्ड में आम जनता गरीबी, अशिक्षा, हिंसा, शोषण, आर्थिक-सामाजिक यथास्थिति से छु़टकारा पाना चाहती है। वह अपनी विशिष्ट पहचान, संस्कृति़, भाषा, अस्मिता, जल, जमीन, जंगल को बचा कर रखना चाहती है। वह उन सारे कारकों और कारणों से बचना चाहती है, जिनके कारण वह सदियों से त्रस्त थी। उसने झारखण्ड अलग राज्य को लोकतांत्रिक ढांचे में एक समाधान के रूप में देखा था। स्वशासन को जनता की स्वयं आकांक्षा की पूर्ति के माध्यम के रूप में देखा था। लेकिन अब तक उनकी सारी उम्मीदें एक-एक कर टू़टती रही हैं। कमोबेश सारे नेता ठग बनके उन्हें ठगते रहे हैं। झारखण्डी जनता अपनी भाषाओं को नेपथ्य में रखकर ऐसी भाषाओं को सम्मानित होते हुए देख रही है, जिन्हें वह अपने साथ हुए शोषण और भेदभाव के संवाहक के रूप में देखती रही है। जनता के जेहन में सवाल उठ रहे हैं कि क्या झारखण्ड के रचयिता श्री शीबु सोरेन झारखण्डी-अस्मिता के संहारक बनेंगे ?         

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