कारगर रणनीति का कमाल

 राजनीति में अच्‍छी तरह सोचसमझ कर बनाए गए कारगार रणनीति का क्‍या प्रभाव होता है, इसका एक ज्‍वलंत उदाहरण आदिवासी विकास परिषद् और पश्चिम बंगाल के मुख्‍य सचिव के बीच दिनांक १ जुलाई को सम्‍पन्‍न हुई वार्ता है।

यह वार्ता तब हुई जब विकास परिषद् के डुवार्स–तराई समिति ने गोर्खा जनमुक्ति मोर्चा के साथ बातचीत करने का फैसला लिया। पिछले दो वर्षो से अपने विभिन्‍न मांगों के समर्थन में विकास परिषद जनसंघर्ष कर रहा था। लेकिन तमाम बंद–हडताल करने, मोर्चा निकालने और धरना देने के बावजूद सरकार के कानों तक उनकी आवाज नहीं पहुँच रही थी। सरकार उनकी हर आवाज को न सिर्फ अनसुना कर रही थी, बल्कि उसकी अहमियत को भी कम आंक रही थी। लेकिन सरकार में बैठे राजनीतिज्ञ–नौकरशाह आदिवासी–गोर्खा राजनीति की एकता और भावना को सुन कर ही चौंक उठे और विकास परिषद को वार्ता का न्‍यौता दे डाले।

 

डुवार्स और तराई के आदिवासी एक टेक लगा कर आदिवासी विकास परिषद को बिना शर्त अपना समर्थन दे रहे हैं। लेकिन उत्‍तर बंगाल की राजनीति की कलकल बहती नदी में प्रतिदिन ही आदिवासी विकास परिषद की दो विचारधारा दृष्टिगोचर हो रही है। राज्‍य समिति के अध्‍यक्ष और सचिव अपना सुर गोर्खा राजनीति के विरोध में निकालते हैं, वहीं डुवार्स–तराई आंचलिक समिति गोर्खा जनमुक्ति मोर्चा के साथ बातचीत करने का पक्षधर है।

 

आंचलिक समिति के निर्णय के कारण ही डुवार्स तराई में आदिवासी–गोर्खा मैत्री की संभावना बनती दिखाई देने लगी है। यह अच्‍छी तरह सोची समझी रणनीति का हिस्‍सा है और इसका प्रतिफल समाज को तुरंत मिला, अर्थात आदिवासी मांगों को पूरा करने का प्रशासनिक आश्‍वासन मिला। यह अलग विषय है कि प्रशासन अपने वादे पर कितना खरा उतरता है। यदि राज्य समिति की राय पर ही कायम रहते तो निश्चय ही वार्ता का कोई बुलावा नहीं आता।

आदिवासी विकास परिषद ने सरकार को अपनी 19 मांगों की सूची सौंपीं है। आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्रों के विकास से संबंधित इन मांगों को पूरा करने की सरकार द्वारा कोई स्‍पष्‍ट समय–सीमा नहीं दी गई है और न ही कोई लिखित आश्‍वासन मिला है। लेकिन जब प्रशासन के शीर्ष नेतृत्‍व द्वारा आश्‍वासन दी गई है, तो यह मान लेना चाहिए कि इसमें राजनैतिक नेतृत्‍व की पूर्ण सहमति सम्मिलित है और इसका राजनैतिक लाभ राजनैतिक नेतृत्‍व को ही मिलेगा और यदि वादा खिलाफी की गई तो इसका फल भी राजनैतिक नेतृत्‍व को ही भुगतना पडेगा।  

 

पश्चिम बंगाल सरकार आदिवासी समाज से संबंधित सभी मांगों को मान तो ली है। लेकिन सभी मांगों को वह अपने बलबूते पूरी करने की स्थिति में नहीं है। सरकार से संबंधित कुछ मांगों को वह तुरंत पूरी कर सकती है, उसके लिए उसे सिर्फ प्रशासनिक आदेश ही निर्गत करने होंगे। लेकिन चाय बागान मजदूरों की मजदूरी 250 रूपये करने की मांग तो चाय बागान प्रबंधन संघ से जुडी हुई है। चाय बागान प्रबंधन संघ के द्वारा हामी भरने पर ही यह मांग पूरी होगी। साल दर साल सिर्फ एक रूपया मजदूरी बढ़ाने के लिए मुश्किल से सहमत होने वाले मालिक पक्ष कितनी जल्‍दी इस मांग को मान लेंगे।  यह तो भविष्‍य ही बताएगा, लेकिन इसके लिए भी बहुत सोच समझ कर सही रणनीति अपनाने की जरूरत पड़ेगी।

अब तक बागान प्रबंधन मजदूरों के संघर्ष को इसलिए काबू में रख पाया है क्‍योंकि मजदूरों में लम्‍बी लडाई लडने की आर्थिक सबलता नहीं है। प्रबंधन और मजदूर संघों के बीच तोलमोल और एग्रीमेंट होने वाले बैठकों में मजदूर नहीं, बल्कि सिर्फ वही नेतागण भाग लेते रहे हैं जो मजदूर वर्ग से नहीं हुआ करते थे। उन्‍हें उद्योगपतियों के प्रतिनिधि कम मजदूरी पर ही सहमत होने के लिए आसानी से मना लेते थे। यदि मजदूर पक्ष मजबूती से दस से पद्रंह दिन हडताल सहने में सक्षम होंगे, बागान बंद होने पर भी उनके पास वैकल्पिक आय के साधन होंगे अथवा घर का चूल्‍हा जलने लायक अन्‍य स्त्रोत  होंगे तथा सही समय पर मांग रखी जाए तो शायद ज्‍यादा मजदूरी बढने की कुछ संभावना होगी।  

 

मजदूरों के श्रम पर भरपूर मुनाफा कमाने और मजदूरों को ढेला की तरह नाममात्र की मजदूरी देने की आदत रखने वाला चाय बागान मालिक पक्ष कितना प्रतिशत मजदूरी बढाना चाहेगा, यह तो वक्‍त ही बताएगा। इस विषय पर पश्चिम बंगाल सरकार कितना दबाव बना पाएगी यह भी देखना है। चुनाव के लिए सत्‍ताधारी पार्टियॉं अपने राज्‍य के प्रमुख उद्योग क्षेत्र से ही चुनाव फंड इकट्ठा करती है। चुनाव फंड इकट्ठा करने के वर्ष में सरकार बागान मालिक पक्ष पर कितना दबाव बनाएगी, यह देखना काफी दिलचस्‍प रहेगा। इसलिए इस विषय पर तुरत–फुरत कोई सफलता मिलने की संभावना नहीं दिखती है।

 

इसी तरह का जटिल विषय है, चाय बागानों के क्‍वार्टरों और उससे जुडी भूमि के पट्टे को मजदूरों के नाम आबंटित किया जाना। बागान के मजदूरों के लिए बनाए गए आवासों का किराया बागान वसूलता है। यह वसूली नकद न होकर मजदूरी के निर्धा‍रण के समय मजदूरों की नागरिक सुविधाओं में जोड दिया जाता है। प्रतिदिन मजदूर अपने आवास के लिए पॉंच रूपये से अधिक किराया चुकाता है। देखा जाए तो कई दशकों तक चुकाए गए किराए का कुल जमा राशि मजदूर आवास के लागत से भी अधिक ही होगी।  मजदूर आवास के निमार्ण के लिए सरकार 66 प्रतिशत तक सहायता राशि प्रदान करती है। शेष राशि बागान प्रबंधन लम्‍बी अवधि के अत्‍यंत कम लागत के ऋण लेकर पूरा करता है, जिस पर भारी टैक्‍स का रियायत भी मिलता है। देखा जाए तो इन घरों पर बागान प्रबंधन अपनी लागत वसूल चुका होता है। इसलिए इन घरों के आबंटन पर उनकी आपत्ति ज्‍यादा गंभीर नहीं होनी चाहिए। लेकिन आवास और भूमि का आबंटन प्राप्‍त करने के बाद यदि मजदूर बागान का नौकरी त्‍याग देता है, तो उसकी जगह भर्ती किए गए नये मजदूर के लिए बागान प्रबंधन को नया घर बनवाना पडेगा। चाय बागानों में बनाए गए घरों के आकार प्रकार भी एक नहीं है। कहीं बडे कमरे बनवाए गए हैं तो कहीं अत्‍यंत छोटे। कहीं आवास के साथ काफी बडे भूमि–आकार जुडी हुई है, तो कहीं अत्‍यंत कम। यदि इन्‍हीं घरों का ही आबंटन होगा, तो सभी मजदूरों को बराबर का हिस्‍सा नहीं मिलेगा। फिर एक घर अथवा आवास भूमि में दो–तीन परिवार भी रहते हैं, उन्हें कैसे बँटवारा मिलेंगे। अनेक बागानों में भारी संख्‍या में ऐसे परिवार भी रहते हैं, जो स्‍थायी रूप से बागान में काम नहीं करते हैं और वे इधर उधर बिखरे खाली जगहों पर झोपडी अथवा मकान बना कर रहते हैं। आवास के लिए तो उन्‍हें भी सुविधाऍं मिलनी चाहिए। दक्षिण भारत में चाय बागान मजदूर औद्योगिक बस्तियों में नहीं बसते हैं और बागान से बाहर से मजदूरी करने आते हैं। डुवार्स तराई में भी उन्हें आवास भत्ते दिए जाएँ तो बात बन सकती है। लेकिन यह मामला को पूरे राज्य में ही लागू करना पड़ेगा। मालिक पक्ष इस मामले को लटकाना चाहेगा। उनका तर्क यह होगा कि बागान के भूमि–कागजातों के आधार पर ही उऩ्होंने वित्तीय संस्थानों से ऋण लिया है। लेकिन भूमि तो सरकारी होती है, देखना दिलचस्प होगा कि वित्तीय संस्थान किस आधार पर उन्हें ऋण प्रदान की हैं।

आदिवासी समाज से संबंधित अत्यंत महत्वपूर्ण मामला है उच्च शिक्षा (बीए, बीकाम, बीएससी, एमए, एमकाम) में हिन्दी भाषा को परीक्षा लिखने की वैकल्पिक भाषा के रूप में मान्यता देने की। लेकिन परिषद् इस मामले को अब तक सरकार और मी़डिया के सामने ठीक से रख नहीं पाया है। बंगाल सरकार और मीडिया हिन्दी भाषा के सवाल को सिर्फ प्राथमिक और उच्च विद्यालय से जोड़ कर ही सामने रखती है। यह समस्या से ध्यान भटकाने का एक प्रयास ही है। उच्च शिक्षा के बिना समाज का विकास किसी भी तरह नहीं होनेवाला है। विकास करना है तो विश्वविद्यालय स्तर की परीक्षाओं में हिन्दी भाषा को विकल्प बनाना ही होगा। यदि बंगाल सरकार इससे इन्कार करती है तो सभी हिन्दी स्कूलों को अंग्रेजी माध्यम में परिवर्तन करने के लिए आवाज उठाया जाए।

 

परिषद् और मुख्य सचिव के मध्य हुई तमाम बातें सिर्फ प्रशासनिक बातें थीं। सिर्फ राजनैतिक बातों से नयी चीजें हासिल होती हैं। फिर भी इन तमाम मामलों से आदिवासी समाज में कुछ सुधार तो आ ही सकता है, लेकिन इससे सामाजिक और राजनीतिक दृश्यों में कोई अमुलचूल बदलाव नहीं आएगा। सरकार डुवार्स–तराई में किस स्तर के प्रशिक्षण केन्द्र बनाएगी ? प्रशिक्षण के बाद शैक्षणिक योग्यता के अनुसार उन्हें कहाँ नौकरी मिलेगी ? बंगाल में तो सिर्फ सात प्रतिशत ही आरक्षण उपलब्घ है। इससे कितनों को नौकरी मिलेगी ? स्वरोजगार के लिए किन क्षेत्रों में सरकार कितना निवेश करेगी, यह भी स्पष्ट किया जाना बाकी है। ढाँचागत विकास के लिए इस सरकार के पास गिनती के दिन ही बाकी है। सरकार की इमानदारी पर मधुबागानियार ने पहले भी शंका जाहिर किया है कि पिछले चौंतिस साल में जो सरकार ने आदिवासी विकास के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया वह सात–आठ महीने में क्या कर पाएगी ?

 

पश्चिम बंगाल में ट्राइबल एडवाइजरी कौंसिल का गठन नहीं किया गया है, जबकि संविधान के पाँचवी अनुसूची में साफ–साफ लिखा गया है कि जिन राज्यों में शिड्युल एरिया नहीं होगा, लेकिन पर्याप्त आदिवासी जनसंख्या होगी वहाँ भी ट्राइबल एडवाइजरी कौंसिल का गठन किया जाए। ट्राइबल एडवाइजरी कौंसिल उन क्षेत्रों के प्रशासन को सुझाव देती है, जहाँ आदिवासी जनसंख्या पर्याप्त मात्रा में हैं। ट्राइबल एडवाइजरी कौंसिल के आदेश प्रशासन के लिए बंधनकारी होता है और वह आदिवासी विकास के लिए राज्यपाल के प्रति जिम्मेवार होती है। आदिवासी विकास की वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपना पड़ता है। आदिवासी विकास परिषद् ने छटवीं अनुसूची की मांग रखी है, लेकिन वर्तमान परिस्थिति पर भी लागू होने वाले प्रावधानों पर चुप्पी साध रखी है। ट्राइबल एडवाइजरी कौंसिल में राज्य विधान सभा के सदस्यों को पदेन सदस्य के रूप में स्थान दिया जाता है, जो प्रशासन को निर्देश जारी करता है और आदिवासी विकास को सुनिश्चित करता है। आदिवासी विकास से संबंधित रिपोर्ट  को ट्राइबल एडवाइजरी कौंसिल द्वारा राज्यपाल के माध्यम से राष्ट्रपति को भेजी जाती है। उल्लेखनीय है कि आदिवासी विकास के लिए केन्द्र सरकार ही पचास प्रतिशत से अधिक राशि प्रदान करती है।

राज्य के मुख्य सचिव के साथ हुई वार्ता में विकास परिषद् ने आदिवासी जमीन की जबरदस्त लूट को उठाया या नहीं यह स्पष्ट नहीं है। सरकार से मांग की जाने चाहिए कि वह इस मामले पर हाईकोर्ट के न्यायधीश के समकक्ष न्यायधीश के द्वारा एक आयोग बिठाए जो सभी भूमि घोटाले मामले की जाँच करे।

मुख्य सचिव के साथ हुई वार्ता तो एक शुरुआत है, ऐसी वार्ताएँ होती रहेंगी। समस्याओं के महासागर में रहने वाले आदिवासी समाज की समस्याएँ तुरंत हल होने वाली नहीं है। यह सरकार तो चंद महीनों की है। चंद महीनों में शायद ही कोई काम मुकम्मल ढंग से पूरी होगी, क्योंकि उपरी स्तर के आदेशों का कार्यन्यवन तो निचले स्तर के अधिकारी और कर्मचारी ही करेंगे और इनकी मानसिकता में रातों रात परिवर्तन नहीं आएँगे। कार्यन्यवन में तकनीकी अड़चनें डाली जाएगी, समय की बर्बादी की जाएगी। इन तमाम अड़चनों से निपटने के लिए भी पहले से ही रणनीति पर बातचीत कर लेनी होगी, अर्थात् प्रशासनिक भ्रष्टाचार और शिथिलता से निपटने के रणनीति बनाने होंगे।

 

सफलता रातों रात नहीं मिलती। एक ही पैंतरा से काम नहीं चलता है। सभी पैंतरे को काम में लाना पड़ता है। आदिवासी विकास परिषद् का गोर्खा जनमुक्ति मोर्चा के साथ मैत्री बढ़ने से राजनीति बरगेन पावर बढ गया है। यह बारगेन पावर शक्तिहीन हो जाएगा, यदि परिषद् मुख्‍य सचिव स्‍तर के वादों से संतुष्‍ट होकर तथा साधारण मांगों से चुप होकर बैठ जाएगा। दोस्ती की भावना ह्लदयवान होने का परिचायक होता है। मैत्री सबलता प्रदान करता है। समाज को अपने दम पर विकास करने के लिए राजनैतिक रूप में सबल होने की जरूरत है। ऐसी राजनैतिक शक्ति प्राप्‍त करने की आवश्‍यकता है, जिसमें वह प्रशासन का नियंत्रण अपने हाथ में रख सके। मुख्‍य सचिव के आदेश के द्वारा वही चीजें मिलेंगी, जो जानबुझ कर चालाकी से रोकी गई थी। ऐसी कोई चीजें और राजनैतिक शक्ति नहीं मिलेगी, जो आदिवासी समाज को विकसित समाजों की श्रेणी में ले जाएगी। आज जरूरत है आदिवासी समाज के बारगेन शक्ति को बढाने का और न्‍यायपूर्ण राजनैतिक और आर्थिक स्‍वशासन प्राप्‍त करने का। समाज का चारित्रिक परिचय गढना और समाज को एक कमेटिट चेहरा प्रदान करना अच्छे नेतृत्व की जिम्मेदारी होती है। किसी बाहरी दबाव के प्रभाव से समाज के दोस्ती की भावना लुप्त न हो। दबावों का मुकाबला बुद्धिमानी से किया जाए। इसके लिए कारगर रणनीति बनायी जाए। सिर्फ कारगर रणनीति और उनके कार्यन्यवन से ही सफलता मिलेगी।

    

  

 

   

 

कारगर रणनीति का कमाल

 

राजनीति में अच्‍छी तरह सोचसमझ कर बनाए गए कारगार रणनीति का क्‍या प्रभाव होता है, इसका एक ज्‍वलंत उदाहरण आदिवासी विकास परिषद् और पश्चिम बंगाल के मुख्‍य सचिव के बीच दिनांक १ जुलाई को सम्‍पन्‍न हुई वार्ता है।

यह वार्ता तब हुई जब विकास परिषद् के डुवार्स–तराई समिति ने गोर्खा जनमुक्ति मोर्चा के साथ बातचीत करने का फैसला लिया। पिछले दो वर्षो से अपने विभिन्‍न मांगों के समर्थन में विकास परिषद जनसंघर्ष कर रहा था। लेकिन तमाम बंद–हडताल करने, मोर्चा निकालने और धरना देने के बावजूद सरकार के कानों तक उनकी आवाज नहीं पहुँच रही थी। सरकार उनकी हर आवाज को न सिर्फ अनसुना कर रही थी, बल्कि उसकी अहमियत को भी कम आंक रही थी। लेकिन सरकार में बैठे राजनीतिज्ञ–नौकरशाह आदिवासी–गोर्खा राजनीति की एकता और भावना को सुन कर ही चौंक उठे और विकास परिषद को वार्ता का न्‍यौता दे डाले।

 

डुवार्स और तराई के आदिवासी एक टेक लगा कर आदिवासी विकास परिषद को बिना शर्त अपना समर्थन दे रहे हैं। लेकिन उत्‍तर बंगाल की राजनीति की कलकल बहती नदी में प्रतिदिन ही आदिवासी विकास परिषद की दो विचारधारा दृष्टिगोचर हो रही है। राज्‍य समिति के अध्‍यक्ष और सचिव अपना सुर गोर्खा राजनीति के विरोध में निकालते हैं, वहीं डुवार्स–तराई आंचलिक समिति गोर्खा जनमुक्ति मोर्चा के साथ बातचीत करने का पक्षधर है।

 

आंचलिक समिति के निर्णय के कारण ही डुवार्स तराई में आदिवासी–गोर्खा मैत्री की संभावना बनती दिखाई देने लगी है। यह अच्‍छी तरह सोची समझी रणनीति का हिस्‍सा है और इसका प्रतिफल समाज को तुरंत मिला, अर्थात आदिवासी मांगों को पूरा करने का प्रशासनिक आश्‍वासन मिला। यह अलग विषय है कि प्रशासन अपने वादे पर कितना खरा उतरता है। यदि राज्य समिति की राय पर ही कायम रहते तो निश्चय ही वार्ता का कोई बुलावा नहीं आता।

आदिवासी विकास परिषद ने सरकार को अपनी 19 मांगों की सूची सौंपीं है। आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्रों के विकास से संबंधित इन मांगों को पूरा करने की सरकार द्वारा कोई स्‍पष्‍ट समय–सीमा नहीं दी गई है और न ही कोई लिखित आश्‍वासन मिला है। लेकिन जब प्रशासन के शीर्ष नेतृत्‍व द्वारा आश्‍वासन दी गई है, तो यह मान लेना चाहिए कि इसमें राजनैतिक नेतृत्‍व की पूर्ण सहमति सम्मिलित है और इसका राजनैतिक लाभ राजनैतिक नेतृत्‍व को ही मिलेगा और यदि वादा खिलाफी की गई तो इसका फल भी राजनैतिक नेतृत्‍व को ही भुगतना पडेगा।  

 

पश्चिम बंगाल सरकार आदिवासी समाज से संबंधित सभी मांगों को मान तो ली है। लेकिन सभी मांगों को वह अपने बलबूते पूरी करने की स्थिति में नहीं है। सरकार से संबंधित कुछ मांगों को वह तुरंत पूरी कर सकती है, उसके लिए उसे सिर्फ प्रशासनिक आदेश ही निर्गत करने होंगे। लेकिन चाय बागान मजदूरों की मजदूरी 250 रूपये करने की मांग तो चाय बागान प्रबंधन संघ से जुडी हुई है। चाय बागान प्रबंधन संघ के द्वारा हामी भरने पर ही यह मांग पूरी होगी। साल दर साल सिर्फ एक रूपया मजदूरी बढ़ाने के लिए मुश्किल से सहमत होने वाले मालिक पक्ष कितनी जल्‍दी इस मांग को मान लेंगे।  यह तो भविष्‍य ही बताएगा, लेकिन इसके लिए भी बहुत सोच समझ कर सही रणनीति अपनाने की जरूरत पड़ेगी।

अब तक बागान प्रबंधन मजदूरों के संघर्ष को इसलिए काबू में रख पाया है क्‍योंकि मजदूरों में लम्‍बी लडाई लडने की आर्थिक सबलता नहीं है। प्रबंधन और मजदूर संघों के बीच तोलमोल और एग्रीमेंट होने वाले बैठकों में मजदूर नहीं, बल्कि सिर्फ वही नेतागण भाग लेते रहे हैं जो मजदूर वर्ग से नहीं हुआ करते थे। उन्‍हें उद्योगपतियों के प्रतिनिधि कम मजदूरी पर ही सहमत होने के लिए आसानी से मना लेते थे। यदि मजदूर पक्ष मजबूती से दस से पद्रंह दिन हडताल सहने में सक्षम होंगे, बागान बंद होने पर भी उनके पास वैकल्पिक आय के साधन होंगे अथवा घर का चूल्‍हा जलने लायक अन्‍य स्त्रोत  होंगे तथा सही समय पर मांग रखी जाए तो शायद ज्‍यादा मजदूरी बढने की कुछ संभावना होगी।  

 

मजदूरों के श्रम पर भरपूर मुनाफा कमाने और मजदूरों को ढेला की तरह नाममात्र की मजदूरी देने की आदत रखने वाला चाय बागान मालिक पक्ष कितना प्रतिशत मजदूरी बढाना चाहेगा, यह तो वक्‍त ही बताएगा। इस विषय पर पश्चिम बंगाल सरकार कितना दबाव बना पाएगी यह भी देखना है। चुनाव के लिए सत्‍ताधारी पार्टियॉं अपने राज्‍य के प्रमुख उद्योग क्षेत्र से ही चुनाव फंड इकट्ठा करती है। चुनाव फंड इकट्ठा करने के वर्ष में सरकार बागान मालिक पक्ष पर कितना दबाव बनाएगी, यह देखना काफी दिलचस्‍प रहेगा। इसलिए इस विषय पर तुरत–फुरत कोई सफलता मिलने की संभावना नहीं दिखती है।

 

इसी तरह का जटिल विषय है, चाय बागानों के क्‍वार्टरों और उससे जुडी भूमि के पट्टे को मजदूरों के नाम आबंटित किया जाना। बागान के मजदूरों के लिए बनाए गए आवासों का किराया बागान वसूलता है। यह वसूली नकद न होकर मजदूरी के निर्धा‍रण के समय मजदूरों की नागरिक सुविधाओं में जोड दिया जाता है। प्रतिदिन मजदूर अपने आवास के लिए पॉंच रूपये से अधिक किराया चुकाता है। देखा जाए तो कई दशकों तक चुकाए गए किराए का कुल जमा राशि मजदूर आवास के लागत से भी अधिक ही होगी।  मजदूर आवास के निमार्ण के लिए सरकार 66 प्रतिशत तक सहायता राशि प्रदान करती है। शेष राशि बागान प्रबंधन लम्‍बी अवधि के अत्‍यंत कम लागत के ऋण लेकर पूरा करता है, जिस पर भारी टैक्‍स का रियायत भी मिलता है। देखा जाए तो इन घरों पर बागान प्रबंधन अपनी लागत वसूल चुका होता है। इसलिए इन घरों के आबंटन पर उनकी आपत्ति ज्‍यादा गंभीर नहीं होनी चाहिए। लेकिन आवास और भूमि का आबंटन प्राप्‍त करने के बाद यदि मजदूर बागान का नौकरी त्‍याग देता है, तो उसकी जगह भर्ती किए गए नये मजदूर के लिए बागान प्रबंधन को नया घर बनवाना पडेगा। चाय बागानों में बनाए गए घरों के आकार प्रकार भी एक नहीं है। कहीं बडे कमरे बनवाए गए हैं तो कहीं अत्‍यंत छोटे। कहीं आवास के साथ काफी बडे भूमि–आकार जुडी हुई है, तो कहीं अत्‍यंत कम। यदि इन्‍हीं घरों का ही आबंटन होगा, तो सभी मजदूरों को बराबर का हिस्‍सा नहीं मिलेगा। फिर एक घर अथवा आवास भूमि में दो–तीन परिवार भी रहते हैं, उन्हें कैसे बँटवारा मिलेंगे। अनेक बागानों में भारी संख्‍या में ऐसे परिवार भी रहते हैं, जो स्‍थायी रूप से बागान में काम नहीं करते हैं और वे इधर उधर बिखरे खाली जगहों पर झोपडी अथवा मकान बना कर रहते हैं। आवास के लिए तो उन्‍हें भी सुविधाऍं मिलनी चाहिए। दक्षिण भारत में चाय बागान मजदूर औद्योगिक बस्तियों में नहीं बसते हैं और बागान से बाहर से मजदूरी करने आते हैं। डुवार्स तराई में भी उन्हें आवास भत्ते दिए जाएँ तो बात बन सकती है। लेकिन यह मामला को पूरे राज्य में ही लागू करना पड़ेगा। मालिक पक्ष इस मामले को लटकाना चाहेगा। उनका तर्क यह होगा कि बागान के भूमि–कागजातों के आधार पर ही उऩ्होंने वित्तीय संस्थानों से ऋण लिया है। लेकिन भूमि तो सरकारी होती है, देखना दिलचस्प होगा कि वित्तीय संस्थान किस आधार पर उन्हें ऋण प्रदान की हैं।

आदिवासी समाज से संबंधित अत्यंत महत्वपूर्ण मामला है उच्च शिक्षा (बीए, बीकाम, बीएससी, एमए, एमकाम) में हिन्दी भाषा को परीक्षा लिखने की वैकल्पिक भाषा के रूप में मान्यता देने की। लेकिन परिषद् इस मामले को अब तक सरकार और मी़डिया के सामने ठीक से रख नहीं पाया है। बंगाल सरकार और मीडिया हिन्दी भाषा के सवाल को सिर्फ प्राथमिक और उच्च विद्यालय से जोड़ कर ही सामने रखती है। यह समस्या से ध्यान भटकाने का एक प्रयास ही है। उच्च शिक्षा के बिना समाज का विकास किसी भी तरह नहीं होनेवाला है। विकास करना है तो विश्वविद्यालय स्तर की परीक्षाओं में हिन्दी भाषा को विकल्प बनाना ही होगा। यदि बंगाल सरकार इससे इन्कार करती है तो सभी हिन्दी स्कूलों को अंग्रेजी माध्यम में परिवर्तन करने के लिए आवाज उठाया जाए।

 

परिषद् और मुख्य सचिव के मध्य हुई तमाम बातें सिर्फ प्रशासनिक बातें थीं। सिर्फ राजनैतिक बातों से नयी चीजें हासिल होती हैं। फिर भी इन तमाम मामलों से आदिवासी समाज में कुछ सुधार तो आ ही सकता है, लेकिन इससे सामाजिक और राजनीतिक दृश्यों में कोई अमुलचूल बदलाव नहीं आएगा। सरकार डुवार्स–तराई में किस स्तर के प्रशिक्षण केन्द्र बनाएगी ? प्रशिक्षण के बाद शैक्षणिक योग्यता के अनुसार उन्हें कहाँ नौकरी मिलेगी ? बंगाल में तो सिर्फ सात प्रतिशत ही आरक्षण उपलब्घ है। इससे कितनों को नौकरी मिलेगी ? स्वरोजगार के लिए किन क्षेत्रों में सरकार कितना निवेश करेगी, यह भी स्पष्ट किया जाना बाकी है। ढाँचागत विकास के लिए इस सरकार के पास गिनती के दिन ही बाकी है। सरकार की इमानदारी पर मधुबागानियार ने पहले भी शंका जाहिर किया है कि पिछले चौंतिस साल में जो सरकार ने आदिवासी विकास के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया वह सात–आठ महीने में क्या कर पाएगी ?

 

पश्चिम बंगाल में ट्राइबल एडवाइजरी कौंसिल का गठन नहीं किया गया है, जबकि संविधान के पाँचवी अनुसूची में साफ–साफ लिखा गया है कि जिन राज्यों में शिड्युल एरिया नहीं होगा, लेकिन पर्याप्त आदिवासी जनसंख्या होगी वहाँ भी ट्राइबल एडवाइजरी कौंसिल का गठन किया जाए। ट्राइबल एडवाइजरी कौंसिल उन क्षेत्रों के प्रशासन को सुझाव देती है, जहाँ आदिवासी जनसंख्या पर्याप्त मात्रा में हैं। ट्राइबल एडवाइजरी कौंसिल के आदेश प्रशासन के लिए बंधनकारी होता है और वह आदिवासी विकास के लिए राज्यपाल के प्रति जिम्मेवार होती है। आदिवासी विकास की वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपना पड़ता है। आदिवासी विकास परिषद् ने छटवीं अनुसूची की मांग रखी है, लेकिन वर्तमान परिस्थिति पर भी लागू होने वाले प्रावधानों पर चुप्पी साध रखी है। ट्राइबल एडवाइजरी कौंसिल में राज्य विधान सभा के सदस्यों को पदेन सदस्य के रूप में स्थान दिया जाता है, जो प्रशासन को निर्देश जारी करता है और आदिवासी विकास को सुनिश्चित करता है। आदिवासी विकास से संबंधित रिपोर्ट  को ट्राइबल एडवाइजरी कौंसिल द्वारा राज्यपाल के माध्यम से राष्ट्रपति को भेजी जाती है। उल्लेखनीय है कि आदिवासी विकास के लिए केन्द्र सरकार ही पचास प्रतिशत से अधिक राशि प्रदान करती है।

राज्य के मुख्य सचिव के साथ हुई वार्ता में विकास परिषद् ने आदिवासी जमीन की जबरदस्त लूट को उठाया या नहीं यह स्पष्ट नहीं है। सरकार से मांग की जाने चाहिए कि वह इस मामले पर हाईकोर्ट के न्यायधीश के समकक्ष न्यायधीश के द्वारा एक आयोग बिठाए जो सभी भूमि घोटाले मामले की जाँच करे।

मुख्य सचिव के साथ हुई वार्ता तो एक शुरुआत है, ऐसी वार्ताएँ होती रहेंगी। समस्याओं के महासागर में रहने वाले आदिवासी समाज की समस्याएँ तुरंत हल होने वाली नहीं है। यह सरकार तो चंद महीनों की है। चंद महीनों में शायद ही कोई काम मुकम्मल ढंग से पूरी होगी, क्योंकि उपरी स्तर के आदेशों का कार्यन्यवन तो निचले स्तर के अधिकारी और कर्मचारी ही करेंगे और इनकी मानसिकता में रातों रात परिवर्तन नहीं आएँगे। कार्यन्यवन में तकनीकी अड़चनें डाली जाएगी, समय की बर्बादी की जाएगी। इन तमाम अड़चनों से निपटने के लिए भी पहले से ही रणनीति पर बातचीत कर लेनी होगी, अर्थात् प्रशासनिक भ्रष्टाचार और शिथिलता से निपटने के रणनीति बनाने होंगे।

 

सफलता रातों रात नहीं मिलती। एक ही पैंतरा से काम नहीं चलता है। सभी पैंतरे को काम में लाना पड़ता है। आदिवासी विकास परिषद् का गोर्खा जनमुक्ति मोर्चा के साथ मैत्री बढ़ने से राजनीति बरगेन पावर बढ गया है। यह बारगेन पावर शक्तिहीन हो जाएगा, यदि परिषद् मुख्‍य सचिव स्‍तर के वादों से संतुष्‍ट होकर तथा साधारण मांगों से चुप होकर बैठ जाएगा। दोस्ती की भावना ह्लदयवान होने का परिचायक होता है। मैत्री सबलता प्रदान करता है। समाज को अपने दम पर विकास करने के लिए राजनैतिक रूप में सबल होने की जरूरत है। ऐसी राजनैतिक शक्ति प्राप्‍त करने की आवश्‍यकता है, जिसमें वह प्रशासन का नियंत्रण अपने हाथ में रख सके। मुख्‍य सचिव के आदेश के द्वारा वही चीजें मिलेंगी, जो जानबुझ कर चालाकी से रोकी गई थी। ऐसी कोई चीजें और राजनैतिक शक्ति नहीं मिलेगी, जो आदिवासी समाज को विकसित समाजों की श्रेणी में ले जाएगी। आज जरूरत है आदिवासी समाज के बारगेन शक्ति को बढाने का और न्‍यायपूर्ण राजनैतिक और आर्थिक स्‍वशासन प्राप्‍त करने का। समाज का चारित्रिक परिचय गढना और समाज को एक कमेटिट चेहरा प्रदान करना अच्छे नेतृत्व की जिम्मेदारी होती है। किसी बाहरी दबाव के प्रभाव से समाज के दोस्ती की भावना लुप्त न हो। दबावों का मुकाबला बुद्धिमानी से किया जाए। इसके लिए कारगर रणनीति बनायी जाए। सिर्फ कारगर रणनीति और उनके कार्यन्यवन से ही सफलता मिलेगी।

    

  

 

   

 

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