राजनीति की कूटनीति

डुवार्स के हाल के इतिहास में यह एक अभूतपूर्व घटना ही कही जाएगी। इस अभूतपूर्व घटनाक्रम में गोर्खा जनमुक्ति मोर्चा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार कालचीनी विधानसभा का चुनाव जीत गया । यह अभूतपूर्व इसलिए है कि कालचीनी विधानसभा ही नहीं बल्कि अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित डुवार्स के किसी भी विधानसभा केन्द्र से पिछले दो तीन दशकों में कोई भी स्वतंत्र उम्मीदवार कभी भी चुनाव जीत नहीं पाया है। यह इसलिए भी अभूतपूर्व है कि झारखण्डी समुदाय जो यहॉं का बहुसंख्यक मतदाता है, की सक्रिय संस्था आदिवासी विकास परिषद का अपना घोषित उम्मीदवार होते हुए भी एक ऐसा उम्मीदवार जीत गया, जिनकी जीत की आशा शायद खुद उम्मीदवार और गोर्खाजनमुक्ति मोर्चा को भी नहीं था । डुवार्स के कालचीनी विधानसभा केन्द्र में कांग्रेस और आरएसपी एक दूसरे को मात देते हुए पिछले कई चुनाव जीतते रहे हैं। लेकिन जीतने वाला कोई झारखण्डी ही होता था। पूर्व विधायक और राज्य सरकार में सार्वजनिक निर्माण मंत्री रहे श्रीमनोहर तिरकी के सांसद चुने जाने पर रिक्‍त हुई इस सीट से किसी झारखण्डी का विधायक बनना लगभग तय था। तृणमूल, आरएसपी और बीजेपी पार्टियों ने झारखण्डियों को ही यहॉं से अपना उम्मीदवार बनाया था। लेकिन काफी कम जनसंख्या वाले बोडो जनजाति से संबंध रखने वाले और गोर्खाजनमुक्ति मोर्चा द्वारा समर्थित श्री विल्सेन चंप्रोमारी का करीबन 6000 वोट से चुनाव जीत जाना अत्यंत अभूतपूर्व घटना है। चुनावी रेस में श्री चंप्रोमारी एक छुपा रूस्तम साबित हुए और जीत दर्ज करके सभी को चौंका दिए। लोकतंत्र में सभी को चुनाव में खडे होने और जीतने का अधिकार है। आजकल चुनाव का प्रबंधन पेशेवर रूप अख्तियार कर लिया है। अच्छी रणनीति बना कर चुनाव लडने वालों की ही जीत की अधिक संभावना होती है और लगता है श्री चंप्रोमारी को अच्छे चुनाव प्रबंधक प्राप्त हुए।

 

 श्री चंप्रोमारी की जीत झारखण्डी समाज में एक व्या‍पक चर्चे को जन्म दे दिया है। उनकी जीत ने झारखण्डी‍ समाज को नेतृत्व प्रदान करने वाले और विकास के पथ में ले जाने का दावा करने वालों के दावों पर कई गंभीर सवाल खडे कर दिए हैं। इस जीत ने साबित कर दिया है कि आदिवासियों की एक बडी संख्या परिषद के उम्मीदवार को वोट नहीं दिया तथा एक बडी संख्या गोर्खालैण्डि मुद्दे को अपना समर्थन देती है और आदिवासियों के साथ हो रहे अमानवीय अन्या्य, पक्षपात, भेदभाव से छुटकारा पाने के लिए वे अलग राज्ये को बेहतर विकल्प के रूप में देखती हैं। गोर्खाजनमुक्ति के अलग राज्य की मांग का विकास परिषद् विरोध करता रहा है।

झारखण्ड् समाज के ज्वलंत समस्याओं को उठा कर आदिवासी विकास परिषद् ने झारखण्डियों का अच्छा खासा समर्थन जुटा लिया है। सामाजिक मुद्दों पर आंदोलन चलाते हुए विकास परिषद् ने अचानक ही राजनीति के मैदान में भी उतर कर अपना एक स्वतंत्र उम्मीनदवार खडा किया और उसकी जीत को सुनिश्चित करने के लिए अपना पूरा जोर लगा दिया। लेकिन राजनीति की कूटनीति में विकास परिषद् अन्यों के मुकाबले पिछड गया। झारखण्डियों के अबाध और मुक्त समर्थन को राजनीति में भी भुनाने की चेष्टा रंग नहीं लायी। डुवार्स और तराई में करीबन 35 लाख झारखण्डी आदिवासी निवास करते हैं, उनकी समस्याऍं अनगिनत है और आजतक किसी भी पार्टी अथवा सरकार ने आदिवासियों की समस्याओं को सुलझाने का प्रयास नहीं किया। उनमें एक लम्बे समय से असंतोष व्या‍प्त था, लोगों में यथास्थिति के प्रति आक्रोश था। विकास परिषद् के कई बेहतरीन कार्यों और सक्रियता को लोगों ने एक समाधान के रूप में देखा और उन पर विश्वास किया और निशर्त अबाध समर्थन भी दिया। लेकिन परिषद् के नेतृत्व की अपरिपक्वता ने आज झारखण्डी् समाज को राजनैतिक रूप से गरीब बना दिया। परिषद लोगों में इतनी एकता की उपस्थिति को भी भुनाने में नाकाम रहा और आदिवासियों में आई एकता की भावना को आहत कर दिया। यह तो सिद्ध हो गया कि सिर्फ जोश से ही समाज का नेतृत्व नहीं किया जा सकता है। अनुभव, परिपक्वतता और ठण्डे दिमाग से उठाए गए कदमों से ही सफलता प्राप्त होती हैं। विकास परिषद् में परिपक्वता की कमी दिखाई दे रही है। हर बातों में जोश दिखाकर शास्त्रीय समस्याओं से निजात नहीं पाया जा सकता है। संदीप एक्का की उम्मी‍दवारी में स्थानीय नेता और केन्द्रीय नेतृत्व में अंतिम समय तक तीब्र मतभेद था, जिसे स्वाभाविक कहा जा सकता है। लेकिन उम्मीदवारी की घोषणा के बाद भी कभी अधिकृत तो कभी सिर्फ स्वतंत्र उम्मीदवार बताना लोगों में भ्रम फैलाने के लिए काफी था। चाय उद्योग में मजदूर संघों की जडें सामाजिक ताने-बाने तक में समाया हुआ है और झारखण्डियों में मजदूर संघों का प्रभाव भी गहरा है। रातों रात मजदूर संघों के प्रभाव को कम नहीं किया जा सकता है। झारखण्डी मजदूर विभिन्न मजदूर संघों में दशकों तक अपनी वफादारी दिखाते रहे हैं। अचानक ही यूनियन बदलना और दूसरे यूनियन से संबंद्ध उम्मीदवार को वोट देना उनके भावनाओं में शुमार नहीं है। विकास परिषद् के सामाजिक कार्यों अथवा कदमों को कोई भी आदिवासी मजदूर ऑखें बंद करके समर्थन कर सकता है, लेकिन राजनीति के प्रति लोगों में तुरंत पाला बदलने की भावना कम होती है। एक सतर्कतापूर्ण नीति बना कर चुनावी खेल को खेलना था। सम्पूर्ण  आदिवासी समाज के समर्थन करने के दावे के बावजूद परिषद् समर्थित उम्मी‍दवार जीत नहीं पाया। इससे साबित होता है कि उम्मीदवार उतारने के पूर्व अच्छी‍ तरह होमवर्क नहीं किया गया। एक बडी और सक्रिय संस्था जिसे दूसरे समुदाय के लोग प्रशंसनीय निगाहों से नहीं देखते हैं, को हर कदम अच्छी तरह सोच-समझ कर बढाना होता है। कालचीनी विधानसभा के खट्टे नतीजे ने एक मौका दिया है कि परिषद् के नेतागण गंभीर मंत्रणा करें कि परिषद एक सक्रिय सामाजिक संस्थान के रूप में काम करे कि एक राजनैतिक शक्ति के रूप में विकसित हो । सामाजिक कार्यो के लिए परिषद् एक सशक्त संस्था के रूप में काम कर रहा है और इसका सहयोग सभी से मिल रहा है। लेकिन तत्काल राजनीतिक रूप लेने से समाज की एकता भंग होगी और इसका फायदा लम्‍‍बे समय तक समाज को नहीं मिल पाएगा । चुनाव तो आते जाते रहता है। स्वंय चुनाव में न रह कर विभिन्न पार्टियों से मोलतोल करने पर ज्या्दा फायदा हो सकता है। परिषद को मंजिल से मतलब रखना चाहिए न कि रास्ते से। इससे समाज में बिखराव भी नहीं होगा। विकास परिषद् आज से दस बीस साल में समाज को कहॉं देखना चाहता है, उसे यह स्पष्ट करना चाहिए और उसी के अनुसार नीतियॉं बनानी चाहिए। यदि चुनाव आने के साथ-साथ दिलों में चुनावी भावना ऊफान पर आए और तुरंत मैदान में कसरत करने बैठ जाऍं तो जाहिर है चुनावी लडाई के लिए बॉंहो के मसल नहीं बन पाएगा। कई बातें हैं जिन पर परिषद् को गंभीरता से विचार करने की आवश्यमकता है। जोश में हर बार कदम उठाने की आदत से पार पाना होगा। इतिहास रचने के लिए कई विचारों और आकांक्षाओं को त्यागना होता है। कई विचारों की कुर्बानी देनी होती है। एक गरीब, अशिक्षित, छल-कपट से दूर रहने वाले राजनीति चेतनाहीन समाज में नेतृत्व प्रदान करना एक कठिन कार्य है। लम्बे समय तक लोगों के अबाध समर्थन की आशा नहीं की जा सकती है। नेतृत्व को हमेशा सजग और सतर्क रहना ही होता है, नहीं तो कूटनीति के वियावन में रास्ते कब खो जाते हैं पता ही नहीं चलता है।

 

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