आदिवासी इलाकों में चली बदलाव की बयार

मंजरी चतुर्वेदी

 उदयपुर–उनके हाथों से सपेरे की बीन, पैरों के नीचे दो छोरों से बंधी रस्सी या हाथों से तीर-कमान अब गायब हो चुके हैं। वे अब तंबुओं या कच्ची झोपडि़यों से निकलकर पक्के घरों में रहने लगे हैं। आजीविका के लिए लोगों का मनोरंजन और जंगलों पर निर्भरता, शिकार वगैरह छोड़कर खेती-मजदूरी करने लगे हैं। राजस्थान के आदिवासी बहुल इलाके मेवाड़ और वागड़ क्षेत्र के कालबेलिया और भील सहित तमाम आदिवासी समुदायों की जिंदगी में यह बदलाव इंदिरा आवास योजना और नरेगा जैसी योजनाओं के कारण दिखाई दे रहा है।

वक्त के साथ ये जनजातियां अपने पारंपरिक तौर तरीकों को छोड़कर समाज की मुख्यधारा का हिस्सा बनने को बेताब दिख रही हैं। राजसमंद जिले में गांव सिरोही की भागल की कालबेलिया बस्ती हो या उदयपुर के गिरवां तहसील में पंचायत समिति सरू का वल्ली पचोर मोहल्ला, सभी में आदिवासी समुदाय इंदिरा आवास योजना का लाभ उठाकर पक्के मकानों में रहने लगा है। इतना ही नहीं, योजना के तहत मिले बिजली के एक फ्री कनेक्शन से इनके घरों में सिर्फ बल्ब या पंखा ही नहीं, टीवी व कूलर भी दिखाई देने लगा है।

इंदिरा आवास योजना के तहत आज इन इलाकों में हजारों परिवारों को पक्का घर मिल चुका है। ग्रामीण विकास मंत्रालय की इस योजना के तहत इन दोनों इलाकों में चालू वित्त वर्ष के नवंबर महीने तक 1,662 घर बन चुके हैं, जबकि 3,756 बन रहे हैं। सरकार अब तक इसके तहत 1,773.78 लाख रुपये ग्रामीणों को बांट चुकी है। इस योजना के तहत केंद्र सरकार गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों को अपना घर बनाने के लिए 45 हजार रुपये व राज्य सरकार पांच हजार रुपये की आर्थिक मदद देती है।

सरकारी योजनाओं ने इन्हें सिर छिपाने की जगह भले ही दे दी हो, बावजूद इसके आज भी इस समुदाय के अधिकांश घरों में शौचालय का अभाव मिलेगा। पक्का घर बनवाने के बावजूद ये लोग शौचालय नहीं बनवाते। जबकि सरकार संपूर्ण स्वच्छता अभियान (टीएससी) के तहत टॉयलेट बनाने के लिए हर परिवार को 2,500 रुपये की आर्थिक मदद देती है। इस योजना का लाभ न लेने के पीछे राजसंमद जिला परिषद के सीईओ रामपाल शर्मा का कहना है कि खुले में जाने की सामाजिक आदतों के चलते ये लोग टीएससी के तहत अप्लाई भी नहीं करते।

बांसवाड़ा जिले के टीएससी कॉर्डिनेटर रजनीश पांड्या के अनुसार, 2005 में हुए बेसलाइन सर्वे में जिले 80 फीसदी अनुसूचित जातियों के यहां टॉयलेट व्यवस्था नहीं थी। तमाम प्रोत्साहन व कुछ जगह दंड के प्रावधान के बावजूद इस दिशा में बड़ी कामयाबी नहीं मिल पाई है। हालांकि कई जगह महिलाएं शौचालय के प्रति इच्छुक दिखीं, लेकिन समुदाय के पुरुष इसकी अनिवार्यता के प्रति उतने संवेदनशील नहीं हो पा रहे हैं। कालबेलिया बस्ती की बुजुर्ग लीलाबाई व सरू की फूला जैसी तमाम महिलाओं ने माना कि उन्हें बाहर जाने में दिक्कत होती है।

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Author: madhubaganiar

Madhubaganiar loves to write on social issues especially for downtrodden segment of Indian society.

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