विनायक सेन के सरोकार

भारत डोगरा
विनायक सेन से मैं सबसे पहले छत्तीसगढ़ में लौह अयस्क खनिकों के एक संगठन के कार्यालय के पास मिला। इस संगठन के अग्रणी नेता शंकर गुहा नियोगी कुछ ही समय पहले जेल से रिहा हुए थे और संगठन में उमंग का माहौल था। संगठन की पहल पर शराब विरोधी आंदोलन जोर पकड़ रहा था और हजारों श्रमिक शराब छोड़ने की कसम खा चुके थे। इसी उत्साह में मजदूरों द्वारा एक अस्पताल बनाने का निर्णय लिया गया था। नियोगी का कहना था कि यह अस्पताल सभी निर्धन लोगों के लिए मजदूरों का उपहार होगा जहां वे कम खर्च पर जाने-माने डॉक्टरों से अच्छा इलाज करवा सकेंगे।

शहीद अस्पताल
इस सपने को सच बनाने में सबसे बड़ा सवाल यह था कि इस दूर-दराज के इलाके में कौन जाना-माना डॉक्टर आएगा। वह भी तब जब अस्पताल चलाने वाले श्रमिक संगठन को आए दिन तरह-तरह का उत्पीड़न सहना पड़ता हो। पर यह हमारे देश की समृद्ध परंपरा रही है कि यहां सेवा-भाव से कार्य करने वाले व्यक्ति उच्चतम स्तर पर भी उपलब्ध रहे हैं। जब मजदूरों ने अपने पैसे और श्रमदान से दल्ली राजहरा में शहीद अस्पताल बनाया तो उसमें काम करने के लिए डॉ. विनायक सेन और डॉ. शैबाल जाना जैसे कई योग्य डॉक्टर भी पहुंच गए।

इलाज और रोकथाम
विनायक सेन से पहली मुलाकात जब हुई तब शहीद अस्पताल नहीं बना था और श्रमिक कार्यालय के बाहर ही वे निर्धन मरीजों की जांच-परख कर रहे थे। मरीजों की लंबी कतार लगी थी, जिससे ही पता चलता था कि यहां अस्पताल की कितनी जरूरत है। डॉ. सेन ने मुझे बाद में बताया कि उनका उद्देश्य केवल मरीजों का इलाज करना नहीं बल्कि रोकथाम के कदम उठाकर बीमारी की संभावना को कम करना है। उन्होंने यह भी बताया कि स्वास्थ्य कार्यकर्ता का प्रशिक्षण लेकर कई मजदूर अपनी नि:शुल्क सेवा देने के लिए आगे आ रहे हैं।

कुछ समय बाद डॉ. विनायक सेन और उनकी पत्नी डॉ. इलीना सेन ने रूपांतर संस्था स्थापित कर धमतरी के आसपास के क्षेत्र में निर्धन व विस्थापित आदिवासियों के बीच स्वास्थ्य, कृषि आदि महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर कार्य आरंभ किया। मलेरिया से मौतें रोकने के लिए उन्होंने यहां ऐसी व्यवस्था बनाई कि इसकी जांच गांव स्तर पर ही हो सके। गांव में ही प्रयोगशाला स्थापित की गई ताकि तुरंत जांच के आधार पर मरीजों को उचित दवा दी जा सके। इस तरह बहुत से लोगों का जीवन बच सका।

रूपांतर ने परंपरागत बीजों की रक्षा और संग्रहण का कार्य भी मेहनत और निष्ठा से किया। लुप्त होने के कगार पर पहुंचे मूल्यवान परंपरागत बीज इस प्रयास से दोबारा उपलब्ध होने लगे। इस विषय पर छत्तीसगढ़ में सबसे मूल्यवान कार्य डॉ. आर. एच. रिछारिया ने किया था और मैंने उनके इसपर एक पुस्तक लिखी थी। अत: इस विषय पर कोई भी कार्यशाला या गोष्ठी होने पर विनायक और इलीना मुझे अवश्य बुलाते थे और अपने आवास पर ही रहने को कहते थे। उनकी छोटी बेटी बिल्लो बहुत ही प्यारी लगती थी और केवल उससे मिलने के लिए उनके घर जाने का दिल करता था। इस समय हुई चर्चाओं से पता चला कि इस दंपति के रचनात्मक सरोकारों का दायरा कितना व्यापक है। डॉ. सेन से स्वास्थ्य और कृषि पर लंबी बात होती थी, तो इलीना से शिक्षा व महिला जागृति पर। वे तब ईंट भट्ठों के मजदूरों के बच्चों के लिए एक प्रॉजेक्ट आरंभ करने जा रहे थे ताकि छत्तीसगढ़ के प्रवासी मजदूरों की शिक्षा में निरंतरता बनी रहे।

एक दिन वे मुझे रायपुर के बाहरी इलाके में स्थित अपने छोटे से फार्म में ले गए थे। यहां कम क्षेत्र में ही उन्होंने धान की कई सारी किस्में उगाने का प्रयास किया था। खेत में बैल भी बहुत कद्दावर और ताकतवर थे। उनमें एक का नाम नेपोलियन था। यह गणेश पूजा के दिन थे और उन्होंने गणेश की मूर्ति भी स्थापित की थी। इससे मुझे कुछ आश्चर्य हुआ, पर बाद में मैंने देखा कि वे सार्थक परंपराओं से जुड़े रहते हैं। एक बार हम एक आदिवासी विवाह समारोह में पहुंचे थे। आलू की सब्जी और चावल पक रहे थे। उस निर्धन परिवार के लिए यही विवाह की पार्टी थी, पर उल्लास की कमी नहीं थी। विनायक सेन भी तुरंत आदिवासियों के नृत्य में शामिल हो गए।

इधर जब डॉ. सेन पर देशद्रोह जैसे आरोप लगाए गए तो उनके अधिकांश पुराने मित्रों को घोर आश्चर्य हुआ। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उन्हें आजीवन कारावास दिए जाने की कड़े शब्दों में आलोचना की है। कई कानूनविदों, यहां तक कि पूर्व न्यायधीशों ने भी सवाल उठाए हैं कि आखिर किस प्रमाण के आधार पर उन्हें इतनी बड़ी सजा दी गई है। डॉ. सेन के पक्ष में खड़े लोगों की कतार में ऐसे कितने ही व्यक्ति हैं जिनकी लोकतंत्र व संवैधानिक तौर-तरीकों में आस्था पूरी तरह प्रमाणित है।

नियोगी की याद
1977 से 1991 तक शंकर गुहा नियोगी के नेतृत्व में चले श्रमिक आंदोलन को भी सरकारी तंत्र ने कई बार हिंसक कहा पर सचाई यह है कि इन 14 वर्षों में इस आंदोलन ने एक भी हत्या नहीं की। नशा विरोधी गांधीवादियों ने यहां आकर कहा कि शराब के विरुद्ध बहुत महत्त्वपूर्ण काम हुआ है। सिख नेताओं ने कहा कि 1984 की हिंसा में इस श्रमिक संगठन ने अनेक सिख परिवारों की रक्षा की। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कहा कि मजदूरों का अस्पताल बनने से सैकड़ों लोगों का जीवन बचा है। व्यापारियों ने इस लेखक को बताया कि मजदूरों की आय बढ़ने से उनकी दुकानों की बिक्री बढ़ी है। बैंक मैनेजर ने कहा कि मजदूरों की आय बढ़ने से उनके बैंक का व्यवसाय बढ़ा है।

इस सब के बावजूद नियोगी के आंदोलन को बार-बार हिंसक कहा गया व अंत में उनकी हत्या कर दी गई। हिंसक कौन है इसकी पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लोकतांत्रिक ढंग से विरोध करने वालों को किसी न किसी तरह हिंसक या देशदोही सिद्ध करने की प्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए।

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Author: madhubaganiar

Madhubaganiar loves to write on social issues especially for downtrodden segment of Indian society.

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