Panchayat reps seek action against mine mafias

BHUBANESWAR: Elected representatives of three panchayats of Joda and Jhumura blocks of Keonjhar district today demanded action against mines mafias for taking away the jobs of the local people by bringing outsiders for mining activities. Addressing mediapersons here, tribal women representatives of the two blocks including Padmini Khelar and Laximipriya Bankira said that outsiders have eaten away the job of the local people. So far people from Jharkhand, Bihar and West Bengal were working in different mines. Now large number of people from Tamil Nadu are engaged in the mining activities threatening the livelihood of the local people, they said.  About three families working in different mines of Nayagarh, Badada and Badakalimati panchayats are rendered jobless due to influx of workers from outside the state mostly from Tamil Nadu. This illegal activities are going on with the active patronage of the local administration.  They further alleged that the use of heavy machineries in mines have also rendered many families jobless. Any protest by the local people are muzzled by goons hired by the mines owners from outside the state. Some of the workers were manhandled by the goons of the mines owners on January 2 when they protested the engagement of outsides. Although the matter was brought to the notice of the police, no action has been initiated against the culprits they said. They urged the Government to take immediate action against those mines owners who are employing outsiders in mining activities violating the  labour laws.Courtesy:ExpressBuzz.

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Author: madhubaganiar

Madhubaganiar loves to write on social issues especially for downtrodden segment of Indian society.

3 thoughts on “Panchayat reps seek action against mine mafias”

  1. क्या आदिवासी हेभी मशीनरी नहीं चला सकता है।
    (माफ कीजिये, सवाल चिन्ह का अपहरण हो गया है। अभी तक नहीं मिला है।)

    ये वही गंवार, अनपढ़, गरीब आदिवासी हैं, जिन्होंने कठिन परिश्रम करके और सारा दुख दर्द सहकर आसाम को स्वर्ग बना दिया। जंगल काटा, जमीन खोदा और पेड़ के बदले चाय का पौधा लगाया। ना धुवां निकला, ना हवा दूषित हुई और ना क्लाईमेट पर दुषप्रभाव पड़ा।
    आज लोग आराम से बैठ कर चाय पी रहे हैं।
    ये वही गंवार, अनपढ़, गरीब आदिवासी हैं, जिन्होंने कठिन परिश्रम करके और सारा दुख दर्द सहकर झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के सड़कों को बनाया। जंगल काटा, जमीन खोदा और मिट्टी ढोया। ना धुवां निकला, ना हवा दूषित हुई और ना क्लाईमेट पर दुषप्रभाव पड़ा।
    आज उसी सड़क पर लोग अपनी गाड़ी मजे में दौड़ा रहे हैं।
    ये वही गंवार, अनपढ़, गरीब आदिवासी हैं, जिन्होंने कठिन परिश्रम करके और सारा दुख दर्द सहकर हीराकुन्ड जैसे बाँध को बनाया। जंगल काटा, जमीन खोदा और मिट्टी ढोया। ना धुवां निकला, ना हवा दूषित हुई और ना क्लाईमेट पर दुषप्रभाव पड़ा।
    आज लोग वहीं से बिजली पा रहे हैं। अपना घर रोशन कर रहे हैं।
    कभी सलवा जुड़ुम, कभी ग्रीन हन्ट। बिकास के नाम पर आदिवासियों का जमीन लूटा जा रहा है, और लोग आदिवासी जमीन का मालिक बन रहे हैं। आदिवासियों की समझ में नहीं आ रहा है कि यह बिकास है या एक लड़ाई है। जंगल काटा जा रहा है, जमीन खोदा जा रहा है। धुवां निकल रहा, हवा दूषित हो रही है, क्लाईमेट पर दुषप्रभाव पड़ रहा है और सभी का भाव बढ़ रहा है।
    अगर आदिवासी खदान का मालिक होता तो हेभी मशीनरी की जरूरत नहीं होती। आदिवासियों के लिये कुदाली ही काफी है। ना धुवां निकलता, ना हवा दूषित होती, ना क्लाईमेट पर दुषप्रभाव पड़ता और ना ही कोई बिस्थापित होता। सभी खुश रहते और सभी जगह शाँती होती।

  2. एमानुएलजी,
    आदिवासियों को आज सभी लूटने में लगे हुए हैं। यह लूट भारतीय सरकारी तंत्र की सहमति से हो रही है। स्‍वतंत्रता की गारंटी देने वाले संविधान की कसम खा कर काम कर रहे तंत्र आदिवासियों को तिल–तिल कर मरने के लिए छोड् दिया है। जल जंगल और जमीन की उनकी मिल्कियत को किसी भी तरह उनके हाथों से निकालने की कोशिश जारी है मुद्दइयों की और तंत्र भ्रष्‍टाचार में मग्‍न है। आदिवासी विकास और भलाई की आड में सभी अपनी रोटियॉं सेंक रहे हैं, चाहे वे सरकारी बाबू हों,चाहे नेता या फिर तथा कथित नक्‍सली। नक्‍सली तो आदिवासियों को पूरी तरह बर्बाद करने का एक बडा कुचक्र है। इस पर आप जैसे लोगों को खुल कर सामने आना चाहिए। आपने हिन्‍दी टाइपिंग सीख ली है, बधाई। हिन्‍दी का संसार साक्षर आदिवासियों और आम जन जीवन से नजदीकी बढाता है। काश अंग्रेजी में लिखने वाले सभी भाई बहन हिन्‍दी टाइपिंग सीख लेते। इससे समता और सम्‍मान की लडाई को तेज धार दिया जा सकता है। जनता की भाषा में जनता की लडाई रंग लाती है।

  3. SAIS director professor Sunil Khilnani दुनिया के विभिन्न देशों में घूमते हैं और भारत के power and richness के बारे लेक्चर देते हैं। सुनने से दुख लगता है।
    हाँ तो भारत अपने को दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बनाना चाहता है। भारत चीन, अमेरिका और पाकिस्तान जैसे देशों से टक्कर लेना चाहता है मगर भूल जाता है कि उसे एकता की जरूरत है जो कि देश के गरीबों से मिल सकती है।
    कुछ लोग एकता के लिये एक देश, एक धर्म, एक जाति आदि का अभियान चलाते हैं और गरीबों के विश्वास और संवेदना पर आघात पहुँचाते हैं।
    कुछ लोग गरीब आदिवासियों की शाँति और उन्नत्ति देखकर जलते हैं और हमेशा उनकी टाँग खींचने में लगे रहते हैं।
    आदिवासियों की पंचायत चुनाव का माँग पूरा हुवा। लेकिन पंचायत में अब दिकु घुस गये हैं। अब वे Pre and Prior consent का नाजायज फायदा उठायेंगे और आदिवासी जल, जंगल और जमीन को बेच देंगे। और उन्हें रोकने वाला कोई नहीं होगा। याने कि अब आदिवासियों का विस्थापन, विनाश या अंत निश्चित है।
    हाँ तो आदिवासियो, अब लड़ो या मरो।

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