हाथी और आदिवासी गति

डुवार्स की वादियों में मानव और जंगली जानवरों के बीच कई दशकों से मुठभेड जारी है। हर सप्‍ताह कहीं न कहीं कोई अभागा जानवरों के हमलों से मारा जा रहा है। कहीं जंगली हाथियों का झूंड गॉव में हमला कर रहा है, तो कहीं अपने दैनिक कार्यों में मग्‍न लोगों पर जानवरों के हमले हो रहे हैं। इसी कड़ी में कुछ दिन पहले हुई मुठभेड भी शामिल है, जिसमें एक दांतिला हाथी ने डुवार्स के नगराकाटा–चालसा जंगल में एक ट्रेन को रोक लिया था और गुस्‍से में ट्रेन की ओर बढते हाथी से बचने के लिए ट्रेन के ड्राइवर ने ट्रेन को बैकगीयर में डालकर पीछे सरका लिया था।

इसी रूट में कुछ दिन पहले एक बार दो हाथी और एक बार सात हाथी ट्रेन से टकरा कर मारे गए। आमतौर से इसे एक सामान्य घटना मान लिया गया है, कि ट्रेन पटरी पार करते हुए ये हाथी मारे गए। हाथी को तुलनात्‍मक रूप से एक बुद्धिमान जानवर माना गया है। सामान्‍य परिस्थितयों में पत्तियों को खाकर पेट भरने वाले शाकाहारी हाथी अन्‍य जानवर अथवा प्राणी पर हमला नहीं करते। लेकिन पिछले एक दशक से डुवार्स के जंगलों के हाथी हिंसक हो गए हैं और अक्‍सर जानमाल की खबरें मिलती रहती है।

चाय उद्योगतंत्र के अधीन चाय की खेती के लिए आदिवासियों ने उन्‍नीसवीं सदी में डुवार्स–तराई के विशाल भूभाग में फैले घने जंगल को काटा और साफ किया। साफ किए गए इन्‍हीं हजारों वर्गमील क्षेत्र में अंग्रेज और भारतीय उद्योगपतियों ने सैकडों चाय बागान बनाया। बीसवीं सदी के पाँचवे दशक तक भी जलपाईगुड़ी जिले के विभिन्‍न भागों में बड़े और घने जंगल बचे हुए थे। यद्यपि जिले के डुवार्स इलाके में अनेक चाय बागान बस चुके थे, लेकिन जंगली जानवरों के लिए पर्याप्‍त जगह छोड़ी गई थी और जानवरों का आबादी के क्षेत्र में विचरण करने के कुछ ही विवरण मिलते हैं। जंगली हाथी कभी–कभी बागान बस्तियों में निकल आते थे, लेकिन जानमाल की हानि नहीं करते थे। मांदर, नगाडे और ढोलक बजाने और इंसानों की अजीब कोलाहल सुनकर जंगलों की ओर भाग जाते थे। केले के बागान और धान के खेत उनके प्रिय जगहें होतीं थीं।

सत्‍तर अस्‍सी के दशक में जब हम छोटे थे और रात को शोर सुनते थे कि गॉंव में हाथी आया है, तो हम भी अंधेरे में भाग कर हाथी देखने के लिए दौड़े जाते थे। हमारे लिए हाथी भगाना एक आनंददायक मौका होता था और हम हाथियों के बिल्‍कुल करीब जाकर उन्‍हें ‘’भगाने’’ का आनंद लिया करते थे। हमें इस बात का डर नहीं होता था कि विशालकाय जानवर गुस्‍से में पीछे मुडकर हमें कहीं रौंद न दे। तब हाथी हिंसक नहीं होते थे, वे हमारे शोर से कभी–कभार ही बिलचित होकर दो चार कदम भागते थे, नहीं तो अक्‍सर अपनी शानदार मस्‍त चाल से ही चल कर जंगल की ओर चले जाते थे।

मैं तब ग्‍यारह साल का था। असम से हाथी शावक पकड़ने के लिए महावतों का एक दल अपने पालतु हाथियों के साथ हमारे बागान आया हुआ था। एक सुबह किसी ने बताया कि हाथी शावक को पकड़ने के लिए महावतागण अपने हाथियों के साथ जंगल की ओर गए हैं। मैं भी अपने फुफेरे भाई शंकर तिर्की के साथ उनके साथ जाना चाहता था। उनके अलसुबह ही चले जाने पर हमें निराशा हुई, लेकिन हम हार नहीं मानने वाले थे। हम भी गाना गाते हुए एक दूसरे के कंधे पर हाथ रखकर जंगल की ओर चल पडे। अभी जंगल में कुछ ही दूर गए थे कि झरने (पझरा) के पानी से बना छोटा सा वन्‍य तालाब साफ दिखाई देने के बदले भरपूर मटमैला दिखाई दिया। हमें लगा हाथियों का झूँड यहॉं से नहा कर जंगल के अंत:भाग में चला गया है। हम गाना गाते हुए बीस पच्‍चीस कदम आगे ही बढ़े थे, कि हमारे बाऍं ओर का एक झाडी लरज कर नीचे गिर गया। हम उस झाडी को ध्‍यान से देख पाते उससे पहले ही दाऍं ओर का एक झाडी भी उसी अंदाज से हिल गया। हम एक सेकेंड के सौंवे भाग में ही देख चुके थे कि हमारे दोनों ओर हाथियों का झूँड बैठा हुआ है। हाथियों के झूँड को देखकर हमारे गाने तो बंद हो ही चुके थे, होश भी ठिकाने आ चुके थे। कहॉं तो हम हाथियों को पकड़ कर उनकी सवारी करने के ख्‍वाब लिए जंगल आए थे और अब तो हमें एक पल में जिन्‍दगी के यथार्थ समझ में आ गया था। एक क्षण के लिए तो ऐसा लगा भागना बेकार का प्रयास होगा, अब चल कर हाथियों के हाथों ही वीरगति को प्राप्‍त कर लेते हैं। लेकिन दिमाग के किसी कोने ने भागने का आदेश दिया और हम सिर पर पॉंव रख कर ऐसे भागे कि यदि ओलंपिक की दौड़ में होते तो प्रथम ही आते। आज कहना चाहूँगा कि यदि हाथी जरा भी हिंसक होते तो उस दिन हम किसी भी तरह से बच नहीं पाते। हाथियों का झूँड हमारे रास्‍ते के दोनों ओर बीस पच्‍चीस गज की दूरी पर पझरा के पानी में स्‍नान करके आराम फरमा रहे थे। वह दृष्‍य किसी फिल्‍मी बैकग्राउण्‍ड दृश्‍य की तरह आज भी नजरों से अक्‍सर गुजरती है।

आज डुवार्स के जंगल में पेड ऐसे काटे जा रहे हैं, जैसे किसानों के द्वारा अपने बैलों को खिलाने के लिए रोज घास काटी जाती है। जंगली सूअर, सियार, हिरण, खरगोश, जंगली भैंस, चीता आदि अक्‍सर ही जंगल में सूखी लकडियॉं इकट्ठा करते झारखण्डी, राभा, बोडो और गोर्खा महिलाओं और पुरूषों को दिखाई देते रहते थे। क्‍योंकि जंगलों में इन समुदायों की महिलाऍं ही वनोपज के लिए रोज ही जंगलों की खाक छानती थीं। लेकिन लकड़ी चोर और लकड़ी तस्‍करी में लगे लोगों ने अब जंगल को उजाड़ कर रख दिया है। अब जानवर तो जंगलों में दिखाई ही देने बंद हो गए हैं। कुछ जानवर नेशनल पार्क में तब्दील जलदापाडा, गोरूमारा, चिलापाता, जंयती, राजाभातखावा आदि जंगलों में बचे रह गए हैं, लेकिन दौलत के भूखे शहरी सुटेटबुटेट जानवर उन्‍हें भी खत्‍म करने के लिए दिन रात षड़यंत्र रचने में अपनी उर्जा व्‍यय कर रहे हैं। आजकल मैना, गोरैया, पांडुकी आदि भी बहुत कम मात्रा में दिखाई देती हैं। मोर की चिंहूक की आवाज तो जंगलों में शायद ही सुनाई देती है।

डुवार्स में आज जनसंख्‍या बेतहासा बढ़ चुकी है। मानवीय कार्यकलापों से इकोलॉजी में बहुत अंतर आ चुका है। कभी थोड़ी सी बारिश होने पर जंगलों में पझरा फूटता था। जंगल किनारे हम मिट्टी को काट कर एक दो फूट के नन्‍हें तालाब बना कर पझरा पानी को इकट्ठा करके मेरा ‘’तालाब तेरा तालाब’’ खेलते थे। जंगल के काफी अंदर जाकर हम पेड़ पर चढ़ कर जानवरों की आवाजों की नकल निकालते थे और जानवरों से ऑंखमिचौली खेलने की कोशिश करते थे। हमें जंगली जानवरों का भय नहीं सताता था। हम उन्‍हें शर्मिले ही समझते थे और साथ में एक लाठी अथवा डालियॉं काटने के लिए एक झोरनी (लम्‍बा छूरा) ही साथ रखते थे। कभी–कभी हम मीलों तक जंगल में सैर करते थे। हमारी सुरक्षा हमारे सादरी और हिन्‍दी फिल्‍मी गाने किया करते थे, जिसे हम जंगल दौरे पर पंचम स्‍वर में गाते थे। जंगली जानवरों के कान और ऑंखें बहुत तेज होती हैं, वे हमारी आवाज सुन कर ही घनी झाडियों में दुबक जाते थे। जंगल  में उनके खाने पीने की चीजों की कमी नहीं थी। आदमी पर हमले सिर्फ बाघ ही किया करते थे वह भी आदमी के द्वारा उन्‍हें नुकसान पहुँचाने के इरादे से हमले किए जाने पर।

कभी शांत रहने वाले जंगली पशु आज मानवीय स्‍वार्थपूर्ण गतिविधियों के कारण त्रस्‍त हैं। अपनी स्‍वार्थ की पूर्ति के लिए मानवों ने वन्‍य प्राणियों के प्राकृतिक अधिकारों पर निरंतर हमला बोला है और इसी मानवीय हमलों से अजीज आ चुके वन्‍य प्राणी आज मनुष्‍य के प्रति हिंसक भावना विकसित कर चुके हैं। कभी आदमी को देखकर झाडियों और जंगलों में छुप जाने वाले शर्मिले जानवर आज आदमी को देखते ही उनपर हमला बोलने लगे हैं। चूँकि जानवर मानव की तरह तीक्ष्‍ण बुद्धि के नहीं होते हैं और मानव के तकनीकी शक्तियों को समझ नहीं पाते हैं, इसी कारण वे इस पृथ्‍वी से मानव के द्वारा मिटाए जा रहे हैं।

बहुत कुछ ऐसा ही अशिक्षित और भोले–भाले होने के कारण आदिवासियों के साथ भी घट रहा है। उनके खेत खलिहान लूटे जा रहे हैं, उन्‍हें उनके ही घरों के आसपास के मामूली नौ‍करियों जैसे आंगनवाड़ी–रसोईया और शिशुशिक्षक जैसे रोजगारों से भी वंचित किया जा रहा है। कभी डुवार्स के अस्‍सी प्रतिशत खेल खलिहानों को जोतने वाले आदिवासी आज अपने अधिकांश खेत खलिहानों से हाथ धो बैठे हैं। देश के दूसरे राज्‍यों और पडोसी देशों से आए हुए नवआगंतुकों ने छल–कपट से आदिवासियों के खेत–खलिहानों को एक बार लूटना शुरू किए तो बस लूटते ही चले गए। वे ऐसे आदिवासियों को चुनते हैं, जिनके पास प्रयाप्त भूमि होती है और जो नशापान करना भी पसंद करते हैं। उनसे दोस्ती करके उन्हें नियमित नशापान कराया जाता है। फिर उनके चारित्रिक पसंद को जानकर उन्हें अन्य ऐब का भी शौकिन बनाया जाता है। पहले उन्हें नशेड़ी और फिर कर्जदार बनाया जाता है। इन्हीं तिकड़मों के सहारे आज भी रोज कहीं न कहीं खेत खलिहान लूटे जा रहे हैं। आदिवासियों के खेतों को कहीं ट्राइबल लैंड के नाम पर पहाडी ट्राइबल के नाम पर स्‍थानांतरित किए जा रहे हैं तो कहीं ट्राइबल डिपाटर्मेंट के सहयोग से ननट्राइबल में बदला जा रहा है। अनेक खेत–खलिहान आज भी कागजों में ट्राइबल के नाम पर ही हैं, लेकिन उस पर कब्‍जा किन्‍हीं गैर आदिवासी का है।

अनपढ़ आदिवासी, सरकारी और तथाकथित ‘’आदिवासी चिंतकों’’ के सह और सहयोग से किए जा रहे इस अन्‍याय और चालाकी के खेल को उस वन्‍य प्राणी की तरह असहाय होकर देख रहा है, जो अधिक बलशाली होने के बावजूद मानवीय तकनीकी को समझ नहीं पाने के कारण अपना अस्त्वि गँवाते जा रहे हैं। आम आदिवासी को जमीन स्थानानंतण के कानून की जानकारी नहीं है। जिन्हें थोड़ी बहुत जानकारी है, उन्हें सरकारी नियमों के दावपेंच की जानकारी नहीं है। जैसे वन्य प्राणी अपने जीने खाने के सिवा और कोई चालाकी सीख नहीं पाते हैं, वैसे ही आदिवासी भी राज्य के कानूनी दॉंवपेंच और दूसरों के चालाकी को समझ नहीं पाते हैं।

आज डुवार्स के वन्‍य प्राणी खूँखार होकर जंगल में पेट न भर पाने के कारण मानव बस्तियों में घुसे जा रहे हैं और मानव से मुठभेट होने पर उन पर हमला कर रहे हैं। सरकार इन हमलों में घायल होने वाले को कुछ आर्थिक मदद देकर अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर रही है। शरीर की गंभीर व्‍याधि का इलाज करने के बदले चेहरे पर टेल्‍कम पावडर लगा कर चेहरे पर लाली लाने की इन कोशिशों से स्थि‍ति में कोई सुधार नहीं होगा और यह मर्ज भविष्‍य में तीब्र गति से बढता ही रहेगा। गॉंव की गरीब जनता को पॉंच, दस, पचास या अधिकतम एक लाख रूपये देकर न तो वन्‍य प्राणी को वन से बाहर आने से रोका जा सकेगा और न ही गॉंव वालों को इन हमलों से सुरक्षा ही दी जा सकेगी।

वन्‍य प्राणियों की तरह ही आज डुवार्स–तराई के आदिवासी भी पक्षपात, अन्‍याय, चालाकी और अपने बापदादाओं के द्वारा छोडी गई एक मात्र जीविका के साधन खेत–खलिहानों की लूट और सरकारी दमन से अत्‍यंत क्षुब्‍ध और आक्रोशित है। आदिवासियों के सामाजिक और आर्थिक समस्‍याओं को भी सरकार टेल्‍कम पावडर लगाकर दर्द और व्‍यथा को छुपाने और नकली चमक दिखाने की भरपूर कोशिश कर रही है। आदिवासियों के रहमुनाई का दावा करने वाले नेतागण और कार्यकर्ता भी कास्मेटिक उपायों के पीछे अपनी उर्जा गँवा रहे हैं। सरकार भी उनकी कल्‍पनाशीलहीनता, दूरदृष्टिहीनता की सीमा को गहराई से जानती है और उन्‍हें इन्‍हीं सब बातों में उलझा कर रखती है, ताकि वे नई कल्‍पानाशीलता और दूरदृष्टि सम्‍पन्‍न होकर दूर की कोई कौड़ी न मांग लें।

डुवार्स के जंगलों में वास करने वाले वन्‍य प्राणियों के लिए सरकार के पास कोई पुख्‍ता परियोजना नहीं है, न ही वह इस समस्‍या को सुलझाने के लिए गंभीर है। इसी तरह वह आदिवासियों की समस्‍याओं को भी सुलझाने में गंभीर नहीं है। सरकार की उदासीनता, जानबुझकर समस्‍याओं को न सुलझाने की नीयत की दोहरी मार आदिवासी समाज को पड़ रही है। आदिवासियों के हाथों बचे थोड़े से खेतों में लहलहाते धान को खाने के लिए हाथी रात में चले आते हैं। खेत के धान, सब्‍जी बारी के केले खाने के साथ साथ हाथी थोडा मस्‍त होने के लिए हँडिया की गंध सूंघ कर आदिवासी गॉंवों की ओर चल पड़ते हैं। कच्‍चे मकानों को रौंद डालते हैं और सामने आने वाले मनुष्‍य को भी देखते ही अपने रोष की भावना को व्‍यक्‍त कर डालते हैं। हाथियों के गुस्से से शिकार हुए लोगों की गणना की जाए तो उनमें आदिवासियों की संख्या ही अधिक होगी।

डुवार्स के आदिवासी एक ओर सरकारी सहमति से हो रही लूट, पक्षपात और अन्‍याय से जुझ रहे हैं, वहीं सरकारी सहमति से बसाए गए विशाल बाहरी जनसंख्‍या के कारण सिकुड़ते प्राकृतिक संसाधानों की कमी से जुझते वन्‍य प्राणियों के हमलों से भी त्रस्‍त हो रहे हैं। स्‍पष्‍ट रूप से दोहरी मार पड रही है समाज में।

सरकारी और संचार माध्‍यमों द्वारा यह कहा जा रहा है कि रेल पटरी पार करते हुए एक साथ सात हाथी ट्रेन के धक्‍के से मारे गए। लेकिन यह अर्द्धसत्‍य है। हाथियों के कान बहुत तेज होते हैं। मालगाडी की गड़गडाहट पॉंच किलोमीटर दूर से उन्‍हें सुनाई पड़ सकती है। विशाल ट्रेन को सामने से आते देखकर वह पटरी पार करने के लिए शायद ही तैयार होंगे। एक हाथी इसके कुछ दिनों पहले ही ट्रेन से मारा गया था, जिसे शायद दूसरे हाथी ने अपनी ऑंखों से देखा लिया था। उन्‍हें मानव के तकनीकी ज्ञान के बारे कुछ मालूम नहीं। लेकिन ट्रेन से अपने झूँड के साथी को मरते हुए देख कर इतना तो समझ आ ही गया होगा कि कोई तेज और विशालकाय ‘जानवर’ उन्‍हें मार डाला है। शायद उसी का बदला लेने के लिए वे मूक जानवर एक साथ ट्रेन से भिड़ गए और उन्‍हें अपनी जान गँवानी पडी। विशेषज्ञगण  शायद इन बातों को समझते भी होंगे। कभी अहिंसक रहे जानवर आज कितने हिंसक हो चुके हैं, इस घटना से सहज ही पता चल जाता है।

आदिवासी समाज एक शांतिप्रिय समाज है। सामुहिकता की उनकी भावना में सभी के लिए जगह और भावना है। इन ‘सभी’ में मनुष्‍य और प्राकृतिक दोनों ही शामिल हैं। लेकिन आज उनके साथ जो छल किया जा रहा है, उससे वह बहुत व्यथित है। यही व्यथा को कुछ तत्वों ने हिंसक मोड़ देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा है। डुवार्स और तराई में अभी भी आदिवासी शांत है। जरुरत इस बात की है कि उसके साथ हो रहे अन्याय, छल–कपट, पक्षपात, चालाकी को रोका जाए। देर होने पर शांत आदिवासी भी वन्य हाथियों की तरह हिंसक हो सकते हैं। देश के कई भागों में आदिवासियों को हिंसा की दीक्षा दी जा रही है। उनके हाथों में हाथियार थमाया जा रहा है। उन्हें विशाल हिंसक जानवर बनाकर देश को रौंदने का जरिया बनाया जा रहा है। यह निश्चय ही वेदनापूर्ण स्थिति है।

डुवार्स–तराई के सुरम्य वादियों में सिर्फ कुछ हाथी ही हिंसक हो चुके हैं। लेकिन जानमाल की हानि बहुत हो रही है। इस सुरम्य वादियों में हाथियों और आदिवासियों दोनों को ही शांतिपूर्ण जीवन जीने का प्राकृतिक और कानूनी अधिकार प्राप्त है। वे जीवन जीयें और शांत रहें, इसके लिए जरुरी है कि उनके अधिकारों और अस्तित्व का सम्मान किया जाए। यह अतिआवश्यक है कि देश और समाज द्वारा पूर्ण रुप से उनकी समस्या को सुलझाने के लिए ईमानदारीपूर्ण प्रयास किया जाए। हाथियों की तरह आदिवासियों का भी संयम जवाब दे दे तो वह निश्चच ही इऩ वादियों के लिए सबसे दुर्भाग्यपूर्ण दिन होगा।

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Author: madhubaganiar

Madhubaganiar loves to write on social issues especially for downtrodden segment of Indian society.

1 thought on “हाथी और आदिवासी गति”

  1. समझदार को इसारा काफी है। आपने आदिवासियों की स्थिति को बहुत अच्छी तरह समझाया है। लोग इसे समझें तो अच्छा है। मैंने कई बार हाथियों को टी वी पर देखा है। हाथी बहुत ही प्यारा जानवर है। उसकी समझ बूझ और प्यार अपने बच्चों और ग्रुप के लिये देखने लायक है। अगर उसमें थोड़ी बुद्धी होती तो ट्रेन से टक्करा कर मरने के बदले ट्रेन लाईन ही उखाड़ देता या ट्रेन लाईन पर पेड़ या बिजली खंभा ही गिरा देता। उसके दिमाग में क्या है उसे भविष्य ही बतायेगा। ये रही हाथियों की बात।
    अब अत्याचार से बेबस आदिवासियों और गोरखाओं की बात आती है। दोनों ही अपने अधिकार की माँग कर रहे हैं। ना गोरखालैंड बना और ना ही गोरखा आदिवासी प्रदेश।
    स्थिति बदल गई है। अरे भाईया, मुझे तो एक नहीं चार पाँच ट्रेन दिखाई दे रही है। काठमाँडु एक्सप्रेस, पटना एक्सप्रेस, कोलकाता एक्सप्रेस, राँची एक्सप्रेस और ढाका एक्सप्रेस। जो कभी भी टकराने वाली है। कौन कहाँ टकराती है इसे समय ही बतायेगा।
    जैसे कि उड़ीसा में तमिल और छत्तीसगढ़ में पंजाबी घुस आये हैं वैसे ही डुवार्स और तराई में बंग्लादेशी घुस आये हैं और आमार बंग्ला का नारा लगा रहे हैं।
    बिल्लियों और बंदरों की बंदर बाँट शुरू हो गई है। अब समय ही बतायेगा कौन कहाँ रहेगा और कौन कहाँ विस्थापित होगा। तब भी बंदर बाँट होगा। लोग सिलिगुड़ी जंक्शन पर जमा होंगे। और चार पाँच ट्रेन खड़ी मिलेगी। एक बिल्ली चिल्ला रहा होगा। पी पी पी काठमाँडु एक्सप्रेस में बैठो। अरे भईया हिन्दी भाषी हो, पटना ट्रेन में बैठो। लालू इन्तजार कर रहे हैं। अरे बिरसा तिर्की जी, आसो कोलकाता एक्सप्रेस में उठो। कोई बिल्ली चिल्ला रहा होगा, नक्सालाईट नक्सालाईट राँची एक्सप्रेस छूटने वाली है। बोका सोमरा और मतल मंगरा जो कि बगान काम ना जाकर सबेरे से शाम तक घाईला खाली करने में लगा रहता है उनको विस्थापित नहीं होना है। वे नगराकाटा और चालसा के बीच जंगलों में हाथियों के साथ छिप जाते हैं और ट्रेन का इंतजार करते हैं। मंगरा मतल तो था ही। उसको ट्रेन से क्यों टकराना है पता नहीं था। बोला, ई ट्रेन का हिके। मोंय एके बेर अईसन ढूसबो जे पूरा ट्रेन पलाईट जाई।
    अभी का हालत देख कर पता नहीं चल रहा है कि आज आदिवासी कहाँ जा रहा है। लग रहा है कि जहाँ आदिवासी नेता हाँक रहे हैं वहीं सभी लोग भेड़ के झुन्ड की तरह पीछे चल रहे हैं। जब नेता तिस्ता में गिरेगा तो सब तिस्ता में डूबेंगे। आदिवासी नेताओं को किसी के बहकावे में नहीं आना चाहिये। सभी नेताओं को साथ मिलकर सोच समझकर निर्नय लेना चाहिये कि वे किस दिशा में आगे बढ़ेंगे।
    रही बात आदिवासियों की अस्तित्व की, तो किसी को किसी की ताकत को कम नहीं समझना चाहिये। चाहे वह गरीब हो या अनपढ़ हो या अल्पसंखयक हो। आज आदिवासी बुद्धिजीवी है। सब कुछ करने में समर्थ है। आज तक आदिवासियों पर बहुत से अत्याचार हुए हैं। आदिवासी सब कुछ सहा है। क्योंकि आदिवासी धार्मिक प्रावृति का है। और सभों के साथ शाँति से जीना चाहता है। मगर अत्याचार सहने की हद होती है। मरता क्या नहीं करता।
    हिंसा किसी के लिये भी अच्छा नहीं है। और ना ही हिंसा से शाँति लाया जा सकता है। किसी का दिल जीता जा सकता है। हिंसा जब शुरू होती है तो अंत होने में वर्षों बीत जाते हैं। यह पलेस्तीन, ईराक, अफगानिस्तान जैसे देशों में देखा जा सकता है।
    क्या भारतवासी हिंसा चाहते हैं, क्या भारतवासी भारत की बरबादी चाहते हैं, क्या भारतवासी शाँति नहीं चाहते हैं?
    भारतवासी आदिवासियों की समस्याओं को समझें और उनकी मदद करें। धन्यावाद।

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