हिन्दी के साथ मजाक कर रहे कॉलेज

धनीष श्रीवास्तव, सिलीगुड़ी : हिंदी की पढ़ाई के प्रति उदासीन उत्तर बंगाल विश्र्वविद्यालय से सम्बद्ध कई डिग्री कॉलेज अनोखी दलील देते हैं। इन कॉलेजों में हिंदी के शिक्षक तो हैं नहीं, उलटा विद्यार्थियों से यह कहा जाता है कि उनके यहां हिंदी नॉनटॉट है। मतलब यह कि कॉलेज की ओर से हिंदी की परीक्षा तो ली जाएगी, लेकिन पढ़ाई के लिए शिक्षक नहीं मुहैया कराए जाएंगे। यह स्थिति विवि अनुदान आयोग व उत्तर बंगाल विश्र्वविद्यालय के दिशा-निर्देशों के विपरीत है। विवि से संबद्ध 62 में से दो दर्जन से अधिक कॉलेजों में किसी-न-किसी रूप में हिंदी पढ़ाई जाती है। अधिकांश कॉलेजों में छात्रों के अनुपात में शिक्षकों का अभाव है। कई कॉलेज ऐसे हैं जो अल्पकालिक शिक्षकों की व्यवस्था करके किसी तरह काम चला रहे हैं। जबकि सूर्यसेन कॉलेज व महिला महाविद्यालय आदि में प्रवेश के समय साफ कह दिया जाता है कि उनके यहां हिंदी नॉनटॉट है। इसके अलावा नक्सलबाड़ी कॉलेज, वीरपाड़ा कॉलेज, नेताजी सुभाष महाविद्यालय, सुकांत महाविद्यालय, एसी कॉलेज, आनंद चंद्र कॉलेज, एबीएन सील कॉलेज, पीडी वूमेंस कॉलेज, विवेकानंद कॉलेज और जलपाईगुड़ी कॉलेज हिंदी (अनिवार्य) के लिए शिक्षक नहीं मुहैया कराने के सम्बन्ध में तरह-तरह की दलीलें देते हैं। शिक्षक नहीं होने की वजह से यहां छात्रों को खुद किसी तरह पढ़ाई करके परीक्षा देनी पड़ती है। उधर उत्तर बंगाल विश्र्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक एस दास का कहना है कि कॉलेजों की ऐसी हरकतें सरासर गलत हैं। यह सर्वोच्च न्यायालय, विश्र्वविद्यालय अनुदान आयोग और उत्तर बंगाल विश्र्वविद्यालय के दिशा-निर्देशों की अनदेखी है। नियमों के मुताबिक जिस विषय के शिक्षक नहीं, कॉलेज उसके लिए नामांकन नहीं ले सकते। शिकायत मिली तो जांच की जाएगी और गलती साबित होने पर समुचित कार्रवाई भी। वस्तुत: विवि से कई कॉलेज ऐसे विषयों की मान्यता ले लेते हैं, जिनके अध्ययन-अध्यापन के लिए उनके पास समुचित व्यवस्था नहीं है। हिन्दी और अल्पकालिक शिक्षकों के साथ जुगाड़ की यही व्यवस्था काम करती है। अल्पकालिक शिक्षकों की वस्तुस्थिति यह कि कभी वे मौजूद रहेंगे, कभी कॉलेज प्रशासन किन्हीं कारणों से उनकी सेवाएं नहीं लेगी। जांच वगैरह के समय शिक्षक प्रकट कर दिए जाते हैं। अन्यथा छात्रों को नॉनटॉट की दलील या कोई अन्य तर्क देकर खुद पढ़ाई करने के लिए कहा जाता है। खामियाजा भुगतते हैं विद्यार्थी। शुल्क तो देते हैं, लेकिन धेले भर की पढ़ाई नसीब नहीं होती। परीक्षाओं के समय में विद्यार्थियों की हालत और अधिक खराब हो जाती है। शिक्षक न होने की वजह से विषय पर विद्यार्थियों को सही मार्ग दर्शन नहीं मिल पाता है। पाठ्यक्रम भी पहले की अपेक्षा और अधिक कठिन हो गया है। परीक्षा के बदतर परिणाम से विद्यार्थी तनाव में आ जाते हैं।
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Author: madhubaganiar

Madhubaganiar loves to write on social issues especially for downtrodden segment of Indian society.

One thought on “हिन्दी के साथ मजाक कर रहे कॉलेज”

  1. Agar hindi ke prati logon ka yahi rawiya raha to wo din dur nahi jab hindi bhasa ka ant ho jayega.School main bache math aur science ki tution lete hain par hindi ki nahi.

I am thankful to you for posting your valuable comments.

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