बच्‍च्‍ो तोड रहे पत्‍थर

धुपगुड़ी,: तकरीबन नौ साल से बंद रहे कठालगुड़ी चाय बागान खुल तो गया है लेकिन बागान के श्रमिकों की समस्याएं कम नहीं हुई हैं। आज भी श्रमिक परिवार के बच्चों को जहां पत्थर तोड़कर घर के लिए अतिरिक्त आय करनी पड़ रही है वहीं, वयस्कों को सौ दिनी रोजगार योजना के तहत काम करना पड़ता है। उसका भी भुगतान समय पर नहीं होने से आर्थिक संकट ज्यों का त्यों बना हुआ है। ऐसे समय में जब मासूम बच्चों को स्कूल जाकर पढ़ाई करनी चाहिए वे पत्थर तोड़ने जैसा सख्त काम करना पड़ रहा है। चाय बागान इलाके में श्रमिकों के परिवार आर्थिक जद्दोजहद के लिए बुजुर्ग से लेकर बच्चे तक पत्थर तोड़ने से लेकर बालू निकालकर बांध बनाने जैसे जोखिम भरे काम कर रहे हंै। बागान के एक कर्मचारी केरन मुंडा ने कहा कि बागान के मजदूरों रोजी रोटी की समस्या है। जब चाय श्रमिक काम पर जाते हैं तब उनके बच्चे नदियों के पत्थर तोड़ने का काम करते हैं। पत्थरों को तोड़कर उसे पांच फीट लंबा व पांच फीट चौड़ा और एक फीट ऊंचे टीले को स्थानीय बोली में पोआ कहा जाता है। इसे तैयार करने पर श्रमिक को मात्र पचास रुपए मिलते हैं। सुबह सात बजे से लेकर दोपहर 12 बजे तक यह काम चलता है। रविनंद महली नामक एक सातवीं कक्षा के छात्र ने पत्थर तोड़ने के क्रम में कहा कि मां व पिता काम पर गए हैं। उन्हें तुरत तो रुपए नहीं मिलेंगे। इसलिए प्रतिदिन भोजन का खर्च निकालने के लिए मेहनत मजदूरी करनी पड़ती है। टी लैंड अंचल के 13 वर्षीय यह लड़का बानरहाट स्कूल में पढ़ता है। स्कूल जाने से पहले वह यह काम करता है। स्थानीय 11 वर्ष का आकाश मुंडा ने बताया कि स्कूल जाने से यह काम नहीं कर पाउंगा। परिवार चलाने के लिए अतिरिक्त कमाई करनी पड़ती है। उसकी तरह छोटे छोटे 20-25 बच्चे सुकीर्ति नदी के किनारे पत्थर तोड़ने का काम करते हैं। केरन मुंडा ने कहा कि कठालगुड़ी चाय बागान में कुल 1479 श्रमिक कार्यरत हैं। महीने में दो सप्ताह ही काम होता है। मजदरी कई दिन बाद मिलती है। केवल मासिक वेतन इतना कम है कि उससे बच्चों की शिक्षा से लेकर घर का खर्च चलाना बेहद कठिन काम है। स्कूल में दाखिला कराने के लिए दो से तीन माह समय लगता है। स्कूल में प्रधानाध्यापक नहीं हैं। अस्पताल तो है लेकिन वहां स्थानीय चिकित्सक नहीं है। हर सप्ताह बुधवार और शुक्रवार चिकित्सक आते हैं। अन्य दिनों में बीमार पड़ने से वीरपाड़ा अस्पताल जाना पड़ता है।बागान की सबसे बड़ी समस्या पेयजल की है। पीएचई की पानी की टंकी है लेकिन उसमें पानी नदारद है। कई मील दूर से पानी लाना पड़ता है। कई जगह पाइप फट गए हैं। पेयजल के अभाव में तरह तरह के रोग फैल रहे हैं। महिला श्रमिक सामी उरांव ने कहा कि उनके परिवार में पांच लोग हैं। एक दृष्टिहीन समेत तीन बच्चे हैं। पति चाय श्रमिक हैं लेकिन आर्थिक तंगी से जूझ रहे है इसी वजह से अतिरिक्त रोजगार करना पड़ रहा है। पहले राशन नहीं मिलता था, लेकिन हाल फिलहाल दस किलो गेहूं दो रुपए किलो की दर से, 11 किलो चावल तीन रुपए की दर से, किरासन तेल 13 रुपए प्रति लीटर की दर से दी जा रही है। सौ दिवसीय रोजगार योजना की मजदूरी अभी तक नहीं मिली है। इससे परिवार चलाना मुश्किल हो गया है।साभार–दैनिकजागरण

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Author: madhubaganiar

Madhubaganiar loves to write on social issues especially for downtrodden segment of Indian society.

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