चाय उद्योग के लिए बने मंत्रालय

जलपाईगुड़ी : चाय उद्योग के लिए एक स्वतंत्र मंत्रालय होना चाहिए। तभी उत्तर बंगाल के चाय उद्योग एवं उससे जुड़े श्रमिकों का भला हो सकेगा। अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद की डुवार्स-तराई आंचलिक कमेटी के अध्यक्ष जॉन बारला ने यह विचार बुधवार को व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जिस तरह से सभी विभागों के लिए पृथक मंत्रालय है उसी तरह से चाय उद्योग के लिए भी अलग मंत्रालय होना चाहिए। यह उत्तर बंगाल का सबसे बड़ा या यों कहें एकमात्र वृहद उद्योग है। इस उद्योग के साथ खासतौर से दार्जिलिंग के अलावा तराई एवं डुवार्स के लाखों श्रमिक, कर्मचारी एवं अन्य लोग जुड़े हैं। फिलहाल चाय श्रमिक कई बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। मजदूरी भी केवल 67 रुपए मिल रहे हैं जोकि महंगाई को देखते हुए बहुत ही नगण्य है। इसलिए यदि अलग मंत्रालय गठित होता है तो चाय उद्योग को चंगा करने के साथ ही श्रमिक-कर्मचारियों की अवस्था में सुधार संभव हो सकेगा। सबसे बड़ी समस्या कम मजदूरी को लेकर है। 67 रुपए की दिहाड़ी में आजकल क्या होता है। श्री बारला ने कहा कि इतनी कम मजदूरी में परिवार चलाना मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव है। कारण कि यदि इतनी मजदूरी में यदि श्रमिक भरपेट भोजन करता है तो कपड़े नहीं होते और कपड़े खरीदता है तो पेट काटना पड़ता है। नतीजतन चाय श्रमिकों की हालत सोचनीय होती जा रही है। पूर्व की वाममोर्चा सरकार ने श्रमिकों को हमेशा ही अंधेरे में रखा है। उन्हें पंगु कर दिया था ताकि वे सिर उठाकर नहीं जी सकें। चाय श्रमिकों के अधिकारों के लिए को-आर्डिनेशन कमेटी है लेकिन वह भी श्रमिकों के दुख दर्द दूर करने में विफल रही है। इसीलिए इस उद्योग के लिए अलग मंत्रालय की जरूरत है। जॉन बारला ने कहा कि हम चाहते हैं कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चाय उद्योग के लिए अलग से मंत्रालय का गठन करें। फिलहाल बाजार की जो स्थिति है उसमें न्यूनतम मजदूरी ढाई सौ रुपए होना चाहिए। तभी इनकी न्यूनतम जरूरतें पूरी होंगी।साभार–दैनिकजागरण
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Author: madhubaganiar

Madhubaganiar loves to write on social issues especially for downtrodden segment of Indian society.

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