सिमडेगा के अनुज लुगुन को भारत भूषण अग्रवाल कविता पुरस्कार

संजय कृष्ण, रांची समकालीन युवा कविता का सर्वाधिक प्रतिष्ठित सम्मान, भारत भूषण अग्रवाल कविता पुरस्कार-2011 सिमडेगा के अनुज लुगुन को उनकी कविता अघोषित उलगुलान के लिए मिलेगा। इस वर्ष के निर्णायक उदय प्रकाश ने इसका चयन किया है। यह कविता प्रगतिशील वसुधा के अप्रैल-जून 2010 के अंक में प्रकाशित हुई थी। अनुज अभी बीएचयू में शोधरत छात्र हैं। उनके पुरस्कृत कविता का एक-एक शब्द झारखंड के शोषण, दमन की अंतहीन कहानी कहता है। आदिवासी अपनी घटती जमात से चिंतित है। कोई नहीं बोलता इनके हालात पर/ कोई नहीं बोलता जंगलों के कटने पर/पहाड़ों के टूटने पर/नदियों के सूखने पर/ट्रेन की पटरी पर पड़ी तुरिया की लवारिस लाश पर। पर हम बोलते हैं, किस पर? आरक्षण पर, धर्मातरण पर। अनुज पूछते भी हैं, दांडू जाए तो कहां जाए/ कटते जंगल में/या बढ़ते जंगल में। इसके पहले निर्मला पुतुल ने भी ऐसे ही तीखे सवाल पूछे थे। पहला भारत भूषण पुरस्कार पटना के अरुण कमल को दिया गया था।

अघोषित उलगुलान में मुंडारी काव्य परंपरा की आदिम लय है

रांची : अनुज लुगुन कविता के क्षेत्र में एक नया आदिवासी नाम है। वे सिमडेगा जिले के जलडेगा पहान टोली के रहने वाले हैं। 10 जनवरी 1986 को जन्मे लुगुन मुंडा समुदाय से आते हैं। 2007 में रांची विश्र्वविद्यालय से स्‍नातक करने के बाद वे बीएचयू चले गए। वहीं से उन्होंने हिंदी में एमए किया और फिलवक्त वे वहीं से मुंडारी आदिवासी गीतों में आदिम आकांक्षाएं और जीवन-राग विषय पर शोध कर रहे हैं। अघोषित उलगुलान कविता हिंदी संस्कारों का निर्वाह करते हुए धूमिल व पाश के आसपास खड़ी होती है। लेकिन इसकी आत्मा में आदिवासी जीवनदर्शन है। अनुज की दूसरी कविताओं के साथ-साथ अघोषित उलगुलान में भी परिलक्षित कर सकते हैं। जो बहुत वोकल नहीं होता।

 

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Author: madhubaganiar

Madhubaganiar loves to write on social issues especially for downtrodden segment of Indian society.

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