उबले आदिवासी संगठन

रांची, वसं : सारंडा जंगल में पुलिस द्वारा मारे गए दो निर्दोष आदिवासियों का मामला अब तूल पकड़ते जा रहा है। आदिवासी संगठन घटना में मारे दोनों आदिवासियों के परिजनों को बीस-बीस लाख रुपये मुआवजा व नौकरी की मांग कर रहे हैं। साथ ही घटना की सीबीआई या न्यायिक जांच की मांग भी उठा रहे हैं। गुरुवार को होटल महाराजा में झारखंड प्रदेश आदिवासी नागरिक एवं बुद्धिजीवी मंच के बैनर तले प्रो करमा उरांव, पूर्व डीआईजी पीयूष बेक, पूर्व आईजी आरआई वी कुजूर, डॉ. नारायण भगत, हिंमाशु कच्छप ने सरकार से सवाल किया कि क्या आदिवासी मनुष्य नहीं, जानवर हैं। क्या ये पुलिस के लिए शिकारी हैं, जिसे जब चाहा गोली मार दी। प्रो करमा उरांव ने कहा कि आदिवासियों की हत्या के पीछे औद्योगिक घरानों की भूमिका है। वे चाहते हैं कि दहशत का ऐसा माहौल बने कि आदिवासी जंगल छोड़ भाग जाए और जंगल के अंदर छिपा खजाना उन्हें आसानी से हासिल हो सके। पूर्व आईजी आरआईवी कुजूर ने कहा कि घटना की सीबीआई या न्यायिक जांच हो। दोषी अधिकारियों को सजा मिले। मंच ने यह भी मांग की कि सरकार आदिवासियों को उजाड़ना बंद करे। बढ़नियां कांड के दोषियों पर भी हत्या का मुकदमा चले। नक्सली के नाम पर निर्दोषों की हत्या बंद हो : झाजमं अल्बर्ट एक्का चौक पर शुक्रवार कोसारंडा मामले में झारखंड जनाधिकार मंच ने धरना दिया। धरना के माध्यम से मांग की गई कि सारंडा में नक्सलियों के नाम पर निर्दोष ग्रामीणों की हत्या बंद हो। दोषी पुलिसकर्मियों को चिह्नित कर उन पर हत्या का मामला दर्ज हो। मृतक परिवारों को 50-50 लाख मुआवजा मिले। सारंडा के ग्रामीणों को विकास के लिए विशेष पैकेज की मांग भी उठी। उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में पुलिस की गोली नहीं, रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार, शिक्षा-चिकित्सा उपलब्ध कराई जाए। दाल-भात योजना सारंडा जंगल के ग्रामीणों के लिए भी चलाई जाए। धरना को बंधु तिर्की, दयामनी बरला, रतन तिर्की, फादर स्टेन स्वामी, शिवा कच्छप, सुनील शाहदेव, राजेश लकड़ा, संजय तिर्की आदि ने संबोधित किया। धरना में काफी संख्या में लोग शामिल थे। खेती के लिए भी बनानी पड़ती है हाजिरी : अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार निगरानी परिषद के सदस्य हीरालाल तिवारी ने शुक्रवार को बैठक कर बताया कि सारंडा में पुलिस का अत्याचार इतना बढ़ गया है कि वहां के किसानों को खेती करने के बाद पुलिस कैंप में हाजिरी लगानी पड़ती है। ग्रामीण दहशत में हैं। तिवारी ने कहा कि परिषद की टीम सारंडा के ग्रामीणों से मिलने के बाद इसकी शिकायत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, निगरानी परिषद दिल्ली से भी की है। बैठक में नरेश प्रसाद श्रीवास्तव, अब्दुल जलील हसन, अधिवक्ता शशि भूषण प्रसाद, विनय श्रीवास्तव आदि उपस्थित थे। मुठभेड़ों में मरते आदिवासी : माओवादियों के खात्मे के लिए चलाए जा रहे पुलिसिया अभियान में माओवादी कम, निर्दोष ज्यादा मारे जा रहे हैं। झूठ पर पर्दा डालने के लिए घटना को कभी वह मुठभेड़ बताती है तो कभी क्रॉस फायरिंग। मामला जब मीडिया में आता है तब पुलिस अपना अपराध स्वीकार करती है। कुछ घटनाएं आपरेशन के चरित्र को उजागर करने के लिए काफी हैं। खूंटी के मुरहू प्रंखड के सिरका गांव में 19 मार्च, 2009 में पुलिस ने सुबह-सुबह ही महुआ चुनते समय अमर पूर्ति की हत्या कर दी थी। घटना के चश्मदीद गवाह गंगू पूर्ति, जो कक्षा छह में पढ़ता है, पर पुलिस अब तरह-तरह के दबाव बना रही है। लातेहार के बरवाडीह प्रखंड के बढ़नियां गांव में लोकसभा चुनाव के समय मार्च, 2009 में सीआरपीएफ के जवानों ने पांच ग्रामीणों की हत्या कर दी। इसमें दो मासूम भी थे। पहले तो इसे मुठभेड़ बताया, लेकिन जब कई संगठन सड़कों पर उतरे तो माना कि मारे गए सभी निर्दोष थे। इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि राज्यपाल को जांच बिठानी पड़ी। जांच में माना गया कि मारे गए सभी निर्दोष थे। इस आधार पर पीडि़त परिवारों को पांच-पांच लाख मुआवजा दिया गया। लेकिन दोषी पुलिसकर्मियों को सजा नहीं दी गई। यही नहीं, राज्यपाल की वह रिपोर्ट भी आज तक सार्वजनिक नहीं हो सकी। जून, 2010 में इसी प्रखंड के लादी गांव में एक महिला को पुलिस ने मार दिया। बताया कि वह क्रासफायर में मारी गई। इसी तरह रांची के तमाड़ के बाड़ेग गांव में 19 जून, 2011 में 65 साल की नीलमणि नामक महिला को मार दिया। 2010 में नामकुम में राजेश सिंह मुंडा नामक माओवादी को मार गिराया। पहले पुलिस ने कहा, मुठभेड़ में मारा गया, लेकिन बाद में पता चला, उसे पकड़ कर जंगल में ले जाकर गोली मारी गई। तब, अर्जुन मुंडा ने भी सीबीआई जांच की मांग उठाई थी, पर जांच आज तक नहीं बिठाई गई। सरायकेला-खरसांवा में जुलाई 2010 में एतवा मुंडा को भी पुलिस ने मार दिया। इसी साल के जून को पं सिंहभूम के बलिंगा गांव में सीआरपीएफ व पुलिस के जवानों ने मंगल होनहांगा की हत्या कर दी। इसी क्षेत्र में अगस्त की 18 तारीख को सोमा गुडि़या की भी पुलिस ने हत्या कर दी। ये कुछ घटनाएं हैं, जो मीडिया में आई। सामाजिक कार्यकर्ता फादर स्टेन स्वामी मानते हैं कि राज्य बनने से लेकर अब तक माओवादी-नक्सली के नाम पर पुलिस 585 आदिवासी युवकों की हत्या कर चुकी है। 4090 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इनमें 99 प्रतिशत आदिवासी हैं। योजना आयोग से जुड़े व मानवाधिकार कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग पिछले दस सालों में जितने भी मुठभेड़ हुए हैं, उनकी सीबीआई जांच की मांग करते हैं।साभार दैनिकजागरण
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Author: madhubaganiar

Madhubaganiar loves to write on social issues especially for downtrodden segment of Indian society.

4 thoughts on “उबले आदिवासी संगठन”

  1. पाँच सौ से भी अधिक आदिवासी नक्सल के नाम से मारे गये हैं। यह जानकर बहुत दुख लगता है। मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि ये नक्सल पुलिस मुठभेड़ क्यों हो रहे हैं। पुलिस नक्सलियों के पीछे क्यों पड़ी है? आखिर नक्सलियों ने क्या किया है? नक्सलियों ने कितने मंत्रियों, नेताओं, सरकारी अधिकारियों, उद्योगपतियों और बनियों को मारा है? नक्सलियों ने कितने बैंकों, मंत्रियों, नेताओं, सरकारी अधिकारियों, उद्योगपतियों और बनियों को लूटा है? नक्सलियों ने कितने उद्योग और सरकारी संपत्ती को बर्बाद किया है?
    शहरों में शाँती और गाँवों में आशाँती क्यों?

  2. सरकार कहती है कि नक्सली हिंसा प्रेमी हैं, लेकिन नक्सलियों से अधिक हिंसा सरकारी फोर्स कर रही हैं। अक्सर आम नक्सली तो आदिवासी होते हैं लेकिन नक्सलियों के नेता गैर आदिवासी। उन्हें आदिवासियों की समस्याओं से कुछ लेना देना नहीं है। उन्हें तो सिर्फ उगाही से मतलब है। वे आदिवासी इलाके को इसलिए चुनते हैं ताकि वहाँ अशांति फैला कर लोगों को विस्थापित किया जा सके और उस इलाके को भविष्य में पूंजीपतियों के हवाले किया जा सके। आदिवासी इलाके में नक्सली आंदोलन एक बड़ी साजिश है। यह आदिवासियों को बर्बाद करने का कुचक्र है। छत्तीसगढ़ में विस्थापन के बाद उन इलाकों में खुदाई के कार्यक्रम चलाने की कोशिशें जारी है, जो कभी आदिवासी गाँव हुआ करते थे।

  3. मैं एक पढ़ा लिखा आदिवासी हूँ। लेकिन मुझको पता नहीं है कि मावोवादी, नक्सलाईट कौन हैं और उनके उद्देश्य क्या हैं। तो हम सोच सकते हैं कि गाँव का एक अनपढ़ या अधपढ़ आदिवासी को क्या पता होगा मावोवाद और उनका उद्देश्य। जैसे कि आदिवासी बहनों को लोग ठगकर दिल्ली मुम्बाई ले जाते हैं वैसे ही भाईयों को भी ठगकर, लोभ देकर या डरा धमकाकर नक्सल बनाया जाता होगा। ये हमारे वे भाई हैं जो जल जंगल जमीन बचाने के लिये अपनी जान खतरे में डाल देते हैं। जल जंगल जमीन आसानी से लूटने के लिये इन भाईयों का मरना जरुरी है। जब ये नक्सल बन जाते हैं तो गैरआदिवासी नक्सलियों द्वारा जो कि पुलिस से मिले हुए होते हैं इनका नाम पुलिस के नक्सल लिस्ट में आ जाता होगा। और इस तरह वे जल्द ही एनकाउन्टर में मारे जाते हैं। कलिंगानगर, तपकरा, खन्डमल जैसे जगहों पर आदिवासी खुलेआम मारे गये थे और उसका विरोध हुआ था। अभी उग्र आदिवासियों को एक एक करके चुन चुन कर जंगल में मारा जा रहा है। क्योंकि इन पर नक्सल टैग है तो इसका विरोध नहीं हो रहा है। जौभी कि यहाँ मरने वालों की संख्या कलिंगानगर, तपकरा, खन्डमल जैसे जगहों से ज्यादा है पर दिखाई नहीं दे रहा है। उनको बचाने वाला कोई नहीं है। उग्र आदिवासी मार दिये गये। आदिवासी एस पी ओ से हथियार छीन लिये गये। अब आदिवासियों को कौन बचायेगा।
    जैसा कि आप कह रहे हैं कि आदिवासी नक्सलियों के लीडर गैरआदिवासी हैं। आदिवासी, नक्सल लीडर बन नहीं सकते तो कहाँ प्राधानमंत्री और राष्ट्रपति बनने का सपना देख रहे हैं। हाँ तो आदिवासियों को जल्द से जल्द नक्सल ग्रुप छोड़ना चाहिये और अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिये जल जंगल जमीन बचाने के लिये।

  4. टोप्पोजी,

    नक्सली कभी भी पढ़े लिखे आदिवासी को अपने गिरोह में शामिल नहीं करते है। एक पढ़ा लिखा आदिवासी वह सब कुछ नहीं करना चाहेगा जो धूर्त गैर आदिवासी नक्सली नेता उनसे कराना चाहते हैं। पढ़ा लिखा व्यक्ति कभी गिरोह का नेता भी बन सकता है। अंग्रेजी पत्रिका दी वीक में नक्सली लोगों के बारे एक विश्लेषण था, जो काफी दिलचस्प है। वह नेट पर भी उपलब्ध है, समय मिले तो जरूर पढ़िए। लेख में नक्सलियों के शिक्षण प्रोफाइल दिया गया था। जितने भी आदिवासी नक्सली थे, गरीबी और परिस्थियों के मारे थे। अधिकतर लोगों के पास पर्याप्त रोजी रोटी के स्रोत नहीं था। आदिवासियों में कोई भी उच्च शिक्षित नहीं था। नक्सलियों में जो ग्रेजुयेट थे सभी गैर आदिवासी थे और अधिकतर के पास पर्याप्त खेती की भूमि और दूसरे आय के साधन थे। जाहिर है कि पढ़े लिखे गैर आदिवासी ही गिरोह का नेतृत्व कर रहे होंगे। आम आदिवासी तो सिर्फ हुकुम बजाने वाला बंदूकधारी रहे होंगे। गरीबी का फायदा सभी उठाते हैं, गरीब और अर्धशिक्षित आदिवासियों का शोषण ये नक्सली भी कर रहे हैं। ये नक्सली जातिवादी विचारों से भी ओतप्रोत हैं। बिहार में वे अपनी धमकी को पूरा करने के लिए सबसे पहले एक गरीब पुलिस वाले को ही गोली मार दिए। इन नक्सलियों को न तो किसी क्रांति में विश्वास है न ही किसी देश और समाज को बदलने की रूचि। इनकी मुख्य रूचि धन उगाही करने में है। इन्हें बड़े–बड़े उद्योगपतियों से भी उगाही में धन मिलता है। एक अनुमान के अनुसार ये दस हजार करोड़ से अधिक धन की उगाही करते हैं। जाहिर है कि इस असीमित धन का एक छोटा सा भाग ही ये हथियार खरीदने में लगाते हैं। अधिकतर को ये अपने घर परिवार के लोगों तक पहुँचाते हैं, बड़े बड़े शहरों में व्यापार में लगाते हैं। इधर हमारे भाई बहनें नक्सली बनने के बाद सिर्फ गोलियाँ खाते हैं। ये समाज का कोई भला करते हैं या नहीं मुझे नहीं मालूम। नक्सली नेतागण उद्योगपतियों से साठगाँठ करके आदिवासियों के इलाकों में जबरजस्ती अशांति फैलाते हैं और भूमिपुत्रों को विस्थापित होने के लिए मजबूर करते हैं। आदिवासियों को खत्म करने के लिए छत्तीसगढ़ में उन्हें तीन तीन हजार रूपये देकर विशेष पुलिस अधिकारी का लालीपाप देकर अपने ही आदिवासी भाई को मारने के लिए कुचक्र चलाया गया। किसी गैर आदिवासी को एसपीओ नहीं बनाया गया। यदि नक्सलियों को मार कर खत्म करना ही था तो देश भर के युवाओं को बुला बुला कर नौकरी देना चाहिए था। कम से कम छत्तीसगढ़ के गैर आदिवासियों को तो शामिल करना था। कुल मिला कर यह तो स्पष्ट हो गया है कि छत्तीसगढ़ का शासकवर्ग आदिवासियों को मार कर खत्म करना चाहता है और वे आदिवासियों के लिए दिल में कोई दया भाव नहीं रखते हैं। वे चाहते हैं कि आदिवासी किसी भी तरह उन इलाकों से भाग जाएँ जहाँ की धरती में कोई भी खनिज छुपा हुआ है। चाहे वे पुलिस की गोली से मरें चाहे एसपीओ के बुलेट से। छत्तीसगढ़ का शासकवर्ग इतना निर्लज है कि वे आदिवासियों को एक लाख का बंदूक तो थमाते थे लेकिन रूपल्ली सिर्फ तीन हजार थमाते थे। अपनी सुरक्षा में वे उन्हें क्यों नहीं लगाते रहे ? क्या वे गैर आदिवासियों को भी सिर्फ तीन हजार रूपये में पुलिस की नौकरी देने का साहस करेंगे ? वास्तव में पूरा नक्सल आंदोलन ही आदिवासी और गरीब विरोधी है। नक्सल या माओवादी आंदोलन जिसे मैं खाओवादी आंदोलन मानता हूँ, तब ही खत्म होगा जब इससे जुड़े गिरोहबाज खलनायक खत्म होंगे।

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