Jobs in language largesse

SANTOSH K. KIRO

Appointment of official writers, teachers likely in future

Government jobs and promotion of literature await the 11 languages that recently got second language status in Jharkhand.

The Cabinet on August 30 had agreed to accord the status to five tribal and four regional languages — the quintet of Santhali, Ho, Kurukh, Mundari and Kharia and the quartet of Nagpuri, Panchpargania, Khortha and Kurmali — along with Bengali and Oriya.

The Assembly passed the language bill on September 3.

Now, the governor will put his seal and the Raj Bhasha department will notify it in the gazette.

This entire process clears the way for numerous benefits associated with the official second language tag bestowed on the 11 tongues.

The two most obvious gains are jobs for those conversant with these languages — as teachers, official writers and the like — and promotion of literature.

“Government advertisements will be published in newspapers and magazines in these new official languages. Interested people can use these languages in applications to the government. The government is bound to reply in the language concerned,” said an official of Raj Bhasha department, requesting anonymity.

This opens up huge employment avenues, as the government will need to appoint persons with academic qualification in these languages.

While the Raj Bhasha department will notify how and where each of the 11 new second official languages will come in use, the human resource development department will determine whether to introduce the languages at the primary level of education.

“We are expecting about 40,000 jobs for our youths as teachers of these languages at the primary school level,” said Giridhari Ram Gaunjhu, head of the department of tribal and regional languages, Ranchi University.

The veteran scholar also hoped that literature of tribal and regional languages would get a big boost through state promotion.

Echoing him, Nagpuri scholar and former Ranchi University professor B.P. Kesri said: “We have succeeded in getting second official language status for our languages. Now we will ask the state government to establish Sahitya Akademi, so that our literatures get promoted. ”Courtesy: TheTelegraph.

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Author: madhubaganiar

Madhubaganiar loves to write on social issues especially for downtrodden segment of Indian society.

1 thought on “Jobs in language largesse”

  1. why urdu is second official language of jharkhand. does urdu is a jharkhandi language. does urdu has any connection with jharkhandi culture and history? then why jharkhand govt declare urdu as a second official language of jharkhand? why there is more than 10000 urdu medium govt. schools in jharkhand. why govt. financial grant for madarsa in a secular country you cant favour any religios education . if govt give grant for madarsa then why not for saraswati shishu/vidya mandir and other hindu organisation schools?
    झारखण्ड में भासा के स्थानीय होने के मानदंड क्या है . किसी जाति भाषा संस्कृति के स्थानीय होने के कारन कौन से है . ये तो सर्बमान्य है की गाव या ग्रामीण अंचल की भासा संस्कृति किसी प्रदेश की स्थानीय भाषा मानी जाती है . धनबाद , बोकारो,रांची के शहरी क्षेत्रो में भोजपुरी भाषी बहुसंख्यक ,करीब ८०% तक लेकिन इसका अर्थ ये तो नहीं हो गया की भोजपुरी धनबाद बोकारो रांची जमशेदपुर की स्थानीय भाषा है .किसी भाषा को उस क्षेत्र के स्थानीय भाषा कहलाने के लिए निम्लिखित योग्यता होनी चाहिए –
    १. उक्त भाषा को उस प्रदेश की ग्रामीण या दूर दराज के क्षेत्र की आंचलिक भाषा होनी चाहिए यानि उस क्षेत्र के निरक्षर व्यक्ति से लेकर शिक्षित सभी उस भाषा को बोलना जानते हो
    २. उक्त भाषा उस प्रदेश में कम से कम ५०० – १००० बरस पुरानी हो . भाषा के पुराना या प्राचीन होना स्थानीयता को दर्शाता है यानि उक्त प्रदेश में कम से कम ५००- १००० बरस पहले से उक्त भाषा वोहा बोली जाती हो .
    ३. उक्त भाषा उस प्रदेश इतिहास और संस्कृति से संबध हो , उक्त प्रदेश की संस्कृति लोक कला , लोकगीतों में उस भाषा का प्रभाव हो . प्राचीन साहित्य में प्रभाव हो . धर्म धार्मिक क्रिकलाप उक्त भाषा में किये जाते हो जैसे ज्योतिष गणना पूजा पथ भक्ति काब्य सभी कुछ तथा प्राचीन परंपरा के रूप में .
    प्रश्न यह है की हिंदी और बंगला में कौन झारखण्ड की स्थानीय भाषा है ?
    तुलनात्मक बिशलेषण-
    १. झारखण्ड के किसी भी गाव या ग्रामीण अंचल में हिंदी नहीं बोली जाती ,पछिम उत्तर प्रदेश सहारनपुर मीरट देलही क्षेत्र की हिंदी खडी बोली पछिम उत्तर प्रदेश की स्थानीय भाषा है क्योकि ये भाषा उस प्रदेश के ग्रामीण अंचल में बोली जाती . जब हिंदी को रास्ट्र भाषा का दर्जा मिला तो ये सर्वभारतीय भाषा बना तथा इसका महत्वा और सम्मान और उपयोगिता बढ़ गयी . झारखण्ड की भाषा खोरठा नागपुरी अदि कमजोर भाषा होने के कारण हिंदी को झारखण्ड की स्थानीय भाषा बनाया गया लेकिन ये झारखण्ड की स्थानीय भाषा नहीं है क्योकि हिंदी झारखण्ड के दूर दराज और ग्रामीण अंचल में नहीं बोली जाती .
    बंगला भाषा झारखण्ड में बहुत प्राचीन है और चास चंदनकियारी मुरी सिल्ली ,पुरबी सिंघ्भुम ,सराइकेला खरसावाँ के ग्रामीण अंचल ,धनबाद ,जामतारा,दुमका ,पाकुड़ , साहिबगंज और आंशिक रूप से देवघर के ग्रामीण क्षेत्रो में बोली जाती है और १००० वर्सो से बोली जा रही . १९४७ तक इन क्षेत्रो में शिक्षा का माध्यम बंगला मीडियम स्कूल थे . बाद में बंगला स्कूल को हिंदी स्कूल में रूपांतरित कर दिया गया यानि झारखण्ड में ५०% क्षेत्र में बंगला भाषा स्थानीय रूप में बोली जाती रही है जो की इस भाषा की स्थानीयता को दर्शाता है . किसी भाषा के विकाश के लिए उस भाषा का राजकीय समर्थन जरुरी है . परन्तु तत्कालीन बिहार सरकार और वर्तमान में झारखण्ड सरकार ने झारखण्ड में उर्दू भाषा का विकाश और बंगला भाषा के विनाश को मूल लक्ष्य बनाया है . उर्दू का झारखण्ड से क्या संबंद है जिस भाषा में ८०% विदेसी सब्द हो उसका झारखण्ड क्या भारत से कोई सम्बन्ध नहीं है अरबी फारसी तुर्की सब्दावाली से बनी उर्दू भाषा का झारखण्ड से क्या सम्बन्ध तो फिर क्यों सन २००६ में मधु कोड़ा और कांग्रेस की सरकार ने उर्दू को द्वितीय राजभासा बनाया . क्या ये मुस्लिम वोते बैंक की राजनीती है .
    हिंदी एक नयी भाषा है जिसका विकाश १७-१८ वी सताब्दी में हुवा और वर्त्तमान हिंदी का स्वरुप सन १८०० के सुरु में प्रकट हुवा बंगला एक प्राचीन भाषा है करीब १५००-२००० बरस पुरानी
    झारखण्ड के धार्मिक सांस्कृतिक क्रियाकलाप पर बंगला भाषा का प्रभाव –
    १. ग्रामो में बंगला जात्रा का मंचन
    २. बंगला ज्योतिष कैलेंडर को मानना , पूजा पद्धति पर बंगला भाषा का प्रभाव ,
    ३. झारखण्ड के मानभूम सिंघ्भुम संथाल परगना के ग्रामीण अंचल में काशीदास जी का महाभारत और किर्तिवाश ओझा रचित रामायण का पाठ होता ग्राम के होरी मेला में मानभूम सिंघ्भुम के गाव में एक सामुदायिक धर्मं चर्चा स्थान होता है जिसे हरी मेला या होरी मेला कहते है वोह वैसाख मास में किर्तिवाशी रामायण पाठ होता है .
    इस प्रकार हम कह सकते है की बंगला झारखण्ड की स्थानीय भाषा है और इसे द्वितीय राजभासा का दर्जा अवश्य मिलना चाहिए नाकि उर्दू को .झारखण्ड में भावात्मक एवं साहित्यिक शून्यता का कारण-
    सभी प्रदेशो का एक सांस्कृतिक एवं भाषाई पहचान है , परन्तु झारखण्ड की स्थिति बड़ी विचित्र है , झारखण्ड में भाषा की बिडम्बना ये है की झारखण्ड की राजभासा हिंदी का झारखण्ड से कोई ऐतिहासिक सम्बन्ध नहीं है न ही कोई सांस्कृतिक सम्बन्ध है . हिंदी एक नयी भासा है . हिंदी के अनेक रूप है खड़ी बोली ,अवधी,ब्रजभासा ,किन्तु भारत सरकार ने पच्छिम उत्तर प्रदेश में बोली जाने वाली खड़ी हिंदी को राष्ट्र भासा माना. खड़ी हिंदी का दो रूप है एक संस्कृत निष्ठ हिंदी और उर्दू मिश्रित हिन्दुस्तानी . हम लोग बोल चल में उर्दू मिश्रित हिन्दुस्तानी हिंदी का प्रयोग करते है . भारत में स्वतंत्रता के बाद हिंदी को राजकीय संरक्षण मिला जिससे हिंदी का दुसरे प्रान्तों में फेलाव और विकाश हुआ . किसी भी भासा के विकाश के लिए राजकीय संरक्षण बहुत जरुरी है बिना राजकीय संरक्षण के भय्ये मर या लुप्त हो जाती है जैसा की मैथिलि भासा के साथ हुआ ,ये ३००० बरस पुरानी भासा सरकारी उपेछा के कारण लुप्तप्राय हो गयी है . मैथिलि भासा बांग्ला भासा की जन्मदाता भासा है . बांग्ला भासा की लिपि वास्तव में मिथिलाक्षर है जिसे तिरहुता भी कहते है .
    बिहार सरकार में मैथिलि भासा की उपेछा कर के उर्दू को बिहार की द्वितीय राजभासा बना दिया , झारखण्ड में भी बांग्ला भासा की उपेछा कर उर्दू को द्वितीय राजभासा बना दिया . उर्दू का झारखण्ड से क्या सम्बन्ध है , क्या कोई सांस्कृतिक या ऐतिहासिक सम्बन्ध है ,नहीं बिलकुल नहीं , भला अरबी फारसी और तुर्की सब्दो वाली उर्दू भासा का झारखण्ड से क्या सम्बन्ध हो सकता है . झारखण्ड की राजकीय भासा हिंदी खुद एक आयातित भासा है जिसे उत्तर प्रदेश से आयात किया गया है क्योंकि झारखंडी की सदनी या मूल भाषाये बहुत ही कमजोर है . राजकीय कामकाज खोरठा कुरमाली नागपुरिया पंच्पर्गानिया जैसे कमजोर बहसों के बस की बात नहीं है . बांग्ला को झारखण्ड की राजकीय भासा बनाया जा सकता है क्योकि बांग्ला बहुत ही विकसित भासा है तथा तकनिकी रूप से विकसित है . परन्तु झारखण्ड में रह रहे १ करोड़ बिहारी प्रवासियों को जिससे दिक्कत होती . इसलिए ये सही है की हिंदी को झारखण्ड की राजभासा बनाया गया . हिंदी वास्तव में झारखण्ड की राजभासा बनाने के योग्य है परन्तु द्वितीय राजभासा का दर्जा निश्चित रूप से बांग्ला को मिलना चाहिए . बांग्ला बसा का आगमन झारखण्ड में हिंदी से बहुत पहले हुआ . बांग्ला का आगमन झारखण्ड में १००० से १२०० बरस पूर्व हुआ जब झारखण्ड और बिहार के प्रदेशो पर बंगाल के पाल और सेन राजवंसो का सासन था और मुंगेर पाल राजवंश की राजधानी थी . पूरा का पूरा संथाल परगना और अंग प्रदेश भागलपुर अंग प्रदेश में बांग्ला भासा बोली जाती थी तथा मुग़ल काल में राजमहल बंगाल सूबा की राजधानी थी . सन १९११ तक बंगाल प्रेसिडेंसी के अंतर्गत झारखण्ड और बिहार के प्रदेश थे उस समय राजकीय भासा बांग्ला ही थी . समस्त संथाल परगना ,मानभूम ,सिंघ्भुम में बांग्ला माध्यम स्कूल थे . १९५०-५५ तक इन इलाको में बांग्ला माध्यम के स्कूल चल रहे थे कालांतर में इन स्कूल को हिंदी माध्यम में रूपांतरित कर दिया गया . मानभूम संथाल परगना सिंघ्भुम के निवाशी बांग्ला भासा और संकृति से पूरी तरह से जूद चुके थे उस समय एक नयी भासा हिंदी को उन पर थोप दिया गया . संथाल परगना की लोक संस्कृति रीती रिवाज़ धार्मिक क्रियाकलाप पंचांग शिक्षा बांग्ला पर आधारित थी . लोक गीतों अदि पर बांग्ला का प्रभाव था . इन इलाको में बांग्ला भासा के ख़तम हो जाने से एक सांस्कृतिक और भावात्मक शून्यता पैदा हो गयी .नयी और पुरानी पीढ़ी के बीच एक भाषाई खालीपन पैदा हो गया . मानभूम क्षेत्र के पुराने लोग हिंदी बोलना नहीं जानते . आप धनबाद चास चंदनकियारी चांडिल पटमदा सिंघ्भुम के किसी ग्रामीण क्षेत्र में चल जाये और किसी बूढी महिला को पूछ कर देखे वो हिंदी नहीं जानती होगी लेकिन बांग्ला बोलना जरूर जानती होगी . आज हिंदी भारत की राष्ट्र भासा है और झारखण्ड की राजकीय भासा है इसलिए आज हिंदी भासा का महत्वा ज्यादा है इसलिए आज की नयी पीडी हिंदी बोलना पसंद करती है लेकिन झारखण्ड के संथाल परगना मानभूम और सिंघ्भुम के लोगो को बांग्ला भासा को नहीं भूलनी चाहिए क्योकि ये उनकी जड़ो से जुडी हुई है . नहीं तो एक सांस्कृतिक खालीपन पैदा हो जाएगी . आज भी झारखण्ड में गयी जनि वाली टुसू गान बांग्ला में ही है . अर्जुन मुंडा और सिबू सोरेन भी बंगलाभाषी ही है .
    झारखण्ड में भासा का कालानुक्रम –
    १. कुरमाली ,खोरठा ,संथाली अति प्राचीन
    २. बांग्ला – १०००-१२०० बरस पूर्व
    ३. हिंदी १५० -२०० बरस पूर्व
    हम लोग बीच वाले काल क्रम को भूल जाने चाहते है और बांग्ला बोलने में संकोच महसूस करते है .
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