भारत आगमन के साथ ही हुआ अंग्रेजों का विरोध

बेड़ो, : करमचंद भगत महाविद्यालय बेड़ो के परिसर में 1857 के विद्रोह में आदिवासियों की भागीदारी विशेष संदर्भ झारखंड विषय पर आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के दूसरे दिन प्रस्तुत शोधपत्रों के आधार पर इतिहासकारों ने निष्पक्ष एवं पूर्वाग्रह रहित इतिहास लेखन को रेखांकित किया। विद्वानों ने झारखंड में अंग्रेजों की विभाजनकारी नीतियों को स्पष्ट किया। दूसरे दिन के पहले सत्र केमुख्य अतिथि सिद्धू-कान्हू विश्र्वविद्यालय के इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ सुरेन्द्र झा ने कहा कि छोटानागपुर संथालपरगना ही एक ऐसा क्षेत्र रहा है, जहां अंग्रेजों के आगमन के साथ हीं विद्रोह प्रारंभ हो गया था। यहां के आदिवासी अपनी अस्मिता जल, जंगल जमीन की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को आतुर थे। यही कारण है कि 1857 की क्रांति में आदिवासियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। अध्यक्षता करते हुए राष्ट्रीय सेमिनार के आयोजन समिति के सचिव इतिहासकार डॉ मथुरा राम उस्ताद ने कहा कि हमें जिन तथ्यों की आवश्यकता है वे कोलकाता के संग्रहालय में सुरक्षित देसी राजाओं व अंग्रेजों के मूल दस्तावेज के आधार पर हीं नहीं, बल्कि गांवों गाए जाने वाले लोक गीतों में अंतनिर्हित हैं। सेमिनार के दूसरे दिन पहले सत्र में 14 तथा दूसरे सत्र में 6 शोधपत्र प्रस्तुत किया गया। पीपीके कॉलेज बुंडू की इतिहासविद् डॉ कालिंदी कुमारी, डॉ संध्या रानी, डॉ आभा खलखो करमचन्द भगत महाविद्यालय के प्रो. इंद्रमोहन राय, प्रो. नवल किशोर शाही समेत संगीता मिंज, ज्योति मिंज ने अपने शोधपत्र में 1857 की क्रांति में तत्कालीन सम्राज्यवादी शक्ति व अंग्रेजों के तलवे चाटने वाले जमींदारों की भूमिका पर प्रकाश डाला। दूसरे सत्र में इतिहासकारों ने मूलतत्व में जाकर इतिहास की स्वतंत्रता एवं निर्भिकता तथा निरपेक्ष इतिहास लेखन के अलग-अलग पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए इतिहासकारों के बीच मतभिन्नता को स्वभाविक बताया। डॉ उस्ताद ने कहा कि आपसी मतभिन्नता से ही कई नए तथ्य सामने आते हैं। प्रो. नवल किशोर शाही ने अपने वक्तव्य में कहा कि विद्रोहियों खासकर आदिवासी तथा अन्य लोगों के बीच 1857 की क्रांति में एक-दूसरे से संवादहीनता नहीं होती, तो आजादी पहले ही हासिल हो जाती। मौके पर जवाहरलाल नेहरू विश्र्वविद्यालय के डॉ. जोसेफ बाड़ा, डॉ. राजेन्द्र तिवारी, प्रो. इन्द्रमोहन राय, प्रो. दिलीप सिंह, किशोर टंडर, सुखेदव उरांव, मो. रफीक सहित अन्य लोगों ने भूमिका निभाई।
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Author: madhubaganiar

Madhubaganiar loves to write on social issues especially for downtrodden segment of Indian society.

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