दस करोड़ लोगों का नहीं है कोई अपना धर्म

संजय कृष्ण, रांची दस करोड़ आदिवासियों की आबादी का क्या कोई अपना धर्म नहीं है? भारत सरकार की मानें तो नहीं? क्योंकि जनगणना प्रपत्र में इनके लिए कोई कॉलम नहीं हैं। इन्हें या तो हिंदू धर्म में विलोपित कर दिया जाता है या ईसाई में। पर, इसकी मांग लंबे समय से की जाती रही है और सरकार इसे नकारती रही है? जोहार सहिया के संपादक अश्विनी कुमार पंकज कहते हैं कि अलग धरम कोड की मांग उतनी ही पुरानी है, जितनी झारखंड आंदोलन की मांग। अलग राज्य की मांग में अलग धरम कोड की मांग भी थी। पर, कालांतर में राजनीतिक-आर्थिक कारणों की प्रबलता से यह मांग पीछे छूट गई। अब राज्य अलग हो गया तो भाषा का सवाल, धरम कोड का सवाल प्रमुखता से उठ रहा है। यह जायज भी है। यह उनके अस्तित्व से जुड़ा है। धरम कोड को लेकर एक लंबी बहस भी चली। आदिवासियों के धर्म को आदि धरम कहा जाए या सरना। आदिवासियों के पूजा स्थल को सरना स्थल कहा जाता है। इसे लेकर कहा गया कि पूजा स्थल धर्म नहीं हो सकता। दूसरे आदिवासी समुदायों ने आदि धरम नाम प्रस्तावित किया। इसमें डा. रामदयाल मुंडा का नाम प्रमुख है। उन्होंने अपने अंतिम समय में आदि धरम नामक किताब भी लिखी। वे शुरू से ही इसके पक्ष में थे कि आदिवासियों को आदि धरम से चिह्नित किया जाए। भारत सरकार ने तो संयुक्त राष्ट्र संघ में एक बार आदिवासी आबादी को ही नकार दिया था। जब काफी हो-हल्ला हुआ तो उसने स्वीकार किया। हालांकि संविधान ने आदिवासियों की एक अलग पहचान स्वीकारी है और उनकी सांस्कृतिक विशिष्टता के संरक्षण-संवर्धन के लिए अनेक प्रावधान किए गए हैं। यहां तक कि 1960 में ढेबर कमीशन ने आदिवासी/अनुसूचित जनजातियों को इंडीजिनस के समकक्ष माना है। देश की सत्ता सदैव से ही आदिवासी आबादी को नकारती रही है। इसलिए जनगणना प्रपत्र में आज तक इनके लिए अलग से कोई कॉलम नहीं दिया गया है। अब यह मामला जोर पकड़ रहा है। जब जैन, बौद्ध, पारसी या अन्य जो जनसंख्या की दृष्टि से कम हैं, उनके लिए अलग से कॉलम है तो आदिवासियों के लिए क्यों नहीं? यही मांग लंबे समय से की जा रही है। जिनकी आबादी देश में दस करोड़ हो, उनके अस्तित्व को क्या नकारा जा सकता है? आदिवासी जनपरिषद इन्हीं सवालों को लेकर बिरसा मुंडा के जन्म स्थान से पदयात्रा कर रहा है।
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Author: madhubaganiar

Madhubaganiar loves to write on social issues especially for downtrodden segment of Indian society.

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