EXPOSE : बिकने के बाद जिस्म के धंधे में खप जाती हैं यहां की लड़कियां

अमित सिंह. |रांची.झारखंड को बने 12 साल हो गए, 13वें वर्ष में प्रवेश हो चुका है। कहते हैं कि 12 साल में घुरे का दिन भी बदल जाता है, पर इन 12 सालों में आदिवासी महिलाओं की तकदीर नहीं बदली। महिलाएं यहां दोहरे मोर्चे पर संघर्ष करती हैं। आजीविका के संकट के कारण एक तो पलायन कर रही हैं, दूसरे मानव व्यापार का शिकार बन रही हैं।

प्रदेश से हर साल करीब 33 हजार महिलाएं मानव तस्करी का शिकार होती हैं। पलायन का आंकड़ा तकरीबन एक लाख तक पहुंच गया है, जिनमें करीब 50 हजार शिकंजे से मुक्त नहीं हो पाती हैं। मानव तस्करी के मामले में नेपाल व बांग्लादेश सबसे अधिक प्रताडि़त देश है। वैश्विक स्तर पर प्रत्येक साल तीस लाख महिलाओं व बच्चों की तस्करी दलालों के माध्यम से होती है।

 16वें स्थान पर झारखंड

वर्ष 2007 में मानव व्यापार की विभिन्न धाराओं के तहत देश में दर्ज मामलों की संख्या 3991 थी, जो वर्ष 2011 में घटकर 3517 रह गई है। झारखंड में मानव व्यापार के मामले कम ही दर्ज हुए है। फिर भी पिछले वर्ष की तुलना में 2.8 फीसदी माले अधिक है। भले ही यहां से सैकड़ों युवतियों और नाबालिग बच्चों का पलायन होता है, दर्ज मामलों की संख्या महज 43 है। मानव व्यापार में राज्यवार स्थिति देखें तो प्रदेश 16वें स्थान पर झारखंड है।

महिलाओं को बाहर लेजाकर बेचने वाले कई दलाल गिरोह सक्रिय

रांची में आदिवासी लड़कियों और महिलाओं को बाहर लेजाकर बेचने वाले कई दलाल गिरोह सक्रिय है। इसका खुलासा रांची रेलवे स्टेशन पर पकड़े गए दलालों ने किया है। शहर के मोरहाबादी, जगन्नाथपुर मौसीबाडी, ऊपर हटिया, चुटिया, नामकुम, पिस्का, नगड़ी, कांके में ऐसे दलाल सक्रिय है। मौसीबाड़ी के एक ऐसे ही महिला दलाल रूदल के पास डीबी स्टार टीम पहुंची। उससे क्या बातें हुई, प्रस्तुत है बातचीत के मुख्य अंश…

रिपोर्टर :मैं बैंगलोर से आया हूं। रांची में चाचा जी का मकान है। मुझे बैंगलोर के घर में काम करने के लिए एक लड़की चाहिए।
रुदल : कई लड़कियां है। कैसी लड़की चाहिए? थोड़ी बहुत पढ़ी लिखी चलेगी?

रिपोर्टर :हां, पढ़ी-लिखी ही चाहिए। कहां की लड़की है?
रुदल :बालालौंग जानते है? हटिया डैम के उस पार है। वही की लड़की है। 25 साल उम्र होगी। आठवीं पास है।

रिपोर्टर :बैंगलोर के घर में ही रहना होगा। पत्नी के ऑफिस जाने के बाद बच्चे की देखभाल कर सकती है?
रुदल :आप जो कहिएगा करेगी। कई माह से काम खोज रही है। अदिवासी है, मगर वैसी दिखती नहीं है।

रिपोर्टर :अभी उससे मिल सकते है?
रुदल :नहीं, बालालौंग जाकर उसे बताना होगा। तब यहां आएगी। मोबाइल भी उसके पास नहीं है।

रिपोर्टर :उससे मिलने के लिए कब आना होगा?
रुदल : मैने बोल दिया कि वह जाएगी, तो जाएगी। आप उसे ले जाने के लिए क्या करेंगे, यह बताइये।

रिपोर्टर :मुझे क्या करना होगा, आप ही बता दीजिए।
रुदल :आपको दो किस्तों में राशि देनी होगी। पहली किस्त 25,000 रुपए कैश देना होगा, जो लड़की के परिवार को मैं दे दूंगी। दूसरी किस्त, जब लड़की के काम से आप संतुष्ट हो जाएंगें, तब 20,000 रुपए मेरे एकाउंट में डालना होगा।

रिपोर्टर : इतना पैसा, देने के बाद लड़की मिलेगी?
रुदल :ज्यादा पैसा लग रहा है। एक-एक लाख देकर लोग यहां लड़की ले जाते है। साल में कई कपड़े व गिफ्ट भी देते है।

रिपोर्टर :मेरे लिए यह पैसा बहुत ज्यादा है।
रुदल : आपके साथ राजेश जी आए है, इसलिए कम पैसे बता रही हूं। आप निश्चिंत होकर उसे ले जाइए, बहुत सेवा करेगी। अच्छी लड़की है।

रिपोर्टर :अब तक आप कितनी लड़कियों को बाहर भेज चुकी है?
रुदल : 15 साल से लड़कियों को रोजगार मुहैया करवा रही हूं। अबतक सैकड़ों लड़कियों को तो दिल्ली सहित कई बड़े शहरों में भेज चुकी हूं।

रिपोर्टर :आप किसी संस्था से जुड़ी है या खुद की बदौलत यह काम करती हैं।
रुदल : खुद की बदौलत यह काम करती हूं। मुझसे लड़कियों के लिए संस्थाएं संपर्क करती है।

रिपोर्टर :यह काम तो गलत है, पुलिस भी पकड़ सकती है।
रुदल : पुलिस यहां नहीं आती। वैसे आप लड़की लेने आए है या मेरा इंटरव्यू?

रिपोर्टर : मैं दैनिक भास्कर डीबी स्टार से आया हूं। लड़कियों की खरीद फरोख्त कैसे होती है, यह देखने आया था।
रुदल : सर, आप मेरे बारे में अखबार में मत छापिएगा। पेट पर लात लग जाएगा। बच्चे सड़क पर आ जाएंगे। आपको जो चाहिए बोलिए।

रिपोर्टर : मुझे क्या दे सकती हैं?
रुदल : आप जो बोलिएगा आपको मिलेगा। मेरा भाई भी आ गया। आप इससे बात कर लीजिए। मैं गलत नहीं करती हूं।

रिपोर्टर :गलत नहीं करती है। मगर पैसे लेकर एक तरह से लड़कियों को बेचने का काम तो करती है।
रुदल : पैसे लड़की के घर वालों को देती हूं। कुछ ही पैसे अपने पास रखती हूं। मैं लड़कियों का धंधा नहीं करती।

वर्ष 2012 में मानव व्यापार के 43 मामले
>1 वेश्यावृत्ति के लिए युवती को खरीदा
>6 वेश्यावृत्ति के लिए युवती को बेचा
>15 अवयस्क लड़कियों से वेश्यावृत्ति
>6 लड़कियों का आयात किया
>15 लड़कियों का अनैतिक व्यापार

317 लड़कियां को बचाया गया
2010 व 2011 में दलाल के चंगुल से करीब 317 लड़कियों को बचाया गया। रांची स्टेशन पर इस साल तीन दर्जन से ज्यादा लड़कियों को दिल्ली जाने से रोका गया, जिसे दलाल अपने साथ लेकर जा रहे थे। दलालों के ऊपर एफआईआर करके उन्हें जेल भी भेजा जा चुका है।
हर साल 35 हजार लड़कियों का पलायन
झारखंड से एक वर्ष में करीब 35 हजार लड़कियों का पलायन होता है। सबसे चौंकाने वाली बात यह कि लड़कियों के लिए सर्वाधिक असुरक्षित जगहों में राजधानी रांची का भी नाम शुमार है। इसके अलावा पाकुड़, साहेबगंज, सिमडेगा, गुमला, गिरिडीह, चाईबासा जिलों का भी वही हाल है। ये बातें राज्य महिला आयोग की ओर से मानव व्यापार रोकने के लिए पिछले माह आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में उभर कर सामने आई।
क्यों है आदिवासी लड़कियों की मांग
अदिवासी लड़कियां परिश्रमी, ईमानदार, विश्वसनीय, विनयशील होती हैं। दिल्ली जैसे महानगर के हिसाब से कम पैसे में भी दिनरात खटाया जा सकता है। संभ्रांत परिवार आदिवासी लड़कियों को घरेलू काम काज के लिए खोजता है।

दलदल में ऐसे फंसती है लड़कियां

जितनी लड़कियां ट्रैफिकिंग की शिकार होती है, उनमें 51 प्रतिशत मामले ऐसे होते है, जिनके दूर के जीजा ही पैसे के लोभ में दिल्ली पहुंचा देते हैं। इनमें 77 प्रतिशत एसटी होती है, 12 प्रतिशत एससी। सामान्य 03 और पिछड़े समाज की लड़कियां 08 प्रतिशत। गांव में रोजगार नहीं होने के कारण भी लड़कियां दिल्ली पहुंचा दी जाती हैं। जाने वालों में अशिक्षित लड़कियों की संख्या सबसे अधिक होती है। यानी 67 प्रतिशत। इनमें 51 प्रतिशत लड़कियों की संख्या ऐसी होती है, जिनके जीजा ही दिल्ली पहुंचा देते हैं।

दिल्ली रिटर्न की मिलती है पहचान

दिल्ली से वापस आई आदिवासी लड़कियों को दिल्ली रिटर्न बोला जाता है। विभिन्न संस्थाओं की पहल पर समय-समय पर दिल्ली व अन्य महानगरों से मुक्त कराई गई लड़कियों के संदर्भ में एक एनजीओ की सहयोगी कहती हैं, दिल्ली रिटायर्ड कहकर इन लड़कियों को जहां समाज स्वीकार नहीं करता, वहीं सरकार भी मुख्यधारा से जोडऩे की दिशा में उदासीन है। नतीजतन पलायन का सिलसिला जारी है।

123 हैं वैध तो हजार हैं अवैध एजेंसियां
दिल्ली में वैध 123 तो अवैध 11 सौ एजेंसियां है। सिर्फ दिल्ली में इस तरह की 123 रजिस्टर्ड एजेंसिया है, जो प्लेसमेंट दिलाने का कार्य करती हैं, जबकि अवैध एजेंसियों की संख्या करीब 1100 से भी अधिक है। जहां तक झारखंड की बात है, यहां एक भी ऐसी पंजीकृत एजेंसी नहीं है। बिचौलिये कमीशन की चाह में किशोर-किशोरियों को फांसते है और महानगरों में कार्यरत एजेंसी के हवाले कर देते हैं।

मामलों में आई है कमी
“आयोग लड़कियों की ट्रैफिकिंग रोकने के कई उपाय कर रहा है। आयोग व पुलिस की विशेष सेल की मदद से हाल के दिनों में ऐसे मामलों में कमी आई है। पुलिस का विशेष सेल भी इस दिशा में काम कर रहा है।”-हेमलता एस मोहन, अध्यक्ष, राज्य महिला आयोग– साभार-दैनिकभाष्‍कर

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Author: madhubaganiar

Madhubaganiar loves to write on social issues especially for downtrodden segment of Indian society.

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