गरीबी से नहीं, असमानता से उपजता है नक्सलवाद

भरत झुनझुनवाला —छत्तीसगढ़ की नक्सलवादी घटना से हमें यह समझ लेना चाहिए कि देश की समस्यागरीबी की नहीं बल्कि असमानता की है। नक्सली गरीबनहीं हैं। उन्हें आक्रोशहै कि शहरों में बसे चुनिंदा नेता, अफसर और उद्यमी उनके संसाधनों को लूटरहे हैं। देश का विकास हो रहा होगा किंतु उनकी दृष्टि अपने सामान्य जीवन औरशहरी अय्याशी के बीच बढ़ती खाई पर है। समस्या को नक्सलियों के दमन से नहींबल्कि अमीरी के दमन से सुलझाना होगा। यह समस्या मुद्राकोष और विश्व बैंकद्वारा लागू मॉडल में निहित है। यह मॉडल अमीर और आम आदमी में फासला बढ़ाताहै। ऑक्सफैम के एक अध्ययन के अनुसार विश्व के 100 अमीर व्यक्तियों कीसंपत्ति में गत वर्ष लगभग 13 हजार करोड़ रुपये की वृद्धि हुई। इस रकम कोयदि दुनिया के सौ करोड़ गरीबों में वितरित कर दिया जाए तो प्रत्येक गरीबव्यक्ति को 13,200 रुपये मिल सकते हैं जो कि उनकी मूल जीविका साधने के लियेपर्याप्त होगा।

सिटिजन और स्लेव

दुनिया के सौ करोड़ गरीब और 100 अमीर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।तात्पर्य यह कि एक सीमा तक असमानता समाज के लिए हितकारी होती है। सीमा पारकरने के बाद वही असमानता समाज के लिये अभिशाप बन जाती है। समानता परकआदिवासी समाज को लें। यह समाज बंदूक नहीं बना पाता। बंदूक बनाने के लियेलुहार, इंजीनियर, केमिस्ट आदि अलग-अलग पेशे के लोगों की आवश्यकता होती है।इन्हें ट्रेनिंग देने में असमानता उत्पन्न हो जाती है। बिना असमानता केबंदूक बनाना कठिन होता है। लेकिन इसका परिणाम यह निकलता है कि बंदूकधारी केसामने आदिवासी समाज पस्त हो जाता है। अमेरिका में रेड इंडियन समाज केध्वस्त होने का यही सबक है। दूसरी ओर बढ़ती असमानता समाज को अस्थिर भी बनादेती है। पुरातन यूनान ने असमानता को स्वीकार किया। सिटिजन और स्लेव के बीचसमाज बंटा हुआ था। लेकिन समृद्धि का वह समाज सुवितरण नहीं कर सका।परिणामस्वरूप यूनान के आम आदमी में असंतोष व्याप्त हो गया। जब बर्बरों नेआक्रमण किया तो आम जनता ने बर्बरों का साथ दिया और यूनानी साम्राज्यनेस्तनाबूद हो गया।

पतन की आशंका

स्पष्ट है कि समानता तथा असमानता दोनों ही कामयाब नहीं है। इन दोनों छोरोंके बीच कहीं असमानता का सही स्तर रहता है। यह स्तर तकनीकी विकास के साथबढ़ता जाता है। जैसे नुक्कड़ की दुकान और वालमार्ट की तुलना करें। नुक्कड़की दुकान का मालिक यदि माह में 50 हजार कमाता है तो नौकर पांच हजार।असमानता 10 गुनी रही। लेकिन वालमार्ट की आय उसके किसी सामान्य कर्मचारी से 10 लाख गुनी अधिक है। कारण कि वालमार्ट के मालिक को आय संपूर्ण विश्व सेमिलती है। इसके विपरीत कर्मचारी को संपूर्ण विश्व के श्रमिकों सेप्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है और उसका प्रभावी वेतन घटता जाता है। जरूरी नहींकि बाहरी आक्रमण से ही हमारा पतन हो। आंतरिक विरोध से भी हमारा पतन होसकता है जैसा कि आज पाकिस्तान और कुछ अफ्रीकी देशों में देखा जा सकता है।आज हमारा आम आदमी असंतुष्ट है। एक ओर नेता, सरकारी कर्मी और शीर्ष उद्यमीअरबों रुपये कमा रहे हैं और अति उच्च जीवन स्तर भोग रहे हैं, दूसरी ओर आमआदमी को दो टाइम की रोटी और टेबलफैन ही उपलब्ध है।

 

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Author: madhubaganiar

Madhubaganiar loves to write on social issues especially for downtrodden segment of Indian society.

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