ईश्वर के नाम पर न दें धन-दौलत दान में

नेह इंदवार 

भक्तों द्वारा पूजालयों-प्रार्थनालयों में जाकर ईश्वर को रूपये पैसे धन दौलत का दान देना ईश्वर के गला पर जोरदार थप्पड़ मारने के बराबर है। यह दान-दक्षिणा का दिखावटीपन दिखाता है कि आप कितने घमंडी और जाहिल हैं, जो सम्पूर्ण विश्व के मालिक को थोड़े से रूपये-पैसे दान देकर अपनी तुच्छता-घटियापन दिखा रहे हैं। यह आपकी तुच्छ सोच और व्यवहार को बताता है कि आप अपने हद दर्जे के भोलेपन (या कमीनापन) से ऐसी शक्ति को दान देने की कोशिश कर रहे हैं, जो यूनिवर्स के मालिक है। सीधे-सीधे यह यूनिवर्सल के मालिक की बेईज्जती है और उसे अपने से नीचे दिखाने की आपकी अक्षम्य चेष्टा है। जिस सर्वशक्तिमान से आप खुद गिड़गिड़ाकर भीख मांग रहे हैं, उसे ही भीख और घुस देने की चेष्टा कर रहे हैं। यह कितना हास्यस्पद या अनैतिक है, इसे आप से बेहतर कौन समझ सकता है।
क्या ईश्वर कोई भिखारी है ? जिसे आपकी भीख की आवश्यकता है ? क्या धन-दौलत पाकर ईश्वर किसी मॉल या बाज़ार में खरीदारी करने जाएँगे ? क्या उन्हें आपकी तरह किसी सांसारिक चीज की जरूरत भी है ?

आप खुद सोचिए, तनिक विचार कीजिए, चिंतन-मनन कीजिए कि आप ईश्वर के नाम पर दान-दक्षिणा देकर खुद को या ईश्वर को क्या साबित करना चाहते हैं ? आप स्थापित लकीर की सोच से बाहर आकर स्वतंत्र दिमाग से गहरे रूप से चिंतन करें। यह आपके व्यक्तिगत नैतिक, मानसिक, आत्मिक जीवन से संबंधित है। आप रूपये-पैसे, धन-दौलत का दान देकर अनजाने में एक सर्वशक्तिमान, सर्वधन संपन्न शक्ति की कैसी तौहिन कर रहे हैं और उसका आपके आलौकिक या परलौकिक जीवन में क्या फल मिलता होगा ?

क्या इतने पैसों से आप आलौकिक-परलौकिक सुख-शांति-आनंद और स्वर्ग खरीद लेंगे ? क्या यह इतनी ही सस्ती है ?

यदि आप प्राकृतिक ईश्वर को अपना कुछ अमूल्य चीज ही समर्पित करना चाहते हैं तो वह आपके जन्म और मृत्यु के बीच का “समय” है। प्राकृतिक ने आपको जीने का एक निश्चित समय दिया है और उस “समय” से अधिक आपके जीवन में कोई भी अमूल्य और महत्वपूर्ण नहीं है। आपको प्राकृतिक के द्वारा प्रदत्त समय से न एक पल अधिक मिलेगा और न एक पल कम। यदि आप ईश्वर को कुछ समर्पित करना ही चाहते हैं तो अपने समय को उसे अर्पित करें। आंख बंद करके ईश्वर से अपने चित्त को जोड़ें। अपने चित्त को इस लोक से निकाल कर उस लोक से जोड़े और अपने मन-ह्रदय को पवित्र बनाएँ और इस जुड़ाव को स्थायी बनाएँ। यही ईश्वर के प्रति सर्वश्रेष्ठ समर्पण और दान है।

आप कभी भी रूपये-पैसे, धन दौलत का दान न करें। ये हद दर्जे की सांसारिक वस्तुएँ हैं और इसका दान यह दिखाता है कि आप वास्तविक रूप से धार्मिक नहीं है, बल्कि आप निकृष्ठ रूप से सांसारिक, साम्प्रदायिक और स्वार्थी आदमी हैं और आपका यह दान ईश्वर को घुस देकर, उसे हेय समझ कर, उसे नीचा दिखा, उसे ठग-फूसला कर आप अपने सांसारिक क्षयदायी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए उसके प्यार और यूनिवर्सल संवेदनशीलपूर्ण मेकानिज्म का बेजा फायदा उठाना चाह रहे हैं। यह आपकी निष्कृष्ठ सोच, व्यवहार और मानसिक उद्देश्य को इंगति करता है।

इसका मतलब यह है कि आप संगठित रूप से धर्म के नाम पर सत्ता, वर्चस्व, प्रभाव बनाने रखने वाले बाज़ारू माफिया संगठनों को निरंतर समर्थन देना चाहते हैं। आप धर्म के नाम पर बनाए गए गैर-बराबरी, भेदभावमूलक, विभाजनकारी, शोषणकारी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए लगातार अपनी कमाई को इसमें निवेश करना चाहते हैं। इसका यह भी मतलब है कि प्राकृतिक रूप से ईश्वर के बनाए गए समतापूर्ण, दयामयी, करूणापूर्ण प्राकृतिक और स्वाभाविक मानवीय सामाजिक व्यवस्था को ध्वंस करने के कुचक्र में आप लगातार शामिल हैं। यह साबित करता है कि किसी रूपये-प्रेमी स्वार्थी धार्मिक राज सत्ता को बनाए रखने के लिए एक क्रूर धार्मिक सिपाही की भूमिका में आपने अपने जीवन को होम कर दिया हैं।

धर्म के नाम पर बचपन से ही थोपे हुए Domesticated mind and behavior की समीक्षा जरूर करें। ईश्वर को भिखारी, गरीब और धन-दौलत के भूखे होने के विचारों पर आधारित सोच-व्यवहार पर लगाम लगाएँ। धर्म के नाम पर बेवकूफ बन कर दान-दक्षिणा करने के कारण इसके दुरूपयोग करने वाले निठल्लों का एक मौजू-वर्ग हर जगह मौजूद है। आपके चिंतनहीन सोच विचार ने निठल्ले होकर विलासितापूर्ण जीवन जाने वाले एक परजीवी वर्ग का निर्माण किया है और वह आपको अधिक दान-दक्षिणा देने के लिए विभिन्न प्रकार से फूसलाता रहता है और तिकड़म भिड़ाता रहता है, ताकि आपकी कमाई से उनकी आय सदा बनी रहे और उनकी मौज-मस्ती, प्रभाव, वर्चस्व और सामंतवादी व्यवस्था में कोई व्यवधान उत्पन्न न हो।

Author: madhubaganiar

Madhubaganiar loves to write on social issues especially for downtrodden segment of Indian society.

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