आदिवासियों के साथ ममता सरकार का सौतेला व्यवहार

नेह इंदवार

बकौल उत्तरबंग संबाद (23 जनवरी 2020) ममता दीदी ने पहाड़ में डेवलपमेंट बोर्ड्स के लिए 2014-2017 के बीच लेप्चा, तमांग, शेरपा, मंगर, दमई, गुरूँग, कामी सहित 15 विकास बोर्ड्स को 480 करोड़ रूपये उपलब्ध कराया :- लेप्चा विकास बोर्ड- 130 करोड़, तमांग विकास बोर्ड 75 करोड़ सहित अन्य विकास बोर्ड को 25 से 30 करोड़ रूपये उपलब्ध कराया। इनमें से लेप्चा विकास बोर्ड के कार्यकलापों को छोड़कर अन्य विकास बोर्ड के कार्यकलापों पर अनेक प्रश्न चिह्न उठे हैं। इनमें से अधिकतर ने सरकार को Utilization Certificate अर्थात् कार्य सम्पन्न हुए ऐसा प्रमाण-पत्र जमा नहीं दिए हैं और सरकार का कहना है कि जब तक उसे यह प्रमाण-पत्र नहीं प्राप्त होगा, वह इन बोर्ड्स को और फण्ड उपलब्ध नहीं कराएगी।
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हम सरकार और पहाड़ के बोर्ड्स के बीच के मामलों में कुछ नहीं बोलेंगे। लेकिन डुवार्स के साथ सरकार का सौतेला व्यवहार बहुत स्पष्ट हो चला है। डुवार्स के लेप्चा, तमांग, शेरपा, मंगर, दमई, गुरूँग, कामी सहित 15 समुदायों को इन विकास बोर्ड्स के पैसों का कोई हिस्सा मिला या नहीं यह एक बड़ा प्रश्न है। उपरोक्त कई समुदायों में महज कुछ हजार ही परिवार हैं। उन परिवारों को इन फण्ड्स में से हिस्सा मिला या नहीं यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। कृपया आपलोग आरटीआई से ऐसे लोगों की सूची प्राप्त करें जिन्हें डुवार्स में उन पैसों में हिस्सेदारी मिली है।
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लेकिन बहुत बड़ा प्रश्न है कि सरकार ने क्यों पश्चिम बंगल आदिवासी विकास बोर्ड को नाममात्र का फण्ड उपलब्ध कराया ? पश्चिम बंगाल विकास बोर्ड को राज्य के 50 लाख आदिवासियों के लिए महज 5 करोड़ का फण्ड उपलब्ध कराया जाता था। लेकिन पहाड़ के विकास बोर्ड को इससे दुगुणी, तिगुणी फण्ड दिया जाता रहा है। लेकिन अब तो वह भी नसीब नहीं हो रहा है। यह स्पष्ट है कि डुवार्स-तराई के आदिवासियों के साथ सरकार जानबूझ कर सौतेला व्यवहार करती है। यह सिर्फ मामता सरकार की बात नहीं है। बल्कि हर सरकार ने यही किया है। लेकिन आदिवासी नेता अलग राज्य के मुद्दे या वोट के मुद्दे पर कोलकाता के नेताओं का ही समर्थन करते रहे हैं। लेकिन बदले में उन्हें पिछवाड़े में सरकार की लात मिलती रही है।
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सवाल है कि सरकार पहाड़ के विकास बोर्ड्स पर क्यों अधिक पैसा लुटाती है और डुवार्स तराई के विकास बोर्ड को पैसों के लिए तरसाती है? इसका एक ही उत्तर है, वह है पहाड़ के लोग अधिक शिक्षित हैं और वे अपने अधिकारों के लिए आंदोलित रहते हैं और अधिकार प्राप्ति के लिए अलग राज्य की मांग उठाते रहते हैं। पश्चिम बंगाल सरकार सिर्फ अलग राज्य की मांग की एकता को तोड़ने के लिए ही सरकारी पैसों को पहाड़ पर लुटा रही है। यदि डुवार्स में भी अलग राज्य की मांग की जाएगी तो जाहिर है डुवार्स के लोगों के उपर भी ममता या अन्य की ममता की बारिश होगी।
.🍀🌲कोलकाता की सरकार की पहली प्राथमिकता बंगाल सरकार में कोलकाता वासियों की वर्चस्व बनाए रखनने की है। वह चाय बागान के गैर-बंगला भाषी जनता को बंगाल की स्वाभाविक नागरिक नहीं सकती है। यह हजारों बार स्पष्ट हो चुका है। यह सरकार कितनी साम्प्रदायिक और जातिवादी है यह इस बात से भी स्पष्ट हो चुका है कि टी टूरिज्म के लिए एक दो पूँजीपतियों की मांग पर तुरंत कार्रवाई करते हुई टी टूरिज्म के लिए नई नीति लाई और इसमें उन मांगों को भी शामिल कर ली, जिसकी मांग ही किसी ने नहीं उठाया था। लेकिन चाय बागान मजदूरों के वेतन वृद्धि को चार साल में 14 बार मिटिंग करके भी ठण्डे बस्ते में रखा हुआ है। लोकसभा चुनाव में खुद ममता दीदी ने पाँच रैली में चाय मजदूरों को आवासीय पट्टा देने की घोषणा की, लेकिन वह तो केन्द्र सरकार के मोदी से भी बड़ा जुमलाबाज निकली।
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ममता सरकार ने टी टूरिज्म से चाय मजदूरों को चाय में डुबी हुई मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दी है और उन्हें टी टूरिज्म का कोई भी लाभ देने से पूरी तरह वंचित कर दी है। चाय मजदूर केवल टूरिस्टों के खिदमद करके या उनके सामने नाचनिया बन के ही कुछ भीख में पैसा कमा सकते हैं, बाकि उनके लिए कहीं कोई गुंजाईश नहीं रखी गई है। टी टूरिज्म में कैसे उनके साथ सौतेला व्यवहार किया गया, यह इतिहास में लिखा जाएगा। यह विकास बोर्ड में दिए जाने वाले 25-30 करोड़ की तरह मामूली बात नहीं है। बल्कि इसका वित्तीय असर लम्बे अरसे में खरबों रूपये का होगा। टी टूरिज्म चाय मजदूरों के शोषण का एक नया जाल साबित होगा।

Author: madhubaganiar

Madhubaganiar loves to write on social issues especially for downtrodden segment of Indian society.

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