विचारों की दुनिया

#नेह इंदवार 
∼प्रकृति में जन्म और मृत्यु एक प्राकृतिक नियम है। दुनिया के सभी नेचुरल और अर्टिफिशियल चीजों पर यह लागू होता है। यह नियम मल्टी यूनिवर्स, गैलेक्सी, तारे, ग्रह, समुद्र, पहाड़, नदी, झील, शहर, सरकार, सड़क, बिल्डिंग, परिवार, मनुष्य और मनुष्य के विचारों तक में लागू होता है। जो जन्म लेता है मृत्यु भी  होती है।
विचारों का जन्म और मृत्यु काल मनुष्य के जीवन काल से बड़ी या छोटी हो सकती है। किसी विचारों का जन्म और मृत्यु काल क्षणभंगुर होता है। लेकिन कई विचार कई सदियों तक जिंदा रहती है।
गैलेक्सी और ग्रहों की तरह ही विचारों का अपना परिवार, खानदान और संस्कृति होती है। विचारों का वर्ग और स्तर भी होता है। कोई  विचार शरीफ कहलाता है तो कोई खलनायक। किसी विचारों की चारों ओर धूम होती हैं, तो किसी विचारों पर लानत-मलानत भेजी जाती है।
✌️आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, मानसिक दुनिया से संबंधित विचार हमें बहुत प्रभावित करते हैं। विचारों के जन्म, शैशवकाल, जवानी, परिपक्वता, बृद्धाकाल आदि से सभी व्यक्ति, परिवार, समाज देश या देशों के समूह से इतने प्रभावित होते हैं कि सुबह बिस्तर छोड़ने और सोने के बीच की दुनिया में विचार के कार्यकलाप से व्यक्ति आजाद नहीं हो पाता है। जिस तरह बिना अक्सीजन के प्राणी जिंदा नहीं रहता है, वैसे ही व्यक्ति और समाज बिना विचारों के जिंदा नहीं हो सकते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि जो विचार अभी जिंदा और बुढ़ा होकर मर नहीं गया है, उसी विचार से ही व्यक्ति और समाज, सरकार संचालित होते हैं। जो विचार कभी जिंदा था, लेकिन नये विचारों के कारण उसकी पूछ जाती रही और वह मर गया। उन विचारों को हम इतिहास कहते हैं।
सम्राट अशोक, अकबर और चंगेजखान के जमाने के विचार कब के बुढ़े होकर मर खप गए। यदि आज उस जमाने का कोई विचार दिखाई भी देता है तो समझ जाईए कि वह हमशक्ल वाला विचार उसके डीएनए वाला कोई नया विचार ही है।
सुबह उठते ही परिवार धर्म, खानपान, परिधान, व्यवहार, शिक्षा, आर्थिक गतिविधियों, धार्मिक गतिविधियों से संबंधित विचारों से संचालित होना शुरू हो जाते हैं।
धर्म के जो विचार बुढ़े होकर मर गए हैं, उन विचारों को छोड़कर व्यक्ति धर्म के नये विचारों, प्रार्थनाओं, भंगिमाओं से धर्म के विचारों को ओढ़ता है। धर्म और संस्कृति के विचार भी मर खप जाते हैं। जो वर्तमान में दिखाई देते हैं। वे पुराने धर्म और संस्कृति के कंकाल ही होते  हैं।
शिक्षा के नये विचारों से प्रेरित बच्चे नये विचारों के अनुसार शिक्षा ग्रहण करते हैं। पुराने विचार शिक्षा संस्थाओं से विदा ले चुके होते हैं।  चार पीढ़ी पहले के खानपान के उलट व्यक्ति वर्तमान में तैर रहे विचारों के अनुसार अपना खानपान करता है। धोती और गमछा पहनने के बजाय नये विचारों से संचित नये ढंग के शर्ट्स, पैंट, साड़ी या सलवार पहन कर परिवार अपना दैनिक कार्य शुरू करता है।
राजनीति पार्टी से संबंधित व्यक्ति मर चुके राजनीति के बदले नये विचारों से संचालित राजनीति के अनुसार नई रणनीति बनाने में व्यस्त रहता है। धर्म और राजनीति के द्वारा नये विचारों से आर्थिक और सामाजिक लक्ष्य लेकर चल रहे व्यक्ति बिल्कुल नये विचारों के साथ नयी रणनीति बनाते हैं। वह वोटरों को नये विचारों के साथ प्रभावित करके अपने पक्ष में करने के लिए नये पैंतरे बनाते हैं। वह वोटरों को शिष्ट शांत बनाए रखने के बदले उत्तेजित, गर्म खून और उग्र विचारों के इंजेक्शन लगाने के लिए नये-नये पैंतरे और रणनीति बनाते हैं।
एक ही नाम की नई राजनैतिक पार्टियाँ भी खानदान के टाईटिल को ढोने वाली पार्टियाँ ही होती हैं। नई राजनीति पार्टियाँ चाहतीं हैं कि जनता जल्दी से जल्दी पुराने विचारों को त्याग दें और नये विचारों को अपना लें। वे नये जन्मे विचारों को जल्दी जवान और परिपक्व बनाने में उसी तरह की रणनीति बनाते हैं, जैसे पोल्ट्री फार्म वाले अपने मुर्गियों के वजन बढ़ाने के लिए इंजेक्शन और चारे में केमिकल देने की रणनीति अपनाते हैं।
सरकार प्रशासन के कार्य को नये विचारों और उससे संचालित नीतियों से चलाना चाहती है। उन विचारों और नीतियों को जनता का समर्थन प्राप्त हो इसलिए वह पुरानी नीतियों की निंदा करती है। यहाँ पुरानी नीति कहने का सीधा अर्थ है उन विचारों का जो जन्म लेकर बुढ़े होकर मर गए हैं। मरे विचार अनुपयुक्त हो जाते हैं। आज की प्रचलित विचारों की दुकान भी भविष्य में बंद हो जाएगी और आप जिन विचारों के लिए आज मरने-मारने, दंगा करने, षड़यंत्र करने में व्यस्त हैं, वह विचार और संस्कृति भी मर खप जाएंगी और वह भविष्य में आपको बुद्धु इंसान घोषित कर ही देंगी। इसलिए खलनायक विचारों से संचालित होने के बजाए शरीफ विचारों से संचालित होकर जिंदगी में सुख और शांति को प्राप्त कर पाएँगे।
राजनीति, आर्थिक, धर्म आदि में विचारों को आर्टिफिशियल ढंग से जन्म देना, उसे जल्दी जवान करने की जतन करना, उसे जनता पर थोपने की जल्दीबाजी दिखाना, थोपने के बाद उससे मनपसंद रिजल्ट पाने की रणनीति बनाना आदि कुछ ऐसे काम, नीति, रीति  है, जिसे हर जमाने में चालाक लोग करते रहते हैं।
क्या आप चालाक लोगों की श्रेणी में खुद को रखते हैं ?
जब चालाल लोग ऐसे कार्यों को अंजाम देते हैं तो जाहिर है कि ऐसी नीतियों, कार्यक्रमों को लागू करने के लिए कम चालाक मतलब बेवकूफ लोगों की भी आवश्यकता होती है। बेवकूफ लोगों की आबादी हमेशा बड़ी होती है।
आमतौर से आम नागरिक चालाकी की बारिकियों में नहीं जाते हैं। वे विश्लेषक नहीं होते हैं। न ही उनके पास इन चीजों को जाँचने परखने के उपकरण होते हैं। वे इन चीजों से दूर रहें, इसके लिए जरूरी है कि उन्हें हमेशा समस्याओं की टोकरियाँ थमाई जाए। वे समस्याएँ निपटाने में ही जिंदगी खपा देंगे। यूँ तो वे महज विचारों के उपभोक्ता होते हैं, जो विचार बाजार में आया उसे वे अपनी जरूरत के हिसाब से खरीद लेते हैं। उसका सेवन कर लेते हैं। उसे अपने जेब की पॉकेट में और घर के अलमारी में कैद कर लेते हैं।
शराब के बोतल में ऱखी शराब के सेवन से नशा ही होगा और कॉम्पलान के डब्बे में बच्चों को पौष्टकता देने के ही पदार्थ मिलेंगे। पान-तंबाखू खाने के बाद उसे थूक दिया जाता है। विचारों के साथ भी यही होता है। मतलब आप जिन विचारों के स्थायी ग्राहक बनेंगे, वे विचार आपको अपना स्थायी उपभोक्ता बना ही लेगा। यदि आपको बचपन से मक्के की रोटी और चने के साग खाने की आदत लगायी जाएगी तो आप उसके स्थायी उपभोक्ता बनेंगे। खाना खाने के बाद आपको छाछ, मिष्टी, दही, रसगुल्ले खाने की आदत लगाई जाएगी तो आप जिंदगी में उसके प्रशंसक बने बिना जिंदगी नहीं जी सकते हैं। सुबह उठ कर जिस प्रार्थना को आपको लटाया जाएगा, जिस ढंग से धर्म को अपनाने की आदत लगाई जाएगी, वह कालांतर में आपको उसका गुलाम बना देगा। गुलाम बनाने की प्रक्रिया ऐसी ही होती है।  इस प्रक्रिया को जन्म देने वाले भी नये विचारों के जन्मदाता ही होते हैं। मार्क्स, हिटलर, गाँधी, जॉर्ज वाशिंगटन, माओ आदि विचारों के शानदार माताएँ थे। उनके गर्भ में नये विचार पलते रहते थे।
विचारों का जन्म होता है। विचार धीरे-धीरे मोटे मजबूत या दूबले हो सकते हैं। वह जवान होकर परिवक्व होता है। फिर वह जवानी के खेल भी दिखाता है। वह इतिहास बनाता है। पुराने इतिहास को बिगाड़ता है। लेकिन अंततः प्राकृतिक नियमों के अनुसार मर खप जाता है।
कार्ल मार्क्स ने सर्वहारा की एकता, संगठन, उसकी शक्ति, सत्ता में हिस्सेदारी और पूरी दुनिया में साम्यवाद का एक विचार दिया था। जब वह विचार जवान हुआ तो दुनिया के चालिसेक  देश मार्क्सवाद के जवानी का आनंद ले रहे थे। लेकिन अंततः वह पूँजीवाद के विचारों से हार गया और हारने के बाद बुढ़ा भी हो गया। फिलहाल पूँजीवादी विचार भी मरन्नासन अवस्था में पहुँच गया है। भारत में यह पूरी तरह बीमार हो गया है। कोई नयी खूनी या पानी क्रांति जरूर होगी, जो उसे कब्र में पहुँचाने का काम करेगी।
बहुत लंबी लेख कोई पढ़ता नहीं यारों। इसलिए संक्षेप में :- विचारों का जन्म होता है और वह जवान भी होता है। आप किन विचारों के स्थायी ग्राहक है ? इस पर विवेक लगाएँ। कहीं आप ऐसे विचारों के ग्राहक तो नहीं है, जिसका चरित्र ही खलनायक का है और आपको एक उपकरण के रूप में यूज कर रहा है ? वह विचार किसी भी विषय से संबंधित हो सकता है। मतलब वह विचार सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक धार्मिक, शारीरिक और मानसिक कुछ भी हो सकता है। यदि आप इसे समझ नहीं पा रहे हैं तो इस पर तर्क करें, विचार करें, अध्ययन करें और इन सबके बाद आपने आपको चालाक और चतुर बनाएँ। यह विचार जरूर करें कि कहीं आप किन्हीं विचारों के हद से भी अधिक गुलाम तो नहीं हैं ? ?? यदि  गुलाम हैं तो इस नाचीज को याद कर लेना। यदि बहुत चालाक हैं तब तो जरूर याद कर लेना। आपका ही नवतुन- विचारदाता-मित्र-नेह। 😍

Author: madhubaganiar

Madhubaganiar loves to write on social issues especially for downtrodden segment of Indian society.

I am thankful to you for posting your valuable comments.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.