डुवार्स नया राज्य ?

निसंदेह भारत के विभिऩ्न भागों में बने छोटे राज्‍यों ने अपनी तीब्र आर्थिक विकास करके और स्थानीय नागरिकों को स्वशासन की संतुष्टी देकर अपनी उपयोगिता साबित की हैं। जनतांत्रिक शासन-व्‍यवस्‍था में स्‍थानीय स्‍वशासन का दूसरा कोई विकल्‍प नहीं होता है। यहाँ तक कि साम्यवाद शासन में भी स्वशासन को ही अंतिम लक्ष्य माना गया है।  जनतांत्रिक व्‍यवस्‍था में राजनैतिक शक्ति प्राप्‍त होने पर जनता अपने स्‍वविवेक अनुसार अपने लिए विकास के मापदंड स्‍थापित करती है और पूर्ण अधिकार तथा स्‍वाभिमान के साथ स्‍वयं पर और अपने क्षेत्र पर संतुलन बैठा कर शासन स्‍थापित करती है और वह शासन उस क्षेत्र के समस्‍त निवासियों के लिए सर्वश्रेष्‍ठ होता है। समस्त समाज का संतुलित विकास और संतुष्टि ही अंतिम लक्ष्य होता है।

गोर्खालैण्‍ड की मांग लोकतांत्रिक अधिकार की प्राप्ति हेतु स्‍वशासन की आकांक्षा की मांग है। गोर्खा जनमुक्ति मोर्चा गोर्खालैण्ड में डुवार्स और तराई को शामिल करने को आकांक्षित है। लेकिन डुवार्स और तराई में आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्‍व कर रहा आदिवासी विकास परिषद इसके बिलकुल खिलाफ है और डुवार्स तथा तराई को शामिल किए जाने पर उग्र आंदोलन की धमकी दे चुका है। पिछले साल इसने डुवार्स और तराई के लिए छटवीं अनुसूची की मांग किया था, लेकिन अब 20 दिसंबर 09 को मेटली में सम्पन्न हुए सम्मेलन में अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के केन्द्रीय अध्यक्ष सोमजी भाई दामोर ने इसे केन्द्र शासित बनाने की मांग की है। 

डुवार्स तराई में आदिवासी समाज गोर्खा समाज से अनेक क्षेत्रों में पिछडा हुआ है। आदिवासियों का जितना शोषण और भेदभाव बंगाल में हुआ है उतना शायद ही किसी और समाज का हुआ हो। आदिवासियों को संवैधानिक रूप से स्‍वीकृत कोई भी अधिकार मुक्‍कमल रूप में कभी मिला नहीं और न ही मिलने ही कोई संभावना नजर आती है। इसमें परिस्थिगत हुए भेदभाव और अऩ्याय कम और जानबूझ कर किए गए भेदभाव  प्रमुख रहे हैं। पिछले डेढ साल से आदिवासी विकास परिषद अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत है। स्‍थानीय प्रशासन से लेकर माननीय मुख्‍यमंत्री तक से मिल कर परिषद के नेतागण आ चुके हैं। अनेक आशवासन मिले लेकिन ढाक के वही तीन पात। बुनियादी रूप से आदिवासियों का विकास कर सके ऐसा एक भी कलम उठाए नहीं गए न ही कोई बात हो पाई है अब तक। बंगाल सरकार की आदिवासियों के प्रति जारी नीतियों में कोई बदलाव नहीं आया है। चाहे वह शिक्षा नीति हो, या भूमिहीन और मजदूरों के जीवन में आर्थिक संबलता देने वाली कोई घोषणा हो, या औद्योगिक नीतियॉं हो, या फुटकर रूप में घरेलू और कुटीर उद्योग की बातें हो, कहीं कोई सकारात्‍मक बदलाव नहीं। आदिवासियों की आवाज नक्‍कारखाने में  तूती बन कर रह गई है। जाहिर है कि पश्चिम बंगाल के तथाकथित लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था में आदिवासी आवाज को सुनने और उसे एक वैधानिक आवाज के रूप में मान्‍यता प्रदान करने की कोई व्‍यवस्‍था नहीं है। निकट भविष्‍य में आदिवासियों को इस देश के नागरिक के रूप में मान्‍यता मिलने की कोई संभावना नजर नहीं आती है, कम से कम उत्‍तर बंगाल के आदिवासियों की दशा को देख कर इससे तनिक भी इन्‍कार नहीं किया जा सकता है। राजनैतिक स्‍वशासन के अधिकार के बिना विकास की बातें लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था में नहीं की जा सकती है और न ही वर्तमान शासन व्‍यवस्‍था के अंतर्गत आदिवासियों के विकास की बातें डुवार्स और तराई में  की जा सकती है।

आदिवासी और गोर्खा समुदाय करीबन दो शताब्दियों से भी अधिक समय से एक साथ जीवन संघर्ष करता आ रहा है। दोनों के बीच में एक सह-अस्तित्‍व की भावना गहरे रूप में  जमी हुई है। जिसमें लाख कोशिशों के बावजूद अब तक विरोधियों ने दरार बनाने में नकामी हासिल की हैं। लेकिन राजनैतिक और लोकतांत्रिक अधिकार को हासिल करने में दोनों समाज एक मंच पर नहीं आ पा रहे हैं। विकास और अस्मिता की जरूरत दोनों को एक समान है। विकास की राजनैतिक और आर्थिक आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए स्वशासन की आवश्यकता एक जैसा है। 

एक अलग राज्‍य अपने नागरिकों को सांस्‍कृतिक, सामाजिक, राजनैतिक  और भाषाई पहचान देने के आलावा और भी कई तत्‍वों को  नागरिकों को प्रदान करता है। क्‍या डुवार्स और तराई को गोर्खालैण्‍ड में शामिल करने पर आदिवासियों को भी वैसी ही सामाजिक, सांस्‍कृतिक और भाषाई पहचान मिलेगी जैसे कि गोर्खा समाज को गोर्खालैण्‍ड राज्‍य के गठन के साथ-साथ मिलेगी। कई सवाल है जिन्‍हें हल करना अत्‍यंत आवश्‍यक है। जिसके बिना गोर्खालैण्‍ड में डुवार्स और तराई को शामिल करना संभव नहीं होगा। डुवार्स और तराई सहित गोर्खालैण्‍ड बनने पर गोर्खा समाज को तुरंत मनोवैज्ञानिक लाभ प्राप्‍त होगा। लेकिन इतर समाज जिसमें आदिवासी प्रमुख हैं इस मनोवैज्ञानिक लाभ से बंचित ही रहेंगे। आदिवासी समाज को यद्यपि बंगाल जैसे शोषक राज्‍य से तुरंत छुटकारा मिल जाएगा, लेकिन उन्‍हें गोर्खा समुदाय की तरह एक अलग पहचान नहीं मिलेगी। नये राज्‍य के नामकरण में गोर्खा नाम होने पर ही गैर गोर्खाओं की सामाजिक गरिमा और हैसियत गोर्खाओं से कमतर होगी। राज्‍य का नामकरण अलग होने पर भी यदि स्थिति, गरिमा, अस्मिता में कोई परिवर्तन न हो तो आम गैर गोर्खा कैसे गोर्खालैण्‍ड के लिए अपनी सहमति प्रदान करेंगे। कई सवाल है, शंकाऍं हैं, जिनका खुलासा और समाधान किया जाना चाहिए। किसी भी इलाका अथवा अंचल को किसी नये राजनैतिक ईकाई में शामिल करने के लिए उस अंचल के आम नागरिकों का विश्‍वास हासिल करना अत्‍यंत जरूरी होता है। बिना विश्‍वास और आपसी सौह्रार्द्र हासिल किए बिना सुख शांति और विकास की बातें बेमानी होती है।

राज्‍यों की सीमा का बदलना एक ऐतिहासिक फैसला और बड़ी घटना होती है। इसके अनेक सकारात्‍मक और नकारात्‍मक दूरगामी परिणाम होते हैं। किन्‍हीं बातों और विचारों को आज की दुनिया में मनवाने के लिए खुले और व्‍यापक चर्चे की आवश्‍कता से इन्‍कार नहीं किया जा सकता है। ऐतिहासिक और भौगोलिक रूप से दार्जिलिंग जिला, डुवार्स और तराई में अनेक समानताऍं हैं। दोनों ही इलाका अंग्रेजों के साम्राज्‍यवाद ललक के कारण ब्रिटिश भारत का अंग बना। 1864-65 के ब्रिटिश-भूटान युद्ध के बाद भूटान-डुवार्स का भूभाग ब्रिटिश-भारत में विलय हुआ। इसके साथ ही जंगलों को काट-काट कर चाय बागान बनने लगे जहॉं आदिवासी और गोर्खा बसने लगे। बैंकुठपुर अंचल और रंगपूर जिले के भूभाग को पश्चिम डुवार्स में मिला कर 1869  में अस्तित्‍व में आए जलपाईगुडी जिले के मूल निवासियों में मेच अर्थात बोडो, राभा, भुटिया आदि के साथ प्रथम अधिसंख्‍या निवासियों में आदिवासी और गोर्खा ही प्रमुख थे। जलपाईगुडी जिले के अस्तित्‍व  में आने के पूर्व ही चाय बागान बनने शुरू हो गए थे और यहॉं के मजदूर आदिवासी और गोर्खा ही थे। सांस्‍कृतिक और भाषाई खिंचाव कहीं आदिवासियों को अधिसंख्‍या बनाया तो कहीं गोर्खाओं को। डुवार्स और तराई आदिवासियों को अधिक भाया वहीं पहाडों में बनने वाले चाय बागान गोर्खाओं को। बहुत सालों के बाद छोटे-मोटे दुकानदारों, व्‍यापारियों के रूप में गैरआदिवासी-गैरगोर्खाओं ने छोटे-बडे कस्‍बों की रूपरेखा बनाई। लेकिन आदिवासियों और गोर्खाओं का योगदान अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण रहा है डुवार्स और तराई के विकास में। चाय बागानों के जनसंख्‍या जहॉं पीढी दर पीढी बच्‍चों को मातापिता के उत्‍तराधिकारी के रूप में काम दिया जाता है, को यदि मापदंड माना जाए तो डुवार्स तराई में आदिवासियों की ऐतिहासिक उपस्थिति को किसी भी तरह से नकारा नहीं जा सकता है। यदि आज आदिवासी विकास परिषद आदिवासियों को डुवार्स का भूमिपुत्र कहता है तो यह किसी भी तरह से अतिश्‍योक्ति नहीं है।

ऐतिहासिक तथ्‍य जहॉं दावों को मजबूत करता है वहीं वर्तमान तथ्‍यों को भी किसी नये राज्‍य बनाने के लिए नकारा नहीं जा सकता है। आज यहाँ की जनसंख्या विभिऩ्ऩ समुदायों की मिश्रित जनसंख्या है। डुवार्स और तराई को गोर्खालैण्‍ड में शामिल किए जाने पर यह न सिर्फ सीमा और क्षेत्र के रूप में एक सामान्‍य राज्‍य होगा, बल्कि आर्थिक और राजनैतिक रूप से भी एक मजबूत राज्‍य बन सकेगा। आखिर विकास के लिए पहाडों के साथ समतल जमीन भी तो चाहिए एक नये राज्‍य को। डुवार्स-तराई के बिना गोर्खाओं को पहाड में एक राजनैतिक और सामाजिक पहचान तो मिल सकती है लेकिन शायद आर्थिक आजादी उस पैमाने पर नहीं मिलेगी जिसका प्रत्‍याशा नये राज्‍य के सभी नागरिकों को होगी। जलवायु परिवर्तन जिस गति से पहाडों को प्रभावित कर रहा है वह शायद पर्यटन के लिए हमेशा मुनासिब नहीं होगा। सिर्फ पर्यटन और चाय उद्योग के बल पर एक राज्‍य का आर्थिक चेहरा हमेशा प्रसन्‍नचित नहीं रह सकता है। किसी भी समुदाय का विकास, विकास के लिए आवश्‍यक अनेक बुनियादों के आधार के सहारे ही होता है। यदि पश्चिम बंगाल में बनने वाले अलग राज्‍य में डुवार्स, तराई और इससे जुडे अन्‍य अंचल शामिल हो जाए तो वह सोने पर सुहागा साबित होगा। आर्थिक और राजनैतिक रूप में एक स्‍वस्‍थ राज्‍य बन सकता है। लेकिन यह राज्‍य इन सभी इलाकों के आम नागरिकों के सहयोग और सहमति से ही बन सकता है। यदि इन क्षेत्रों का सही और संतुलित विकास और समृद्धि तथा पहचान चाहिए तो गोर्खालैण्‍ड नाम से आगे जा कर सोचने की जरूरत है। डुवार्स और तराई को गोर्खालैण्‍ड में शामिल करने में क्‍यों आदिवासी विकास परिषद सहमत नहीं है इन तथ्‍यों को सामाजिक, सांस्‍कृतिक भाषाई विकास और पहचान के संदर्भ में भी गोर्खाओं को सोचने की जरूरत है। अस्मिता की लडाई लड रहे गोर्खा नेतृत्‍व यह भी देखे कि क्‍या आदिवासियों के द्वारा मांगी जाने वाली किसी आदिवासीलैण्‍ड में गोर्खा अपनी अस्मि‍ता को त्‍याग कर बिना शर्त आदिवासीलैण्‍ड के आंदोलन में शामिल हो सकता है ? ऐसे कई सवाल हैं जो दो दिलों को आपस में जोडने, साथ संघर्ष करने और एक मंजिल की ओर जाने में बाधा डालता है। यदि ऐतिहासिक और वर्तमान संदर्भ में देखा जाए तो गोर्खाओं की तरह ही आदिवासियों को भी विकास के लिए राजनैतिक अधिकार और स्‍वशासन की उतनी ही जरूरत है जितनी गोर्खाओं को है। आदिवासी विकास परिषद छटवीं अनुसूची अथवा केन्द्र शासित प्रदेश की मांग कर रहा है। इस मांग की क्‍या तुक है ? क्‍या वह इस मांग को गंभीरता से उठा रहा है अथवा सिर्फ लोगों को झुनझुना सुना रहा है ? क्‍या डुवार्स तराई के सभी आदिवासी इस तरह के ढुलमुल रवैये से सहमत हैं ? अनेक सवाल हैं जिसे आदिवासी विकास परिषद को भी स्‍पष्‍ट करने हैं। राजनैतिक स्‍वशासन के बिना कोई भी अंचल अथवा समुदाय विकास के सिर्फ सपने देख सकता है विकास नहीं कर सकता। राजनैतिक स्‍वशासन के संबंध में आदिवासी विकास परिषद का रवैया ढुलमुल ही नहीं बिल्‍कुल अस्‍पष्‍ट है। कभी छटवीं अनुसूची तो कभी केन्द्र शासित प्रदेश की मांग करना भ्रम की स्थिति को इंगित करता है। विकास की उनकी क्‍या परिकल्‍पना है, क्‍या समयबद्धता है अथवा क्‍या कार्यक्रम है ? अभी भी सभी कुछ अंधेरे में है। आदिवासी विकास परिषद कितने लोकतांत्रिक रूप में कार्यशील है और नीतियॉं बनाने और उनपर बहस करने के क्‍या क्‍या पद्धतियॉं अपनाई जा रहीं हैं ? यह भी धुंधला ही है। लोगों का यदि उसपर  विश्‍वास है तो इसलिए कि लोगों ने इसके माध्‍यम से एक आशा की किरण देखी है। लेकिन अंतिम और दृढ रूप से आदिवासी विकास परिषद क्‍या चाहता है ? यह अभी इसके द्वारा बताया जाना बाकी है। यदि गोर्खाजनमुक्ति मोर्चा राजनीतिक संघर्ष में सचमुच आदिवासियों का साथ चा‍हता है तो उसे सार्वजनिक रूप से उन बातों का खुलासा करना चाहिए जो आदिवासियों को उनसे जोडने में बाधा बन रही है। यदि दोनों पक्ष समान रूप से एक दूसरे के लक्ष्‍यों पर सहमत हो जाऍं तो शायद परिदृश्‍य में अमुलचुल परिवर्तन हो जाएगा। यदि गोर्खालैण्‍ड शब्‍द को छोडकर ऐतिहासिक रूप से प्रचलित डुवार्स (लैण्‍ड) शब्‍द जैसे किसी शब्‍द पर सहमति बने तो शायद इस अंचल में बसने वाले सभी समुदाय एक नये राज्‍य बनाने के लिए कमर कस ले। तब सबकी सामाजिक और राजनैतिक आकांक्षाओं की पूर्ति हो सकती है। तब शायद गोर्खालैण्‍ड के विरूद्ध झंडे उठाने वाले भी नया राज्‍य बनाने के लिए सर्वमान्‍य झण्‍डा उठाने को तैयार हो जाएँ। लेकिन ऐसी किसी प्रस्‍ताव को प्रस्‍तुत करने और स्‍वीकारने में वर्तमान नेतृत्‍व को  अत्‍यंत बोल्‍ड होने की आवश्‍यकता होगी। उन्‍हें वर्तमान घोषित नीतियों को बदलने की आवश्‍यकता होगी। यदि इन कसौटियों पर नेतृत्‍व खरा उतरे तो एक नया इतिहास डुवार्स की वादियों में लिखा जाएग।

 

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2 thoughts on “डुवार्स नया राज्य ?”

  1. Very well said, the truth is said. Its like that, if ABAVP or Adivasis is not comfortable with the roadmap, naming of the state, even starting joint stuggle with the hill party GJMM, still it’s no problem for us sincerely wanting freedom. WE call upon you to declare the roadmap, UT is fine, statehood is better. Naming the state, you name we will accept. Any obstacle in the hills shall be removed, be sure of that, those incompentent elements in the hills, if work against the interest of Adivasis , Gorkhas shall be eliminated. Launch a struggle for Freedom. WE shall support in strength

  2. पी पी पी और भी पी

    एक बटी पी

    एक डुबहा पी

    एक घईला पी

    पी पी पी और भी पी

    हिसाब से पी

    बेहिसाब भी पी

    दिल खोल के पी

    पी पी पी और भी पी

    हड़िया पानी पी

    महुआ पानी पी

    बोथल पानी पी

    पी पी पी और भी पी

    तलाब झोईक के पी

    जमीन बेईच के पी

    घर बुड़ाई के पी

    पी पी पी और भी पी

    जीत कर पी

    हार कर भी पी

    गम भुलाऐक ले पी

    पी पी पी और भी पी

    एकले भी पी

    गोरखा संग पी

    गैर आदिवासी संग भी पी

    पी पी पी और भी पी

    अनुशासन में पी

    बिना अनुशासन के भी पी

    आबिप के देखाई के पी

    पी पी पी और भी पी

    दिल्ली जाईके पी

    गाँगपुर जाईके पी

    जशपुर और चैनपुर जाईके भी पी

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