सरकारी ठगी कथा

डुवार्सतराई में आदिवासी समाज देश के सबसे पिछडे समाज के रूप में अपनी राष्‍टीय पहचान बना ली है। संगठित औद्योगिक क्षेत्र में भी इनकी कमाई सिर्फ 60 रूपये दैनिक है। उत्‍तर बंगाल में आदिवासियों को सबसे पिछडे बनाए रखने और राष्‍ट्रीय औसत में सबसे ज्‍यादा गरीब, बेचारा और श्रीहीन बनाए रखने का श्रेय पश्चिम बंगाल सरकार को जाता है। आदिवासियों के साथ बेइमानी करने, उनकी अशिक्षा का लाभ उठाकर उनके विकास के सपनों को मटियामेट करने में ब्‍युरोक्रेसी और राजनेता भी शामिल रहे हैं। अखिल भारतीय स्‍तर में अपने को सबसे ज्‍यादा बुद्धिमान और विकासवादी बताने वाले बंगाली बुद्धिजीवी भी आदिवासियों के साथ होने वाले अन्‍याय, पक्षपात और बेइमानी से ऑख मुँदे रहे और सरकारी अन्‍याय नीति को परोक्ष रूप में अपना समर्थन देते रहे। बंगाली बुद्धिजीवियों द्वारा संचालित और मार्गदर्शित मीडिया आदिवासियों के साथ होने वाले अन्‍याय, पक्षपात और बेइमानी को देखने, हाइलाइट करने से बचते रहे। यह और बात है कि वे इजरायल और अमेरिकी फोजों के हाथों मार खाते फिलिस्‍तीनी, ईराकी और ईरानी, अमेरिकी पूंजीवाद, साम्राज्‍यवाद, लतीनी अमेरिकी देशों में हो रहे सरकारी अत्‍याचार और अ‍फ्रीकी देशों में नस्‍लवाद के साए में जी रहे जनता के पक्ष में खूब कलम घिसते रहे। बंग्‍ला और बंगाल के अंग्रेजी मीडिया को बाल ठाकरे के शिवसेना द्वारा परप्रांतीय पर किए जाने वाले अत्‍याचार आदि दीखते रहे हैं। लेकिन डुवार्सतराई के आदिवासियों की सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक व्‍यथा, करूणदशा गाहेबगाए ही दिखाई दिया करती है।

 

भारतीय जनता ने एमरजेंसी में इंदिरा गॉंधी की शक्ति को देखा था। सत्‍ता के मद में निरंकुश आदेशों को डंडों में बदलता भी देखा था। इन्‍हीं निरंकुशता और शक्ति के मद को देखते हुए जनता ने 1977 में मार्क्‍सवाद और मजदूरों की सार्वहारा शक्ति पर लम्‍बे लम्‍बे भाषण देते नेताओं को अपना समर्थन देकर सत्‍ताधीश बनाया था। लेकिन पानी पीपी कर पूँजीवाद को कोसते, गरियाते मार्क्‍सवादी पश्चिम बंगाल में सत्‍तासीन होने के बाद ही पूँजीवादी चारित्रिक चोले को धारण कर लिए और जनता को बेवकुफ बनाने के लिए ही मार्क्‍सवाद की बातें करते रहे। ये नेतागण नाम के लिए मार्क्‍सवादी थे, लेकिन दिल और दिमाग से पूर्णत: जातिवादी, साम्‍प्रदायवादी और भारतीय भूमि में पल्‍लवित सामंतवादी सोच के पोषक ही थे और अभी भी अपने व्‍यवहार से यही होने का साबूत भी देते रहते हैं।

 

इनकी यही सोच और विचारधारा ने बंगाल के आदिवासियों के साथ भेदभाव करने, नीतिगत रूप से उन्‍हें शिक्षा से बंचित करने और शोषकों के हाथों शोषण होने देने के लिए निसहाय छोड दिया। चाय बागानों में प्‍लांटेशन लेबर एक्‍ट 1952 को लागू करने के लिए कभी भी सरकार, सरकार में शामिल नेता, ब्‍युरोक्रेसी ने कोई प्रयास नहीं किया। इस कानून के तहत बनाए जाने वाले विनियम अर्थात् रूल्‍स को भी धरा पर लाने के लिए कभी लेबर डिपार्टमेंट ने कोई कार्रवाई नहीं की। मजदूरों के नेता होने का ढोंग करने वालों ने भी कभी दिल से कोई काम नहीं किए। आदिवासी जनता एक स्‍वाधीन देश में बागान मालिकों और प्रबंधन द्वारा लुटते रहे। मालिक और प्रबंधन की  सामंतवादी सोच और आदेशों के तहत बागानों के श्रमिक अपनी खून और पसीना एक करते हुए बागानों को सींचते रहे और मालिक मजदूरों की कीमत पर लाभ कमाते रहे। यही नहीं मजदूरों को अनपढ बनाए रखने के लिए मालिक कुचक्र चलते रहे। बच्‍चे स्‍कूल जा कर न पढें, इसलिए उन्‍हें छोकडा मजदूर के रूप में बागानों में काम कराते रहे। उन्‍हें न उचित रूप से आवास दिए गए, न पीने के पानी, न शौचालय, न बिजली, न स्‍तरीय स्‍कूल, न चिकित्‍सा व्‍यवस्‍था, न पदोन्‍नति के अवसर और न ही पर्याप्‍त मजदूरी । उन्‍हें कानून द्वारा दिए गए हक और सुविधाओं से मालिक वंचित करते रहे और उनके मौलिक अधिकारों का हनन करते रहे। सरकार मुक दर्शक बन कर देखती रही।

ऐसा नहीं कि सरकार बागान मजदूरों के साथ हो रहे पक्षपात, शोषण और अत्‍यचार से अन्‍जान थी। सरकार को सारी बातों की खबर थी। लेकिन जातिवादी, सम्‍प्रादायवादी और प्रांतवादी विचारों से ओतप्रोत सरकारी अमला और नेता कभी भी बागान मजदूरों के पक्ष में दिल और दिमाग खोल कर सामने नहीं आए। कानूनों के बंदिश में विधानसभी और लोकसभा के कुछ आसन आदिवासियों के लिए भले आरक्षित किए गए हों, लेकिन राजनीति के आकाओं ने कभी भी किसी योग्‍य व्‍यक्ति को इन आसनों से चुनाव नहीं जीतने दिया। हर बार ऐसे लोगों को टिकट दिए जाते रहे, जो अपने आकाओं के हुक्‍म का गुलाम थे।

 

पूरे देश में मजदूरों की जिन्‍दगी को उपर उठाने के लिए अनेक कानून बने। औद्योगिक बस्तियों में रहने वाले मजदूरों और कामगारों के लिए वेतन बोर्ड बनाए गए। उनके बच्‍चों को शिक्षा की सुविधाऍं देने के लिए उनके आवास के आसपास स्‍तरीय स्‍कूल और कालेज तथा रोजगार उपलब्‍ध कराने के लिए रोजगार उन्‍मुखी प्रशिक्षण संस्‍थान बनाए गए। प्रत्‍येक श्रमिक को एक काम में निपुण बनाने के साथ दूसरा काम भी सीखने के अवसर और विकल्‍प उपलब्‍ध कराए गए। लेकिन पश्चिम बंगाल में डुवार्स और तराई क्षेत्रों को हर तरह के रोजगार उन्‍मुखी संस्‍थानों से वंचित रखा गया। ताकि बागानों में रहने वाले आदिवासियों और गोर्खाओं में पिछडापन को बरकरार रखा जा सके।

 

ऐसा नही है कि सरकार के पास डुवार्स और तराई में शिक्षा, रोजगार उन्‍मुखी संस्‍थाओं को स्‍थापित करने और उन्‍हें चलाने के लिए संसाधानों की कोई कमी थी और सरकार चाह कर भी ऐसा करने में कामयाब नहीं हो सकी। वास्‍तविकता तो यह है कि सरकार सिरे से ही बेइमान थी और गैर बंगाली आदिवासी और गोर्खाओं को विकास के पथ पर जाने देना नहीं चाहती थी। इस बात को कभी छिपाया भी नहीं गया। सरकार की नीतियॉं, उनका कार्यान्‍वयन सब कुछ बताती रही है। डुवार्सतराई में किए जाने वाले किसी भी सर्वे और अध्‍ययन से यह बात जग जाहिर हो जाएगी।   

 

संविधान के अनुच्‍छेद 275 के तहत भारत सरकार अपने कान्‍सोलिडेटेड फंड से देश के ट्राइबल एरिया में एडमिनिशट्रेशन और ढांचागत विकास के लिए फंड मुहैया कराता है। सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक विकास के लिए चलाई जाने वाली स्‍कीमों के लिए यह फंड प्रदान की जाती है और ट्राइबल समुदायों के विकास के लिए शतप्रतिशत दर से दिया जाता है। यह एक निर्विवाद विषय है कि पश्चिम बंगाल में जलपाईगुडी और दर्जिलिंग जिला आदिवासी बहुल जिला है और इन जिलों के अधिकतर ब्‍लॉक को इन्‍टीग्रेटेड ट्राइबल डेवे‍लेपमेंट प्रोजेक्‍ट (आइटीडीपी) के अन्‍तर्गत लाया गया है और यहॉं विभिन्‍न विकासात्‍मक योजनाऍं चलाई जा रही है और इसके लिए भारत सरकार संविधान के अनुच्‍छेद 275 के तहत फंड मुहैया कर रही है और यह सारा फंड कल्‍याणकारी योजनाओं के तहत पश्चिम बंगाल सरकार को दिया जा रहा है। केन्‍द्र सरकार देश ने अनेक राज्‍यों में सामुदायिक विकास केन्‍द्र, आदिवासी कला केन्‍द्र, आंगनवाडी केन्‍द्र, आदिवासी रोजगार प्रशिक्षण केन्‍द्र (वोकेश्‍नल ट्रेनिंग सेंटर), आदिवासी प्रशासनिक सेवा प्रशिक्षण केन्‍द्र, क्राफ्ट प्रशिक्षण केद्र, बालक और बालिका हॉस्‍टल, कॉलेज और विश्‍वविद्यालय होस्‍टल, स्‍कूल, पुस्‍तकालय भवन, मॉडल स्‍कूल, टीचर ट्रेनिंग स्‍कूल, पुल, बिजली कनेक्‍श्‍न आदि के लिए इसी फंड से राशि निर्गत की है। इन्‍हीं राशियों के सहारे उत्‍तर पूर्व के राज्‍यों के आदिवासी अंचलों में ढांचागत विकास किए जा रहे हैं जिसका लाभ उठाकर वहॉं के आदिवासी समुदाय दूसरे विकसित समुदायों के साथ कदम से कदम मिला कर चल रहे है। पाठकों की अधिक जानकारी के लिए मैं यहॉं केन्‍द्र सरकार के आदिवासी मंत्रालय के वेबपेज को नीचे प्रस्‍तुत कर रहा हूँ, जिसमें सूचना दी गई है केन्‍द्र सरकार किन विकासात्‍मक योजनाओं के लिए 100 प्रतिशत विकास राशि प्रदान करती है।   

Scheme of Grant-in-Aid to State Governments under Article 275(1) of the Constitution of India  Article 275(1) of the Constitution provides as follows:-

       Such sums as Parliament may by law provide shall be charged on the consolidated Fund of India in each year as grants-in-aid of the revenues of such States as Parliament may determine to be in need of assistance, and different sums may be fixed for different States:

       Provided that there shall be paid out of the Consolidated Fund of India as grants-in-aid of the revenues of a State such capital and recurring sums as may be necessary to enable that State to meet the costs of such schemes of development as may be undertaken by the State with the approval of the Government of India for the purpose of promoting the welfare of Scheduled Tribes in that State or raising the level of administration of the Scheduled Areas therein to that of the administration of the rest of the areas of that State”.

 Funding Pattern:

       This is a Central Sector Scheme and 100% grants are provided to the States.

Coverage:

       The scheme covers States namely Andhra Pradesh, Arunachal Pradesh , Assam , Bihar, Chhattisgarh, Goa, Gujarat, Himachal Pradesh, Jammu & Kashmir, Jharkhand, Karnataka, Kerala, Madhya Pradesh, Maharashtra, Manipur, Meghalaya, Mizoram, Nagaland, Orissa, Rajasthan , Sikkim , Tamil Nadu, Tripura, Uttar Pradesh, Uttarakhand and West Bengal having Scheduled Tribe Population..

Features

  • The grants are provided to the States on the basis of ST population percentage in the State to the total tribal population of the Country.
  • (ii)      The funds are released to the State Governments against specific projects for the welfare of Scheduled     Tribes and   strengthening of administration of tribal areas from the year 2000- 2001. A part of funds are also utilised to establish Eklavya Model residential Schools to provide quality education to ST students from class VI to XII

                  The Ministry of Tribal Affairs issued revised guidelines, in super session of the earlier circulars/ letters/ guidelines on the subject, under No.14011/ 9/ 2001-SG&C dated 2.7.2002 for adoption during 10th Five Year Plan.

 Main Features of the Revised Guidelines dated 2.7.2002

                 The following are the main features of the revised guidelines issued by this Ministry on 2.7.2002.

(i)                 Grant under Article 275(1) is additionality to Normal Central Assistance to the State Plan.

(ii)               Adoption of the project approach and prior approval of the Ministry is necessary.

(iii)              The projects under the first proviso to Article 275(1) are part of the overall TSP and the Annual State Plans.

(iv)             Micro-plans for each ITDA/ MADA are to be prepared through multi-disciplinary teams.

(v)              Thrust areas are to be identified so that resources are better targeted rather than spreading too thin.

(vi)             (vi)        Provision for utilization of 2% of the funds for project management   has    been made.

(vii)           Provision of expenditure upto 10% of the funds for maintenance and infrastructure with prior approval of the Ministry has also been made.

(viii)          Proportionate, at least 30% coverage of women is necessary.

(ix)            TSP Component of the Annual State Plan is to be put in a separate budget head under the administrative      control of their respective Tribal Development Department.

(x)               Earmarking of 10% of funds out of the overall allocation under the first proviso to Article 275(1) for innovative projects has been provided which will be sanctioned amongst only those States who provide TSP in the State Plan in proportion to the ST population of the State in a single budget head and then have spent at least 75% in previous three years on an average

 Proposed Activities

      States can take up activities for strengthening the infrastructure in the sectors critical to enhancement of human development indices such as education, income generation, health irrigation, roads, bridges, forests, forests villages,  electrification, communication, rural marketing, agriculture, animal husbandry, food processing, processing of MFPs, human resource development in technical and vocational spheres, water harvesting, resettlement of displaced persons, tribal land management, sports promotion.Generation of community welfare assets like residential schools, Maintenance of schools,   Providing skilled teaching including in tribal language,  Nutritional support to needy: children, mothers and elderly people, Community Grain Storage,   Assured Drinking Water, and Other activities meant for welfare of Tribal population different from conventional development etc. 

 उपरोक्‍त वेबपेज के विवरण से यह स्‍पष्‍ट हो जाता है कि डुवार्स तराई के आदिवासियों के विकास के लिए राज्‍य सरकार ने केन्‍द्र सरकार के पैसे का उपयोग भी करने के लिए कोई कदम नहीं उठाई। यदि सरकार में इच्‍छाशक्ति और इमानदारी होती तो केन्‍द्र सरकार के द्वारा प्रदान किए जाने वाली राशि से डुवार्स तराई में पर्याप्‍त मात्रा में स्‍कूल, हॉस्‍टल, कालेज, विश्‍वविद्यालय स्‍तर में पढाई के लिए हॉस्‍टल, स्‍वनिर्भर रोजगार उन्‍मुख प्रशिक्षण केन्‍द्र, स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्र आदि की स्‍थापना करती और आदिवासी समाज को भी विकसित होने का मौका देती।  लेकिन लगता है सरकार आदिवासी जनता का सिर्फ वोट लेती है और बदले में ठगने का काम ही करती है। स्‍वतंत्र भारत में डुवार्स तराई के जनता के साथ की गई ठगी एक ज्‍वलंत उदाहरण है कि भारत में आज भी राज्‍य और प्रशासन संविधान और कानूनों के अनुसार नहीं चलाया जाता है, बल्कि राज्‍य और प्रशासन का संचालन करने वालों की जातिवादी और सम्‍प्रादियक भावना तथा उनके व्‍यक्तिगत विश्‍वास और झुकाव ही प्रधानता पाता है।

 

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