आजादी की रस्‍मी खुशियॉं

आज 15 अगस्‍त का दिन है। स्‍वतंत्रता दिवस की धूम चारों ओर है। कहीं तिरंगा फहराया जा रहा है तो कहीं देशभक्ति गीत गूँज रहे  हैं। रेडियो–टीवी पर देश की स्‍वधीनता और स्‍वधीनता से प्राप्‍त हुई प्रगति के ब्‍यौरे दिए जा रहे हैं। कहीं नेता भाषण दे रहे हैं, तो कहीं बच्‍चों में मिठाईयॉं बॉटी जा रही है। चारों ओर उमंग है। लोगबाग खुश हैं कि वे आज एक आजाद देश के नागरिक हैं और उन्‍हें आजाद देश में मिलने वाली सारी सुविधाऍं, अधिकार, हक और अवसर मिल रहे हैं। वे आज अपनी आवाजें पूरे हक से उठा सकते हैं और अपनी योग्‍यता के बल पर उँची से उँची मुकामें हासिल कर सकते हैं।     

लेकिन मैं उदास हॅू। स्‍वतंत्रता दिवस पर उदास होना अच्‍छी बात तो नहीं है। लेकिन लाख चाहने पर भी मन से उदासी जा नहीं पा रही है। कई कारण हैं, कई सामाचार है, कई कारक और विषय है, जिन पर नजर टिकने पर मुझे नहीं लगता है कि मैं अर्थात् मधुबागानियार, एक आदिवासी युवक, आजाद देश का निवासी हॅूं। तमाम खुशियों के बीच भी मुझे लगता है आदिवासी समाज को अभी भी आजादी नहीं मिली है और मैं आज भी गुलामी की जंजीरों में जकडा हुआ हूँ।     

कई दिनों से लगातार डायरिया से आदिवासी मजदूरों की मृत्‍यु के सामाचार आ रहे हैं। आज भोटपाडा चाय बागान में मॉं और उसकी मासूम बेटी की डायरिया से मरने के समाचार ने दिल को हिला कर रख दिया। क्‍या गुजर रही होगी उस परिवार में। मासूम असहाय बेटी अपनी मॉं के ऑंचल तले ममता की आकांक्षा लिए शरण लेना चाहती होगी और मॉं स्‍वयं अपनी कमजोरियों की परवाह न करते हुए बेटी की स्‍वस्‍थता के लिए क्‍या–क्‍या जतन न की होगी। परिवार के अन्‍य लोगों ने भी क्‍या–क्‍या कोशिशें नहीं की होंगी। घरेलू नुस्‍खे, वैद्यीकीय दवाईयॉं और बागान अथवा सरकारी डिस्‍पेंसरी, अस्‍पतालों के चक्‍कर लगाए होंगे। लेकिन मॉं मंजु और बेटी सुष्मिता को बचाया नहीं जा सका। मॉं बेटी की मृत्‍यु पर पडोसी के कुछ लोगों के ऑंखें भीग गई होंगी, लाखों लोगों ने इसे अखबारों में सिर्फ एक समाचार के रूप में पढ कर किसी अगले समाचार में नजरें गडाए होंगे। यॅू भी आदिवासियों की मृत्‍यु से देश को कोई फर्क नहीं पडता है। सरकारी मशीनरी तो इतनी असंवेदनशील है कि वे भावनाहीन ऑखों और हृदय से कुछ रूपये देने की घोषणा कर देते हैं और अपने अन्‍य कामों में लग जाते हैं।     

हर साल वर्षा के मौसम में और कभी–कभी अन्‍य मौसम में भी डायरिया कहर बन के महामारी बरपाती है। दर्जनों और कभी–कभी सैकडों लोग असमय मृत्‍यु के गाल में समा जाते हैं। दो–चार दिनों के लिए कई स्‍तरो पर यह चर्चा का विषय होता है। फिर लोग भूल जाते हैं अथवा कोई अन्‍य खबरों से दब जाती हैं, गरीबों की मृत्‍यु का समाचार। यादें  रह जाती है उन लोगों के दिलों में जो उनके समीप के होते हैं, जो उनके अजीज होते हैं। लेकिन वे भी कब तक उनके लिए एक इंसानी जजबात को बनाए रख सकते हैं दिलों में, जब उनके पेट ही खाली हो। भूख और मामूली रोगों से मृत्‍यु को प्राप्‍त करते लोगों के प्रति इस आजाद और महान देश में किसी को फिक्र नहीं। इस महान देश में आजादी के सर्वसुख और सुविधा का उपभोग करने वाले नागरिकों को इन मृत्‍युओं से कोई फर्क नहीं पडता है, क्‍योंकि मरने वाले नब्‍बे प्रतिशत मजदूर बागानियार आदिवासी होते हैं।     

डुवार्स और तराई के चाय अंचलों में हर साल ‘मृत्‍यु–पर्व’ के रूप में लगातार आ रहे डायरिया और जॉण्डिस का मुख्‍य कारण पीने का दूषित पानी ही है। सैकडों वर्ष पूर्व लगाए गए पाइपों से होकर गुजरने वाले  पीने के पानी को मजदूर नियमित पीते हैं। जर्जर हो चुके पाइप में बरसात के कीचड और दूषित पानी प्रवेश कर जाते  हैं और वही पानी पीकर मजदूर अपनी प्‍यास बुझाते हैं। जंग लगे जर्जर पाइपों के द्वारा प्राप्‍त होने वाले पानी को नियमित पीकर मजदूर अपनी रोग प्रतिरोधीक्षमता को बढा लिए हैं। लेकिन बरसात के मौसम में उन्‍हें इतना  दूषित पानी की आपूर्ति होती है कि उनकी रोग प्रतिरोधी क्षमता भी हार जाती है, और वे दवाई–स्‍वास्‍थ्‍य सेवा की कमी से जीवन हार बैठते हैं।    

प्रतिवर्ष कहर बन बरपते इन बीमारियों की आवृति से बागान प्रबंधन, सरकारी स्‍वास्‍थ्‍य सेवा, जिला प्रशासन सभी अवगत हैं। लेकिन महज कुछ लाख रूपयों में बदले जा सकते इन पाइपों को बदलने के लिए कोई भी आगे नहीं आ रहा है। बागान प्रबंधन यदि इन पाइपों पर रूपया खर्च करता है तो वह इसे अपनी लागत में दिखा कर इन पर टैक्‍स का छूट प्राप्‍त कर सकता है। ढॉंचागत विकास के लिए सरकार द्वारा उपलब्‍ध वित्‍तीय लाभ को प्राप्‍त कर सकता है।    

 दो वर्ष पूर्व  तत्‍कालीन केन्‍द्रीय वाणिज्‍य राज्‍य मंत्री जयराम रमेश ने चाय बागानों में ढॉंचागत विकास के लिए केन्‍द्रीय सरकार के खजाने से 500 करोड रूपये जारी करने की घोषणा की थी, जिसके लिए केन्‍द्रीय बजट में प्रावधान भी किया गया था। मजदूरों के लिए घोषित और करार किए गए सभी तरह के अनुबंध और सुविधाओं को विकसित करने अथवा उनका नवीकरण करना ढॉंचागत सुविधाओं की श्रेणी में आता है।    

इन ढॉंचागत सुविधाओं के निर्माण के लिए टी बोर्ड भी हर साल अपनी बजट में प्रावधान करता है। ढॉचागत सुविधाओं की वृद्धि और नवीकरण, रिप्‍लेसमेंट आदि के लिए व्‍यय किए गए खर्चे पर बागान को सब्‍सीडी भी मिलता है। लेकिन तमाम सुविधाओं के लिए फण्‍ड मुहैया कराने के लिए टी बोर्ड एक महत्‍वपूर्ण शर्त लगाता है कि जो बागान किसी भी विकासात्‍मक कार्यो के लिए फण्‍ड मांगेगा, उन्‍हें यह दिखाना होगा कि प्रोविडेंट फण्‍ड की बकाया राशि दस हजार से अधिक नहीं है। अधिकतर बागान प्राविडेंट फण्‍ड की राशि में घपला किए हुए हैं, इसलिए वे इस तरह की शर्तो को पूरा नहीं कर पाते हैं।    

श्रमिक युनियन के नेतागण सिर्फ मजदूरी और बोनस देने की मांग ही करते हैं, वे ढांगागत सुविधाओं की मांग तब ही करते हैं, जब उन्‍हें बडे हडताल और बंद को सफल करवाना होता है। इनकी सफलता से वे बडे नेता कहलाते हैं तथा बागान प्रबंधन और मालिकों की नजरों में अधिक जोडतोड के नेता के रूप में अपनी पहचान बनाते हैं और इसका व्‍यक्तिगत बेजा फायदा उठाते हैं।    

चाय मजदूरों के कल्‍याण के लिए पारित प्‍लान्‍टेश्‍न लेबर एक्‍ट और उस पर बने नियमों की एक झलक मैं यहॉं प्रस्‍तुत करना चाहॅूगा कि नियमों में लिखी बातें क्‍या है और चाय मजदूरों को इनमें से क्‍या मिलता है। इसे मैंने प्‍लान्‍टेशन लेबर एक्‍ट से ज्‍यों के त्‍यों कॉपी किया है।      

     

HEALTH – Responsibilities of the Employers
(Facilities to be provided in the Plantations)

Drinking Water: In every plantation effective arrangements shall be made by the employer to provide and maintain at convenient place a sufficient -supply of wholesome drinking water for all workers [Section 8].     

Conservancy: There shall be a sufficient number of conveniently situated & accessible separate latrines and urinals for males and females in every plantation. All of these are to be maintained in a clean and sanitary condition [section g].     

Medical facilities: Medical facilities for workers and their families (as prescribed by the state government) have to be maintained and made available by the Employer [Section 10].     

In the absence of such prescribed medical facilities, the Chief Inspector can arrange for provision- and maintenance of medical facilities and recover the costs of these from the defaulting employer.  [Actual Recovery of such costs will be done by the Collector as arrear of Land Revenue on Chief Inspectors’ certification].     

      

 

    

  


     

WELFARE     

Canteens: Under Section 11, the State Government has been empowered to ask Employers to open Canteen(s) in Plantations employing one hundred and fifty workers or more and to make rules for the working and maintenance of canteens.     

There is also a provision for the constitution of a managing committee in which the workers are represented.     

Creches: The employer must provide and maintain suitable rooms for children where the number of workers is more than fifty or the number of children of women workers is twenty or more [Section 12].     

Creches are to be maintained in a clean, safe and sanitary conditions and are to be run by a woman trained n the care of children and infants as per the law.     

Recreational facilities: every employer to make provision in the Plantation for recreational facilities for the workers and their children [Section 13].     

Educational facilities: In every Plantation where the children- of the workers between the ages of six and twelve exceed the number twenty five, the employer is under obligation to provide educational facilities as may be specified by the State Government [Section 14].     

Housing facilities: It is the duty of the employer to provide and maintain necessary housing accommodation for every worker and his family [Section 15].     

Every worker (including his family) is entitled to a housing accommodation after six months of continuous service whether staying inside or outside a plantation and who has expressed a desire in writing to live in the plantation. The requirement of continuous service of six months will not apply to a worker who is the member of the family of a diseased worker who was residing in the plantation. Under Section 16, the-State Government has been empowered to make rules relating to standards of housing and constitution of an advisory board with representatives of workers and employers.     

Liability of employer in case of accidents resulting from collapse of houses provided by him: If the house collapse is not solely or directly attributable to a fault on the part of the occupant or to a natural calamity, the employer shall be liable to pay compensation to the worker or his kin suffering injury or death. In order to claim this compensation, the worker or his next of kin or his authorised agent must write to Labour Commissioner within 6 months of the accident. The compensation would be paid under the Workmen’s Compensation Act, 1923.     

Other facilities: The State Government has the power to make rules requiring the plantation employer to provide the workers and umbrellas, blankets, rain coats or other like amenities for the protection of workers from rain or cold [Section 17].     

Welfare Officers: In plantations that employ three hundred workers or more, the employer has to employ welfare officers as prescribed [Section 18].     

      

सरकार ने वेलफेयर अधिकारी की नियुक्ति मजदूरों के हित में करने का प्रावधान बनायी है। लेकिन डुवार्स और तराई में मजदूर कल्‍याण अधिकारी बागान प्रबंधन का हिस्‍सा बन कर मजदूरों के अकल्‍याण में लगे हुए हैं। कोई भी मजदूर युनियन नियमों में देय सुविधाओं और प्रावधानों को नजरांदाज करने के लिए कभी कोर्ट नहीं जाते हैं। कभी किसी बागान प्रबंधन के विरूद्ध एफआईआर दर्ज नहीं किेया जाता है। लेबर कमिशनर के द्वारा कभी भी किसी बागान प्रबंधन पर कानून को नजरांदाज करने के लिए कोई कार्रवाई अथवा जुर्माना नहीं किया जाता है।     

जिस आजाद देश में गरीब अनपढों का शोषण करने, उन पर अत्‍याचार करने में मजदूर–राजनैतिक नेता, प्रशासन, अधिकारी सब मिले हुए होते हैं, उस देश में आजादी का मतलब नेताओं के भ्रष्‍टाचार और प्रशासन के निकम्‍मेपन की आजादी ही होती है। चाय बागानों में गरीब, अनपढ आदिवासी और गोर्खा निवास करते हैं, उनके लिए आज तक वास्‍तविक आजादी आया ही नहीं है।     

      

बंद बागानों में मजदूर तिल–तिल कर मर रहे हैं। उन्‍हें दो जून रोटी, पीने को पानी, अस्‍वस्‍थता पर तिमारी नहीं मिल रही है। उधर देश के गोदामों में करोडों टन अनाज सड रहा है। एक आजाद देश में भरपूर अनाज का भंडार रह कर भी जब देशवासी भूख और भूख से उपजे बीमारियों से रोज मरते हैं, तो देश के आजाद होने का कोई मतलब नहीं होता है। आखिर यह आजादी किनके लिए है, यह सवाल मेरे मन में बार–बार उठता है और मन में आजादी के प्रति कोई प्रसन्‍नता का भाव आने से रोक देता है। मेरी ऑखों में उन शहीदों के लिए ऑसू छलछला आते हैं, जिन्‍होंने देश की आजादी की खातिर हँसते–हँसते अपने प्राणों को इस आशा में न्‍योछावर किया कि उनके आजाद देश में सभी नागरिक एक सामान होंगे और सभी को विकास का समान अवसर मिलेगा, किसी के साथ कोई पक्षपात, अन्‍याय नहीं होगा। लेकिन इस आजाद देश में आज कुछ लोग अंग्रजों से भी अधिक अन्‍यायी, पक्षपाती और अत्‍याचारी हो गए हैं। उनके भ्रष्‍ट आचारों से गरीब और अनपढ जनता रोज खून के ऑसू रो रही है, ऐसे में एक दिन की रस्‍मी आजादी की खुशियों में दिल कैसे खुल कर भाग ले सकता है।    

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