Niti Aayog to examine if SC/ST sub-plans can be non-lapsable

New Delhi: Niti Aayog has been asked to explore ways to find out how allocations under the Scheduled Caste Sub-Plan and Tribal Sub-plan can be made non-lapsable.

The decision was taken at a recent meeting on Scheduled Castes Sub-Plan (SCSP) and Tribal Sub-Plan (TSP) monitoring framework chaired by the Principal Secretary to Prime Minister  Narendra Modi.

Also, to put an end to the tussle between the Ministry of Social Justice and Empowerment and Niti Aayog over the monitoring of SCSP, it was decided that SCSP will now be monitored by the ministry.

Niti Aayog member Bibek Debroy. Courtesy Forbes India

Similarly, the TSP will be monitored by the Ministry of Tribal Affairs.

“Both the ministries (SCSP and TSP) will develop monitoring based on the framework designed by Niti Aayog. The system will be put in place in 60 days and will focus not just on financial allocations and utilisation but also on outcomes,” according to an official document.

SCSP and TSP mandate every central ministry to allocate budget for the welfare of Dalits and tribals.

“Niti Aayog will examine if the allocations under the SCSP and TSP be made non-lapsable in addition to the non-divertible. Niti Aayog may examine this in consultation with the relevant ministries and Cabinet Secretariat and recommend appropriate action,” the official document stated.

“A major chunk of the funds allocated under the SCSP and TSP by different ministries remain unutilised and goes back to exchequer at the end of fiscal.

“Now Niti Aayog has been asked to explore ways to see if the allocated amount under these schemes can be made non-lapsable so that the unutilised amount remains in the corpus and carried forward in the next fiscal,” said a government official.

Tribal Ministry allocated Rs 1,250 crore under the TSP for the fiscal 2015-16 out of which Rs 1,132 crore could be utilised.

Similarly, around Rs 4,500 crore was allocated by Ministry of Social Justice in the last fiscal of which around Rs 3000 crore could be utilised. Courtesy:PTI

वर्चस्ववाद का शिकार आदिवासी समाज

नेह अर्जुन इंदवार

              आज आदिवासी समाज का बड़ा हिस्सा हर क्षेत्र में वर्चस्ववाद का शिकार हुआ दिखता है। देश में जहाँ कहीं भी आदिवासी समाज है वह दूसरे तथाकथित अगड़ी समाज के सांस्कृतिक, भाषाई, आर्थिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक, जीवन दर्शन, विचारधारा के वर्चस्ववाद (नायकत्व) का शिकार बना हुआ है। उसका अपना मूल और मौलिक आदिवासीयत से परिपूर्ण नैसर्गिक मूल्य कहीं खो गया है या विलुप्ति के कगार पर है।

आदिवासी इलाकों से दूर विभिन्न कारणों से आदिवासी जहाँ कहीं भी रहता है,  दूसरे तथाकथित विकसित समाज की संस्कृति, भाषा, राजनीति, इतिहास का पिछलग्गु बन जाता है। वह जाने अनजाने तथाकथित रूप से शिक्षित होने के क्रम में दूसरे समाज के विचारों, व्यवहारों के वर्चस्व का शिकार हो जाता है, उसे वह आत्मसात कर लेता है और उसकी नकल भी करने लग जाता है।

आज अधिकतर शिक्षित आदिवासी परिवार अपने घरों में मातृभाषा के रूप में किसी अन्य समाज की भाषा का प्रयोग करता है। ऐसा करने में उसे ग्लानि का अनुभव नहीं होता है,क्योंकि वह मानसिक रूप से दूसरे समाज के वर्चस्ववाद को स्वीकार कर लिया है और उस वर्चस्ववाद को अपनी अगली पीढ़ी को भी पारिवारिक या सामाजिक विरासत के रूप में सौंप रहा है। यह वर्चस्ववाद किसी समाज की अपनी विशिष्ट पहचान को धीरे-धीरे हमेशा के लिए विलुप्त कर देता है। आज पूरे देश में आदिवासी समाज इसी वर्चस्ववाद का शिकार हो रहा है और विडंबना इस बात की है कि समाज का बड़ा और प्रभावशाली तबका इसे मानसिक रूप से स्वीकार कर लिया है।

यह वर्चस्ववाद क्या है? आईए पहले हम वर्चस्ववाद की परिभाषा को समझने का प्रयास करते हैं।

वर्चस्ववाद, आधिपत्य, नेतृत्व, नायकत्व, अंगे्रजी शब्द Hegemony का हिंदी रूपांतर है। इसका शब्दिक अर्थ आधिपत्य, प्राधान्य होता है। Hegemony is political or cultural dominance or authority over others.

इटली के माक्सवादी चिंतक अंतोनियो ग्राम्शी के अनुसार शासक या सत्तारूढ़ वर्ग अपने सोच-विचार, विश्वास, मान्यता, मूल्य, कल्पना, परंपरा, आदर्श को श्रेष्ठ सार्वभौमिक बता कर उसे प्रजा पर थोपता है। इसके लिए शासक या सत्तारूढ़ वर्ग शोषित के विरूद्ध हेरफेर और षड़यंत्र करता है, और उसे अपनी भाषा, संस्कृति अपनाने के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मजबूर करता है।

इस प्रक्रिया में शासक और प्रभु वर्ग शोषित समाज के मौलिक सोच-विचार, विश्वास, मूल्य, कल्पना-परिकल्पना, आदर्श, परंपरा, व्यवहार, भाषा, संस्कृति, राजनीति, अर्थनीति, रंग रूप और सामाजिक स्थिति को घटिया सिद्ध करने का प्रयास करता है और इसके लिए वह विभिन्न प्रकार के साम, दाम, भेद की नीति अपनाता है।

बहुल सांस्कृतिकवाद की जगह एकल सांस्कृतिकवाद के लक्षित प्रक्रिया को ग्राम्शी ने वर्चस्ववाद कहा है। स्थूल रूप से शक्तिशाली देश या राष्ट्र के द्वारा कमजोर देश या राष्ट्र पर धौंस को कूटनीति की भाषा में वर्चस्ववाद कहा जाता है। वर्तमान समय में पूरे संसार में अमेरिकी शक्ति की धौंस कमजोर देशों में चल रही है।

यह ध्यान देने की बात है कि बौद्धिक रूप से क्षमताहीन, साधनहीन वर्ग प्रभु वर्ग के षड़यंत्र को समझ नहीं पाता है और अपनी संस्कृति, भाषा और सामाजिक थाथी को प्रभु वर्ग द्वारा घटिया बताए जाने पर वह भी घटिया मान लेता है। इस प्रक्रिया में वह धीरे-धीरे प्रभु वर्ग की भाषा, संस्कृति, व्यवहार, मान्यता, विश्वास, मूल्य और इतिहास को अपना लेता है और उसका पिछलग्गु बन जाता है।

साधनहीन, अशिक्षित लोग जो साधारणता बौद्धिकतापूर्ण वैचारिक चर्चा से या तो अनजान होते हैं या फिर ऐसी चर्चा और चर्चा के माध्यम तक उनकी पहुँच नहीं होती है,  वे  सत्तारूढ़ वर्ग की चालाकी, सतत व्यवहार, प्रयास या षड़यंत्र को समझ नहीं पाते हैं और कालांतर में  अपनी सामाजिक, ऐतिहासिक, पारंपारिक मूल्यों को तिलांजलि देकर शासक वर्ग के मूल्य, विश्वास, आदर्श, मान्यता, व्यवहार सोच और दृष्टिकोण इत्यादि को अपना लेते हैं।

लेकिन पिछड़े समाज के शिक्षित जनों द्वारा इस तरह के वर्चस्ववाद का बढ़चढ़ कर स्वागत करना और उसे अपनाना शिक्षित समाज की चिंतनधारा पर प्रश्नचिन्ह् खड़ी करता है। इसे आदिवासी समाज के परिपेक्ष्य में गहराई से समझा जा सकता है।

आज आदिवासी समाज अपनी भाषा, परंपरा, विश्वास, मूल्य, मान्यताओं को छोड़ कर गैर-आदिवासी समाज में प्रचलित मूल्य और परंपराओं को अपना रहा है। यद्यपि अशिक्षित समाज अपनी सांस्कृतिक परंपराओं से आज भी कमोबेश जुड़ा हुआ है, लेकिन आदिवासी मूल्य रहित शिक्षा प्राप्त करने के बाद शिक्षित आदिवासी सबसे पहले अपने सामाजिक मूल्यों से पीछा छुड़ा लेता है। वह गैर आदिवासी भाषाओं को अपने घर की भाषा बना लेता है। चाल चलन, पर्व त्यौहार, तथा सामाजिक रूप से दूसरे समाज के सांस्कृतिक मूल्यों को अपने घर का स्थायी निवासी बना लेता है और अपने पारंपारिक मूल्यों को अपनी अगली पीढ़ी में हस्तांतरित करने के बजाय  अपने बच्चों को गैर आदिवासी भाषाओं, मूल्यों से न सिर्फ परिचय कराता है बल्कि उसे अपने परिवार और वातावरण में गुंफित करने लग जाता है और नयी पीढ़ी सिर्फ शरीर, नाम, गोत्र और परिचय के लिए आदिवासी बना रहता है,  मानसिक और आत्मिक रूप से वह गैर-आदिवासी में परिवर्तित हो जाता है।

बच्चों को स्वार्थहीन आदिवासी सामाजिक मूल्यों को परोसने की जगह उनके नन्हे दिमाग में सामंतवादी, शोषणमूलक प्रतिस्पर्धात्मकपूर्ण जीवन मूल्यों को परोसा जाता है। जिसके कारण बच्चे अपने ही सामाजिक मूल्यों के प्रति हेय दृष्टि विकसित करते हैं और मानसिक रूप से एक समतापूर्ण सामाजिक मनुष्य की जगह एक कंपिटिटर मनुष्य बनते जाते हैं। यह कंपिटिटर मनुष्य सहअस्तित्व पर विश्वास नहीं करता है  वह जीवन को एक रेस के रूप में देखता है जहाँ उसे सिर्फ दौड़ना होता है, सबसे आगे निकलने के लिए। यह कंपिटिटर सामाजिक मूल्य का प्रतिफल है कि जीवन में अथाह संपत्ति और सफलता प्राप्त करने की मानसिकता लिए आदमी जीवन भर शांति और सुकून के लिए भटकता है।

आज हिंदी प्रांतों में शिक्षित आदिवासियों की घरेलू भाषा हिंदी हो गई है, वहीं बंगाल में लाखों परिवार घर में बंगला, नेपाली, असम में असमिया, उड़िसा में उड़िया, महाराष्ट्र में मराठी आदि बोलते हुए नजर आते हैं। घर के बाहर सामाजिक समागमों में भी आदिवासी गैर-आदिवासी भाषाओं का ही प्रयोग करते हैं और गैर-आदिवासियों से तो शत-प्रतिशत गैर आदिवासी भाषाओं में ही बातचीत करते हैं, भले आदिवासी दस हों और सामने सिर्फ एक गैर आदिवासी। ऐसी स्थिति शहरों में ही है ऐसी बात नहीं है, बल्कि आदिवासी बहुल क्षेत्र में भी यही स्थिति दृष्टिगत होती है।

आज शिक्षा लेने के क्रम में अधिकतर आदिवासी सिर्फ साक्षर हो रहे हैं, डिग्रीधारी बन रहे हैं, लेकिन शिक्षित नहीं हो पा रहे हैं। उन्हें गैरआदिवासी मूल्य, इतिहास, भाषा, संस्कृति पढ़ाया जा रहा है और वे साक्षर तथा शिक्षित होने के क्रम में आदिवासीयत से दूर होते जा रहे हैं। उनकी सोच और विश्वास में गैर आदिवासीयत मूल्य भरा जा रहा है। वे शिक्षा का उपयोग अपने सामाजिक सोच-विचार, विश्वास, मान्यता, मूल्य, कल्पना, परंपरा, आदर्श, व्यवहार, भाषा, इतिहास, संस्कृति, राजनीति, अर्थनीति और सामाजिक स्थिति को सुदृढ़ करने में नहीं कर रहे हैं या नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि इसके लिए उन्हें शिक्षा ही नहीं दी गई है । उन्हें गैर आदिवासी वातावरण में शिक्षा देने के क्रम में एक शिक्षित सामाजिक प्राणी बनाने की जगह  एक डिग्रीधारी, नौकरी के लिए उपयुक्त कौशल से युक्त प्राणी बनाया जा रहा है, अर्थात् उत्पादन प्रक्रिया में खपा कर काम करने वाला एक उपकरण-प्राणी। प्रभु और शोषक वर्ग का वर्चस्ववाद या आधिपत्यवाद कैसे काम करता है इसे जानने के लिए उपकरण के रूप में तैयार एक शिक्षित व्यक्ति का अध्ययन करके सहज ही जाना जा सकता है।

आदिवासी मूल्यों से रहित शिक्षित आदिवासी शिक्षा का उपयोग अपने समाज और सामाजिक थाती को सुदृढ़ करने में नहीं करता है, बल्कि उसे खोखला और जड़हीन बनाने के औजार के रूप में प्रयोग करता आ रहा है।

जब समाज में शिक्षा का सही प्रयोग बढ़ता है और उसका उपयोग सामाजिक जागरूकता को बढ़ाने, सामाजिक एकता को सुदृढ़ करने, तथा प्रतिकूल परिस्थतियों में संघर्ष करने में  किया जाता है तो उससे जागरूकता की एक नयी जमीन तैयार होती है। समाज में अपने मूल्यों के प्रति लोगों में नया विश्वास जगता है। अपनी संस्कृति के उच्चमूल्यों से समाज परिचित होता है और दूसरे शोषक या शासक वर्ग के सांस्कृतिक, भाषाई, राजनैतिक और आर्थिक वर्चस्व से समाज की रक्षा करने की चाहत पैदा होती है। समाज किसी अन्य समाज का पिछलग्गु नहीं बनता है बल्कि अपने जमीनी मूल्यों से एक सशक्त पहचान बनाता है और सभी तरह के शोषण, अत्याचार, भेदभाव, अन्याय से समाज सहज रूप से लड़ाई करता है। समाज में शिक्षितगण एक नौकरी की मशीनरी में प्रयोग होने वाले एक पुर्जे की तरह नहीं, बल्कि चेतनशील और सामाजिक रूप से अत्यंत सक्रिय कार्यशील बुद्धिजीवी की तरह कार्यरत्त होते हैं और वे बौद्धिकता के बल पर सामाजिक विकास के लिए अनिवार्य सभी परिस्थितियों का निर्माण अपने तई करते हैं।

आदिवासी भाषाएँ भारत की प्राचीनतम भाषाएँ हैं। तमाम आधुनिक भारतीय भाषाएँ,  आदिवासी भाषाओं के हजारों वर्षों बाद की पैदाइश हैं। आज संस्कृत और तमिल को क्लासिकल भाषा की पदवी से नवाजा गया है, लेकिन आदिवासी भाषाएँ तो आर्यों के आने के दसियों, हजारों वर्षों से पहले  से ही विद्यमान हैं।  कई हजार साल से लेकर पिछले सौ दो सौ वर्षों तक हमारे पूर्वजों ने इन भाषाओं को सहेज, समेट कर पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित बचा कर रखा। हमारा पूरा इतिहास, सामाजिक व्यवहार, संस्कृति, सामाजिक संपन्नता आदि तमाम जानकारियाँ इन्हीं भाषाओं में रच बस कर आधुनिक काल तक निर्झर पानी की तरह बहता रहा है।

लेकिन जैसे ही हम तथाकथित रूप से शिक्षित होने की प्रक्रिया में शामिल हुए, सबसे प्रथम भारी आघात हमने अपनी ही भाषा, सामाजिक परंपरा, धर्म और संस्कृति को लगाया और उसे नष्ट तथा मटियामेट करने में कोई कसर नहीं छोड़ा। इतिहास में ऐसी विडंबनापूर्ण स्थिति और कहाँ होगी ?? अपने ही सामाजिक प्राचीन थाथी का हत्यारा होने के आरोप से शिक्षित और तथाकथित रूप से विकसित आदिवासी कैसे इंकार कर सकता है ?? आधुनिक शिक्षा और ज्ञान अपनी ही विरासत का हत्यारा निकला। वर्चस्ववाद का शिकार हुए हमारे विशाल सामाजिक और सांस्कृतिक अट्टालिकाओं का भग्नावशेष भी हम बचा कर रख पाने में असफल सिद्ध हो रहे हैं। कैसी है हमारी शिक्षा और क्या है इसका लक्ष्य ??

आदिवासी समाज अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक अस्मिता के लिए अलग ही पहचाना जाता है। समाज में महिलाओं को बराबरी का दर्जा और स्वतंत्रता हासिल है। समाज में शोषक वर्ग का कहीं उदय नहीं हुआ और ऊँच नीच का कोई स्थान नहीं । अमीर और गरीब में रोटी बेटी का रिश्ता नयी बात नहीं है। समाज सामूहिकता में विश्वास रखता है, खेत-खलिहान सामूहिक मिल्कियत का होता है। खेती करने वाला सिर्फ तत्कालिक मालिक होता है। अपने अधिक भूमि या संसाधन को आदिवासी दूसरे के शोषण के लिए इस्तेमाल नहीं करता है।

आदिवासी नृत्य और संगीत प्रेमी होते हैं। हर मौसम, पर्व-त्यौहार,शादी- विवाह या सुख-दुख के लिए पारंपारिक नृत्य और गीत अलग-अलग होते हैं। सिसई के एक गाँव तथा राउरकेला के नजदीक एक गाँव की शादी में मैंने करीबन बारह तरह के नृत्य-गीत और उसी के अनुसार अलग ढंग से ढोल- नगाड़े की आवाज को देखा और सुना। शादी के नेग दस्तुर में प्राकृतिक पूजन की विविधता, मनोरंजन के अनेक रंग व्याप्त देखा। वहीं जलपाईगुड़ी और असम के कुछ भागों में मैंने सरना शादी में दुल्हा-दुल्हन को राजा-महाराजाओं की तरह मुकुट पहन कर शादी करते देखा। कई चर्च शादी में जिंदगी भर कोट-पैंट की शक्ल नहीं देखने वाले शख्स को कोट-पैंट और टाई पहने शादी करते देखा। इन शादियों  में  सिर्फ एक ही धुन पर ढाँक  बजते और एक ही प्रकार से नाचते लोगों को देख कर सहज ही नृत्य-गीत-संगीत में बाहरी प्रभाव या वर्चस्व को महसूस किया जा सकता है। अब तो अनेक जगहों में शादी-विवाह या अन्य त्यौहारों में गैर आदिवासियों के “रप्टा” बाजा को आमंत्रित करते हुए सहज ही देखा जा सकता है।

कई आदिवासी फिल्में देखी, हर फिल्म में हिंदी फिल्मों की भौंडी नकल ही देखने को मिली। सृजनात्मक सोच में भी जब वर्चस्ववाद की लकीरें दिखाई देती है तो मौलिक सोच के बारे चिंता होना स्वाभाविक ही है।

दुनिया में हर समाज भौतिक विकास कर रहा है, लेकिन अपनी भाषा, अस्मिता, परंपरा, सोच, सामाजिक व्यवहार को तिलांजलि देकर नहीं। इजरायल जैसे देश भी है, जो हजारों वर्ष पूर्व विलुप्त हुए अपनी भाषा को पुनर्जीवित करके आज वैज्ञानिक प्रगति का लोहा सबको मानवा लिया है। तेजी से क्षयग्रस्त होते आदिवासी भाषाओं, पहचान, संस्कृति, खेल-खलिहान को बचाने की कोशिश की जाए तो हम जरूर कामयाब होंगे। लेकिन तब, जब हम इजरायली लोगों की तरह ही  समर्पित और दृढ़निश्चियी  होंगे।

आज आदिवासी समाज में सतत सक्रिय बुद्धिजीवियों का अभाव है तो उसका कारण पिछले सौ वर्षों में दूसरे समाज के वर्चस्ववाद का शिकार होना ही है। समाज में साक्षर होने की प्रक्रिया जारी रही, अनेक स्कूल, कालेजों में, जिनकी स्थापना तीस चालीस के दशक में हुई, आदिवासी समाज से शिक्षा प्राप्त करने वालों की संख्या बढ़ती रही। लेकिन समाज में मौजूद तुलनात्मक रूप से उच्च और मूल्यवान मूल्यों को बचा कर रखने के लिए शिक्षितों का कोई समूह आगे नहीं आया, न ही उच्चकोटि के समाज सुधारक, मार्गदर्शक, लेखक, कवि, कहानीकार, चिंतक, सिद्धांतकार, कलाकार, पत्रकार, सम्पादक, विश्लेषक, समीक्षक, भाषाविद्, बैरिस्टर, कानूनविद्, जज, वैज्ञानिक, अविष्कारक, राजनीतिज्ञ, कूटनीतिज्ञ, रणनीतिज्ञ, उद्भट विद्वान, व्यापारी, उद्योगपति आदि का उत्पादन या पैदाइश हुई।

पूरा समाज बाहरी समाज और लोगों के राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक शिक्षाओं का पिछलग्गु और दास बना रहा और उन्हीं मूल्यों में मनुष्यता के विकास की खोज करता रहा । भाषा संस्कृति, खेत, खलिहान, जंगल, झार, नदी, तालाब, आदिवासी अंचल-क्षेत्र, स्त्री-पुरूष, बच्चे लुटते रहे और समाज जर्जर होता रहा,  शिक्षित आदिवासी बस टुकुर टुकुर देखने के सिवाय कुछ नहीं कर सका। नैसर्गिक क्षमताओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो वर्चस्ववाद का शिकार आदिवासी अपने पुरखों के सामने कहीं नहीं टिकता है। वह विकास के स्वप्न में विनाश को गले लगाता रहा। जिन बाहरी समाज और लोगों ने हमारे पूर्वजों को अपनी चालाकी, धूर्तता और धोखे से ठगा उन्हीं के विचारों, मूल्यों और आस्थाओं को आदिवासी आज इसलिए ढोने में शान समझता है कि जन्म से ही वह उन मूल्यों के खोल में जीवन जीता रहा है। जिन्होंने उनके पूर्वजों को ठगी और चालाकी का शिकार बनाया उन्हें ही वह सम्मानीय समझता है।

आदिवासियों के वर्चस्ववाद के शिकार होने का सबसे बड़ा पहलू आर्थिक वर्चस्ववाद का शिकार है। गरीबी में आटा गीला की कहावत यहाँ चारितार्थ हुई है। जो नगण्य संख्या में सक्षम शिक्षित थे, बौद्धिकता से लैस थे, उनका भी आर्थिक अभाव के कारण हाथ पाँव  शिथिल हो गया था। वे चाह कर भी कुछ नहीं कर पाए, क्योंकि वे भी वर्चस्ववाद के कई पहलुओं के व्यक्तिगत शिकार थे। आज आदिवासी समाज संविधान की पाँचवी अनुसूची का क्षेत्र, सम्पन्नता से भरा खनिज लवण के क्षेत्र का निवासी होते हुए भी बाजार के आर्थिक गतिविधियों से अलग थलग है । उनकी जमीन, क्षेत्र, वातावरण, जलवायु, नदी, तालाब, वन-जंगल का आर्थिक गतिविधियों में बखूबी प्रयोग हो रहा है लेकिन इन गतिविधियों से प्राप्त हो रहे अरबों के लाभ में आदिवासियों को कोई हिस्सा प्राप्य नहीं है,  ये आर्थिक गतिविधियाँ आदिवासी समाज को समाप्त करने के उपकरण के रूप में प्रयोग हो रहीं हैं। आर्थिक वर्चस्ववाद का ऐसा उदाहरण संसार के किसी हिस्से में देखने को नहीं मिलता है।

आज आदिवासी समाज भारत में प्रभु वर्ग या शोषक वर्ग का उपनिवेश बना है तो इसके कई कारण हैं।  वर्चस्ववाद के कई उदाहरण से हमें इसे समझना होगा, तभी हम वर्चस्ववाद के कुचक्र से लड़ सकेंगे और विजयी होने के लिए कार्यसूची और नीति तथा कार्यक्रम बना सकेंगे।

संसार के सभी देशों और महादेशों में यह वर्चस्ववाद का खेल चल रहा है। भारत में करीब 1500 से अधिक भाषाएँ हैं, उनमें पाँच सौ से अधिक  साहित्य और लोकसाहित्य से संपऩ्न हैं, लेकिन देश में सिर्फ 22 भाषाओं को मान्यता दी गई है और पूरे भारतवासियों को इन्हीं भाषाओं के वर्चस्ववाद का शिकार बनने के लिए मजबूर किया जा रहा है। जब एक भाषा के वर्चस्ववाद का शिकार एक विशाल जनसंख्या होती है, तो उस भाषा के माध्यम से उस विशाल जनसंख्या की सोच, चिंतन, व्यवहार, संस्कृति और भाषाओं पर वर्चस्ववाद का प्रभाव पड़ता है और उनके जीवन यापन में अनेक बाहरी प्रभाव परिलक्षित होते हैं। आर्थिक रूप से उस विशेष भाषा के ग्राहकों की बढ़ोतरी हो जाती है, अधिक किताबें, पत्रिकाएँ, अखबार, टीवी, सिनेमा अन्य कलात्मक और संस्कृतिजन्य वस्तु मूल्यों का बाजार तथा प्रभाव बढ़ जाता है। उन्हीं भाषाओं के विद्यालय, कॉलेज, पाठ्यपुस्तकों और जीवन दृष्टि के सब कायल हो जाते हैं। लेकिन वर्चस्ववाद के शिकार समुदाय को दृष्टगत आर्थिक क्षति से भी अधिक अदृष्टिगत हानि होती है और उसके सम्पूर्ण विशिष्ट अस्तित्व पर संकट मंडराने लगता है, या वह पूरी तरह नष्ट हो जाता है। यह किसी समुदाय या राष्ट्रीयता की मृत्यु ही होती है।

अंग्रेजी का बाजार आज पूरे संसार में सबसे बड़ा है।  अंग्रेजी के एक उपन्यास के आय पर उसका लेखक करोड़पति बन जाता है। सिर्फ एक हॉलीवुड फिल्म की कमाई कई देशों के सकल आय से अधिक होती है। यह अंग्रेजी के वर्चस्ववाद का प्रतिफल है। दुनिया का हर देश और जनता अंग्रेजी सीखने के लिए खूब व्यय करता है। पूरी दुनिया में अंग्रेजी भाषा का सिर्फ एक दिन का बाजार ही कई अरब रूपये का है, फिर भी अमेरिकी, यूके, आस्ट्रेलिया आदि अंग्रेजी भाषी देश सारी दुनिया में मुफ्त अंग्रेजी सिखाने के लिए सैकड़ों संस्थाएँ, वेबसाइट, प्रकाशन, रेडियो स्टेशन आदि में बेशुमार पैसा खर्च करते हैं, क्योंकि वे अपने वर्चस्व को बनाए रखना चाहते हैं। इस भाषाई वर्चस्ववाद से सिर्फ अमेरिका को सैकड़ों बिलियन डॉलर की कमाई होती है। हॉलीवुड तय करता है कि दुनिया में कौन से फैशन का चलन होगा या कौन सा संगीत सुना जाएगा। पूरी दुनिया हर मामले में अमेरिका का नकल करने के लिए दिन-रात लगा रहता है। अमेरिका एक्सेंट में बातें करने वाला अपने को अन्यों से उच्च महसूस करता है। यह वर्चस्ववाद का ही प्रभाव है।

हमारे देश में अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण एक सत्ताधारी वर्ग का उदय हुआ है, जो सिर्फ भाषाई ज्ञान के कारण पूरे देश को अपनी मुट्ठी में जकड़ कर रखा है। किसी भी पार्टी  की सरकार बने उसके वर्चस्ववाद का बाजार कभी खत्म नहीं होता है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री, हिंदी टेलिविजन कंपनियाँ और क्रिकेट वर्चस्ववाद के ऐसे उदाहरण है, जहाँ पूरे देश की कमाई सिर्फ चंद मुट्ठी भर लोगों के पास पहुँच जाती है। हिंदी और चंद राज्यों की राजभाषा सैकड़ों भाषाओं के मार्ग में तरह-तरह से बाधाएँ खड़ी करती हैं।

तमिलनाडु में हिंदी का विरोध इसके वर्चस्ववाद का विरोध ही है। तमिल चैनल, फिल्म, अखबार, विज्ञापन, शिक्षण पाठ्यक्रम का एक अलग ही अर्थव्यवस्था है, जिसकी कमाई बॉलीवुड और दिल्ली तक नहीं पहुँचती है, बल्कि वह तमिलनाडु में ही रह जाती है, जिसके कारण लाखों लोगों की आय बढ़ती है और आत्मनिर्भरता की ओर वे एक कदम अधिक बढ़ाते हैं।

भाषाई और सांस्कृतिक वर्चस्व को समाज चाहे तो बहुत आसानी से महज एक दशक की अवधि में खत्म कर सकता है। भाषा, साहित्य, सिनेमा, टीवी, धर्म के रास्ते बढ़ते बाहरी नकारात्मक वर्चस्व को समाज अपनी पौरूषता से तोड़ सकता है। तमिलनाडु इसका एक उदाहरण है। सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक वर्चस्व को खत्म करना आदिवासीयत से भरे बुद्धिजीवियों का काम है। आदिवासी मूल्यों से परिपूर्ण सोच और चिंतन से यह काम भी एक दशक की अवधि में ही किया जा सकता है, लेकिन इसके पूर्व हर तरह के वर्चस्ववाद को चिन्हित, रेखांकित और  विश्लेषण किया जाए । जनचर्चा के माध्यम से वैकल्पिक आदिवासी मॉडल रखा जाए। जागरूकता बढ़ाने का एक विशाल अभियान छेड़ा जाए । इसके लिए बुद्धिजीवियों की एक विशाल फौज चाहिए। समाज को बड़ी मात्रा में बुद्धिजीवियों के उत्पादन करने का रास्ता निकालना होगा।

आदिवासी भाषाएँ, संस्कृति, जीवन-मूल्य,  सोच, दर्शन और परंपराएँ इस देश की मौलिक विरासत है। इनकी विलुप्ति सम्पूर्ण आदिवासी जीवन धारा की मृत्यृ होगी। इसे बचाने के लिए हमें अपनी सोच, चिंतन, जीवन और समाज में इसे जगह देना होगा। विशाल भारतीय समाज में विविधता और बहुलता बनी रही इसके लिए तो खुद आदिवासी समाज को ही आदिवासीयत के संरक्षण के लिए नयी सोच के साथ आगे आना होगा। बाहरी वर्चस्ववाद का मुकाबला अपनी भाषाओं, संस्कृतियों, परंपराओं, सोच-विचार, विश्वास, मूल्य, कल्पना-परिकल्पना, आदर्श, व्यवहार को बचा कर ही किया जा सकता है।

 

Ayurveda industry to tie up with farmers

Farmers, tribes will sell raw material to the industry in an open market, avoiding middlemen

The Ayurveda industry is embarking on an initiative to link herbal drug manufacturing units with tribal councils and farmers, to eliminate middlemen and ensure the supply of raw material through sustainable exploitation of medicinal plant resources.

Piloted by Care Keralam, (Confederation for Ayurvedic Renaissance-Keralam Limited), the industry body of herbal product manufacturers in the State, the project involves a mandi (open market) system where farmers and tribes can sell their produce directly to the industry. It also proposes a buyback agreement between the farmers and the industry.

Support mechanism

“The mechanism will help avoid fleecing by middlemen and the cultivators will be assured of fair price, prompt payment and marketing support,” says Tito Thomas, Senior Manager, Medicinal Plants Promotion Centre, Care Keralam.

“Integrating the cultivation, procurement and distribution systems is key to the success of the scheme.”

Planning committee

A planning committee comprising representatives of the industry, farmers and experts has been proposed to ensure a support price mechanism and a sustainable distribution network.

Pointing out that unsustainable exploitation had led to the disappearance of many medicinal plant species from the areas bordering forests, Mr. Thomas said a distributed system of procurement would ensure availability and prevent price fluctuations.

The concept note adds that collection of herbs from forest areas would also help avoid quality issues caused by pesticide and mercury contamination in farmed herbs.

In a communication to member units, Care Keralam has outlined steps to attract tribal councils and farmers to the initiative by supporting welfare programmes.

Rift in Jharkhand BJP over domicile policy

The domicile policy in Jharkhand seems to have caused a rift in the ranks of the ruling Bharatiya Janata Party (BJP) in the State.

According to the notified policy, which was announced by Chief Minister Raghubar Das in April, anyone living in the State for 30 years and possessing immovable assets will be considered a resident of Jharkhand. However, a section of BJP MPs feels that the 30-year criterion is too harsh while others think that more stringent conditions are needed.

Opinion seems to be sharply divided on the issue.

While some leaders said that those who have been living in Jharkhand since its creation should be accommodated, tribal Mahto leaders have demanded that land records must be made mandatory to ensure that outsiders do not get any job in the State. Under the policy, the third and fourth grade jobs have been reserved for the tribal and indigenous people for the next 10 years at the district level.

Letter to Governor

In a letter written to Jharkhand Governor Draupadi Murmu on April 29, four BJP MPs have demanded that the domicile policy must be changed to assuage the tribals of Jharkhand.

Signed by Ranchi Lok Sabha MP Ram Tahal Choudhary, Khuti MP Karia Munda, Jamshedpur MP Vidyut Baran Mahto and Chaibasa MP Laxman Gilua, the letter stated that the domicile policy has caused discontent among the Adivasis and Moolvasis of the State.

“The domicile policy has been announced after a long wait. There are several shortcomings in the policy. The policy is being opposed by several parties and some changes have been demanded. Discontent is rising among the Adivasis and Moolvasis of the State,” the letter stated.

The Opposition parties have already red-flagged the policy. Even the All Jharkhand Students Union (AJSU), which is a partner in the ruling alliance, has also opposed certain conditions of the policy. However, the chief minister on Tuesday ruled out any change in the domicile policy, which has irked several BJP legislators.

“The chief minister’s statement on Tuesday is unfortunate. The State was formed for the people living in Jharkhand for a long time and who were exploited by the outsiders. The last land record should be a criterion of the domicile policy,” a Mahto leader told IANS.

However, there are those who think that Jharkhand’s domicile policy must be in tune with that of states like Chhattisgarh and Uttarakhand where one has to be a resident for 10 years to seek domicile status. –Courtesy IANS

 

No time-frame for ST status to 6 communities

 NEW DELHI, May 4 – Clarifying that grant of Schedule Tribe (ST) to the six communities is being processed, the Centre has, however, denied that it is considering any proposal to accord the same within a specific time-frame.

“No, the Ministry of Tribal Affairs has not declared that the issue of giving ST status to six ethnic groups of Assam, including Koch-Rajbongshis, Chutias, Tai Ahoms, Morans, Motoks and Tea Tribes, will be done within six months.”

“The Government of India has laid-down modalities for inclusion in, exclusion from and modification in the Orders specifying list of STs. According to these modalities, proposals for inclusion of the above six ethnic groups of Assam has been processed,” Minister of Tribal Affairs Jual Oram said in a Rajya Sabha reply to a question by Ripun Bora.

 

Congress to campaign against diluting forest laws

NEW DELHI, Jan 29, 2016, DHNS:
The Congress is planning to launch a national campaign against the Modi government for diluting forest laws. The party claims that dilution of laws has snatched away the rights of tribals across the country.

Congress vice president Rahul Gandhi will spearhead the year-long campaign against the Centre’s attempts to “weaken” UPA’s flagship Forest Rights Act (FRA) that had empowered tribal hamlets by giving them rights to sell forest produce.

The FRA campaign will be on the lines of the nationwide protest launched against the amendments to the Land Acquisition Act, which were later shelved by the Modi government. Senior Congress spokesman Jairam Ramesh accused the Modi government of issuing guidelines to privatise degraded forests, diverting forest lands without consent of village councils for various projects and carrying out massive plantation in tribal lands.

“These moves have greatly affected the early gains made by the Forest Rights Act in empowering the tribals and even halted the process of implementation in many states,” said Ramesh, who played a key role in enacting the law during UPA-I.

Rahul will also commemorate 10 years of another UPA flagship initiative – the rural jobs scheme NREGA – by visitng a village in Anantpur district of Telangana where it was launched by the then prime minister Manmohan Singh.

ACB Raids Tribal Welfare Hostel

SRIKAKULAM: Following several complaints,  Anti Corruption Bureau (ACB) sleuths led by its DSP Ranga Raju conducted surprise checks in the tribal welfare boys hostel in the official colony here on Friday. The ACB officials found that there were 200 inmates in the hostel.

However, the warden is maintaining the records with 308 inmates. They also found that stocks of essential commodities were not matching with the figures in the records. The officials also interacted with students.

On the occasion the DSP said that they would submit a report to the higher officials.