2021 तक सबको हिंदू बना देंगे-धर्म जागरण समिति

नेह इंदवार

CAA, NRC और NPR मोदी सरकार का देश के लिए बनाए गए विकास कार्यक्रम नहीं है। बल्कि यह विशुद्ध राष्टीय स्वयं सेवक संघ का एजेंडा है। मोदी सरकार तो उसे बस जी-जान से लागू करने की कोशिश कर रही है।

इसी एजेंडे को लागू करने के लिए लोकसभा चुनाव में ईवीएम का जबरदस्त खेल किया गया। ईवीएम के खेल में देश के कुछ चुनिंदा पूँजीपतियों का सक्रिय सहयोग था, जिसके फलस्वरूप उन्हें देश के अधिकतर संसाधनों पर कब्जा दिलाने का काम खूब जोरशोर से किया जा रहा है।

CAA, NRC और NPR की पृष्टभूमि को समझने के लिए नीचे शेयर किए गए “आजतक” के वीडियो को ध्यान से देखें। हो सके तो उसे डाउनलोड कर लें, क्योंकि उसे डीलिट किया जा सकता है।

2014 में ही धर्म जागरण समिति ने धर्मांतरण के मुद्दे को तूल देते हुए कहा था कि ’21 दिसंबर 2021 तक देश के सभी मुसलमानों और ईसाइयों को हिंदू बना दिया जाएगा. यही नहीं, राजेश्वर सिंह ने यह भी कहा था कि मुसलमानों और ईसाइयों को देश में रहने का हक भी नहीं है और 2021 तक इन्हें देश से निकाल दिया जाएगा। राजेश्वर सिंह किनकी ओर से बयान जारी कर रहा था ? उनके बयान के पीछे कौन से तत्व काम कर रहे थे ?

बकौल (aajtak.in [Edited By: महुआ बोस]
नई दिल्ली, 18 दिसंबर 2014, अपडेटेड 13:43 IST) लिंक https://aajtak.intoday.in/…/will-finish-christianity-and-is…
2014 के अगस्त में धर्म जागरण समिति और बजरंग दल ने मिल कर अलीगढ़ में 72 लोगों को ईसाई से और 8 दिसंबर 2014 को आगरा में 200 मुसलमानों की हिंदू धर्म में वापसी कराई थी। खबरों में इन संगठनों को आरएसएस का अनुषंगी बताया गया है।

इसका मतलब है कि CAA, NRC और NPR जैसे कार्यक्रमों का खाका बहुत दिनों से बनाई जा रही थी। इस पर काफी माथा-पच्ची की गई है। विशेषज्ञों की सहायता ली गई है। मतलब षड़यंत्र में सैकड़ों लोग शामिल है। ऐसे तमाम षड़यंत्रों का एक पहलू आर्थिक लाभ या लूट और अपनी जमींदारी स्थापना करना जरूर होता है। ऐसा लगता है वर्तमान लोकसभा कार्यकाल को इसके लिए अंतिम समयसीमा निर्धारित किया गया है। इसके लिए खरबपतियों से सहायता मांगी गई और ईवीएम के रास्ते इस लक्ष्य तक की दूरी की यात्रा निष्कंटक पूरी की गई। इसका मतलब यह है कि जैसे-जैसे CAA, NRC और NPR के कार्य या अफरा तफरी को बढ़ाया जाएगा, सरकारी और राष्ट्रीय संपदा की लूट भी बढ़ती जाएगी, और लक्षित हिंदू राष्ट्र में अघोषित रूप से देश के एक दर्जन पूँजीपति देश के मालिक भी बन जाएँगे। कोई एनर्जी सेक्टर पर कब्जा कर लेगा, कोई उत्पादन और वितरण पर तो कोई रक्षा और वैज्ञानिक विकास के तामझाम पर। सरकारी उद्यमशीलता और PSUs को खत्म कर दिया जाएगा और राष्ट्रीय एकाधिकार की ऐसी व्यवस्था तैयार कर ली जाएगी, कि कोई व्यक्ति तो क्या, कोई भी संगठन या आंदोलन इन व्यवस्थाओं को चुनौती नहीं दे सकेगा।

मतलब विराट हिंदू जनसंख्या दर्जन भर पूँजीपतियों के द्वारा परोक्ष रूप से शासित होगा। देश में सामंतवाद, राजा-राजवाड़े के राज फिर से फूनगियों में उग जाएगी और हिंदू जनता मंदिरों में भजन गाएगी या इन पूँजीपतियों के रहमो-करम पर जिंदगी जीएगी। पूँजीपतियों की लूट में आम जनता रोड़ा न बनें इसके लिए फिलहाल उन्हें हिन्दुत्व का लालीपोप चूसने के लिए दिया गया है। CAA, NRC और NPR के सपोर्ट में आकर जनता लालीपोप चूसती हुई दीख भी रही है।

गैर हिन्दू को हिंदू बनाने के लिए नागरिकता का मुद्दा एक तलवार है। वर्तमान आधुनिक राजनैतिक व्यवस्था में पूरे विश्व में कोई भी व्यक्ति जानवरों की तरह नागरिकविहीन मनुष्य नहीं हो सकता है। इस अति अनिवार्य नागरिकता के मुद्दे को ही धर्म की पोंगापंथी लक्ष्य को पूरा करने के लिए हथियार बनाया गया है। यह अत्यंत सोची-समझी चाल है। जाहिर है कि यह खतरनाक स्तर की बदमाशी, निकृष्टता, बेवकूफी और मानव विरोधी सोच पर आधारित है। इस विचारधारा में मेरा धर्म और संस्कृति ही श्रेष्ठ है जैसी झूठी अवधारणा गुंफित है। जबकि वास्तविकता तो यह है कि धर्म संस्कृति और उससे जुड़े विचार कभी एक से नहीं रहते हैं और उसमें निरंतर परिमर्जन की प्रक्रिया चलती रहती है। लेकिन साम्प्रदायिक सोच से नहाए लोगों को सिर्फ अपनी संकुचित सोच के वर्चस्व को बनाए रखने की धुन रहती है। चाहे इसके लिए कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।

तीन दिन पहले आई ग्लोबल लोकतंत्र सूचकांक की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में नागरिकों की आजादी की स्थिति एक साल में कम हुई है। लोकतांत्रिक सूची में यह गिरावट देश में नागरिक स्वतंत्रता के ह्रास के कारण आई है। सूची में चीन 153वें स्थान पर है। नार्वे शीर्ष पर व उत्तर कोरिया सबसे नीचे है। सूचकांक सरकार का कामकाज, चुनाव प्रक्रिया व बहुलतावाद, राजनीतिक भागीदारी, राजनीतिक संस्कृति और नागरिक स्वतंत्रता पर आधारित है।

यह रिपोर्ट बहुत कुछ कहता है। भारत बहुलतावादी देश है और लोकतंत्र और आजादी भारत की रीढ़ की हड्डी है। रीढ़ के कमजोर होने का मतलब आजादी और लोकतांत्रिक मूल्यों को धारण करने वाली सरकार, मीडिया, संसदीय परंपरा, न्याय प्रणालियों का कमजोर होना है। ये सूचकांक बहुत खराब स्थिति को इंगित करता है। मतलब यही है कि देश कुछ लोगों की धार्मिक पोंगापंथी की जिद्द से चरमरा रहा है और यही हाल रहा तो एक दिन भरभरा कर गिर जाएगा। तब स्थिति अफ्रीका और मिडिल इस्ट की किसी देश के जैसे हो जाएगा, और विश्व की तीसरी आर्थिक और मिलिटरी शक्ति होने के ख्वाब हवा में विलीन हो जाएँगे।

भारत में चल रहे वर्तमान संघर्ष के केन्द्रीय भाग में, मूल रूप में आस्तिकों के मध्य धर्म और संस्कृति का संघर्ष है। एक आस्तिक विचारधारा दूसरे आस्तिक विचारधारा को अपना दुश्मन समझता है और उसे कमजोर करने, वजूद से मिटा देने के लिए रास्ते तलाशता रहता है। आस्तिकों की इस लड़ाई में आध्यत्मिकता बिल्कुल नहीं है। धर्म और पोंगापंथी के इन रणनीतिक और संघर्ष में धार्मिक कट्टरपन ही एक दूसरे को लड़ाई के लिए उकसाता है। इस संघर्ष और दुश्मनी को विज्ञान और पॉपुलर कल्चर के विचारधारा से नष्ट किया जा सकता है। लेकिन ऐसी सोच देश में कितने के पास है ?

आस्तिकों (बिल्लियों) की लड़ाई में पूँजीपति (बंदर) अदूरदर्शी नेताओं, बाबुओं के सहारे पूरे देश के संसाधन, लोकतंत्र, आजादी, मानवीय और नागरिक अधिकारों को खा जाएँगे और फिर बिल्लीयों का झूँड़ अत्यंत शक्तिशाली बने बंदरों को निरीह आँखों से ताकने के सिवाय कुछ नहीं कर पाएँगे।

https://aajtak.intoday.in/video/i-will-make-everyone-hindu-says-rajeshwar-singh-1-792031.html?fbclid=IwAR1l0bNDQrIJHXR2gAp5GtWpLZKY_McNGAUlUKEfG0p_RccGkfJCAyRmgaU

आदिवासियों के साथ ममता सरकार का सौतेला व्यवहार

नेह इंदवार

बकौल उत्तरबंग संबाद (23 जनवरी 2020) ममता दीदी ने पहाड़ में डेवलपमेंट बोर्ड्स के लिए 2014-2017 के बीच लेप्चा, तमांग, शेरपा, मंगर, दमई, गुरूँग, कामी सहित 15 विकास बोर्ड्स को 480 करोड़ रूपये उपलब्ध कराया :- लेप्चा विकास बोर्ड- 130 करोड़, तमांग विकास बोर्ड 75 करोड़ सहित अन्य विकास बोर्ड को 25 से 30 करोड़ रूपये उपलब्ध कराया। इनमें से लेप्चा विकास बोर्ड के कार्यकलापों को छोड़कर अन्य विकास बोर्ड के कार्यकलापों पर अनेक प्रश्न चिह्न उठे हैं। इनमें से अधिकतर ने सरकार को Utilization Certificate अर्थात् कार्य सम्पन्न हुए ऐसा प्रमाण-पत्र जमा नहीं दिए हैं और सरकार का कहना है कि जब तक उसे यह प्रमाण-पत्र नहीं प्राप्त होगा, वह इन बोर्ड्स को और फण्ड उपलब्ध नहीं कराएगी।
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हम सरकार और पहाड़ के बोर्ड्स के बीच के मामलों में कुछ नहीं बोलेंगे। लेकिन डुवार्स के साथ सरकार का सौतेला व्यवहार बहुत स्पष्ट हो चला है। डुवार्स के लेप्चा, तमांग, शेरपा, मंगर, दमई, गुरूँग, कामी सहित 15 समुदायों को इन विकास बोर्ड्स के पैसों का कोई हिस्सा मिला या नहीं यह एक बड़ा प्रश्न है। उपरोक्त कई समुदायों में महज कुछ हजार ही परिवार हैं। उन परिवारों को इन फण्ड्स में से हिस्सा मिला या नहीं यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। कृपया आपलोग आरटीआई से ऐसे लोगों की सूची प्राप्त करें जिन्हें डुवार्स में उन पैसों में हिस्सेदारी मिली है।
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लेकिन बहुत बड़ा प्रश्न है कि सरकार ने क्यों पश्चिम बंगल आदिवासी विकास बोर्ड को नाममात्र का फण्ड उपलब्ध कराया ? पश्चिम बंगाल विकास बोर्ड को राज्य के 50 लाख आदिवासियों के लिए महज 5 करोड़ का फण्ड उपलब्ध कराया जाता था। लेकिन पहाड़ के विकास बोर्ड को इससे दुगुणी, तिगुणी फण्ड दिया जाता रहा है। लेकिन अब तो वह भी नसीब नहीं हो रहा है। यह स्पष्ट है कि डुवार्स-तराई के आदिवासियों के साथ सरकार जानबूझ कर सौतेला व्यवहार करती है। यह सिर्फ मामता सरकार की बात नहीं है। बल्कि हर सरकार ने यही किया है। लेकिन आदिवासी नेता अलग राज्य के मुद्दे या वोट के मुद्दे पर कोलकाता के नेताओं का ही समर्थन करते रहे हैं। लेकिन बदले में उन्हें पिछवाड़े में सरकार की लात मिलती रही है।
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सवाल है कि सरकार पहाड़ के विकास बोर्ड्स पर क्यों अधिक पैसा लुटाती है और डुवार्स तराई के विकास बोर्ड को पैसों के लिए तरसाती है? इसका एक ही उत्तर है, वह है पहाड़ के लोग अधिक शिक्षित हैं और वे अपने अधिकारों के लिए आंदोलित रहते हैं और अधिकार प्राप्ति के लिए अलग राज्य की मांग उठाते रहते हैं। पश्चिम बंगाल सरकार सिर्फ अलग राज्य की मांग की एकता को तोड़ने के लिए ही सरकारी पैसों को पहाड़ पर लुटा रही है। यदि डुवार्स में भी अलग राज्य की मांग की जाएगी तो जाहिर है डुवार्स के लोगों के उपर भी ममता या अन्य की ममता की बारिश होगी।
.🍀🌲कोलकाता की सरकार की पहली प्राथमिकता बंगाल सरकार में कोलकाता वासियों की वर्चस्व बनाए रखनने की है। वह चाय बागान के गैर-बंगला भाषी जनता को बंगाल की स्वाभाविक नागरिक नहीं सकती है। यह हजारों बार स्पष्ट हो चुका है। यह सरकार कितनी साम्प्रदायिक और जातिवादी है यह इस बात से भी स्पष्ट हो चुका है कि टी टूरिज्म के लिए एक दो पूँजीपतियों की मांग पर तुरंत कार्रवाई करते हुई टी टूरिज्म के लिए नई नीति लाई और इसमें उन मांगों को भी शामिल कर ली, जिसकी मांग ही किसी ने नहीं उठाया था। लेकिन चाय बागान मजदूरों के वेतन वृद्धि को चार साल में 14 बार मिटिंग करके भी ठण्डे बस्ते में रखा हुआ है। लोकसभा चुनाव में खुद ममता दीदी ने पाँच रैली में चाय मजदूरों को आवासीय पट्टा देने की घोषणा की, लेकिन वह तो केन्द्र सरकार के मोदी से भी बड़ा जुमलाबाज निकली।
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ममता सरकार ने टी टूरिज्म से चाय मजदूरों को चाय में डुबी हुई मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दी है और उन्हें टी टूरिज्म का कोई भी लाभ देने से पूरी तरह वंचित कर दी है। चाय मजदूर केवल टूरिस्टों के खिदमद करके या उनके सामने नाचनिया बन के ही कुछ भीख में पैसा कमा सकते हैं, बाकि उनके लिए कहीं कोई गुंजाईश नहीं रखी गई है। टी टूरिज्म में कैसे उनके साथ सौतेला व्यवहार किया गया, यह इतिहास में लिखा जाएगा। यह विकास बोर्ड में दिए जाने वाले 25-30 करोड़ की तरह मामूली बात नहीं है। बल्कि इसका वित्तीय असर लम्बे अरसे में खरबों रूपये का होगा। टी टूरिज्म चाय मजदूरों के शोषण का एक नया जाल साबित होगा।

सरकार ने जारी किया टी टूरिज्म नोटिफिकेशन

                                 नेह इंदवार

पश्चिम बंगाल सरकार ने टी टूरिज्म पर नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। इस विषय पर कुछ माह पहले लिखा हुआ एक लेख को फिर से शेयर कर रहा हूँ, ताकि इस विषय पर चर्चा को ताजा किया जा सके। ममता दीदी की सरकार ने सह्रदयता दिखा कर उन विषयों को भी टी टूरिज्म नीति में शामिल कर दिया है, जिनकी मांग किसी ने नहीं की थी। अब सवाल यह है कि जो बागान प्रबंधन चाय बागान में होटल आदि बनाएँगे, क्या वे बागान में लॉक आउट घोषण करेंगे तो क्या किसी चाय बागान में चल रहे अन्य उद्योग में भी लॉक आउट की घोषणा अपने आप हो जाएगी ? सवाल यह भी है कि एक चाय बागान प्रबंधन के अधीन लीज जमीन में क्या होटल आदि किसी अन्य कंपनी के नाम पर रजिस्ट्री की जाएगी ? यदि सरकार किसी अन्य कंपनी के नाम पर होटल खोलने देगी तो क्या होटल की जमीन को किसी अन्य नाम पर हस्तांतरित की जाएगी ? आखिर सरकार ने टी टूरिज्म के नाम में मजदूरों को अपने गृह आवास के खाली पड़ी जमीन, आंगन, सब्जी बारी में होटल या गेस्ट हाउस बनाने की अनुमति देने को क्यों शामिल नहीं किया ? मजदूर कोऑपरेटिव बना कर भी तो लॉज, होटल चला सकते हैं। उसकी अनुमति क्यों नहीं दी गई ? तो क्या यह टी टूरिज्म चाय मजदूर को होटल मजदूर बनाने की नई नीति है ? इन होटलों में 20 प्रतिशत कर्मचारी बाहर के होंगे तो उन्हें स्थायी रूप से बसाने की नीति भी मंजूर की जाएगी ? आखिर 80 प्रतिशत कर्मचारी के रूप में चाय मजदूर क्या-क्या काम करेंगे और उन्हें कौन सा वेतन दिया जाएगा ? सैकड़ों सवाल है। फिलहाल आपलोग इस विषय पर न्यूज क्लिप को पढ़ें और अपना कमेंट्स दें। आखिर यह टी टूरिज्म किनके हित में बनाई गई है ? मेरे पुराने लेख को पढ़ने के लिए नीचे के लिंक को क्लिक करें।https://madhubaganiar.wordpress.com/2019/11/10/%e0%a4%9f%e0%a5%80-%e0%a4%9f%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%af-%e0%a4%ae%e0%a4%9c%e0%a4%a6%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87/?fbclid=IwAR2AybqEpH966epl3BIY_oWRiPWZd1CRi9oNnADTJ1-NPyFg1tHyZi_5E-E

TEA TOURISM NEWS.

ईश्वर के नाम पर न दें धन-दौलत दान में

नेह इंदवार 

भक्तों द्वारा पूजालयों-प्रार्थनालयों में जाकर ईश्वर को रूपये पैसे धन दौलत का दान देना ईश्वर के गला पर जोरदार थप्पड़ मारने के बराबर है। यह दान-दक्षिणा का दिखावटीपन दिखाता है कि आप कितने घमंडी और जाहिल हैं, जो सम्पूर्ण विश्व के मालिक को थोड़े से रूपये-पैसे दान देकर अपनी तुच्छता-घटियापन दिखा रहे हैं। यह आपकी तुच्छ सोच और व्यवहार को बताता है कि आप अपने हद दर्जे के भोलेपन (या कमीनापन) से ऐसी शक्ति को दान देने की कोशिश कर रहे हैं, जो यूनिवर्स के मालिक है। सीधे-सीधे यह यूनिवर्सल के मालिक की बेईज्जती है और उसे अपने से नीचे दिखाने की आपकी अक्षम्य चेष्टा है। जिस सर्वशक्तिमान से आप खुद गिड़गिड़ाकर भीख मांग रहे हैं, उसे ही भीख और घुस देने की चेष्टा कर रहे हैं। यह कितना हास्यस्पद या अनैतिक है, इसे आप से बेहतर कौन समझ सकता है।
क्या ईश्वर कोई भिखारी है ? जिसे आपकी भीख की आवश्यकता है ? क्या धन-दौलत पाकर ईश्वर किसी मॉल या बाज़ार में खरीदारी करने जाएँगे ? क्या उन्हें आपकी तरह किसी सांसारिक चीज की जरूरत भी है ?

आप खुद सोचिए, तनिक विचार कीजिए, चिंतन-मनन कीजिए कि आप ईश्वर के नाम पर दान-दक्षिणा देकर खुद को या ईश्वर को क्या साबित करना चाहते हैं ? आप स्थापित लकीर की सोच से बाहर आकर स्वतंत्र दिमाग से गहरे रूप से चिंतन करें। यह आपके व्यक्तिगत नैतिक, मानसिक, आत्मिक जीवन से संबंधित है। आप रूपये-पैसे, धन-दौलत का दान देकर अनजाने में एक सर्वशक्तिमान, सर्वधन संपन्न शक्ति की कैसी तौहिन कर रहे हैं और उसका आपके आलौकिक या परलौकिक जीवन में क्या फल मिलता होगा ?

क्या इतने पैसों से आप आलौकिक-परलौकिक सुख-शांति-आनंद और स्वर्ग खरीद लेंगे ? क्या यह इतनी ही सस्ती है ?

यदि आप प्राकृतिक ईश्वर को अपना कुछ अमूल्य चीज ही समर्पित करना चाहते हैं तो वह आपके जन्म और मृत्यु के बीच का “समय” है। प्राकृतिक ने आपको जीने का एक निश्चित समय दिया है और उस “समय” से अधिक आपके जीवन में कोई भी अमूल्य और महत्वपूर्ण नहीं है। आपको प्राकृतिक के द्वारा प्रदत्त समय से न एक पल अधिक मिलेगा और न एक पल कम। यदि आप ईश्वर को कुछ समर्पित करना ही चाहते हैं तो अपने समय को उसे अर्पित करें। आंख बंद करके ईश्वर से अपने चित्त को जोड़ें। अपने चित्त को इस लोक से निकाल कर उस लोक से जोड़े और अपने मन-ह्रदय को पवित्र बनाएँ और इस जुड़ाव को स्थायी बनाएँ। यही ईश्वर के प्रति सर्वश्रेष्ठ समर्पण और दान है।

आप कभी भी रूपये-पैसे, धन दौलत का दान न करें। ये हद दर्जे की सांसारिक वस्तुएँ हैं और इसका दान यह दिखाता है कि आप वास्तविक रूप से धार्मिक नहीं है, बल्कि आप निकृष्ठ रूप से सांसारिक, साम्प्रदायिक और स्वार्थी आदमी हैं और आपका यह दान ईश्वर को घुस देकर, उसे हेय समझ कर, उसे नीचा दिखा, उसे ठग-फूसला कर आप अपने सांसारिक क्षयदायी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए उसके प्यार और यूनिवर्सल संवेदनशीलपूर्ण मेकानिज्म का बेजा फायदा उठाना चाह रहे हैं। यह आपकी निष्कृष्ठ सोच, व्यवहार और मानसिक उद्देश्य को इंगति करता है।

इसका मतलब यह है कि आप संगठित रूप से धर्म के नाम पर सत्ता, वर्चस्व, प्रभाव बनाने रखने वाले बाज़ारू माफिया संगठनों को निरंतर समर्थन देना चाहते हैं। आप धर्म के नाम पर बनाए गए गैर-बराबरी, भेदभावमूलक, विभाजनकारी, शोषणकारी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए लगातार अपनी कमाई को इसमें निवेश करना चाहते हैं। इसका यह भी मतलब है कि प्राकृतिक रूप से ईश्वर के बनाए गए समतापूर्ण, दयामयी, करूणापूर्ण प्राकृतिक और स्वाभाविक मानवीय सामाजिक व्यवस्था को ध्वंस करने के कुचक्र में आप लगातार शामिल हैं। यह साबित करता है कि किसी रूपये-प्रेमी स्वार्थी धार्मिक राज सत्ता को बनाए रखने के लिए एक क्रूर धार्मिक सिपाही की भूमिका में आपने अपने जीवन को होम कर दिया हैं।

धर्म के नाम पर बचपन से ही थोपे हुए Domesticated mind and behavior की समीक्षा जरूर करें। ईश्वर को भिखारी, गरीब और धन-दौलत के भूखे होने के विचारों पर आधारित सोच-व्यवहार पर लगाम लगाएँ। धर्म के नाम पर बेवकूफ बन कर दान-दक्षिणा करने के कारण इसके दुरूपयोग करने वाले निठल्लों का एक मौजू-वर्ग हर जगह मौजूद है। आपके चिंतनहीन सोच विचार ने निठल्ले होकर विलासितापूर्ण जीवन जाने वाले एक परजीवी वर्ग का निर्माण किया है और वह आपको अधिक दान-दक्षिणा देने के लिए विभिन्न प्रकार से फूसलाता रहता है और तिकड़म भिड़ाता रहता है, ताकि आपकी कमाई से उनकी आय सदा बनी रहे और उनकी मौज-मस्ती, प्रभाव, वर्चस्व और सामंतवादी व्यवस्था में कोई व्यवधान उत्पन्न न हो।

मन के आंगन में ईश्वर और अलौकिकता

नेह इंदवार

ईश्वर से आराधना या संपर्क सिर्फ मानसिक आध्यत्मा के सहारे की जा सकती है। दुनिया के सभी धर्मों के सच्चे परम आध्यात्मिक गुरूओं ने इसी रास्ते से ही परलौकिकता को प्राप्त किया है। इस निमित्त अपने जाग्रत मन के सिवा किसी माध्यम की आवश्कता ही नहीं है। आप चाहें तो पूरी दुनिया के साहित्य को छान कर इसे देख सकते हैं।
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इसके लिए कोई धर्म, कोई मूर्ति, कोई धार्मिक स्थल, सामूहिक धार्मिक प्रार्थना या धार्मिक कर्मकांड की आवश्यकता तो बिल्कुल नहीं है, न ही इनके सहारे की आवश्यकता है।—— मन के बाहर के दिखावे के सारे धार्मिक कर्मकांड का मुख्य काम है धर्म के लिए पालतुकरण या डोमेस्टिकेशन की प्रकिया को मजबूत करना।—-अर्थात् किसी धर्म के लिए अनुयायियों के दिमाग को कुंद करके उसे अपने धर्म का स्थायी गुलाम बनाना।

ऐसी प्रकिया का मुख्य लक्ष्य है, अधिक से अधिक लोगों को अपने धर्म के साथ जोड़ कर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और बहुसंख्यक समर्थन वाला धार्मिक वर्चस्व स्थापित करना । विराट जनसंख्या पर अपने प्रभाव और धार्मिक सत्ता का सम्राज्य स्थापित करना और अथाह पैसा कमाना। ऐसे सभी धर्म मुख्य रूप से अपने धर्मभीरू अनुयायियों से धन अर्जन करने को सर्वोच्च स्थान देते हैं।

कोई धर्म कभी नहीं कहता है कि आप सिर्फ एक फूल चढ़ा कर अपना श्रद्धा सुमन अर्पित करें। यदि 100% धार्मिक अनुयायी यदि सिर्फ फूल चढाएँगे तो दिखावटी धर्मों का सारा तामझाम ही चरमरा कर गिर जाएगा। इसलिए धर्म के नाम पर होने वाले कमाई को वे कल्याणकारी-धन का नाम देते हैं। लेकिन दुनिया में धन क्या काम करता है, इसे कौन नहीं जानता है ?
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— धर्म के द्वारा बधिया (Sterlization) किए गए दिमाग में धर्म का वर्चस्व और जादू दिमाग में चढ कर बोलता है। यह जादू किसी भी शोषणवादी-सामंतवादी, आर्थिक मॉडल या राजनैतिक व्यवस्था के वर्चस्व से अधिक प्रभावशाली और लाभकारी होता है, क्योंकि धर्म के नशे में रत लोग खरीदे गए गुलाम से भी अधिक आज्ञाकारी और समर्पणकारी होते हैं। वे बिन पैसे खरीदे गुलाम ही होते हैं जो अपने धर्म के आकाओं से कोई प्रश्न नहीं पूछते हैं। प्रश्नवाचक और आलोचनात्मक प्रश्न पूछने की प्रकिया को वे सहन नहीं करते हैं।
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आलोचना-समालोचना या सुधारात्मक प्रश्न उनके लिए बिच्छू की डंक की तरह जहरीला होता है। आलोचना, समीक्षा से उनके धंधे, व्यापार और प्रभाव में मंदी आती है। इसीलिए ये धर्म को ईश्वर से जोड़ देने की चालाकी अपना लिए हैं, ताकि कोई इसके धंधे के बारे में असहज और तार्किक सवाल न उछाले। धर्म की आड़ में इनके खेल निराले होते हैं।
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धर्म के दीवारों के पीछे वे सबकुछ करते हैं लेकिन आलौकिकता से जुड़े आध्यत्मा नहीं। क्योंकि आध्यत्मा तो कहीं भी रह कर की जा सकती है। उसके लिए सिर्फ मन की गहराईयाँ और मन का ध्यान चाहिए। दिखावे के कर्मकांड नहीं।
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ये युगों से अपना एक ढोल जरूर बजाते हैं- वह है हमारा धर्म खतरे में है। हमें धर्म के दुश्मनों को खत्म करना है। इससे धर्म का बाज़ार अधिक मजबूती से कायम होता है और धर्म के शेयर मार्केट में धर्म के शेयर के मूल्य में उछाल आ जाता है और फिर धर्म के नाम पर दौलत खिंचती चली आती है।
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धर्म के गुलाम खूब मेहनत करके पैसा कमाते हैं और अपने कुछ कमाई धर्म के नाम पर नियमित रूप से धर्म के परवीजी (यों) को सौंप देते हैं और सोचते हैं कि वे ईश्वर को दान में दे रहे हैं।
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क्या ईश्वर को पैसे की जरूरत है ? ईश्वर पैसा लेकर कौन से दुकान से खरीदारी करता है ?

सच्चा नेता का चुनाव हो सिक्रेट बैलेट पेपर से

नेह इंदवार

#Dooars_Terai ध्यान दें।

पिछले सप्ताह के दौरान दुआर्स के चाय बागानों से संबंधित दो महत्वपूर्ण घटना घटी।

1. ग्रासमोर चाय बागान में मजदूरों ने सीक्रेट वोट के माध्यम से अपने मजदूर नेता का चुनाव किया। डुवार्स तराई के 200000 से अधिक स्थायी चाय बागानों मजदूरों के द्वारा सीक्रेट बैलेट पेपर के द्वारा अपना मनपसंद नेता चुनने का यह पहला और ऐतिहासिक घटना है।
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नेता चुनने की प्रक्रिया संवैधानिक और लोकतांत्रिक है तथा द ट्रेड यूनियन एक्ट 1926 के अनुरूप भी है। यहां उल्लेख करना उचित होगा कि यह मजदूरों के द्वारा लिया गया अपना स्वयं का निर्णय था।
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आमतौर से राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हुए ट्रेड यूनियन नेता अपने स्थानीय पिट्ठू नेता को मजदूरों के ऊपर थोप देते हैं और वे कभी भी मजदूरों को सीक्रेट बैलेट पेपर से अपने नेता का चुनाव करने का कोई विकल्प नहीं देते हैं।
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ग्रासमोर चाय बागान के मजदूरों को राजनीति पार्टी से जुड़े नेताओं ने खूब धोखा दिया है और उनके बागान को बार-बार बंद करने और खुलवाने का खेल खेला है। मजदूरों का सभी नेताओं के ऊपर से भरोसा उठ गया था इसलिए उन्होंने खुद नेतृत्व के गुण विकसित करके खुद अपना नेता का चुनाव करने का फैसला किया।
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यह ना सिर्फ ऐतिहासिक घटना है बल्कि डुवार्स के तमाम चाय बागानों में सेक्रेट बैलेट के द्वारा नेता का चुनाव करने का एक शुभारंभ घटना भी है।
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2. एक दूसरी महत्वपूर्ण घटना अलीपुरद्वार में घटी। यहां तृणमूल कांग्रेस के नव नियुक्त पार्टी संगठन पर्यवेक्षक श्री मलय घटक पार्टी का हाल-चाल जानने के लिए अलीपुर में पार्टी का एक बैठक किया। इस इस बैठक में अलीपुरद्वार के विधायक चक्रवर्ती और कुमार ग्राम के विधायक कुजूर के बीच में खासी गरमागरम बहस हो गई। चक्रवर्ती का कहना था कि कुजूर के मंत्री रहते चाह बागानों में कुछ भी काम नहीं करने के कारण लोकसभा में पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा। चक्रवर्ती के आरोप पर भड़क उठे कुजूर ने साफ कहा कि मंत्री के रूप में मैंने क्या काम किया था उसका स्पष्टीकरण चक्रवर्ती को देने के लिए बाध्य नहीं हूं ।
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वहीं जिला परिषद के मेंटर (?) के रूप में पहचान रखने वाले शर्मा ने कहा कि जिला परिषद में फंड नहीं आने के कारण विकास केव्यापक कार्य नहीं किए गए जिसके कारण वोटरों ने पार्टी को वोट नहीं दिया।
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सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात यह रही कि किसी भी पार्टी नेता ने मलय घटक को यह नहीं कहा कि “राज्य सरकार द्वारा न्यूनतम वेतन और चाह बागान मजदूरों को घर का पट्टा नहीं दिए जाने के कारण वोट नहीं मिला।” खुद मलय घटक राज्य के श्रम मंत्री हैं और उन्हीं के मंत्रालय के अधीन न्यूनतम वेतन और लैंड-पट्टा पर कानूनी निर्णय प्रक्रिया को शुरू करने का अधिकार है। किसी भी नेता में इतना साहस नहीं था कि वे मलय घटक के मंत्रालय के कामकाज और संवेदनशीलता पर कोई सवाल उठाएं या उन पर कोई आरोप लगाएँ। किसी पत्रकार ने भी उनसे इस विषय पर कोई सवाल नहीं पूछा। विपक्ष के विधायक और सांसद भी नहीं।
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इतना तो स्पष्ट हो गया कि तृणमूल के स्थानीय नेताओं के मन पर कहीं भी चाय मजदूरों के लिए न्यूनतम वेतन और लैंड पट्टा का कोई मुद्दा ही नहीं है। उन्हें अपने वादे और ममता दीदी के द्वारा चुनाव सभाओं में दिया गया वादा भी याद नहीं रहा है। कुल मिलाकर चाय मजदूर सिर्फ वोट और चंदे के लिए उपयोग में आने वाले तुच्छ वस्तु हैं।
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लेकिन रूकिए तुरंत निष्कर्ष ना निकालें। 23 मई 2019 को लोकसभा में शानदार जीत पाने के बाद में हमारे इलाके के सांसदों (अलीपुरद्वार, दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, कुचबिहार) ने केंद्रीय सरकार के वाणिज्य मंत्री, वित्त मंत्री, गृह मंत्री आदि से मुलाकात किए थे और लोकसभा के पटल से भी चाय बागान के बारे में अपनी बात रखे थे। हमारे सांसद ने आधार कार्ड में गलत नामों को ठीक करने के लिए, पीएफ राशि को जमा नहीं करने वालों के विरूद्ध कानूनी कदम उठाने की सार्वजनिक घोषणा की थी। लेकिन अब तक एक दो जगह को छोड़कर सभी जगह के आधार कार्ड में नाम के हिज्जे वैसे ही पड़े रह गए हैं जैसे वे पहले गलत थे। अब तक एक भी ऐसे लोगों की गिरफ्तारी नहीं हो पाई है जिन्होंने मजदूरों के पीएफ को सही ढंग से जमा नहीं किया है। मजदूरों के पीएफ को हड़पने वाले दलाल चक्रों के विरोध में भी अब तक कोई कार्य नहीं हो पाया है। हासीमारा सेंट्रल हॉस्पिटल को चालू करने की दिशा पर क्या प्रगति हुई है यह तो स्थानीय लोग ही जानते हैं। सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात तो यह है कि हमारे नए सांसदों ने भी चाय मजदूरों के न्यूनतम वेतन और घर के पट्टा के लिए अभी तक कोई भी निर्णायक आंदोलन नहीं किया है और न राज्य सरकार से विधि पूर्वक इसकी मांग की है।
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इन तमाम हालातों में रास्ता क्या बचता है ? चाय मजदूर जब तक राजनीतिक पार्टियों के थोपे हुए उम्मीदवारों को चुनाव में वोट देते रहेंगे किसी भी तरह का मजदूर हित में कोई निर्णायक काम कभी नहीं होगा।
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मजदूरों को ग्रासमोर चाय बागान के मजदूरों की तरह अपना नेता सीक्रेट बैलेट से खुद चुनना होगा तभी मजदूरों को सच्चा और ईमानदार नेता मिलेगा। नेह

बेवफ़ा मोबाइल

छतरी ☂️और मोबाइल 📱 बहुत बेवफ़ा होते हैं। कब बेवफ़ाई से साथ छोड़ दें, कहना मुश्किल है। अब तक कई छतरी और मोबाइल साथ छोड़ चुके हैं।
नयी नवेली दुल्हन की तरह जब ड्योढ़ी में आते हैं तो बहुत प्यार से उनका स्वागत किया जाता है। सिंगार पतार में कोई कंजूसी नहीं की जाती है। बढ़िया टेम्पर ग्लास और सुंदर कवर से सूरत पर चार चाँद लगाए जाते हैं। दिल के पास वाले पॉकेट में रख कर बार-बार टटोल लेते हैं कि वह वहीं तो है न !!
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न जाने कितनी बार सेल्फी ले ले कर सूरत की जाँच की जाती है कि थोबड़ा सही सलामत तो हैं ? कौन से एंगल से सूरत चॉकलेटी लगता है और कौन से एंगल से गब्बर सिंग ??
चाहे किसी को फोन करें न करें , परिचित-अपरिचतों का सैकड़ों नम्बर लेकर जरूर रखते हैं। कितने ही फोटो, ईमोजी और कविताओं का संग्रह बन जाता है। बचपन और जवानी के पलों को साकार और तरो-ताजा करने वाले नये-पुराने गीतों का संग्रह।
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भीड़ से परे अकेलेपन को डसने वाले पलों को हजारों दोस्तों से जोड़ने वाले सोशल मीडिया को आगोश में समेटने वाला और कहीं भी किसी भी मौके और जगह से अपनों से बात करवाने वाला मोबाइल कब अपना जीवन साथी बन जाता है पता नहीं चलता है। सोते वक्त, नींद से जागने पर हाथ मोबाइल को ही प्यार से फेर लेता है। किसी दिन, दिन भर मोबाइल से दूर रहें तो लगता है जिंदगी में कुछ-कुछ छूट सा गया है। शाम को घर आकर किसी से बात करें या न करें सबसे पहले मोबाइल की ओर ही ध्यान जाता है।
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ऐसी प्यारी चीज जब नये साल 2020 शुरू होने के एक घंटे पहले (रात 11 बजे) रूठ कर न जाने कहाँ चली गई तो मन खिन्न सा हो गया। यात्रा के बीच बेवफ़ाई करते हुए नये साल में साथ देने से मोबाइल ने चुपचाप इंकार कर दिया और कहाँ गया कुछ भी पता नहीं चला। रात के अंधेरे और उस पर लम्बे रास्ते में उसे ढूँढना ऐसा था मानो आसमान के खरबों तारों में से एक सुख-आनंद के रूठे छूपे तारे को ढूँढ़ लेना। खैर !!
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नव वर्ष की शुरुआत में बेवफाई के गीत गाना संभव नहीं था। नये साल और दशक में नये मोबाइल का साथ मिलेगा, यही सोचकर “बार-बार दिन ये आए,
बार-बार बार दिल ये गाए,
तुम आओ नया हर साल,
हैप्पी बर्थडे टू यू नया साल,
हैप्पी बर्थडे टू यू…
गाने लगा।
कई लोग मेरे गीत मे समाए सूर और ताल को सुन कर चौंक रहे थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि मैं नये साल की खुशियों में स्वागत गान कर रहा हूँ या पिछले साल और बिछड़े मोबाइल की याद में बिरह गान।
नोट-नया मोबाइल आ गया है दोस्तों। बस आपके नम्बर नहीं है मेरे पास। प्लीज समय निकाल कर वही पुराने नम्बर पर एक कॉल तो कीजिए या इन्बॉक्स करें। प्लीज 🙏.नेह इंदवार