चाय मजदूरों के लिए क्या है आंदोलन का विकल्प

बंगाल के चाय मजदूरों के लिए राज्य सरकार ने जनवरी 2018 में 17.50 रूपये वेतन की घोषणा है। सरकार इसे अंतरकालीन वेतन वृद्धि कह रही है। अब मजदूरों को 150 रूपये मिलेंगे और उनकी आर्थिक दशा सुधरेगी, यह कहना है सरकार का।
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पश्चिम बंगाल के चाय बागान के मजदूर पिछले पाँच साल से न्यूनतम अधिनियम 1948 के तहत आंदोलनरत हैं और ममता सरकार ने इस विषय पर विचार विमर्श करने के लिए एक सलाहकार समिति का गठन भी कर दिया है। समिति की आठ बार दिखावटी बैठक हो चुकी है। सरकार बीच-बीच में अंतरकालीन वेतन वृद्धि का प्रस्ताव पहले भी दे चुकी थी, जिसे मजदूरों ने ठूकरा दिया था।
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लेकिन नये साल के सर्द जनवरी में सरकार ने मजदूरों से बिना चर्चा किए ही अंतरकालीन मजदूरी के लिए 17.50 रूपये वृद्धि का आदेश जारी कर दिया है। सरकार का यह कदम मजदूरों को बेवकूफ बनाने के चालाकी भरा कदम के सिवाय और कुछ नहीं है। यह मजदूरों के प्रति सरकार की क्रुर सोच को भी दर्शाती है।
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आखिर सरकार चाहती क्या है ? वह न्यूनतम मजदूरी के लिए बनायी गई समिति को बंद करना चाहती है ? उसे निष्क्रिय करके मालिकों के मर्जी के मुताबिक न्यूनतम वेतन के मुहिम को सिर से खत्म करना चाहती है ?
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आर्थिक और सामाजिक शोषण का ताजमहल बन चुके चाय बागान में न्यूनतम वेतन मुहिम को चाय बागान मालिक फूटी आँख भी देखना नहीं चाहते हैं। वे हमेशा मजदूरों के शोषण के लिए नये-नये रास्ते तलाशते रहे हैं। आर्थिक शोषण को बनाए रखने के लिए वे मजदूर संघों के नेताओं, राजनैतिक दलों के नेताओं की मुट्ठी गर्म करके रखते रहे हैं और वे चाय बागानों में किसी भी सुधारात्मक कदमों को कामयाब होने से रोकने की पूरी कोशिश करते हैं।
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पश्चिम बंगाल सरकार ने जिस तरह न्यूनतम वेतन के लिए बनी समिति को नजरांदाज करते हुए अपनी ओर से एकतरफा कदम उठाते हुए अंतरकालीन मजदूरी देने के लिए आदेश जारी किया है, उससे यही प्रतीत होता है कि राज्य सरकार पूरी तरह चाय बागान मालिकों के चंगुल में फंस चुकी है और सरकार बागान मालिकों के दिशा-निर्देशन के अधीन काम कर रही है। माँ, मानुष और माटी के लिए काम करने का दावा करने वाली सरकार के लिए यह चुल्लू भर पानी में डुब मरने के बराबर शर्म की बात बन गयी है। क्यों शर्म से मरने तक के लिए सरकार तैयार है, लेकिन मजदूरों को न्याय देने के लिए तैयार नहीं ?
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जब कानून के मुताबिक गठित न्यूनतम वेतन सलाहकार समिति का गठन किया गया है तो सरकार को उसी सलाहकार समिति की बैठक हर सप्ताह बुला कर समस्या का समाधान निकालना चाहिए था। समिति के निर्णय को लागू करती। लेकिन वह ऐसा नहीं कर पायी, क्यों ?
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इस समिति की बैठक साल भर में एक दो बार की जाती है और जानबुझ कर षड़यंत्रपूर्वक समस्या को दीर्घकालीन सुस्त चाल का शिकार बनाया जा रहा है।
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यह सरकार की मजदूर विरोधी मंशा को स्पष्ट करता है। ऐसा लगता है प्रदेश का श्रम मंत्रालय चाय बागान मालिकों के मुनाफे लिए काम करने में व्यस्त है, या फिर इसके मंत्री और आईएएस अफसरों में इतनी काबिलियत नहीं है कि वे डेढ़ सौ साल से चल रहे शोषण के चक्र को खत्म करने लिए कोई ऐतिहासिक कदम उठाएँ।
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लगता है माँ माँटी मनुष्य का सरकार सामंतवादी मानसिकता से ग्रस्त लोगों की सरकार है जिसे राज्य के नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन, शोषण, अत्याचार, अनाचार, भेदभाव से कोई मतलब नहीं है। सरकार की आंख चाय बागानों में भारतीय संविधान के भाग तीन में उल्लेखित आर्टिकल्स 12 से 35 के धारावाहिक उल्लंघन पर बिल्कुल बंद है। सरकार की सारी मशीनरी चाय मजदूरों के साथ हो रहे लगातार भेदभाव और शोषण के बारे रिपोर्ट देने में असफल है।
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यह ऐसा भी हो सकता है कि सरकार चाय मजदूरों को शोषण को लगातार जारी रखने के लिए कृतसंकल्प हो और वे शोषण के नये-नये तरीके पर विचार-विमर्श करने में अपनी उर्जा लगा रही हो।
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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हर दो तीन महीने में उत्तर बंगाल की दौरा करतीं हैं। लेकिन वे चाय मजदूरों के मौलिक समस्याओं पर कभी भी बात नहीं करती है। यदि कभी सतही तौर से बात भी करती हैं तो गंभीर होकर कभी कोई कदम नहीं उठाती है। कोलकाता के सत्ताधारियों का चाय बागान मजदूरों के प्रति यह प्रतिकूल नजिरिया नया नहीं है। चाहे कोई भी पार्टी हो कलकत्ता में काबिज होने के बाद वे चाय बागान मालिकों से नये-नये तरीके से चंदा लेने की जुगाड़ में लग जाती है। चाय मजदूरों को वे बाहरी मानती है और वे उन पर अपनी भाषा, संस्कृति, प्रभाव, सामंती नीतियाँ थोपने में कभी भी पीछे नहीं रहते हैं। ममता सरकार का चरित्र भी इस दकियानुसी परंपरा और विचारधारा से अलग नहीं है।
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जब सरकार बिना सलाहकार समिति बनाए ही बीटीएफ (Bought Leaf factory) के मजदूरों के लिए न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के तहत वेतन निर्धारित करने का नोटिफिकेशन निकाल सकती है तो वह सलाहकार समिति के कार्यकाल का निर्धारण क्यों नहीं सकती है ? क्या उनके पास शक्ति नहीं है या इरादा नहीं है ? वह चाहे तो सलाहकार समिति में लेबर कोर्ट के न्यायाधीश को भी शामिल करके उसे जल्द फैसला करने के लिए कह सकता है। यदि समिति फैसला लेने में असफल रहती है तो वह मामले को खुद ही उच्च न्यायालय में ले जा सकती है। लेकिन वह किसी भी अन्य विकल्प को नहीं अपना रही है।
.आखिर वह किस मुख से चाय बागान मजदूरों का हितैशी होने का दावा करती है ?
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डुवार्स और तराई के दस लाख लोगों को मुर्ख बनाने के लिए सरकार दिखावटी काम कर रही है। वह चार पाँच करोड़ का दिखावटी काम करके वाहवाही लुटना चाहती है।
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क्या दो लाख लोगों के संवैधानिक अधिकारों का हनन करके बदले में सौ आदिवासी और नेपाली मजदूरों को घर बना कर देना बहुत बहादुरी का काम है ? क्या करम के नाम पर दो चार नदियों के किनारे चार-पाँच लाख रूपये खर्च करके विकास कार्य करना, दो चार मिटिंग रूम बना कर देना चाय मजदूरों के कल्याण के कार्य हैं ? मजदूरों के अरबों रूपये बकाया के बदले पाँच करोड़ रूपये की विकास राशि डुवार्स और तराई के लोगों के दिल जीतने के लिए बहुत बड़ी राशि है ? क्या जनता इतनी मुर्ख है ?
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क्या पच्चीस तीस लखपति और करोड़पतियों, जो अधिकतर कोलकाता, दिल्ली, मुंबई के व्यापारी हैं, के होटल, गेस्ट हाउस, गाड़ियों के लिए टूरिज्म की नीति बनाना डुवार्स और तराई का विकास है ?
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आज राष्ट्रपति को तीन लाख रूपये मिलते हैं। न्यूनतम वेतन पाने वाला सरकारी कर्मचारी का रोज का वेतन 15 सौ रूपये है। वहीं चाय मजदूरों को प्रोविडेंट फंड काट कर 119 रूपये मजदूरी मिलती है। माँ, मनुष्य माटी की सरकार किस तरह से चाय मजदूरों का कल्याण करना चाहती है और आखिर वह किसे सिर उठा कर इज्जत से जीना समझती है ?
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पिछले चार साल में मजदूरों को न्यूनतम वेतन नहीं मिलने से मजदूरों का करीबन 52 अरब रूपये चाय बागान मालिकों पर बकाया चढ़ गया है।
जो मालिक बोनस के पाँच, दस हजार रूपये को किश्त में चुकाने के लिए गिड़गिड़ता है वह प्रत्येक मजदूरों के दो-तीन लाख रूपये का बकाया कैसे चुकाएगा ? आखिर चाय मजदूरों के प्रति सरकार की वास्तविक नीति क्या है ? क्या सरकार कभी इस पर कोई श्वेत पत्र जारी करेगी ?
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सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों के कारण पिछले आठ दस साल में चाय बागानों की हालत खस्ता हो गयी है और मजदूरों को चाय बागान रोजगार के क्षेत्र न लग कर शोषण का सरकारी मान्यता प्राप्त क्षेत्र लगता है और धीरे-धीरे उनकी दिलचस्पी बागानों पर से खत्म होते जा रही है। लेकिन सामंतवादी मानसिकता के शिकार कोलकाता के सत्ताधारी नेता और अफसरों चैन की नींद सो रहे हैं।
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जब सरकार ही मजदूरों का शोषण करने के लिए कमर कस ली है तो मजदूरों के पास क्या-क्या विकल्प बचता है?
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मजदूर आंदोलन करेंगे, लेकिन सरकार के कानों में जूँ तक नहीं रेंगेगी। बस सरकार एक दो मिटिंग बुला कर लोगों को मुर्ख बनाने की कोशिश करेगी ?
मजदूर हड़ताल करेगी, लेकिन मालिक और सरकार इसे रविवार की छुट्टी की तरह स्वीकार कर लेगी?
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गेड मिटिंग करने से बागान मालिकों के चेहरे पर मुस्कान तैर जाते हैं। जानते हैं इसका कोई मतलब नहीं है, बस मजदूरों का गुस्सा निकल जाता है और एक नकली समाधान की आशा में मजदूर दूसरे दिन काम में ज्वाईन करते हैं।
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तृणमूल कांग्रेस पार्टी ने अधिकतर चाय बागानों के कार्यकर्ताओं को अपने पाले में कर लिए हैं, कुछ लोगों को कुछ सुविधाएँ दे दी गई हैं इसलिए कितना भी शोषण करो, भेदभाव करो, अन्याय करो, वोट तो बस उन्हें ही मिलेगा। जो तृणमूल से दूर हैं उन्हें किसी न किसी तरह से मना लिया जाएगा। आखिर मजदूर करेंगे क्या ? उन्हें न्यूनतम वेतन से वंचित करके उस रूपयों को चंदे के रूप में सत्ताधारी पार्टियों तक पहुँचाऩे की व्यवस्था कर ही लिया जाएगा।
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मुख्य बात है मजदूरों को न्यूनतम वेतन मिलने से उन्हें डीए भी मिलेगा। इससे उनके माली हालात में सुधार होगा और वे अपने बच्चों को हिंदी और अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में पढ़ाएँगे। इससे वे विकसित हो जाएँगे। उनका विकास रोकना है इसलिए उन्हें किसी भी तरह से कानूनन मान्यता प्राप्त मजदूरी न दिया जाए। उन्हें मजदूर बनाए रखे के लिए हर संभव काम किया जाए। उनके नेता तो एक दो हजार में बिकते हैं उन्हें खरीद लिया जाए। आखिर मजदूर क्या करेंगे, दूसरे राज्यों में जाएँगे, सूखी रोटी खाएँगे और चाय बागानों में काम करेंगे, कैसे भी हो यह उनसे कराया जाए, वे दूसरे राज्य के बासिंदें हैं, उनकी भाषा, संस्कृति अलग है और उनके विकास से राज्य के लोगों को कोई लेना देना नहीं है। मजदूरों के शोषण के पीछे यही असली कहानी है।
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लेकिन यदि मजदूर चाहें तो संघर्ष जारी रखा जा सकता है। राजनैतिक पार्टियों को बागानों से भगा दिया जाए। किसी को भी बागानों में मिटिंग न करने दिया जाए। सत्ताधारी पार्टी में शामिल तमाम लोगों का वोट होने तक सामाजिक बाहिष्कार किया जाए। चाय बागानों से तैयार चाय को बाहर भेजने से रोक दिया जाए। सत्ताधारी पार्टी के गुलाम बने स्थानीय और चाय बागान से जुड़े नेताओं को कोई भी मिटिंग न करने दिया जाए। बागानों को खुद चलाने के लिए कॉओपरेटिव की स्थापना की जाए। तमाम कानूनों के जानने के लिए मजदूरों द्वारा टास्कफोर्स बनाया जाए। लेबर कोर्ट और हाईकोर्ट में मामला दायर किया जाए। रोड और रेल को रोक दिया जाए। यदि सरकार अपनी रवैये में कोई परिवर्तन नहीं लाए और शोषण चक्र को जारी रखना चाहे तो जाहिर है कि पश्चिम बंगाल से अलग राज्य के लिए आंदोलन छेड़ा जाए।
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चाय मजदूरों का शत्रु ममता सरकार !

क्या  पश्चिम बंगाल में चाय मजदूरों का सबसे बड़ा शत्रु पश्चिम बंगाल का सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस बन रही है ?  क्या यह चाय मजदूरों को बाहरी मानती है और जितना मजदूरों के विरूद्ध में शोषण मूलक नीति बना सकती है या कदम उठा सकती है, बेशर्मी की हद तक जा कर उठा रही है ?
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उत्तर बंग सम्वाद के 10 जनवरी 2018 के समाचार यदि सही है तो यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि तृणमूल कांग्रेस पार्टी चाय मजदूरों पर अन्याय करने के लिए चाय बागान मालिकों से मिल गई है और वे मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी की मांग और उनके आंदोलनों को खत्म करने के लिए षड्यंत्र रच रही है।
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चाय मजदूर न्यूनतम मजदूरी के लिए 2013 से आंदोलनरत हैं। वे 2014 से लागू होने वाले समझौते की तारीख से कानून सम्मत न्यूनतम मजदूरी मांग रहे हैं । लेकिन उक्त अखबार के अनुसार पश्चिम बंगाल के श्रम मंत्री मलय घटक ने कहा है कि यदि न्यूनतम मजदूरी समझौता होता है तो मजदूर मजदूरों को “गत” अप्रैल से बकाया अर्थात् एरियर मिलेगा। क्या मलय घटक का “गत” अप्रैल का मतलब 2017 का अप्रैल है ?? क्या उन्हें मालूम नहीं है कि चाय मजदूर 2014 की अप्रैल से न्यूनतम मजदूरी के लिए संघर्षरत हैं ??

यदि मलय घटक का “गत अप्रैल”’ 2017 की अप्रैल है तो मजदूरों को कितना नुकसान होगा, क्या उन्हें मालूम है ?? आईए जरा हिसाब लगाते हैं —
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2014 के 1 अप्रैल को 300 रुपये मिले तो वर्तमान के 131 रूपये कट कर 269 रूपये प्रतिदिन बकाया बनता है। हर महीने में 26 दिन काम होता है मतलब 26×269= 6994 रूपये हर महीने। तीन साल में 36 महीने होते हैं। मतलब तीन साल का एरियर 36×6994=251784 रूपये होते हैं।
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डुवार्स तराई में दो लाख स्थायी मजदूर हैं । उनका कुल हिसाब कुछ यूँ होगा —
200000×251784 = 50356800000 रूपये।
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इस गणना में 2016 के फरवरी से बंद हुए राशन जो मजदूरी का ही एक भाग है और जो पूरे भारत में सभी को मिलने वाले राशन को, चाय मजदूरों को भी दिया जाना शुरू हुआ और बागान राशन तब से बंद है, के रूपयों में होने वाले गणना जो करीबन 600 रूपये होते हैं, को शामिल नहीं किया गया है।
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करीबन 51 अरब रूपयों से मजदूरों को वंचित करने की षड़यंत्र तृणमूल कांग्रेस रच रही है।
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अभी तक न्यूनतम वेतन पर आठ बार बैठक हो चुकी है। लेकिन कोई निर्णय नहीं हुआ है, क्योंकि सरकार मालिकों के साथ मिल गई है और वह कोई निर्णय नहीं लेना चाहती है।
कानूनन संविधान के अधिकार क्षेत्र में सरकार को उचित निर्णय लेने से कोई रोक नहीं सकता है। ये चाय मालिक किस खेत की मूली हैं ?? सरकार अपने संवैधानिक अधिकार के तहत चाय पती खरीद कर चाय बनाने वाले कारखानों में काम करने वाले मजदूरों के लिए पहले ही बिना किसी से बात किए न्यूनतम मजदूरी की घोषणा करके नोटिफिकेशन भी जारी कर चुकी है। वह सिर्फ आदिवासी और नेपाली मजदूरों के लिए अपने अधिकार का उपयोग नहीं करना चाहती है, क्योंकि वह उन्हें बाहरी मानती है और उनके शोषणचक्र को बनाए रखना चाहती है, ताकि वे विकास की राह में पीछे रहें।

सरकार की संविधानिक शक्ति क्या होती है ??

संवैधानिक शक्ति को प्रयोग करते हुए पश्चिम बंगाल का श्रम मंत्रालय ने दो दिन पूर्व चाय बागान मालिकों से कहा है कि वे अंतरकालीन मजदूरी के रूप में मजदूरों को रूपये 17.50 अधिक मजदूरी दें। यह उनका आदेश है, अनुरोध नहीं। वे इसका विरोध न्यायालय जाकर ही कर सकते हैं, यूँ ही इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
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ऐसा लगता है तृणमूल की नजर 51 अरब रूपये पर है, जिसे वे मजदूरों से छीन कर चंदे के रूप से मालिकों से लेगी!! यह मजदूरों की आर्थिक, सामाजिक हत्या होगी।
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. तृणमूल सरकार ने Company Social Responsibility के करोड़ों रूपये से भी मजदूरों को वंचित किया हुआ है। जबकि इस पैसे से मजदूरों का कायाकल्प हो सकता है। यह जानबूझ कर मजदूरों को घर का पट्टा नहीं दे रही है।
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क्या तृणमूल को आप गरीबों, माँ माटी की सरकार समझते हैं ???

टी बोर्ड के दिन गिनती के रह गए हैं

कोलकाता: कोलकाता में स्थित टी बोर्ड संस्थान के दिन गिनती के रह गए हैं। टी बोर्ड का मुख्यालय कोलकाता शहर का एक प्रमुख इमारत के रूप में अपनी पहचान कायम किया हुआ है। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने टी बोर्ड मुख्यालय को कोलकाता के ब्रेबोर्न रोड से गुवाहाटी में स्थानांतरित करने का पूरजोर विरोध किया था। स्थानांतरण करने में असफल होने के बाद भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने चाय बोर्ड को महज दो महीने में ही भंग करने का फैसला किया है।

केंद्र ने बोर्ड को दो या अधिक संस्थाओं में विभाजित करने और भारत की चाय व्यापारिक राजधानी कोलकाता से अपनी शासी निकाय स्थानांतरित करने की योजना को अंतिम रूप दे दिया है। बोर्ड के पहले गैर-आईएएस और गैर-कार्यकारी अध्यक्ष प्रभात कमल बेज़बरूआा, जो इसके ऑपरेशंस के आखिरी प्रमुख होंगे, ने कहा कि बोर्ड के दिन गिने चुने गए हैं क्योंकि केंद्र ने इसी वित्तीय वर्ष में चाय नियामक को अन्य कृषि बोर्डों के साथ मिलकर इसका विलय करने का फैसला किया है।

चाय एसोसिएशन ऑफ इंडिया (टीएआई) एजीएम के मौके पर उन्होंने कहा, “मैं सभी संभावनाओं के साथ चाय बोर्ड का आखिरी अध्यक्ष रहूंगा, क्योंकि केंद्र ने जितनी जल्दी हो सके अपने कार्यों को बंद करने की योजना तैयार की है।”

बेज़बरूआ के अनुमान के मुताबिक, वित्त मंत्रालय, 2016-17 से शुरू होने वाले तीन साल के लिए आवंटन में काफी कटौती की थी। चाय बोर्ड ने 800 करोड़ रुपये की मांग की, लेकिन उन्हें केवल 540 करोड़ रुपये दिए गए।

“वाणिज्य मंत्रालय के तहत “बागान निर्यात विकास एजेंसी” (पेडा) विपणन-पदोन्नति का हिस्सा है और चाय व्यवसाय के तकनीकी और कृषि पहलुओं की देखरेख के लिए कृषि मंत्रालय के तहत एक विशेष क्षेत्र का गठन किया जाएगा। यह छाता संगठन चाय, कॉफी और मसाले जैसे बागान फसलों के उत्पादन और निर्यात को बेहतर बनाने में मदद करेगा। “उन्होंने कहा कि अनुसंधान कार्य सीएसआईआर या आईसीएआर जैसे अन्य संगठनों द्वारा किया जा सकता है।

63 वर्ष के पुराने बोर्ड को खत्म करने की प्रक्रिया पहले से ही मंत्रालय के स्तर पर शुरू हो चुकी है और मौजूदा कर्मचारियों को जल्द पेड़ा या कृषि मंत्रालय में स्थानांतरित कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा, “वीआरएस की पेशकश नहीं की जाएगी क्योंकि टी बोर्ड के कई कर्मचारी एक या दो वर्षमें सेवानिवृत्त हो जाएंगे। बाकी कर्मचारियों को दोनों प्रस्तावित संस्थाओं में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।”

लेकिन बेज़बरूआ प्रतिष्ठित बोर्ड भवन के भाग्य पर केवल अटकलें लगा सकते हैं: “वाणिज्य मंत्रालय शायद इसका उपयोग चाय के प्रचार और विपणन कार्यों के लिए करेगा क्योंकि कोई भी मंत्रालय इस तरह के एक प्रमुख स्थान पर कार्यालय नहीं छोड़ना चाहेगा।”

                                                                                                                                            चाय बोर्ड को खत्म करने का मुद्दा पिछले दो दशकों से खबरों में आ रहा था। हालांकि वाणिज्य मंत्रालय इस समय इस मामले सक्रिय हो गया है।  , “लेकिन कर्मचारियों के भविष्य का सवाल अभी भी पीएमओ में लंबित है।” मिनिस्ट्री के एक सीनियर अधिकारी ने कहा।

 

चाय उद्योग को अधिक-विनियमित करने के लिए चाय बोर्ड की आलोचना करने में बेजबरूआ ने शब्दों कठोर शब्दों के प्रयोग में कोताही नहीं की। उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि कि टी बोर्ड ने उद्योग पर नियमों या नियंत्रणों का जो लगाम लगाया है, वह अस्थायी चरण है”। …नेह

Eating this fruit on empty stomach could kill you

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When a harmless fruit turns into a deadly killer.

Be wary before eating unripe lychees! (Source: Thinkstock Images)

The curious case of mysterious deaths in Muzaffarpur left most of the epidemic researchers and doctors puzzled. The number of the deceased seemed to be growing at a fast pace with no valid rhyme or reason.

Over the past three years, when summer was at its peak in mid-May, there were many instances of children waking up with convulsions, high fever and loud cries. Not just kids, young and healthy individuals used to complain of sudden seizures and inexplicably slip into a coma. As strange as it sounds, the problem would automatically stop from July onwards, with the onset of monsoon.

Some attributed it to heat stroke, others credited it to pest infections and pesticide poisoning. But, no one could solve the bizarre outbreak in India. Leaving no fixed pattern, it would strike any random child without showing any visible trace of symptom in his siblings or playmates.

Struggling to search for an explanation, Dr Rajesh Yadav, an investigator with the India Epidemic Intelligence Service, moved to the city of Muzaffarpur and closely observed the cycle of events for three long years. The reason has finally been unearthed, and it’s shocking.

On Tuesday, a joint investigation published by India’s National Center for Disease Control and the India office of the Centers for Disease Control and Prevention in Atlanta published a report identifying the cause of this phenomenon. Turns out, the otherwise harmless fruit, lychee, when consumed on an empty stomach by malnourished children leads to death.

In 2015, when health officials instructed parents to feed a healthy evening meal to their children instead of the fruit, the number of deaths subsequently dropped down to almost 50 per cent.

Here’s how they decoded the mystery deaths

Lack of white blood cells: The subjects used to suffer from an acute brain swelling also known as encephalopathy. Over many years of research, clinicians realised that many sick children did not have fever. An analysis of their spinal fluid showed that they didn’t have an elevated count of white blood cells, implying that their body was fighting infection.

Low blood sugar levels: Some children had extremely low levels of glucose, which meant they were twice as likely to die.

Ackee fruit connection: A conference call with colleagues in Atlanta led the researchers to be aware of a “Jamaican vomiting sickness”, which had similar symptoms like convulsions, mental illness and brain swelling. There was a certain link to it as east Muzaffarpur produces almost 70 per cent of India’s lychee harvest, and the fruit – akin to ackee – also has high levels of hypoglycin, and a similar toxin known as methylenecyclopropyl glycine, or MCPG. Children often used to eat the unripe lychees lying on the ground. Since everyone in the region ate lychees, no one previously connected the fruit with the illness or deaths.

Metabolic imbalance: A test to find out hypoglycin in urine revealed alarming levels in the affected kids.

The mystery was solved!

Based on these findings, families were asked to make sure the children had healthy meals and were made to reduce the consumption of lychees, specifically keeping away from unripe ones.

The takeaway for the rest of the world from this? Be wary before eating unripe lychees on an empty stomach!

 

एक शादीशुदा आदमी से पूछा गया सवाल
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“यदि आपकी सास और आप की पत्नी…
एक साथ बाघ के पिंजरे में गिर. जाएं…
तो आप किसे बचाएंगे…??”
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वो आदमी जोर से हंसा…😂
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हंसते-हंसते लोटपोट हो गया और बोला…😂😂😂😂😂😂
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“यह भी कोई पुछने की बात है…??😂
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मैं यकीनन बाघ को बचाऊँगा…😊
आखिर दुनिया में बाघ बचे ही कितने हैं…”!!!😁😜

Meghalaya BJP assures direct funding to tribal villages

SHILLONG, Dec 4 – BJP in Meghalaya on Friday assured direct funding to tribal villages in the State in the event of the party winning the by-elections in the two tribal autonomous district councils scheduled for December 13.

The BJP is contesting in all six council constituencies in the Khasi Hills Autonomous District Council and one in the Jaintia Hills Autonomous District Council.

“The party shall make serious efforts for the establishment of State Finance Commission which shall recommend measures about adequate funding to the villages with the participation of the ‘Dorbar Shnongs’ under the supervisions of the district councils,” State party president Shibun Lyngdoh said while launching the manifesto of the party at its office here.meghalya-valley

“We in Meghalaya have suffered a loss of hundreds of crores of rupees due to the lack of direct funding,” he said.

Slamming the ruling Congress, Lyngdoh said the party which had been in power at the Centre, the State and the district councils for so long, ‘have so far failed to provide constitutional recognition to the village councils resulting in these bodies becoming powerless’.

The by-poll was necessitated following the State Government passing an act last year prohibiting elected legislators from holding another elected post in the tribal councils. – Courtesy:PTI

 

Adivasis stage rail blockade for ST status

KOKRAJHAR, Dec 5 – Train service of the Northeastern Frontier Railway (NFR) via Fakiragram junction of Kokrajhar district was disrupted this morning for nearly five hours, including Rajdhani Express train, following a rail blockade at Kokrajhar Railway Station by the Adivasi National Convention Committee (ANCC).

ANCC, a conglomeration organisation of the ceasefire militant outfits, and other Adivasi organisations observed the blockade programme today demanding early granting of Scheduled Tribe (ST) status to the communities, implementation of Traditional Forest Dwellers Act, permanent allotment of land and land pattas to the tea garden workers in Assam and settlement of the demands of the ceasefire militant outfits of the Adivasi communities through political negotiation.

Hundreds of Adivasi people from various districts of Kokrajhar, Chirang, Dhubri, Bongaigaon etc., thronged the rail track with banners, festoons and placards to blockade which began from 6 am and shouted slogans for the fulfilment of their demands at the earliest.assam-rail-rocko-photo

 

ANCC president Boyal Hembrom, secretary Birsing Munda, AKSSA president Kamaleswar Toppo, among others, also joined the blockade programme.

The leaders have also alleged that both State and Central governments have been politicising over the issues of the Adavasi for a long time.

The blockade was later lifted at around 11.30 am after district administration headed by Kokrajhar Deputy Commissioner Bibakananda Choudhury assured them to arrange talks with the ANCC leaders to discuss their demands.

Several express trains were controlled at different railway stations in lower Assam and in North Bengal during the blockade period.Courtesy-TheAssamTribunal.