धर्म के रास्ते मानसिक साम्राज्यवाद

नेह अर्जुन इंदवार 

मितरों 🥰कल मैंने मानसिक साम्राज्यवाद पर एक पोस्ट डाला था। उसी की कड़ी पर यह दूसरा पोस्ट है। लम्बी लगे तो दो तीन बार में पढ़ लेना मितर।
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वर्तमान दुनिया में लागू किए गए नव-संविधान ने साम्राज्यवाद को कई तरह के शोषण का हथियार बताया और समानता के सिद्धांतों का प्रतिवादन किया। बहुमत के आधार पर लागू किए गए समानता के सिद्धांत वाले संविधान से अल्पसंख्यक धार्मिक वर्ग क्यों बिदकता है। इसे समझना मुश्किल नहीं।
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मध्यकाल के शासन सिद्धांत मूलतः धार्मिक सिद्धांत ही थे, जो धर्म के नाम पर सम्पत्ति के संचय को प्राथमिकता देता रहा। सम्पत्ति का संचय कुछ मुट्ठी भर लोगों के पास होता था। वास्तविक शासक संपत्ति के मालिक ही हुआ करते थे। अर्थात् जो संपत्तिवान होता वही शासक होता या कहें जो शासक होता उसी के पास संपत्ति होता। सिक्के के दोनों पहलू पर एक ही दृष्य अंकित था।
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सोलहवीं सदी में यूरोप (जर्मनी) के गृहयुद्ध की पृष्टभूमि भी संपत्ति के अधिकार और बँटवारा ही था। इसमें आम जनता के अधिकार महज दाल में झौंक के बराबर था। उक्त युद्ध ने दुनिया का इतिहास ही बदल दिया है। भारत में मंदिरों में हुए तमाम हमले धार्मिक केन्द्रों पर हमले से अधिक खजाने के केन्द्र होने के कारण होते थे। सोमनाथ के मंदिर में 17 बार हुए विदेशी आक्रमण के पीछे भी अनेक कारणों में यही मुख्य कराण था। भारत के मंदिरों में प्राचीन काल से ही धन का संचय होता आया है। भारत में मंदिरों की पृष्टभूमि पर ही संपत्ति का संचय होता था। भारत में राजाओं के बीच की लडाई में सीमा के विस्तार से अधिक सम्पत्ति बटोरने वाले केन्द्रों पर कब्जे की लडाई अधिक महत्वपूर्ण होती थी। कहा भी गया है कि जर-जोरू-जमीन ही सभी लडाईयों का जड़ होता है।
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आम मनुष्य को अनपढ़ और सम्पत्तिहीन बनाए रखने के तमाम प्रयास सत्तादारी वर्ग धर्म और शासन के रास्ते करता था। यह सिद्धांत पूरे विश्व में कमोबेश सभी जगह प्रयोग में लाए जाते थे। शिक्षा दुनिया का सबसे बड़ा हथियार है। यदि शिक्षा और सम्पत्ति किसी व्यक्ति में संचित हो जाता है तो वह दूसरों की अपेक्षा शक्तिशाली हो जाता है। शासक वर्ग कभी नहीं चाहता है कि शोषित वर्ग मुकम्मल शिक्षा प्राप्त करे और सम्पत्ति का भी संचय करे।
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संविधान लागू हो जाने के बाद पूरी दुनिया में शोषण-शासन का सिद्धांत बर्बाद हो गया। पूरी दुनिया में यूनिवर्सल एज्युकेशन, समाज रोजगार, प्रतिस्पर्धा के रास्ते समस्त पदों पर सभी नागरिकों की नियुक्ति आदि ने शिक्षित शोषित वर्ग को संपत्ति संचय करने के अधिकार से सम्पन्न कर दिया। शासन में उनकी पहुँच ने उन्हें शासकीय अधिकार भी देना शुरू कर दिया। वर्गीय लडाई में नव ढनाढ्य वर्ग को शासक अपने साथ कर लेता है, क्योंकि उसके पास शिक्षा और सम्पत्ति के साथ शक्ति भी होता है। शक्तियों का एकीकरण एक जरूरी सिद्धात होता है।
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दुनिया के नव संविधानों के द्वारा दिए गए ये अधिकार दुनिया में पारंपारिक शोषण की व्यवस्था को तार-तार कर दिया। शोषकवर्ग में भारी बेचैनी बढ़ने लगी। वे इससे पार पाने की जुगत भिड़ाने लगे। दुनिया में पारंपारिक शासक वर्ग और शोषित वर्ग के बीच अंतर मिटने लगी। पुरानी परंपराएँ, संस्कार और प्रथाएँ मिटने लगीं। शोषक वर्ग की पहचान और सामंतशाही भी धुल खाने लगी। संविधानिक प्रावधानों के रहते पुरानी शोषण व्यवस्था को वापस लाना पहाड़ उठाने जितना भारी था।
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नये उपाय करने जरूरी थे। लोगों की पुरातनपंथी सोच बडी तेजी से गलने लगी है। नये सिद्धांतों को बिना तार्किक बनाए आम जनता के गले में नहीं पहनाए जा सकते हैं। उनके सामने विकट समस्याएँ आन पड़ी। ऐसे में चालाक लोगों के दिमाग में धर्म एक ऐसा उपकरण दिखाई दिया, जिसे लोगों के गले में बिना ना नुकुर किए डाले जा सकते हैं। धर्म के विरूद्ध केवल उच्च शिक्षित, तर्क शिक्षा प्राप्त सीमित लोग ही तर्क पेश करते हैं। इसलिए धर्म को एक ऐसे उपकरण के रूप में पेश करने की जरूरत महसूस हुई, जो शोषण के नये रास्ते पर बाधा बनने की जरूरत महसूस न करे। धर्म बचपन से ही दिमाग को तर्कहीनता के ढाँचे में ढालता है। धर्मी व्यक्ति विरोध करने के दाँत तो धर्म को दान दे देता है। वह धर्म के लिए जान देने तक के हद तक जा सकता है। ये तमाम बाते शोषण की व्यवस्था को बनाए रखने में कारगर सिद्ध होते रहे हैं।
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दुनिया में पूँजीवाद और समाजवाज में एक लम्बा संघर्ष चला। साम्यवाद की आधी-अधूरी सिद्धांत ने उसे खुद उखाड़ फेंकने के लिए प्रेरित किया। पूँजीवाद एक ऐसा हथियार दिखाई दिया, जिसमें न सिर्फ सम्पत्ति के संचय को अपरिमित बनाया जा सकता है। बल्कि पूँजी के बल पर शासन और शासक दोनों को अपनी मुट्ठी में रखा जा सकता है। यह सोच काम कर गया और प्रायः सभी देशों में शासक और शासन पूँजीपतियों के दोस्त, मित्र, साझेदार और फिर गुलाम बनते गए। चुनने लायक लोगों की पहचान करने में पूँजीवाद को कमाल की एक्सपर्टी हासिल है। चुनाव में अच्छी सोच और चरित्र वालों को छाँट कर निकाल बाहर किया जाता है। इसके लिए पूँजी किसी भी हद तक व्यय करने के लिए तैयारी करता है।
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द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद स्वतंत्र हुए सभी तृतीय विश्व के देश आज अपने देशों के मुट्ठी भर पूँजीपतियों की चेरी बनी हुई है। इन देशों में लोकतंत्र नामक एक ऐसी पद्धति को लागू किया गया। जिसमें चुनाव लड़ने के लिए पूँजी चाहिए होती है और यह पूँजी पूँजीपतियों के पॉकेटों से आते हैं। चुनाव जीतने, शासक बनने, शासक बन कर पद और पैसा कमाने की चाह ने चुनाव में पैसे पाने के लिए उन्हें ब्लैंक पेपर पर या अपमानजनक शर्तों वाले एग्रीमेंट में हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर कर देता है।
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जाहिर है कि लोकतंत्र में जन के प्रतिनिधि का चुनाव नहीं होता है, बल्कि शोषक बनने की चाह रखने वाले संवैधानिक शोषक का चुनाव होता है। चुनाव में मतदाताओं के अधिकतम मत की आवश्यकता होती है। जनमत का निर्माण जनता कभी भी स्वयं नहीं करता है, बल्कि यह मीडिया के द्वारा होता है और मीडिया का मालिक वही पूँजी धारक होता है, जो चुनाव के लिए पैसा देता है। फिलहाल लोकतंत्र में पूँजीपति पूँजी खर्च करके ऐसे लोगों को शासन में बैठाता है, जो उनके साथ एग्रीमेंट किए हुए होते हैं और जो उनके हुक्म का गुलाम बनने के लिए पहले ही समर्पण कर चुके हैं।
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शिक्षा और सम्पत्ति के अधिकारों से सम्पन्न होने के बाद भी यदि व्यक्ति पारंपारिक धर्म का अनुयायी है तो जाहिर है कि धर्म के रास्ते से उनके दिमाग को किन्हीं खास विचारों और व्यवहारों का आदी बनाया जा सकता है और उसी आदत से वह शासकों के द्वारा फेके गए विचारों को आत्मसात करता है और शासक का सहयोगी बन जाता है। मध्यकाल के शोषण व्यवस्था में आम जनता को शिक्षा और सम्पत्ति से विहीन रखा जाता था। लेकिन आवार्चीन काल में उसे सीमित मात्र में शिक्षा और सम्पत्ति प्राप्ति का अधिकार जरूर दिया जाता है। लेकिन स्वतंत्र और लिबरल सोच से उन्हें जरूर वंचित किया जाता है या स्वतंत्र और लिबरल सोच वालों को अल्पसंख्यक रखने की नयी तरकीबें निकाल ली जाती है।
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मीडिया के तमाम संसाधनों पर पूँजी के कब्जे से ऐसा कर पाना बहुत सहज हो गया है। विवेकहीन जनता के प्रचंड बहुमत के अचंभित व्यवहार से विवेकवान अल्पसंख्यकों को आसानी से भयभीय किया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि कुछ खास क्षेत्रों में नये शिक्षितों और सामान्य सम्पत्ति संयच करने वालों को बिल्कुल ही प्रवेश करने न दिया जाए।
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ब्रिटेन में गैर एंग्लीकन को शासन करने का अधिकार नहीं है। अमेरिका में कैथोलिक को राष्ट्रपति बनने के लिए नाक से चने चबाने पड़ते हैं। भारत में किसी दलित और आदिवासी को प्रधानमंत्री बनने के कोई चांस नहीं है। सुन्नी अरब और शिया ईरान में कभी दोस्ती नहीं हो सकती है। भारत में ब्राह्मणवाद साम्राज्यवाद का मुख्य खम्बा जातिवाद ही है और धार्मिक मानसिक साम्राज्यवाद को बनाए रखने के लिए ब्राह्मणवाद किसी भी हद को पार कर सकता है। मनुस्मृति को लागू करने के सपने यूँ ही बंद नहीं होंगे। मुस्लिम मानसिक साम्राज्यवाद को स्थायित्व प्रदान करने के लिए साऊदी अरब पेट्रो डॉलर ऊँढेलता रहेगा। मुसलमानों को पॉपुलर शिक्षा और संस्कृति से दूर रखने के प्रयास चलता रहेगा। शिया साम्राज्यवाद में अपना भविष्य देखना ईरान कभी बंद नहीं करेगा। भारत में मीडिया क्षेत्र में गैर सवर्ण के प्रवेश पर प्रतिबंध हमेशा जारी रहेगा। आदिवासियों को धार्मिक बनाने की मुहिम कभी खत्म नहीं होंगे। उन्हें धर्म के फंदे में रख कर ही ट्रिलियन डॉलर के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जा सकता है। उन्हें पूँजीवाद उग्रवादी बनाता रहेगा।
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संविधान के द्वारा शिक्षा और सम्पत्ति के अधिकार पाए लोगों के लिए कहाँ-कहाँ प्रवेश निषेध का बोर्ड लगा हुआ है, इसे सुधी मितरों खुद देख लें। खुद अध्यनन कर लें। जिन्हें नहीं करना है, यथास्थिति को स्वीकार करके जीना है, उनके लिए तो यह लेख पढ़ना भी बेकार ही है। सॉरी दोस्त आप अध्ययनहीन मित्र नहीं हैं यह मेरा विश्वास है।🥰नेह।

#मानसिक साम्राज्यवाद

नेह अर्जुन इंदवार 

💐💐किसी व्यक्ति का आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, मानसिक शोषण क्यों होता है ? या कहें किसी समाज, वर्ग या क्षेत्र का शोषण क्यों होता है?

💐💐व्यक्ति जब दिमागी और शारीरिक रूप से पंगु होता है तो सक्षम व्यक्ति या समूह या तंत्र कमजोर व्यक्ति का शोषण करता है। शोषण के केन्द्र में स्वार्थ होता है। स्वार्थी त्तत्व कमजोर के शोषण में अपना फायदा देखता है।
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शोषण के अनेक रूप होते हैं। सभी को पहचानना आसान नहीं है। लेकिन जब किसी एक के स्वार्थ के कारण दूसरे की कहीं न कहीं कोई हानि होती है तो विवेकशीलता के माध्यम से शोषण को पहचाना जा सकता है।
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कोरोना वायरस से हमें हमारा विश्वास, प्रार्थना, मंत्र बचाएगा। ऐसा बोलने वाले यदि समाज में मान-सम्मान वाले विश्वासपात्र होते हैं और लोग स्वाभाविक रूप से ऐसे लोगों पर दिल से विश्वास करते हैं तो समझ लीजिए कि ऐसे लोग दूसरों की जान लेने तक के स्वार्थी होते हैं। ऐसी घटनाओं का संबंध मानसिक साम्राज्यवाद से होता है।
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मानसिक शोषण के ढाँचा या साम्राज्यवाद का विकास अधिकतर धार्मिकता के रास्ते किया जाता है। धर्म के मामले पर लोग धर्म के ठेकेदारों, नकली धार्मिक तत्वों पर आँख बंद करके विश्वास करते हैं और वे अपने धर्म की प्रभुसत्ता और इसके प्रभावशीलता के स्थापित स्वार्थ को अक्ष्क्षुण बनाए रखने के लिए ऐसी बातें करते हैं। देश में तंत्र विशेष, धर्म विशेष या संगठन विशेष के कट्टरपन के शिकार व्यक्तियों की मानसिक दशा पर गंभीर विश्लेषण करके इसे पूरी तरह समझा जा सकता है। इंटरनेट के माध्यम से ऐसी अध्ययन के लिए लाखों साम्रगी जुटाया जा सकता है। लेकिन आपको इसके लिए अपने कुकून से बाहर निकलना होगा।
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अवार्चीन युग में बादशाह, चक्रवर्ती राजाओं द्वारा स्थापित किए जाने वाले साम्राज्य टूट कर बिखेर गए हैं। लेकिन साम्राज्यों के निर्माण बंद नहीं हुए हैं। हमारे चारों ओर अनेक तरह के साम्राज्य कार्यरत्त हैं, जो हमारे दैनिक जीनव को अंदर तक प्रभावित करते हैं।
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साम्राज्यों के सृजन के तरीके बदल गए हैं। वैश्विक अर्थ व्यवस्था में पूँजीपति अपनी दक्षता के क्षेत्र में साम्राज्य स्थापित करने की जी तोड़ कोशिश करते हैं और साम्राज्य को स्थापित करने के लिए मार्केटिंग का सहारा लेते हैं। वे अपने पूँजी के बल पर अपने वर्ग के लिए एक हौवा-ढाँचा खड़े करते हैं। इसका प्रभाव शासन-प्रशासन के हर क्षेत्र में घुसपैठ कर लेता है। हवाई जहाज से कोरोना लेकर भारत आने वालों के विरूद्ध सरकार कोई कठोर कारगर कार्रवाई क्यों नहीं कर पायी, इसको समझने के लिए पूँजी के प्रभाव और हौवा को समझने की जरूरत है। दूसरी ओर गरीबी पर पूरी ताकत से पड़ते लठियों के बछौर की तुलना एयरपोर्ट पर मिले पूँजीवाद के स्वागत प्रभाव से करें।
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राजनीतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, भाषाई, मानसिक (भारत में जातिवाद की) साम्राज्य कैसे स्थापित होती है, इसको समझने के लिए भारतीय राजनीति पार्टियों के कार्यकलाप, भारत में चल रहे धार्मिक और सांस्कृतिक संगठनो की गतिविधि, साहित्य, मीडिया में गुंफित विचारधारा आदि को जानने, समझने और उनके विश्लेषण करने की जरूरत है।
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वर्तमान युग में सबसे अधिक असरदार और कामयाब मॉडल मानसिक साम्राज्य की स्थापना है। इसके माध्यम से मनचाहे आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृति, भाषाई, साम्राज्य स्थापित किए जा सकते हैं। मानसिक साम्राज्य की स्थापना के लिए जरूरी होता है, व्यक्ति के सोचने, समझने की शक्ति को एक खास उम्र से पकड़ा जाए, उसे खास सूचना, जानकारी, शिक्षा और मूल्य से सराबोर किया जाए। सूचना, मूल्य और विचारधारा की बमबारी से अपने लक्षित वर्ग को कायल कर दिया जाए। इस तमाम क्रिया-प्रक्रिया के लिए आधुनिक संचार के साधन इसके सबसे असरकार उपकरण हैं। इसके लिए जरूरी है कि इन साधनों पर अपनी पकड़ को बेरहम किया जाए। ये साधन किसी राष्ट्र के गले की हड्डियाँ होतीं हैं। जिसने भी इसे पकड़ा वह सामाज्यवाद का बादशाह बन जाता है।
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भारत में मीडिया के माध्यम से अपने प्रभुक्षेत्र, प्रभावशीलता, विचारों, कार्यकलापों को कैसे खास उम्र के दिमागों में थोपा जाता है और उसका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ उठाया जाता है। इसे समझना बहुत मुश्किल नहीं है। बस आपको अध्ययनशील, विचारशील होने की जरूरत होगी।
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अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कैसे-कैसे पैंतरे लिए जाते हैं। आलोचना, समालोचना, खुले विचारों की स्वतंत्रता को कैसे बाधित और प्रतिबंधित किया जाता है और विशेष रूप से तैयार साम्रागी को कैसे खास लोगों के दैनिक जीवन की सोच के दायरे में अनवरत लाया जाता है। इसे समझना भी बहुत मुश्किल नहीं है।
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अभिव्यक्ति की अबाध स्वतंत्रता, साम्राज्यवाद की स्थापना के लिए ऊर्जा लगा रहे लोगों के लिए खतरे की घंटी होती है। इसलिए वे ऐसी स्वतंत्रता की निंदा करते हैं और साम-दाम-भेद के दम पर उन्हें नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं।
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जिस समाज में वैचारिकी स्वतंत्रता होती है, वह समाज चलायमान होता है, और जिस समाज में आलोचना, समालोचना, निंदा जैसे नये मूल्यवर्धक प्रक्रियाओं को हतोत्साहित किया जाता है। वहाँ भेड़ों की एक ऐसी नस्ल तैयार होती है, जो देखने में तो मनुष्य होते हैं। लेकिन वे स्वार्थी लोगों के द्वारा नियंत्रित समूह होते हैं। फिल्मों के जोंबी के देखकर आप अधिक स्पष्ट हो सकते हैं।
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कोरोना के काल में ऐसे समूहों की बहुत आसानी से पहचान की जा सकती है।

धर्मों का सच्चा-झूठा पुलिंदा

नेह अर्जुन इंदवार 

कोरोना मईया (?) या भईया (?) या दईया (?) ने कई चेहरों, विचारों, गीदड़ों और शेरों के चेहरे के परत को केले के छिलके की तरह परत-दर-परत निकालते जा रहा है। यह एक ओर अमेरिकी श्रेष्ठता, महाशक्ति के मिसाईलों को टुकड़े-टुकड़े करके रख दिया वहीं, वर्तमान सभ्यता की अजेयता को तार-तार करके रख दिया। दुनिया के 102 देशों की सरकारों के माथे से पसीना तर-तर चू रहा है। कोरोना की डर से सबसे अधिक भयभीत धर्म और किताबों के ईश्वर हो गए हैं।

इधर तमाम धार्मिक विश्वास को भाई लोगों के द्वारा बटखरे पर तौला जा रहा है और उसकी असलियत की जद् और हद तक पहुँचने के लिए गर्म पानी में खौला जा रहा है। बेचारे धर्म की जो चौधराहट शेयर बाजार में अकड़ मारता था, वह भीगी बिल्ली बने चूहे के साथ बिल में घुसने की कोशिश कर रहा है।

न जाने कितने लोग धर्म की खींची जा रही खाल के गम में उसे बचाने के लिए दुबले हो रहे हैं और कितने लोग धर्म के नाम पर जमा हुए पैसे की आलोचना को कम करने के लिए हजारों करोड़ दान में देने की झूठी तस्वीरें फेसबुक में शेयर किए जा रहे हैं। लेकिन वास्तविक रूप से कितने रूपये धर्म के ठेकेदारों ने अपने दुश्मन कोरोना से लड़ाई के लिए दिया, इसका कोई सबूत कहीं दिखाई नहीं दे रही है। भला दावा करने में हर्ज ही क्या है। पैसे तो अंटी से जाएँ तब न चमड़ी में आँच आएगी।

कौन धर्म सच्चा है और कौन धर्म झूठ का पुलिंदा ?
सभ्यता की शुरूआत से ही यह पहेली संसार भर में प्रधानमंत्री की तरह पर्यटन कर रही है और लोगबाग कभी इस धर्म तो कभी उस धर्म के खोल में घुसते हैं, रस को पीते हैं फिर उधर से निकलते हैं और नये की तलाश पर निकल पड़ते हैं।
धर्मांतरण और घर-वापसी के खेल में खूब ऊर्जा का निवेश होता है। ऊर्जा मतलब 9 बज कर 9 मिनट में जलाने वाले दीया की ऊर्जा की बात नहीं है। यह रूपल्ली का शुद्ध रूप है। कहते हैं रूपल्ली में ऊर्जा ही गुप्त रूप से बैठा रहता है नहीं तो कागज तो कागज ही होता है। क्या रंगीन और क्या बदरंगी हरा ?

अब जो यह ऊपरवाला ईश्वर, परमेश्वर, गॉड, अल्लाह वास्तव में कैसा रंग-रूप फैशन वाला है, इस पर आज तक धर्म वालों ने कोई सर्वमान्य सिद्धांत पेश ही नहीं किया है। उन्हें समय तो खूब दिया गया। लेकिन सब फिसड्डी साबित हुए। हर धर्म अलग-अलग मॉडल प्रस्तुत करता है। हर मॉडल में ईश्वर का रूप अलग-अलग दिखाया जाता है। अब कौन सा रूप वास्तविक है और कौन सा मेकअफ सोशल मीडिया के समाचार की तरह फेक कहा नहीं जा सकता है।

एक धर्म वालों की नजर में दूसरे धर्म वाले पापी होते हैं। दूसरे की नजर में पहला वाला पापी। वास्तव में कौन पापी है, और कौन पुण्य के सेनिटाईजर में नहाया हुआ है, यह तय करना टेढी खीर है। अल्लाह वालों को भगवान शब्द से एलर्जी है। तो गॉड वालों को अल्लाह से। परमेश्वर और भगवान के लिए प्रार्थना भी एक नहीं होता है। हर प्रार्थना और भगवान के रंग-रूप या निरूप पर अलग-अलग धर्म वालों का प्राइवेट लिमिटेड कॉपीराईट है। इन ईश्वरों में धैर्य नामक तत्व नहीं होते हैं। आलोचना सुनने पर सीधे तलवार चला देते हैं। सुनते हैं शिया और सुन्नी में कन्नी काटने का रिश्ता है। कैथोलिक और प्रोटेस्टेंड में 30 वर्षों तक तलवारबाजी का अभ्यास किया गया था। शैव और वैश्ण्व भी मिल कर युगों तक कराटे का अभ्यास करते रहे। हिन्दू और बौद्ध धर्म में सौतन का रिश्ता अभी भी कायम हैं। सभी धर्मों की अपनी सच्ची-सच्ची किताब, दूसरों की झूठी या कहें झूठ का पुलिंदा किताब जरूर रहता है, जिसमें दुनिया या कहें ब्रह्माण्ड का ज्ञान समाया हुआ रहता है, लेकिन फिर भी कहता है उसके सामने विज्ञान अभी बच्चा है। मतलब उनके किताबों में समाया हुआ विज्ञान बहुते कच्चा वाला बच्चा है।

धर्मों के दावों के मौजों की कहानियों के क्या कहने। सभी में रवानगी ही रवानगी है। सभी धर्मों के प्राईवेट (निजी) स्वर्ग में सुंदर लड़कियाँ जरूर होती है। उनकी सुंदरता के क्या कहने ? पुरूषों के मृत्यु के बाद जो लड़कियाँ उन्हें लुभाती हैं, वही लड़कियाँ स्त्रियों को लुभाती है या नहीं ? फिलहाल इस पर विस्तृत समाचार की प्रतीक्षा की जा रही है। स्त्रियों के लिए सुंदर पुरूष होते हैं या नहीं, इस विषय पर बोलने में धर्म और धार्मिक किताब को बहुत शर्म लगता है। भाई लोग जानना चाहते हैं कि नरक के जिस कुंड में पापी की फ्राई होती है वह कैसे होती है? बंदा शरीर को तो इसी दुखपूर्ण संसार में ही छोड़ जाता है।

इधर सभी धर्म रूपये, पैसे, मोह-माया से बहुत नफरत करते हैं। लेकिन सभी के अड्डे पर नफरत के सामान अफरात में मिलते हैं। जिस रूपये को धर्म पाप की जड़ कहता है, उसे इकट्ठा करने के हर प्रयास वह दिन रात करता है। धर्म के दरबार में कोई खाली हाथ जाता है तो उसे बड़ी हिकारत की नज़रों का सामना करना पड़ता है। ऐसे लोगों को धार्मिक अड्डे के बाहर बैठे भिखारी के बराबर ही समझा जाता है।

अब यह पता लगाना मुश्किल हो गया है कि धर्म को ईश्वर से अधिक प्यार है या पैसे से। धर्म को पैसों से जितना स्नेह है उतना डेमोक्रेसी से नहीं। धर्म को जनतंत्र की जगह राजतंत्र अधिक भाता है। सभी धार्मिक व्यवस्था में राजतंत्र की तरह ही एक बदशाह होता है जो कभी भी कुछ भी आदेश दे सकता है और राजतंत्र की तरह उस आदेश को सभी भक्त बिना हील हुज्जत के मान लेते हैं।

धार्मिक बादशाह आलोचना और समीक्षा से परे होते हैं। उनकी सामंती जमींदारी के सामने लोकतांत्रिक राजागण दण्डवत होते हैं।

दुनिया के सभी धर्म हद दर्जे के लैंगिक भेदभाव में विश्वास करते हैं। लड़का लड़की दोनों समान के नारे वहाँ नहीं चलते हैं। सभी भगवान और सर्वोच्च गुरू पुरूष ही होते हैं। उनकी गद्दी को कोई महिला किसी भी तरह से छीन नहीं सकती है। कई गुरू लैंगिक इच्छा से परिपूर्ण होते हैं और वे बच्चे उत्पादन करना अपना धार्मिक कार्य समझते हैं।

प्रायः सभी धर्मों में पुण्य कमाने के लिए पैसे खर्च करना अनिवार्य होता है। या तो सामंती बदशाह को पैसे दीजिए या उनकी पैसों की भूख को अपनी मेहनत की कमाई से शांत कीजिए। पैसे से बड़ा पाप को छोटा पाप में बदला जा सकता है या क्षमा करवाया जा सकता है। पैसे से आप स्वर्ग में भोजन, कपड़े, सोने-चाँदी के उपहार भेज सकते हैं या नर्क की कुंड की आग की आँच को धीमा कर सकते हैं।

पैसों की जितनी महिमा धर्म में होती है, वह किसी ईश्वर, अल्लाह, गॉड, परमेश्वर से कम नहीं होती है। धर्म में शरीर के साथ-साथ आत्म को चंगाई देने, भला करने, कल्याण करने, मुक्ति देने की शक्ति होती है।

लेकिन गौर किया गया है कि कोरोना काल में इसने शरीर के कल्याण के दावे से उसी तरह हाथ झाड़ लिया है, जैसे सरकार ने नागरिकों की सुरक्षा से अपने हाथ झाड़ लिया है। फिलहाल कोरोना से जितना भय नागरिकों को है, उतना ही भय सरकार को नागरिकों की असंतुष्टि अभिव्यक्ति से है।

कोरोना काल में धर्म की आलोचना से धर्म भी तिलमिला कर रह गया है। इसलिए फिलहाल धर्म अपना सारा ध्यान शरीर को छोड़कर आत्म पर केन्द्रित कर लिया है। पता नहीं कोरोना की पहुँच आत्म तक कब होगी ? आत्म तक होने पर पत्ता गोभी की तरह धर्म के छिलके पर छिलके निकलते रहेंगे या केले की तरह कोई स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ भी निकलेगा। समझे नहीं ? अरे भाई वही भोज्य पदार्थ जिसे स्वर्ग में आत्मा खाते हैं और मौज करते हैं और सुंदर कन्याओं से ईश्क लड़ाते हैं। स्वर्ग में महिलाओं को यह सुख मिलता है या नहीं, इसका पता हमारे संवाददाताओं को अभी नहीं लगा है। लगने पर फिर आपके पास समाचारों के साथ आएँगे।

विचारों की दुनिया

#नेह इंदवार 
∼प्रकृति में जन्म और मृत्यु एक प्राकृतिक नियम है। दुनिया के सभी नेचुरल और अर्टिफिशियल चीजों पर यह लागू होता है। यह नियम मल्टी यूनिवर्स, गैलेक्सी, तारे, ग्रह, समुद्र, पहाड़, नदी, झील, शहर, सरकार, सड़क, बिल्डिंग, परिवार, मनुष्य और मनुष्य के विचारों तक में लागू होता है। जो जन्म लेता है मृत्यु भी  होती है।
विचारों का जन्म और मृत्यु काल मनुष्य के जीवन काल से बड़ी या छोटी हो सकती है। किसी विचारों का जन्म और मृत्यु काल क्षणभंगुर होता है। लेकिन कई विचार कई सदियों तक जिंदा रहती है।
गैलेक्सी और ग्रहों की तरह ही विचारों का अपना परिवार, खानदान और संस्कृति होती है। विचारों का वर्ग और स्तर भी होता है। कोई  विचार शरीफ कहलाता है तो कोई खलनायक। किसी विचारों की चारों ओर धूम होती हैं, तो किसी विचारों पर लानत-मलानत भेजी जाती है।
✌️आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, मानसिक दुनिया से संबंधित विचार हमें बहुत प्रभावित करते हैं। विचारों के जन्म, शैशवकाल, जवानी, परिपक्वता, बृद्धाकाल आदि से सभी व्यक्ति, परिवार, समाज देश या देशों के समूह से इतने प्रभावित होते हैं कि सुबह बिस्तर छोड़ने और सोने के बीच की दुनिया में विचार के कार्यकलाप से व्यक्ति आजाद नहीं हो पाता है। जिस तरह बिना अक्सीजन के प्राणी जिंदा नहीं रहता है, वैसे ही व्यक्ति और समाज बिना विचारों के जिंदा नहीं हो सकते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि जो विचार अभी जिंदा और बुढ़ा होकर मर नहीं गया है, उसी विचार से ही व्यक्ति और समाज, सरकार संचालित होते हैं। जो विचार कभी जिंदा था, लेकिन नये विचारों के कारण उसकी पूछ जाती रही और वह मर गया। उन विचारों को हम इतिहास कहते हैं।
सम्राट अशोक, अकबर और चंगेजखान के जमाने के विचार कब के बुढ़े होकर मर खप गए। यदि आज उस जमाने का कोई विचार दिखाई भी देता है तो समझ जाईए कि वह हमशक्ल वाला विचार उसके डीएनए वाला कोई नया विचार ही है।
सुबह उठते ही परिवार धर्म, खानपान, परिधान, व्यवहार, शिक्षा, आर्थिक गतिविधियों, धार्मिक गतिविधियों से संबंधित विचारों से संचालित होना शुरू हो जाते हैं।
धर्म के जो विचार बुढ़े होकर मर गए हैं, उन विचारों को छोड़कर व्यक्ति धर्म के नये विचारों, प्रार्थनाओं, भंगिमाओं से धर्म के विचारों को ओढ़ता है। धर्म और संस्कृति के विचार भी मर खप जाते हैं। जो वर्तमान में दिखाई देते हैं। वे पुराने धर्म और संस्कृति के कंकाल ही होते  हैं।
शिक्षा के नये विचारों से प्रेरित बच्चे नये विचारों के अनुसार शिक्षा ग्रहण करते हैं। पुराने विचार शिक्षा संस्थाओं से विदा ले चुके होते हैं।  चार पीढ़ी पहले के खानपान के उलट व्यक्ति वर्तमान में तैर रहे विचारों के अनुसार अपना खानपान करता है। धोती और गमछा पहनने के बजाय नये विचारों से संचित नये ढंग के शर्ट्स, पैंट, साड़ी या सलवार पहन कर परिवार अपना दैनिक कार्य शुरू करता है।
राजनीति पार्टी से संबंधित व्यक्ति मर चुके राजनीति के बदले नये विचारों से संचालित राजनीति के अनुसार नई रणनीति बनाने में व्यस्त रहता है। धर्म और राजनीति के द्वारा नये विचारों से आर्थिक और सामाजिक लक्ष्य लेकर चल रहे व्यक्ति बिल्कुल नये विचारों के साथ नयी रणनीति बनाते हैं। वह वोटरों को नये विचारों के साथ प्रभावित करके अपने पक्ष में करने के लिए नये पैंतरे बनाते हैं। वह वोटरों को शिष्ट शांत बनाए रखने के बदले उत्तेजित, गर्म खून और उग्र विचारों के इंजेक्शन लगाने के लिए नये-नये पैंतरे और रणनीति बनाते हैं।
एक ही नाम की नई राजनैतिक पार्टियाँ भी खानदान के टाईटिल को ढोने वाली पार्टियाँ ही होती हैं। नई राजनीति पार्टियाँ चाहतीं हैं कि जनता जल्दी से जल्दी पुराने विचारों को त्याग दें और नये विचारों को अपना लें। वे नये जन्मे विचारों को जल्दी जवान और परिपक्व बनाने में उसी तरह की रणनीति बनाते हैं, जैसे पोल्ट्री फार्म वाले अपने मुर्गियों के वजन बढ़ाने के लिए इंजेक्शन और चारे में केमिकल देने की रणनीति अपनाते हैं।
सरकार प्रशासन के कार्य को नये विचारों और उससे संचालित नीतियों से चलाना चाहती है। उन विचारों और नीतियों को जनता का समर्थन प्राप्त हो इसलिए वह पुरानी नीतियों की निंदा करती है। यहाँ पुरानी नीति कहने का सीधा अर्थ है उन विचारों का जो जन्म लेकर बुढ़े होकर मर गए हैं। मरे विचार अनुपयुक्त हो जाते हैं। आज की प्रचलित विचारों की दुकान भी भविष्य में बंद हो जाएगी और आप जिन विचारों के लिए आज मरने-मारने, दंगा करने, षड़यंत्र करने में व्यस्त हैं, वह विचार और संस्कृति भी मर खप जाएंगी और वह भविष्य में आपको बुद्धु इंसान घोषित कर ही देंगी। इसलिए खलनायक विचारों से संचालित होने के बजाए शरीफ विचारों से संचालित होकर जिंदगी में सुख और शांति को प्राप्त कर पाएँगे।
राजनीति, आर्थिक, धर्म आदि में विचारों को आर्टिफिशियल ढंग से जन्म देना, उसे जल्दी जवान करने की जतन करना, उसे जनता पर थोपने की जल्दीबाजी दिखाना, थोपने के बाद उससे मनपसंद रिजल्ट पाने की रणनीति बनाना आदि कुछ ऐसे काम, नीति, रीति  है, जिसे हर जमाने में चालाक लोग करते रहते हैं।
क्या आप चालाक लोगों की श्रेणी में खुद को रखते हैं ?
जब चालाल लोग ऐसे कार्यों को अंजाम देते हैं तो जाहिर है कि ऐसी नीतियों, कार्यक्रमों को लागू करने के लिए कम चालाक मतलब बेवकूफ लोगों की भी आवश्यकता होती है। बेवकूफ लोगों की आबादी हमेशा बड़ी होती है।
आमतौर से आम नागरिक चालाकी की बारिकियों में नहीं जाते हैं। वे विश्लेषक नहीं होते हैं। न ही उनके पास इन चीजों को जाँचने परखने के उपकरण होते हैं। वे इन चीजों से दूर रहें, इसके लिए जरूरी है कि उन्हें हमेशा समस्याओं की टोकरियाँ थमाई जाए। वे समस्याएँ निपटाने में ही जिंदगी खपा देंगे। यूँ तो वे महज विचारों के उपभोक्ता होते हैं, जो विचार बाजार में आया उसे वे अपनी जरूरत के हिसाब से खरीद लेते हैं। उसका सेवन कर लेते हैं। उसे अपने जेब की पॉकेट में और घर के अलमारी में कैद कर लेते हैं।
शराब के बोतल में ऱखी शराब के सेवन से नशा ही होगा और कॉम्पलान के डब्बे में बच्चों को पौष्टकता देने के ही पदार्थ मिलेंगे। पान-तंबाखू खाने के बाद उसे थूक दिया जाता है। विचारों के साथ भी यही होता है। मतलब आप जिन विचारों के स्थायी ग्राहक बनेंगे, वे विचार आपको अपना स्थायी उपभोक्ता बना ही लेगा। यदि आपको बचपन से मक्के की रोटी और चने के साग खाने की आदत लगायी जाएगी तो आप उसके स्थायी उपभोक्ता बनेंगे। खाना खाने के बाद आपको छाछ, मिष्टी, दही, रसगुल्ले खाने की आदत लगाई जाएगी तो आप जिंदगी में उसके प्रशंसक बने बिना जिंदगी नहीं जी सकते हैं। सुबह उठ कर जिस प्रार्थना को आपको लटाया जाएगा, जिस ढंग से धर्म को अपनाने की आदत लगाई जाएगी, वह कालांतर में आपको उसका गुलाम बना देगा। गुलाम बनाने की प्रक्रिया ऐसी ही होती है।  इस प्रक्रिया को जन्म देने वाले भी नये विचारों के जन्मदाता ही होते हैं। मार्क्स, हिटलर, गाँधी, जॉर्ज वाशिंगटन, माओ आदि विचारों के शानदार माताएँ थे। उनके गर्भ में नये विचार पलते रहते थे।
विचारों का जन्म होता है। विचार धीरे-धीरे मोटे मजबूत या दूबले हो सकते हैं। वह जवान होकर परिवक्व होता है। फिर वह जवानी के खेल भी दिखाता है। वह इतिहास बनाता है। पुराने इतिहास को बिगाड़ता है। लेकिन अंततः प्राकृतिक नियमों के अनुसार मर खप जाता है।
कार्ल मार्क्स ने सर्वहारा की एकता, संगठन, उसकी शक्ति, सत्ता में हिस्सेदारी और पूरी दुनिया में साम्यवाद का एक विचार दिया था। जब वह विचार जवान हुआ तो दुनिया के चालिसेक  देश मार्क्सवाद के जवानी का आनंद ले रहे थे। लेकिन अंततः वह पूँजीवाद के विचारों से हार गया और हारने के बाद बुढ़ा भी हो गया। फिलहाल पूँजीवादी विचार भी मरन्नासन अवस्था में पहुँच गया है। भारत में यह पूरी तरह बीमार हो गया है। कोई नयी खूनी या पानी क्रांति जरूर होगी, जो उसे कब्र में पहुँचाने का काम करेगी।
बहुत लंबी लेख कोई पढ़ता नहीं यारों। इसलिए संक्षेप में :- विचारों का जन्म होता है और वह जवान भी होता है। आप किन विचारों के स्थायी ग्राहक है ? इस पर विवेक लगाएँ। कहीं आप ऐसे विचारों के ग्राहक तो नहीं है, जिसका चरित्र ही खलनायक का है और आपको एक उपकरण के रूप में यूज कर रहा है ? वह विचार किसी भी विषय से संबंधित हो सकता है। मतलब वह विचार सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक धार्मिक, शारीरिक और मानसिक कुछ भी हो सकता है। यदि आप इसे समझ नहीं पा रहे हैं तो इस पर तर्क करें, विचार करें, अध्ययन करें और इन सबके बाद आपने आपको चालाक और चतुर बनाएँ। यह विचार जरूर करें कि कहीं आप किन्हीं विचारों के हद से भी अधिक गुलाम तो नहीं हैं ? ?? यदि  गुलाम हैं तो इस नाचीज को याद कर लेना। यदि बहुत चालाक हैं तब तो जरूर याद कर लेना। आपका ही नवतुन- विचारदाता-मित्र-नेह। 😍

आदिवासी हिन्दू नहीं हैं

आदिवासी हिंदू नहीं है और कभी हिंदू बन भी नहीं सकता है। हिंदू होने के लिए हिन्दुओं के लिए दी गई संस्कार को पूरा करना होता है। बिना ये संस्कार किए कोई असली हिंदू नहीं बन सकता है। जाहिर है कि आदिवासियों को हिंदू बनाने का अभियान ब्राह्मण धर्म को आदिवासियों पर थोप कर उनका सामाजिक और आर्थिक शोषण करना ही मुख्य उद्देश्य है। उनके वोट, आय, स्वतंत्र सोच, आदिवासी इतिहास, वजूद पर कुंडलीमार कर उनका मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक शोषण करना मुख्य उद्देश्य है। इसीलिए आरएसएस के भागवत कहता है कि जनगणना में आदिवासी को हिन्दू लिखने का अभियान चलाया जाएगा। इससे इस देश में आदिवासी जनसंख्या को कमतर दिखाया जा सकेगा और आदिवासी के तमाम संवैधानिक अधिकारों को खत्म किया जा सकेगा।
जाने क्या हैं हिंदू धर्म अर्थात् ब्राह्मण धर्म के संस्कार ? –
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हिन्दू धर्म में सोलह संस्कारों (षोडश संस्कार) का उल्लेख किया जाता है जो मानव को उसके गर्भाधान संस्कार से लेकर अन्त्येष्टि क्रिया तक किए जाते हैं। [1]इनमें से विवाह, यज्ञोपवीत इत्यादि संस्कार बड़े धूमधाम से मनाये जाते हैं। वर्तमान समय में सनातन धर्म या हिन्दू धर्म के अनुयायी में गर्भाधन से मृत्यु तक १६ संस्कारों होते है।[2]
प्राचीन काल में प्रत्येक कार्य संस्कार से आरम्भ होता था। उस समय संस्कारों की संख्या भी लगभग चालीस थी। जैसे-जैसे समय बदलता गया तथा व्यस्तता बढती गई तो कुछ संस्कार स्वत: विलुप्त हो गये। इस प्रकार समयानुसार संशोधित होकर संस्कारों की संख्या निर्धारित होती गई। गौतम स्मृति में चालीस प्रकार के संस्कारों का उल्लेख है। [3]महर्षि अंगिरा ने इनका अंतर्भाव पच्चीस संस्कारों में किया। व्यास स्मृति में सोलह संस्कारों का वर्णन हुआ है। हमारे धर्मशास्त्रों में भी मुख्य रूप से सोलह संस्कारों की व्याख्या की गई है। इनमें पहला गर्भाधान संस्कार और मृत्यु के उपरांत अंत्येष्टि अंतिम संस्कार है। गर्भाधान के बाद पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण ये सभी संस्कार नवजात का दैवी जगत् से संबंध स्थापना के लिये किये जाते हैं।
नामकरण के बाद चूड़ाकर्म और यज्ञोपवीत संस्कार होता है। इसके बाद विवाह संस्कार होता है। यह गृहस्थ जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। हिन्दू धर्म में स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सबसे बडा संस्कार है, जो जन्म-जन्मान्तर का होता है।
विभिन्न धर्मग्रंथों में संस्कारों के क्रम में थोडा-बहुत अन्तर है, लेकिन प्रचलित संस्कारों के क्रम में गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, विद्यारंभ, कर्णवेध, यज्ञोपवीत, वेदारम्भ, केशान्त, समावर्तन, विवाह तथा अन्त्येष्टि ही मान्य है।
गर्भाधान से विद्यारंभ तक के संस्कारों को गर्भ संस्कार भी कहते हैं। इनमें पहले तीन (गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन) को अन्तर्गर्भ संस्कार तथा इसके बाद के छह संस्कारों को बहिर्गर्भ संस्कार कहते हैं। गर्भ संस्कार को दोष मार्जन अथवा शोधक संस्कार भी कहा जाता है। दोष मार्जन संस्कार का तात्पर्य यह है कि शिशु के पूर्व जन्मों से आये धर्म एवं कर्म से सम्बन्धित दोषों तथा गर्भ में आई विकृतियों के मार्जन के लिये संस्कार किये जाते हैं। बाद वाले छह संस्कारों को गुणाधान संस्कार कहा जाता है।

गर्भाधान

हमारे शास्त्रों में मान्य सोलह संस्कारों में गर्भाधान पहला है। गृहस्थ जीवन में प्रवेश के उपरान्त प्रथम क‌र्त्तव्य के रूप में इस संस्कार को मान्यता दी गई है। गार्हस्थ्य जीवन का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्ति है। उत्तम संतति की इच्छा रखनेवाले माता-पिता को गर्भाधान से पूर्व अपने तन और मन की पवित्रता के लिये यह संस्कार करना चाहिए। वैदिक काल में यह संस्कार अति महत्वपूर्ण समझा जाता था।

पुंसवन[संपादित करें]

गर्भस्थ शिशु के मानसिक विकास की दृष्टि से यह संस्कार उपयोगी समझा जाता है। गर्भाधान के दूसरे या तीसरे महीने में इस संस्कार को करने का विधान है। हमारे मनीषियों ने सन्तानोत्कर्ष के उद्देश्य से किये जाने वाले इस संस्कार को अनिवार्य माना है। गर्भस्थ शिशु से सम्बन्धित इस संस्कार को शुभ नक्षत्र में सम्पन्न किया जाता है। पुंसवन संस्कार का प्रयोजन स्वस्थ एवं उत्तम संतति को जन्म देना है। विशेष तिथि एवं ग्रहों की गणना के आधार पर ही गर्भधान करना उचित माना गया है।

सीमन्तोन्नयन

सीमन्तोन्नयन को सीमन्तकरण अथवा सीमन्त संस्कार भी कहते हैं। सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना। गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की मांग भरती हैं। यह संस्कार गर्भ धारण के छठे अथवा आठवें महीने में होता है।

जातकर्म

नवजात शिशु के नालच्छेदन से पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। इस दैवी जगत् से प्रत्यक्ष सम्पर्क में आनेवाले बालक को मेधा, बल एवं दीर्घायु के लिये स्वर्ण खण्ड से मधु एवं घृत वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ चटाया जाता है। यह संस्कार विशेष मन्त्रों एवं विधि से किया जाता है। दो बूंद घी तथा छह बूंद शहद का सम्मिश्रण अभिमंत्रित कर चटाने के बाद पिता यज्ञ करता है तथा नौ मन्त्रों का विशेष रूप से उच्चारण के बाद बालक के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की प्रार्थना करता है। इसके बाद माता बालक को स्तनपान कराती है।

नामकरण[संपादित करें]

एचएचजन्म के ग्यारहवें दिन यह संस्कार होता है। हमारे धर्माचार्यो ने जन्म के दस दिन तक अशौच (सूतक) माना है। इसलिये यह संस्कार ग्यारहवें दिन करने का विधान है। महर्षि याज्ञवल्क्य का भी यही मत है, लेकिन अनेक कर्मकाण्डी विद्वान इस संस्कार को शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना उचित मानते हैं।
नामकरण संस्कार का सनातन धर्म में अधिक महत्व है। हमारे मनीषियों ने नाम का प्रभाव इसलिये भी अधिक बताया है क्योंकि यह व्यक्तित्व के विकास में सहायक होता है। तभी तो यह कहा गया है राम से बड़ा राम का नाम हमारे धर्म विज्ञानियों ने बहुत शोध कर नामकरण संस्कार का आविष्कार किया। ज्योतिष विज्ञान तो नाम के आधार पर ही भविष्य की रूपरेखा तैयार करता है।

निष्क्रमण

दैवी जगत् से शिशु की प्रगाढ़ता बढ़े तथा ब्रह्माजी की सृष्टि से वह अच्छी तरह परिचित होकर दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करे यही इस संस्कार का मुख्य उद्दे निष्क्रमण का अभिप्राय है बाहर निकलना। इस संस्कार में शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है। भगवान भास्कर के तेज तथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है। इसके पीछे मनीषियों की शिशु को तेजस्वी तथा विनम्र बनाने की परिकल्पना होगी। उस दिन देवी-देवताओं के दर्शन तथा उनसे शिशु के दीर्घ एवं यशस्वी जीवन के लिये आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है। जन्म के चौथे महीने इस संस्कार को करने का विधान है। तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये प्राय: तीन मास तक उसे बहुत सावधानी से घर में रखना चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो।

अन्नप्राशन

इस संस्कार का उद्देश्य शिशु के शारीरिक व मानसिक विकास पर ध्यान केन्द्रित करना है। अन्नप्राशन का स्पष्ट अर्थ है कि शिशु जो अब तक पेय पदार्थो विशेषकर दूध पर आधारित था अब अन्न जिसे शास्त्रों में प्राण कहा गया है उसको ग्रहण कर शारीरिक व मानसिक रूप से अपने को बलवान व प्रबुद्ध बनाए। तन और मन को सुदृढ़ बनाने में अन्न का सर्वाधिक योगदान है। शुद्ध, सात्विक एवं पौष्टिक आहार से ही तन स्वस्थ रहता है और स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। आहार शुद्ध होने पर ही अन्त:करण शुद्ध होता है तथा मन, बुद्धि, आत्मा सबका पोषण होता है। इसलिये इस संस्कार का हमारे जीवन में विशेष महत्व है।
हमारे धर्माचार्यो ने अन्नप्राशन के लिये जन्म से छठे महीने को उपयुक्त माना है। छठे मास में शुभ नक्षत्र एवं शुभ दिन देखकर यह संस्कार करना चाहिए। खीर और मिठाई से शिशु के अन्नग्रहण को शुभ माना गया है। अमृत: क्षीरभोजनम् हमारे शास्त्रों में खीर को अमृत के समान उत्तम माना गया है।

चूड़ाकर्म

चूड़ाकर्म को मुंडन संस्कार भी कहा जाता है। हमारे आचार्यो ने बालक के पहले, तीसरे या पांचवें वर्ष में इस संस्कार को करने का विधान बताया है। इस संस्कार के पीछे शुाचिता और बौद्धिक विकास की परिकल्पना हमारे मनीषियों के मन में होगी। मुंडन संस्कार का अभिप्राय है कि जन्म के समय उत्पन्न अपवित्र बालों को हटाकर बालक को प्रखर बनाना है। नौ माह तक गर्भ में रहने के कारण कई दूषित किटाणु उसके बालों में रहते हैं। मुंडन संस्कार से इन दोषों का सफाया होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस संस्कार को शुभ मुहूर्त में करने का विधान है। वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ यह संस्कार सम्पन्न होता है।

विद्यारंभ

विद्यारम्भ संस्कार के क्रम के बारे में हमारे आचार्यो में मतभिन्नता है। कुछ आचार्यो का मत है कि अन्नप्राशन के बाद विद्यारम्भ संस्कार होना चाहिये तो कुछ चूड़ाकर्म के बाद इस संस्कार को उपयुक्त मानते हैं। मेरी राय में अन्नप्राशन के बाद ही शिशु बोलना शुरू करता है। इसलिये अन्नप्राशन के बाद ही विद्यारम्भ संस्कार उपयुक्त लगता है। विद्यारम्भ का अभिप्राय बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तो बालक को वेदाध्ययन के लिये भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था। माँ-बाप तथा गुरुजन पहले उसे मौखिक रूप से श्लोक, पौराणिक कथायें आदि का अभ्यास करा दिया करते थे ताकि गुरुकुल में कठिनाई न हो। हमारा शास्त्र विद्यानुरागी है। शास्त्र की उक्ति है सा विद्या या विमुक्तये अर्थात् विद्या वही है जो मुक्ति दिला सके। विद्या अथवा ज्ञान ही मनुष्य की आत्मिक उन्नति का साधन है। शुभ मुहूर्त में ही विद्यारम्भ संस्कार करना चाहिये।

कर्णवेध[संपादित करें]

हमारे मनीषियों ने सभी संस्कारों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के बाद ही प्रारम्भ किया है। कर्णवेध संस्कार का आधार बिल्कुल वैज्ञानिक है। बालक की शारीरिक व्याधि से रक्षा ही इस संस्कार का मूल उद्देश्य है। प्रकृति प्रदत्त इस शरीर के सारे अंग महत्वपूर्ण हैं। कान हमारे श्रवण द्वार हैं। कर्ण वेधन से व्याधियां दूर होती हैं तथा श्रवण शक्ति भी बढ़ती है। इसके साथ ही कानों में आभूषण हमारे सौन्दर्य बोध का परिचायक भी है।
यज्ञोपवीत के पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष के शुभ मुहूर्त में इस संस्कार का सम्पादन श्रेयस्कर है।

यज्ञोपवीत

यज्ञोपवीत अथवा उपनयन बौद्धिक विकास के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। धार्मिक और आधात्मिक उन्नति का इस संस्कार में पूर्णरूपेण समावेश है। हमारे मनीषियों ने इस संस्कार के माध्यम से वेदमाता गायत्री को आत्मसात करने का प्रावधान दिया है। आधुनिक युग में भी गायत्री मंत्र पर विशेष शोध हो चुका है। गायत्री सर्वाधिक शक्तिशाली मंत्र है।
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं अर्थात् यज्ञोपवीत जिसे जनेऊ भी कहा जाता है अत्यन्त पवित्र है। प्रजापति ने स्वाभाविक रूप से इसका निर्माण किया है। यह आयु को बढ़ानेवाला, बल और तेज प्रदान करनेवाला है। इस संस्कार के बारे में हमारे धर्मशास्त्रों में विशेष उल्लेख है। यज्ञोपवीत धारण का वैज्ञानिक महत्व भी है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी उस समय प्राय: आठ वर्ष की उम्र में यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न हो जाता था। इसके बाद बालक विशेष अध्ययन के लिये गुरुकुल जाता था। यज्ञोपवीत से ही बालक को ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी जाती थी जिसका पालन गृहस्थाश्रम में आने से पूर्व तक किया जाता था। इस संस्कार का उद्देश्य संयमित जीवन के साथ आत्मिक विकास में रत रहने के लिये बालक को प्रेरित करना है।

वेदारंभ

ज्ञानार्जन से सम्बन्धित है यह संस्कार। वेद का अर्थ होता है ज्ञान और वेदारम्भ के माध्यम से बालक अब ज्ञान को अपने अन्दर समाविष्ट करना शुरू करे यही अभिप्राय है इस संस्कार का। शास्त्रों में ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई प्रकाश नहीं समझा गया है। स्पष्ट है कि प्राचीन काल में यह संस्कार मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व रखता था। यज्ञोपवीत के बाद बालकों को वेदों का अध्ययन एवं विशिष्ट ज्ञान से परिचित होने के लिये योग्य आचार्यो के पास गुरुकुलों में भेजा जाता था। वेदारम्भ से पहले आचार्य अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने एवं संयमित जीवन जीने की प्रतिज्ञा कराते थे तथा उसकी परीक्षा लेने के बाद ही वेदाध्ययन कराते थे। असंयमित जीवन जीने वाले वेदाध्ययन के अधिकारी नहीं माने जाते थे। हमारे चारों वेद ज्ञान के अक्षुण्ण भंडार हैं। इस संस्कार को जन्म से 5वे या 7 वे वर्ष में किया जाता है। अधिक प्रामाणिक 5 वाँ वर्ष माना जाता है। यह संस्कार प्रायः वसन्त पंचमी को किया जाता है।

केशांत[संपादित करें]

गुरुकुल में वेदाध्ययन पूर्ण कर लेने पर आचार्य के समक्ष यह संस्कार सम्पन्न किया जाता था। वस्तुत: यह संस्कार गुरुकुल से विदाई लेने तथा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का उपक्रम है। वेद-पुराणों एवं विभिन्न विषयों में पारंगत होने के बाद ब्रह्मचारी के समावर्तन संस्कार के पूर्व बालों की सफाई की जाती थी तथा उसे स्नान कराकर स्नातक की उपाधि दी जाती थी। केशान्त संस्कार शुभ मुहूर्त में किया जाता था।

समावर्तन[संपादित

गुरुकुल से विदाई लेने से पूर्व शिष्य का समावर्तन संस्कार होता था। इस संस्कार से पूर्व ब्रह्मचारी का केशान्त संस्कार होता था और फिर उसे स्नान कराया जाता था। यह स्नान समावर्तन संस्कार के तहत होता था। इसमें सुगन्धित पदार्थो एवं औषधादि युक्त जल से भरे हुए वेदी के उत्तर भाग में आठ घड़ों के जल से स्नान करने का विधान है। यह स्नान विशेष मन्त्रोच्चारण के साथ होता था। इसके बाद ब्रह्मचारी मेखला व दण्ड को छोड़ देता था जिसे यज्ञोपवीत के समय धारण कराया जाता था। इस संस्कार के बाद उसे विद्या स्नातक की उपाधि आचार्य देते थे। इस उपाधि से वह सगर्व गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था। सुन्दर वस्त्र व आभूषण धारण करता था तथा आचार्यो एवं गुरुजनों से आशीर्वाद ग्रहण कर अपने घर के लिये विदा होता था।

विवाह

प्राचीन काल से ही स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यज्ञोपवीत से समावर्तन संस्कार तक ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का हमारे शास्त्रों में विधान है। वेदाध्ययन के बाद जब युवक में सामाजिक परम्परा निर्वाह करने की क्षमता व परिपक्वता आ जाती थी तो उसे गृर्हस्थ्य धर्म में प्रवेश कराया जाता था। लगभग पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का व्रत का पालन करने के बाद युवक परिणय सूत्र में बंधता था।
हमारे शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है- ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, आसुर, गन्धर्व, राक्षस एवं पैशाच। वैदिक काल में ये सभी प्रथाएं प्रचलित थीं। समय के अनुसार इनका स्वरूप बदलता गया। वैदिक काल से पूर्व जब हमारा समाज संगठित नहीं था तो उस समय उच्छृंखल यौनाचार था। हमारे मनीषियों ने इस उच्छृंखलता को समाप्त करने के लिये विवाह संस्कार की स्थापना करके समाज को संगठित एवं नियमबद्ध करने का प्रयास किया। आज उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि हमारा समाज सभ्य और सुसंस्कृत है।

अन्त्येष्टि

अन्त्येष्टि को अंतिम अथवा अग्नि परिग्रह संस्कार भी कहा जाता है। आत्मा में अग्नि का आधान करना ही अग्नि परिग्रह है। धर्म शास्त्रों की मान्यता है कि मृत शरीर की विधिवत् क्रिया करने से जीव की अतृप्त वासनायें शान्त हो जाती हैं। हमारे शास्त्रों में बहुत ही सहज ढंग से इहलोक और परलोक की परिकल्पना की गयी है। जब तक जीव शरीर धारण कर इहलोक में निवास करता है तो वह विभिन्न कर्मो से बंधा रहता है। प्राण छूटने पर वह इस लोक को छोड़ देता है। उसके बाद की परिकल्पना में विभिन्न लोकों के अलावा मोक्ष या निर्वाण है। मनुष्य अपने कर्मो के अनुसार फल भोगता है। इसी परिकल्पना के तहत मृत देह की विधिवत क्रिया होती है।

सकरात्मक विचारों को लिखें और करें प्रस्तुत

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संसार के प्रायः सभी मनुष्य का दिमाग नित नये विषयों पर सदा चलायमान रहता है। बड़े बुढ़ों से लेकर मासूम बच्चों तक का दिमाग किसी न किसी विषय पर केन्द्रित और चिंतनशील होता ही है। यदि चिंतन सकरात्मक हो तो वह व्यक्ति और समाज के लिए लाभजनक होता है। नकरात्मकता चिंतन व्यक्ति और समाज दोनों को हानि पहुँचाता है।

सभी अपनी-अपनी समस्याओं को जादू की छड़ी से सुलझाना चाहते हैं। व्यक्ति की कल्पना क्षमता की सीमा अनंत है। कल्पना की उड़ान सुदूर आकाश तक जाती है। समस्याओं पर केन्द्रति दिमाग ही हजारों, लाखों उलझनों के बीच एक-एक सिरे को मिला कर समस्या को सुलझाने का प्रयास करता है।लगातार चिंतन दिमाग को तेज प्रगामी चिंतक बनाता हैं। यही विशेष चिंतन-शोध मानवीय ज्ञान-विज्ञान-दुनिया का प्रथम सोपान होता है। यह एक प्राकृतिक और स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया ने ही विश्व सभ्यता को पहाड़ के कंदराओं से निकाल कर चाँद, सूरज, मंगल ग्रह और अंतहीन अंतरिक्ष तक पहुँचा दिया है।

चिंतनशीलता किसी खास व्यक्ति, समाज, धर्म या वर्ग की बपौती नहीं है। यह मानव मात्र को प्राप्त प्रकृति शक्ति है। हर आम और खास के दिमाग में हमेशा अनेक नई बातें जन्म लेतीं हैं। जो चिंतन के ताने-बाने को सुलझाते हुए उसे एक खास प्रारूप या ढाँचे में बाँधता है। वह अंततः उलझनों को सुलझाने का एक विशेष रास्ता तैयार करता हैं। ऐसे लाखों मनुष्यों ने ही विश्व को खरबों विषयों पर नये सृजनात्मक पहलुओं से परिचित कराया हैं। गोल पहिए की चलन गति और बिजली के सृजनात्मक प्रयोग के संयोग ने पूरे विश्व को ही बदल कर रख दिया है। यह दिमाग के चिंतनशील प्रक्रिया के द्वारा ही संभव हो सका है।

चिंतन प्रक्रिया कहीं भी चल सकती है। लेकिन खास समस्याओं को सुलझाने के लिए खास तरह की सोच का विकास और पोषण के लिए खास समर्पण की जरूरत भी होती है। समुद्री विज्ञान पर काम करने वाले अंतरिक्ष विज्ञान के लिए नये सिद्धांत नहीं गढ़ सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि हर दिमाग किसी खास लक्ष्य को लेकर चिंतन करे और खास समस्याओं को सुलझाने के लिए एकाग्रहता जुटाए।

एक मानव के दिमाग में चल रहे सकरात्मक सृजनात्मक चिंतन और शोध का असर पूरी मानव जाति पर हो सकता है। यदि ऐसे विद्वान व्यक्ति अपने विचारों को लिख कर प्रस्तुत करते हैं तो वह पूरे समाज और विश्व के लिए एक थाती बन जाता है। लेखन-रिकार्ड की स्वतंत्र लाईब्रेरी और अबाध सार्वजनिक विचार-विमर्श, मानवीय खोजी-अविष्कारक संस्कृति की पराकाष्ठा है। इस संस्कृति का हिस्सा हर शिक्षित व्यक्ति को होना चाहिए।

लेकिन यदि कोई अपने दिमाग में खोजे गए किसी खास सुलझन (Solution) को दिमाग से बाहर नहीं निकालता है और दिमाग में ही बंद रखता है तो उक्त व्यक्ति के संसार से कूच करने के साथ ही वह सृजनात्मक चिंतन हमेशा-हमेशा के लिए अंधकार में दफन हो जाता है।

कहा जाता है कि यूरोप में किसी शोधार्थी ने कपड़े की तरह मुड़ने वाला दर्पण का अविष्कार किया था, और उसे अपने राजा के लिए भेंट किया था। लेकिन ऐसा दर्पण किसी और के पास न पहुँचे यह सोच कर राजा ने अविष्कारक की हत्या करा दी। नकरात्मक सोच हमेशा नकरात्मक प्रतिफल ही देता है। उस दर्पण की खराबी के बाद नया दर्पण देने वाला और कोई अविष्कारक राजा के पास नहीं था। तब राजा को समझ में आया कि वह वास्तव में एक मूर्ख व्यक्ति है।

करीब तीस साल पहले अमेरिका में एक व्यक्ति ने एक लीटर पेट्रोल से 100 किलोमीटर चलने लायक मोटर इंजिन बनाया था। इसकी खबरें भारत में भी प्रकाशित हुआ था। लेकिन पेट्रोलियम में खरबों का लाभ कमा रहे कंपनियों ने इसे अपने लिए खतरा समझ कर उक्त खोज और व्यक्ति को ही गायब करा दिया। अंधाधुंध अतिरेक पेट्रोलियम के प्रयोग ने आज पृथ्वी को जलवायु तबाही (Climate Catastrophe) के मुहाने पर ला खड़ा है। सौ साल में पृथ्वी रहने लायक नहीं होगी। सत्ताधारी खरबपतियों का समूह अभी से ही अंतरिक्ष यान बना कर किसी अन्य ग्रह में जाने की जुगत भिड़ा रहा है। बंदर के हाथ में उस्तरा का मुहवरा इनके लिए ही बना है।

कई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि कई व्यक्तियों ने अजस्र ऊर्जा स्रोत (infinite energy source) की खोज कर ली है। अब बिना खर्च के ही हर घर रोशन होगा। प्रदुषण भूतकाल की बात हो जाएगी। लेकिन उन्हें एनर्जी लॉबी और टैक्स पर जिंदा रहने वाले सरकारों ने उसे आम जनता तक पहुँचने से रोक दिया है। बिजली से खरबों की कमाई और बिजली के द्वारा जनता के जीवन तक बनाई गई नियंत्रण व्यवस्था इससे चरमरा जाएगी। सरकार और बाजार की वर्चस्व जमींदारी बर्बाद हो जाएगी।

लेकिन यदि ऐसे व्यक्ति खतरों को भाँप कर अपने विशेष शोध और ज्ञान को
सार्वजनिक रूप से लाखों व्यक्तियों तक पहुँचा देते, तो उनका जीवन और ज्ञान दोनों ही बच जाता और मानव समाज का कल्याण हो जाता।

इसीलिए सार्वजनिक सृजनात्मक लेखन को मैं सबसे बडा इंसानी धर्म मानता हूँ। यह सभ्यता के विकास को गति देता है। यदि हर व्यक्ति अपने सृजनात्मक चिंतन को समाज के सामने लाता है, तो वह नये लाखों दिमाग को और अधिक गंभीर चिंतन करने के पथ दिखलाता है। लाखों लोगों को इससे प्रेरणा मिलती है और शोध के लिए एक पुख्ता पृष्टभूमि तैयार होता हैं। इंटरनेट ने समाज, शरीर और सोच पर नियंत्रण रखने के जंजीरों को तोड़ दिया है। वर्चस्ववादी, शोषकवादी जमींदारी प्रथा टूट सी गई है। लेकिन वह मरी नहीं है। नये-नये रूप में वह जिंदा होने की कोशिश में लगा हुआ है। वह आधुनिक मनुष्य को गुलाम बनाने की मानसिकता से उबर नहीं सकता है।

तो आईए आप कलम उठाईए, अपनी सकरात्मक चिंतन को शब्दों में पिरोईए और समाज के सामने पेश करें। सभ्यता के इमारत को तैयार करने में अपने हिस्से की एक ईंट तो दीवार में लगा ही दें। नेह 🙏👣

देश बेचने का मुखौटा है NRC, CAA

Neh Indwar

देशदमें निरंकुश, जिद्दी और अलोकतांत्रिक समूह का शासन चल रहा है। जब पूरा देश CAA और NRC, NPR के विरूद्ध में उठ खड़ा हुआ है तो गृह मंत्री कहते हैं कुछ भी कर लो हम यह कानून वापस नहीं लेंगे। यह बयान साबित करता है कि सरकार में अपरिवक्व बुद्धि के हद दर्जे की अलोकतांत्रिक शक्तियाँ काम कर रही है। लोकतांत्रिक देशों में ऐसे विषयों पर चुनाव और जनमत संग्रह के माध्यम से निर्णय लिए जाते हैं। लेकिन यहाँ तो मंत्री ही अलोकतांत्रिक आवाज़ में नारे लगा रहे हैं।
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ऐसा लगता है देश में संसाधनों की लूट के लिए CAA और NRC को मुखौटे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। जिस अंबानी की कंपनी एक महीने पहले बनी थी, उसे प्रधानमंत्री विदेश जाकर खुद लड़ाकू विमान के ऑफसेट पार्टनर बनाने के लिए विदेशी कंपनी को मजबूर करता है और 126 विमानों के बदले 36 विमान लेने के समझौता करते हैं और 60 हजार करोड़ देना मंजूर करते हैं। प्रधानमंत्री खुद जीओ को आगे बढ़ाने के लिए बीएसएनएल को 4G चालू करने नहीं देते हैं और बीएसएनएल को बीमार कंपनी में बदलने में कोई कोर कसर नहीं रखते हैं। आडानी की जिस कंपनी को काठ का नाव बनाने का अनुभव नहीं है, उसे रक्षा पनडुब्बी बनाने के ठेका दिया जा रहा है। इधर एयरपोर्ट, रेल्वे, कोयला और सरकारी कंपनियों को धड़ाधड़ प्राईवेट बनाने के काम को जल्दी-जल्दी निपटाया जा रहा है।
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ऐसा लगता है CAA और NRC बीजेपी सरकार का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि कुछेक पूँजीपतियों द्वारा देश की जनता का ध्यान बँटाने के लिए देश के सामने डाला गया एक चारा है। संसाधनों की लूट पर किसी का ध्यान न जाए और विरोध की आवाज़ उठाने का मौका ही हाथ न लगे, इसलिए बीजेपी पार्टी और सरकार को नाचने गवाने वाले अभिनेता-अभिनेत्री के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। गृहमंत्री जिस तरह से चुनौती के स्वर में देश भर में घूम-घूम कर इसके बारे प्रचार कर रहे हैं, उससे लगता है कि पूरा मंत्रिमंडल ही पूँजीपतियों के इशारों पर देश को फालतू के मुद्दों पर व्यस्त रख रहे हैं। दरअसल बीजेपी को देश भर में इतनी रैलियाँ करने की कोई जरूरत ही नहीं है। CAA कानून बन चुका है। नोटिफिकेशन भी जारी कर दी गई है। अब सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में इसकी संवैधानिकता की समीक्षा की जानी है। बाकी सरकार को सड़क पर उतरने की कोई जरूरत ही नहीं है। न ही आम जनता के साथ सख्ती से गुंडों की तरह पेश आने की जरूरत है। लेकिन सरकार अपनी ऊर्जा और समय विपक्ष की तरह प्रति-आंदोलन करने में लगा रही है। सरकार का यह व्यवहार ही सरकार के प्रति शक पैदा करने के लिए काफी है। आर्थिक मोर्चे पर देश को रसातल में पहुँचाने में सरकार हर बार सफल होते दिख रही है।

एक लोकतांत्रिक देश में जनता को हर तरीके से आंदोलन करने और अपनी आवाज़ को बुलंद करने का अधिकार है। विपक्ष का काम तो विरोध करना ही है। लेकिन असम में उठते हुए सवालों पर, नागरिकता के सबूती कागजातों पर वाजिब सवाल का सरकार के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री कोई जवाब न देकर सिर्फ थोथे मुँह से कह रहे हैं कि विपक्ष लोगों को भड़का रहा है। मंत्रियों के ऐसै बयान से लगता है पूरा मंत्रिमंडल ही अनपढ़ों का है।
अन्यथा वे देश को अनपढ़ों का झूंड नहीं समझते। आखिरकार सरकार कोई नौटिफिकेशन जारी करके क्यों यह स्पष्ट नहीं करती है कि भारतीय नागरिक को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए अंतिम रूप से क्या-क्या सबूत दिखाने होंगे ? जनता महीनों से आंदोलित है, लेकिन सरकार धमकी के स्वर में बयान तो जारी करती है, लेकिन कागजातों की कोई सूची को अंतिम बताना भी नहीं चाहती है। यह सरकार के बेईमान, कम दिमाग और बददिमाग होने का सबूत भी देता है। पूरी दुनिया के नजर में यह सरकार अर्बन नाजी सरकार के रूप में पहचान कायम कर ली है।
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असम में 13 लाख लोगों के मामले को अलग मामला बता कर देश की जनता को बेवकूफ बनाने की सरकारी कोशिश से भला कौन बेवकूफ बनेगा ? सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं है कि कैसे एनआरसी प्रक्रिया में एक ही परिवार के दो भाई एक भारतीय और एक विदेशी बन गया है। आखिर गलत कार्य करने वाले ब्यूरोक्रेसी के लिए सरकार क्यों सख्त सजा का ऐलान नहीं करती है ? गलत कार्य करके भारतीय नागरिकों की जिंदगी को नर्क बनाने वालों के उपर सरकार क्यों कोई कार्रवाई नहीं कर रही है ? देश को धर्म के आधार पर बाँटने के लिए कौन सच्चा भारतीय तैयार होगा ? ऐसा लगता है बीजेपी सरकार 1947 के पहले वाले परिस्थियों को फिर से पैदा करना चाहती है। गृह युद्ध के हालात पैदा करने की स्थिति क्यों पैदा कर रही है यह सरकार ?
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जिस तरह सरकार जन आंदोलनों के बीच देश की सम्पत्तियों को पूँजीपतियों को धड़ाधड़ बाँट रही है उससे लगता है यह सरकार हिन्दुओं के नाम पर लोगों को बेवकूफ बना कर मुट्ठी भर पूँजीपतियों को पूरा देश बेच रही है और उसकी इस बात पर विरोध का कोई स्वर न उठने पाए इसके लिए लोगों को व्यस्त रखने के लिए CAA और NRC, NPR पर देश भर में घूम-घूम कर रैलियाँ जा रही हैंं। देश के चंद पूँजीपति परिवारों के पास देश के बजट से भी अधिक की परिसंपत्ति होना इसी बात को साबित कर रहा है कि बीजेपी का यह सरकार वास्तविक रूप से पूँजीपतियों का पूँजीपतियों के द्वारा और सिर्फ पूँजीपतियों के लिए है।
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हिन्दुत्व का नारा तो बस काले करनामों को ढकने का एक नकाब है।