बड़ा होता ईश्वर का रूतबा

नेह इंदवार

ईश्वरों का उत्पादन कब से शुरू हुआ ? यह एक शास्त्रीय सवाल है।
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बहुत घनघोर शोध करने के बाद भी इस बात को निश्चित रूप से तय नहीं किया जा सका है।
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जब तक शास्त्रीय पहेली — पहले मुर्गी आई कि अंडा आया को हल नहीं कर लिया जाता है। तब तक ईश्वर के उत्पादन या खेती की शुरुआती युग के बारे कुछ भी निश्चित करना टेढ़ी खीर है।
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इस मुर्गी और अंडे की उलझन में बेचारा रंगीन कलिगा खोंसे मुर्गा किधर गायब रहता है, आज तक किसी को पता नहीं चला है।
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खास लोग कहते भी हैं चुनाँचे मुर्गा बाँग देता है तो गनीमत सुबह होता है। नहीं तो #इस_रात_की_सुबह_नहीं” वाली फिल्म हमेशा के लिए चलती रहती। नयी नवेली दुल्हन मुर्गे को क्यों दुश्मन मानती है, इसका कोई कारण तो जरूर होगा।
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इधर दुनिया में ठीक-ठाक ईश्वरों की जनसंख्या कितनी है ? यह जानना भी टेढ़ी खीर बन गया है। जितनी ब्रह्मांडलीय ईश्वरों की संख्या है, उससे अधिक स्थानीय, राज्य स्तरीय, देश स्तरीय और महादेशीय स्तर के ईश्वरों की संख्या है। कुछ ईश्वर पानी की गहराइयों में तो कुछ दुरूह पहाड़ों में रहते हैं। सर्वेयर सब जगह जाने से साफ मना कर देते हैं। टीए डीए भी अधिक खर्च होता है।
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लेकिन ईश्वरों को त्यागने, अपनाने, गले लगाने की रफ्तार इतनी ज्यादा है कि कौन सा नया ईश्वर का जन्म लेटेस्ट रूप से हुआ है और कौन सा ईश्वर इन सभी क्रियाओं के बीच मैदान छोड़ कर निकल गए है या बेसहारे हो गए है, का ठीक-ठाक लेखा जोखा रखना जोखिम भरा हो गया है।

इधर ईश्वरों के इलाकों की सीमा में भी लगातार बढ़ोतरी या घटोतरी होते रहती है।
कभी एक सभ्यता के एकछत्र ईश्वर होने के ऐलान करने वाले ईश्वर तब दूसरे इलाके के सभ्यता का भी ईश्वर हो जाते हैं, जब दूसरे इलाके के लोग पहले इलाके की सभ्यता, भाषा, संस्कृति, सोच, आस्था को अपना लिए होते हैं, और उनके भजनों को उनसे भी अधिक तन मन लगा कर गाते हैं।
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फिर ईश्वर के इलाके का विस्तार उन इलाकों में भी हो जाता है जो पहाड़, मरूभूमि, नदी, समुद्र के उस पार के इलाके होते हैं। क्योंकि तब वहाँ के लोगों ने भी पहले इलाके वालों का ईश्वर को अपना लिये होते हैं।
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इस तरह एक छोटी सी जगह का स्थानीय शर्मिला ईश्वर का साम्राज्य बड़ा होता जाता है। पहले पहल सभी ईश्वर एक क्षेत्र विशेष के स्थानीय ईश्वर होते हैं। फिर रूतबा बढ़ता जाता है। फिर गाँव, प्रदेश, देश, महादेशों में ईश्वरों का रूतबा बढ़ते-बढ़ते स्थानीयता, परा स्थानीयता की दीवार को तोड़ कर ब्रह्मांडलीय ईश्वर का रूतबे और सम्मान पा जाते है।

ईश्वरों की दुनिया में भी कम्पिटीशन बहुत बढ़ गया है। भक्तगण पहले अपने-अपने ईश्वर को पूरी दुनिया का बताते थे। लेकिन तमाम कंपिट्टीटर जब अपने अपने ईश्वरों के लिए पूरी दुनिया का ईश्वर शब्द का इस्तेमाल करने लगे तो चालाक लोगों ने उसे पूरे पृथ्वी का ईश्वर घोषित कर दिए। जाहिर है कि “दुनिया” में सिर्फ महादेश ही शामिल हैं। लेकिन “पृथ्वी” में तो सात समंदर भी अटैच किया हुआ है। मतलब “दुनिया” से “पृथ्वी” बड़ी।

चूहे दौड़ की ऐसी कम्पिटीशन का कोई अंत नहीं है। जब लोग बाग अंतरिक्ष की बातें करने लगे तो कम्पिटीशन में लगे लोग चौंक गए और अपने ईश्वर की रूतबा, जिसमें सोना, चाँदी, रूपये पैसे सब शामिल है, की जमींदारी परिधि को बढ़ा कर ब्रह्माण्डलीय कर लिए।
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….. कम्पिटीशन इतना जबरदस्त है कि जल्दबाज़ी में सौर परिवार और गैलेक्सी शब्द छूट गए। अब वैज्ञानिक multiverse की बात कर रहे हैं। अब ईश्वरों का रूतबा एक ही ब्रह्मांड में रहेगा कि बहु-ब्रह्मांड में फैलेगा ??
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देखें ब्रह्मांडलीय ईश्वर का अगला पद कौन से शब्दों से नवाजा जाता है।
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इस बीच ईश्वरों की जनसंख्या और उनके उत्पादन की प्रागैतिहासिक विवरण जुटाने के लिए एक वैश्विक घोषणा करके शोध जारी रखना होगा।
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इस बीच अंडे और मुर्गी की पहेली को भूल कर लोगबाग चिकन कबाब और अंडे पकौड़ी की पार्टी का आयोजन कर रहे हैं। यदि पहेली सुलझ जाएगी तो जाने क्या परिणाम होगा। या तो मुर्गी को गौरवबोध होगा या अंडे को।

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धर्म नहीं देता कोई प्रमाण

नेह इंदवार

धर्म का अविष्कार मानवीय अविष्कार है। यह आकाश या किन्हीं अन्य ग्रह, नक्षत्र या समुद्र की गहराईयों को चीर कर या और कहीं से उड़ कर नहीं आया है।…… भगवान या ईश्वर की परिकल्पना विशुद्ध मानवीय परिकल्पना है। ……..जब विज्ञान का विकास नहीं हुआ था, तब जनसाधारण को बताने के लिए धर्म ही विज्ञान के स्थान पर कार्यरत था। विज्ञान का अर्थ ही है विशेष ज्ञान। लेकिन यह विशेष ज्ञान ठहरे हुए न होकर निरंतर अनुसंधान और समीक्षा के द्वारा अपने आप को माँजता रहता है। विज्ञान अपनी हर क्रिया को बार-बार दुहराता है और हर बार उसकी क्रिया का एक निश्चित मान या फल मिलता है। वह अपनी आलोचना का खुले दिल से स्वागत करता है। वह किसी बात को बिना प्रमाण के मानने की बात नहीं करता है। ……. मानव का दिमाग यूनिवर्स के सबसे रहस्यमय मशीन है। यह दिन-रात सदा कार्यरत रहता है। इसी के निरंतर कार्यरत रहने के कारण मानव जाति का विकास प्रकृति के इत्तर कृत्रिम रूप से भी होने लगा और आज मानव इसी कृत्रिमता के सहारे मंगल ग्रह और खरबों किलोमीटर अंतरताराकीय शून्यता तक जा पहुँचा है। ……………….आज धर्म संबंधी तमाम बातें खोखले साबित हो चुके हैं। धर्म एक ही बात को बिना जाँचे परखे, आँख बंद करके विश्वास करने के लिए कहता है। यह पोपले-पोपले बातें करता है। वह ऐसी बातें करता है, जिस पर खुद उसे विश्वाास नहीं है और ना ही वह उसे जाँचने. परखने उसे साबित करने की बातें ही करता है। वह जिस आस्था की बात करता है उसी आस्था के बल पर वह न तो विष पीकर उसे सच्चा साबित करने के लिए तैयार होता है और न आस्था के ईश्वर या शक्ति पर विश्वास करके किसी ऊँचे पहाड़ से छलांग लगा कर उसे सच्चा साबित करने के लिए तैयार होता है। वह उस मृत्यु के बाद की जीवन (स्वर्ग और नर्क) पर अपना तन-मन-धन को निवेश करने के लिए कहता है, जिसके रिटर्न के बारे दुनिया में किसी को कोई जानकारी नहीं है। इसके परिणाम के बारे खुद मर कर साबित करने के लिए धर्म के कोई ठेकेदार तैयार नहीं है। धर्म बेवकूफी की बातें करता है और पूरी दुनिया को उसी पर बिना प्रत्यक्ष परिणाम के विश्वास करके समर्पण करने के लिए कहता है। यह अविश्नीय रूप से व्यवहार करता है। …………यह कमोबेश साबित हो चुका है कि है यूनिवर्स के करोड़ों ग्रहों, उपग्रहों में जीवन की उत्पत्ति हो चुकी है और हजारों ग्रहों में मानव से भी लाखों वर्ष एडवांस तकनीकी से लैस बुद्धिमान जीव मौजूद हैं और वे पूरे यूनिवर्स में पर्यटन करते रहते हैं। यूएफओ और पृथ्वी पर बने ऐसे अनेक पुरातात्विक चिन्ह् मौजूद है जो अंतरताराकीय दुनिया में बुद्धिमान जीवों की उपस्थितियों के सबूत पेश करते हैं। ………….. वर्तमान एलिट सरकारों और आर्थिक रूप से शक्तिशाली धर्म संगठनों के दबाव में नासा या अन्य स्पेस एजेंसियाँ एलियन की मौजूदगी की पुष्टि नहीं करते हैं। उन्हें लगता है कि इसकी विधिवत घोषणा से वर्तमान सत्ता और धार्मिक व्यवस्था, पूँजीवादी बाजार व्यवस्था, गाँवों में खेती करते किसान से औने पौने दामों में खरीद कर शहरों में पहुँचाने वाले और बड़े-बड़े अट्टालिकों में उन्हें शान से चबाने वालों की सप्लाई व्यवस्था की पूरी तामझाम व्यवस्था ही बिखर जाएगी। पूरी सभ्यता ही बिखर जाएगी। …………..एक ओर दूसरों की कमाई पर पलने वाले, दूसरों के घरों के नीचे स्थित प्राकृतिक संसाधनों पर टिकी हुई अंतर्राष्ट्रीय शोषण व्यवस्था के अनुसार अभिजात लोगों के द्वारा बनाई गई बेढंगी, असमानताओं से भरी हुई शोषण की दुनिया है। ……………………. वहीं धर्म के नाम पर लोगों के दिमागों को कुंद करके बनाई गई एक धार्मिक शोषण की दुनिया है।……. जिसका अध्यात्मिकता या मानव की अद्भूत दिमागी शक्ति या प्राकृतिक आत्म या आत्मिक शक्ति से कोई लेना देना नहीं है, का शोषण का ढाँचा है। इन दो ढाँचा ही दुनिया की राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, सप्लाई व्यवस्था को अपनी मुट्ठी में कैद करके रखा है।………… तमाम धर्म मानवीय मेधा शक्ति को इन्हीं अभिजात वर्ग के हित में कार्य में लगाने का उपकरण है। याद रखें इन धर्मों का सारा कारोबार रूपये पैसे, रूतबा, वर्चस्व, भीड़ आदि की ताकत पर टिकी हुई है। भीड़ की ताकत बनी रहे इसीलिए प्रत्येक धर्म अपने अनुयाईयों को किसी और धर्म की भीड़ में जाने से रोकने के लिए जी जान लगा देते हैं। ………..जहाँ कहीं विज्ञान को जानने का जनता को मौका लगा। वैज्ञानिक कारणों और कारकों पर विश्लेषण करने और उन्हें समझने का मौका मिला। लोगबाग धर्म की भेड़चाल और धर्म संगठनों के मनोवैज्ञानिक कब्जे से बाहर निकल गए हैं।…………………….. लेकिन अफसोस !! दुनिया में अभी भी अधिकतर मानव जनसंख्या को मुकम्मल शिक्षा लेने और उन शिक्षा के माध्यम से नये विकसित विचारों, नये पद्धतियों से, वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक यथार्थों से परिचित होने के मौके नहीं मिले हैं और वे धर्म की ढकोसलों को समझने में असमर्थ हैं। ऐसे ही लोगों को धार्मिक संगठन अपने कब्जे में लेने के लिए उन्हें व्यर्थ की कथाओं, कहानियों, संस्कृतियों, पोथियों की बातें सुनाते हैं और उनके दिमाग पर कब्जा करते हैं। सभी धर्म अपनी अपनी जमींदारी को आगे बढ़ाने, उसे बनाए रखने और उससे अपने हित साधने के लिए तन-मन-धन लगा देते हैं। जो इनके कार्यों की गहराई से समीक्षा करते हैं वे इसे समझने का प्रयास करते हैं और उनके चंगुल से निकल जाते हैं, और जो अपने दिमाग, विवेक का इस्तेमाल नहीं करते हैं, इन धर्मों की गुलामी करते रहते हैं।

आस्था और मान्यताएँ

Himanshu Kumar

जो आस्था सत्य से आहत हो जाती हो उस आस्था को मर जाना चाहिए

पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी को कुछ धारणाएं कुछ मान्यताएं कुछ विश्वास और कुछ परंपराएं देती है

ज्यादातर लोग पुरानी धारणाओं मान्यताओं विश्वास और परंपराओं को आंख मूंद कर स्वीकार कर लेते हैं और पूरी जिंदगी उन पर चलकर मर जाते हैं

लेकिन कुछ लोग इन धारणाओं मान्यताओं विश्वास और परंपराओं को तर्क समझ और विज्ञान के आधार पर इनकी जांच करते हैं

इन्हें परखते हैं इनसे विद्रोह करते हैं इन्हें छोड़ते हैं दफन कर देते हैं और आगे बढ़ते हैं

मनुष्य पहले गुफाओं में रहता था

आज मनुष्य जहां पहुंचा है वह पुराने को छोड़ते हुए नए को खोजते हुए पहुंचा है

मनुष्य को अतीत बड़ा सुरक्षित और प्यारा लगता है

क्योंकि अब अतीत सिर्फ उसकी स्मृतियों में है वह उनमें जैसे चाहे कल्पना के रंग भर सकता है

वह कल्पना कर सकता है कि मेरे पैगंबर गधे पर बैठकर सातवें आसमान पर जाकर अल्लाह से मिलकर आए या उन्होंने उंगली से चांद के दो टुकड़े कर दिए

या मनुष्य कल्पना कर सकता है कि उसके भगवान ने सूरज को निगल लिया था या पहाड़ उखाड़कर हाथ पर रखकर हवा में उड़ गए थे

मनुष्य असलियत में शारीरिक रूप से अन्य जानवरों के मुकाबले काफी कमजोर है

मनुष्य बिना हथियार की मदद के ना हाथी का मुकाबला कर सकता है ना शेर का

इसलिए मनुष्य ने खुद के ताकतवर होने की कल्पना करी और कहानियां बनाई

इन कहानियों में मनुष्य के पैगंबर या देवता और भगवान बहुत ताकतवर होते हैं

और वे सब कुछ कर सकते हैं वे उड़ सकते हैं वह तूफानों को रोक सकते हैं वह मरो को जिंदा कर सकते हैं

कल्पना की दुनिया से निकलने के बाद मनुष्य खुद को जिंदगी की चुनौतियों से घिरा हुआ पाता है

जिंदगी की हकीकत की चुनौतियों से बचकर भागने के लिए वह अतीत की ताकत से भरी कहानियों के नशे में डूबा रहना चाहता है

इसलिए आप देखेंगे कि मानव समाज को गुलाम बनाकर उनका शोषण करने वाले सत्ताधारी उन्हें अतीत की कहानियों में बहलाने की कोशिश करते हैं

इसलिए कभी वह आपको अल्लाह और पैगंबर की कहानियां सुनाकर उस जमाने में ले जाने की कोशिश करते हैं

कहीं वह आपको राम की कहानी सुनाकर राम के जमाने को फिर से जिंदा कर देने की कल्पना से बरगलाते हैं

लेकिन अब अतीत कभी नहीं आएगा

अतीत अब कहीं नहीं है

अतीत अब सिर्फ आपकी कल्पना में जिंदा है

वह आपको आपकी कल्पनाओं का गुलाम बना लेते हैं

तो आप जीते तो है वर्तमान में लेकिन दिमाग खोया रहता है अतीत में

वह आपके वर्तमान का शोषण करते हैं

लेकिन क्योंकि आपका दिमाग वर्तमान में है ही नहीं

वह तो पैगंबर या भगवान और देवताओं की कल्पनाओं में खोया हुआ है

तो आप अपने वर्तमान की चुनौतियों को न समझ पाते हैं ना लड़ पाते हैं ना बदल पाते हैं

यही सत्ता का षड्यंत्र है आपके खिलाफ

आप की धार्मिक सत्ता और राजनीतिक सत्ता का आपस में गठजोड़ है

यह गठजोड़ बहुत पुराना और बहुत गहरा है

लेकिन आप धर्म और राजनीति को अलग समझते हैं

इसलिए आप को गुलाम बनाकर रखना बहुत आसान हो चुका है

जब तक मनुष्य अतीत की कल्पनाओं से निकलकर वर्तमान को खुली आंखों से देखकर

उसे बदलने के लिए काम नहीं करेगा

तब तक इंसानी समाज लड़ाईयों, गरीबी बीमारी और तकलीफ में डूबा रहेगा

#Dooar_Terai_संस्मरण

#Dooar_Terai_संस्मरण : Neh Indwar

हिमालय पहाड़ के दक्षिणी उच्च भूमि में बसे डुवार्स और तराई के हरे-भरे, खेत-खलिहान, जंगलों के बीच में करीब 300 बड़े चाय बागान हैं और निजी और छोटे-छोटे कई हजार प्रोजेक्ट चाय बागान हैं। बड़े-बडे़ जंगलों में शीशम, सगौन के पेड़ों के बीच हाथी, बैसन, हिरण, चीता बड़े ठाठ से विचरण करते हैं और कभी-कभी चाय बागानों में आदमी से मिलने के लिए भी चले आते हैं।
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पहाड़-जंगलों के समीप बसे इन चाय बागानों को कभी भोटांग राईज कहा जाता था। छोटानागपुर के आदिवासियों के बीच इसे कचिया राईज भी कहा जाता था। कचिया मतलब पैसा। 1860 के दशकों से जनसमूहों के सैलाब पैसा कमाने के लिए छोटानागपुर, संताल परगाना, उड़िसा, जशपुर क्षेत्रों से लोग आते गए और चाय बागान में कचिया कमाने के लिए काम करने लगे। तब विक्टोरिया इम्प्रैस के नाम से चाँदी के सिक्कों का चलन था।
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आदिवासी संस्कृति में तब तक पैसे का चलन अधिक नहीं था और सामाज में लोग अपने समानों की अदला-बदली करके स्थानीय अर्थ व्यवस्था का ताना-बाना बुने हुए थे। लेकिन जब वे चाय बागानों में आए तो यहाँ बर्टर संस्कृति के उलट पैसे के मूल्य के साथ परिचय हुआ। तब चाय बागानों में भी चाँदी के रूपये चलते थे। 1939 तक शुद्ध चाँदी के सिक्के का चलन था। लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध में चाँदी का अकाल पड़ जाने के कारण बाद के सालों में अन्य धातु मिले हुए चाँदी के पैसे मिलते थे।

छोटानागपुर के पठारों में प्राचीन काल से ही हीरे और सोने मिलने के जिक्र बहुत मिलते हैं। लेकिन आदिवासी समाज में चीजों के बाजार-मूल्य का सर्वथा अभाव था। समाज में धन संपत्ति जमा करने की लोपुपता और दूसरे से अधिक धनवान बनने की कोई प्रवृत्ति नहीं थी। पूरा समाज ही समाजवाद के अघोषित आदर्शों से पोषित था। धन सम्पत्ति के बल पर आदिवासी समाज में कोई बड़ा और महान नहीं होता था। बड़ा और महान की अवधारणा ही गैर-आदिवासी अवधारणा और मूल्य है।

बट्टा पद्धति या Barter systems के समाज से जब आदिवासी बाजार आधारित समाजों के संपर्क में आए तो उन्हें पैसे के मूल्य से परिचय प्राप्त हुआ। अपने परिश्रम के मूल्य को बचा कर भविष्य में मनचाहा उपयोग करने के नये आईडिया भी उन्हें मिला। इसके पहले वे अपनी बचत का मनचाहा उपयोग नहीं कर पाते थे। इन कचियों से (वापस जाकर) देस में नये विकसित संसार की रचना करने का भी आईडिया अधिकतर के दिमागों में आया। लेकिन अधिकतर आदिवासी अपने नये परिवार के साथ हमेशा के लिए डुवार्स-तराई में ही बस के रह गए।
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बहुतों ने चाँदी के रूपयों को बचा कर रखा, जो देश की स्वतंत्रता के बाद सम्पत्ति के रूप में उनके पास बचा रह गया। स्वतंत्रता के बाद सरकार ने चाँदी के सिक्कों का चलन बंद कर दिया था। आज भी अनेक घरों में चाँदी के सिक्के, पुरखों की निशानी और विरासत के रूप में मौजूद हैं।
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चाय बागानों में चाय मजदूरों को कभी भी श्रम का पूरा प्रतिदान नहीं मिला। बागान मालिक हमेशा मजदूरों का शोषण करके अपने मुनाफा को बढ़ाने का प्रयत्न ही किया है। तथापि आज की तुलना में सरकारी-अन्य गैर सरकारी क्षेत्रों से तुलनात्मक रूप से बीच इतनी असंतुलन नहीं थी। शोषण की मार इतनी भयानक नहीं थी।
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जब हम स्कूल में पढ़ते थे, कई बार सुनते थे कि अमुक चाय बागान के अमुक शिक्षित भैया-दीदी को राज्य सरकार, केन्द्र सरकार के किसी विभाग, किसी उपक्रम में नौकरी लगी है। इक्का दुक्का लगने वाले इन नौकरियों की ख़बरे आग की तरह चारों ओर फैल जाती थी। स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थयों के लिए इस तरह की ख़बरें किसी चमत्कार से कम प्रतीत नहीं होती थीं। एयर लाईंस कंपनियों में किसी के एयर होस्टेज बन जाने की ख़बरें तो लड़कियों को और पढ़ने के लिए जादू की छड़ी सा काम कर जाती थीं।
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लेकिन तब हम बहुत आश्चर्यचकित हो जाया करते थे, जब हमें सुनने को मिलता था कि कोई भैया किसी शहर की सरकारी नौकरी को छोड़कर वापस आ गया है और वह चाय बागान में बाबु बन गया है। तब हम चीजों को गहराई से समझ नहीं पाते थे। तब शायद सरकारी दफ्तर और बागान के बाबु के वेतन में ज्यादा अंतर नहीं होता था। लेकिन आज दोनों के बीच कम से कम 15-30 हजार का सहज अंतर है। आज बागान का बाबु कोई भी सरकारी दफ्तर में मिले सरकारी नौकरी को लपक लेता है।
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इसका निष्कर्ष यही है कि तब चाय बागान और अन्य क्षेत्रों के श्रममूल्यों में बहुत अंतर नहीं था। चाय बागान मजदूर और बाहरी क्षेत्रों के मजदूरों के मजदूरी में भी आज की तरह आकाश-पाताल का अंतर नहीं था। तब लोगों के चेहरे आज की तरह निस्तेज नहीं होते थे। आदिवासी समाज में लोगों की औसत लम्बाई 5 फीट 5 इंच की होती थी। लेकिन आज औसत लम्बाई 5 फीट से भी कम रह गया है। पहले लोगों की औसत आयु 70-80 साल हुआ करती थी, लेकिन आज चाय बागानों में बड़े बुढ़े लोग देखने में भी नहीं आते हैं। जब किसी शेर को माँस के बदले नियमित रूप से घास खिलाएँगे तो वह हिरण तो क्या मुर्गी का शिकार भी नहीं कर सकता है। लगता है यही हाल हो गया है डुवार्स तराई के चाय मजदूरों का। #Dooar_Terai_संस्मरण नेह इंदवार
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संस्मरण की अगले पोस्ट में पढ़े – चाय बागानों में चिट फंड के माध्यम से ठगी की शुरूआत …….

कर्मकांड बनाम आध्यात्मिकता

नेह अर्जुन इंदवार

भारत में गरीबों, अनपढ़ों, तथाकथित पिछड़े समाजों का आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, मनोवैज्ञानिक, शारीरिक शोषण का आधार मानवीय दिमाग से सृअजित धर्म ही है।
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मानवीय दिमाग ने धर्म, ईश्वर, स्वर्ग, नरक, पूजा-पाठ, पर्व त्यौहारों, पैसों और पैसे के समतुल्य मूल्यवान वस्तुओं का चढ़ावा, खास लोगों के लिए जबरदस्ती सम्मान और श्रद्धा आदि का ऐसा भूलभुलैया तैयार किया गया है कि जो अनपढ़, गरीब और अतार्किक समाज है, वह उससे बाहर निकलने का रास्ता कभी ढूँढ़ नहीं पाता है। उसकी तह तक पहुँचने का मेधा शक्ति को वह कभी प्राप्त नहीं कर पाता है, क्योंकि तार्किक विश्लेषण-चर्चा की सांस्कृतिक वातावरण के विकास को बड़ी चतुराई से नष्ट कर दिया जाता है। यह किसी एक भारतीय धर्म की बात नहीं है। भारत में अभ्यास किए जा रहे सभी धर्मों की यही रामकहानी है।
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ऐसा तबका धर्म के गोरखधंधे में पड़कर अपने को कमतर समझ लेता है। कमतर से अधिकतर बनने के लिए वह धर्म की शरण लेता है। धर्म के केन्द्रीय कक्ष में स्थित ईश्वर की परिकल्पना के नाम पर धर्म ऐसे लोगों को अपने कब्जे में ले लेता है। फिर वहीं से उसका मानसिक तथा अन्य शोषण शुरू होता है।
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कई महात्मा, ऋषि सहित बुद्ध ने किसी मानव या मानवीय सदृष्य सा किसी ईश्वर के वजूद पर इंकार किया है। पेरियार ने इस बात पर गहण अध्ययन किया और भारतीय शोषण मॉडल के पीछे छुपे ईश्वर को देख लिया था। यह ईश्वर असली ईश्वर नहीं है, बल्कि शोषण के लिए तैयार किए गए ईश्वर हैं।
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प्राकृतिक शक्ति या ईश्वर न कभी अवतार लेता है, न अवतार लेकर मानवीय कार्यकलाप अर्थात् सांस्कृतिक, भाषाई, सामाजिक, राजनैतिक कार्यकलाप करता है। वह न किसी से नफरत करता है और न किसी से युद्ध करता है और न किसी को अपना दुश्मन समझता है, न ही वह जादुगरों की तरह कोई जादू या करतब दिखाता है।
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ये सारे कार्य तो शोषण के लिए तैयार किए गए ईश्वर करते हैं। इन्हीं ईश्वर और ईश्वर प्रेरित धर्म के नाम पर मानव को ऊँच, नीच, छोटा, बड़ा, अमीर, गरीब, इज्जतदार, गैर इज्जतदार बनाया गया है और इसका लाभ ऐसे ईश्वरों के रचयिताओं को पीढ़ी दर पीढ़ी हो रहा है। जो भी इन मानवकृत ईश्वरों के पीछे गया वह यदि कोई खास वर्ग का नहीं है तो शोषण का शिकार जरूर बनता है। क्योंकि ऐसे ईश्वर के नाम पर मनोवैज्ञानिक असर करने वाले ऐसे सिद्धांतों पर विश्वास करना और उन पर चलना होता है, जो उन्हें मानवीय उच्चगुणों से पदच्यूत करता है। ऐसे ईश्वर के नाम पर आम जनता को सम्पत्ति से वंचित किया गया। विद्या और ज्ञान प्राप्त करने से रोका गया। उन्हें निकृष्ट जीवन जीने के लिए बाध्य किया गया। उन्हें जानवर से भी अधिक घृणित माना गया। गरीब, अनपढ़, तर्कहीन समाज इन सिद्धांतों को ईश्वरीय और प्राकृतिक समझने और तदनुसार व्यवहार करना शुरू कर देता है।
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मनुष्य एक प्राकृतिक उत्पाद है। सभी मनुष्यों को प्राकृतिक ने एक सा बनाया। मानवीय मेधा ने मनुष्यों के विकास के लिए सभ्यता का विकास किया और सभी को सभ्यता के गुणों का लाभ मिलने लगा। लेकिन शोषण और ऊँच-नीच की अवधारणाओं से प्रेरितों ने शोषण का मॉडल विकसित किया और उसे तर्कहीन, अंधविश्वासी समाजों पर थोप दिया।

इसी सभ्यता ने आध्यात्मिकता का भी विचार दिया। आध्यात्मिकता के विचारों में कोई कर्मकांड नहीं होता है। कोई ऊँच नीच नहीं होता है। न उसका कोई धर्म होता है और न उसका कोई स्थल होता है। उसका कोई धर्म संगठन या समुदाय भी नहीं होता है। दुनिया के तमाम आध्यात्मिक महापुरषों ने प्राकृतिक शक्तियों की उपासना, ध्यान मार्ग को अपना कर किया। इसे तप भी कहा गया है। मेडिटेशन, ध्यान या तप के माध्यम से प्राकृतिक के रहस्यों तक पहुँचने की भारतीय परंपरा भी है। आज भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो मेडिटेशन के बल पर आध्यात्मिकता की दुनिया में किसी ऊँचे मुकाम पर पहुँचे हैं। आत्मात्मिकता के ऊंचे अटारी में पहुँच कर उन्होंने क्या-क्या देखा और क्या-क्या पाया, इसकी वे न तो प्रचार करते हैं और न प्रदर्शनी लगाते हैं।
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आध्यात्मिकता की दुनिया में पहुँचने के लिए व्यक्ति को न तो किसी धर्म स्थल में जाना होता है, न ही पैसों की चढ़ावा देना होता है और न ही किसी धार्मिक कर्मकांड की शरण लेना होता है। धर्म के नाम पर मलाई खाते धंधेबाज इस परंपरा को प्रोत्साहित नहीं करते हैं। क्योंकि इसमें कमाई नहीं है। धर्म के नाम पर परजीवी बने लोगों को भक्तों की कमाई का हिस्सा चाहिए। उन्हें रूपये पैसे चाहिए या रूपये पैसे के समकक्ष दूसरे चढ़ावा। इसके बिना वे न कोई कर्मकांड करते हैं और न करेंगे। पैसे प्राप्त करने के लिए उनके पास हजार दूसरे बहाने होते हैं। बस आदमी को धर्म के धंधे में ग्राहक बन कर पास लाना होता है। ऐसे धंधेबाजों की ठाठ के क्या कहने।
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लेकिन अमेरिका का NASA रूस का Roscosmos State Corporation for Space Activities, कई विश्वविद्यालय, कई वैज्ञानिक संस्थान आदि में Meditation के माध्यम से अत्यंत गहन शोध कार्य किए जा रहे हैं। ये शोध प्राकृतिक में स्थित अदृष्य आयाम (Dimensions) में जाने और प्राकृतिक रहस्यों को समझने, सुलझाने के रास्ते तलाश रहे हैं। मेडिटेशन की शक्ति के माध्यम से एक महाशक्ति दूसरे महाशक्ति के एटमी जखीरे के नियंत्रण पर सेंध लगाने, उस पर दूर से नियंत्रण करने के तरीके तक तलाश रहे हैं।
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क्योंकि मानव दिमाग यूनिवर्स का सबसे रहस्यामय मशीन है। इस मशीन ने ही दुनिया में सभ्यता का विकास किया। यह मशीन ही मनुष्य को बौद्धिक शक्तिमय बना कर उसका उद्धार भी करता है। धर्म के कई प्रवर्तकों ने दिमाग की इसी शक्ति के बल मानव उद्धार की बात की है। प्रार्थना भी इसी प्रक्रिया का एक अत्यंत छोटा सा हिस्सा है। लेकिन अकेले एकांत में गहन मेडिटेशन करने वालों से धार्मिक कर्मकांड करके पैसे कमाने वालों को कोई आर्थिक लाभ नहीं होता है न उनकी धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, वर्णवादी और जातिवादी वर्चस्व-जमींदारी बढ़ता है। सतही धार्मिक कर्मकांडों से कभी किसी का न उद्धार हुआ है और न विकास। यह एक भूलभुलैया है। गंभीर चिंतन रहित लोग इस में खो कर रह जाते हैं। धर्म के रास्ते भारतीयों की गरीबी, अशिक्षा और पिछड़ापन कभी भी खत्म नहीं होगा। यह निर्विवाद सत्य है।

सस्ती संचार सेवा के लड्डू

                                                नेह अर्जुन इंदवार
एक बिलियनियर्स कंपनी ने एक ही केबल से इंटरनेट, टीवी केबल, लैंड लाईन की सेवा देने की घोषणा की है। जाहिर है कि बाजार में अत्यंत सस्ते मिलने वाली इस प्रकार की सेवा से आम जनता जल्द ही जुड़ जाएगी।
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दूसरी ओर यही कंपनी देश के अधिकतर खबरिया चैनलों के मालिक भी हैं। कई अखबार कंपनियों पर भी इनका अधिकार है। मतलब देश में पत्रकारिता के बड़े अंश में काम करने वाले, जनमत बनाने वाले पर इनकी मजबूत पकड़ बनी हुई है।
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इंटरनेट पर आप क्या करते हैं ? टीवी पर आप कौन सा कार्यक्रम देखते हैं ? लैंड लाईन पर आप किनसे बात करते हैं ? आपके यार दोस्त, परिवार के सदस्य, बिजिनेस पार्टनर के बारे पता करने के लिए एक ही केबल काफी होगी। जाहिर है कि आपकी आर्थिक, राजनैतिक, मनोवैज्ञानिक, विचारधारा संबंधी जानकारी एक ही जगह इकट्ठे होते रहेंगे। जस्ट गुगल के डेटा सेंटर में जमा होने वाली जानकारी की तरह। लेकिन कई जानकारियाँ गुगल में जाने से बच भी जाती हैं। लेकिन यहाँ बचने की गुंजाईश नहीं रहेगी।
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आप बाजारवाद के एक ऐसे युग में पहुँच रहे हैं, जहाँ आपका अपना निजी कुछ भी निजी नहीं रहेगा। आपके जन्म कुंडली की सारी बातें किसी कम्प्यूटर में दर्ज होगी और सिर्फ एक क्लिक से सौ पेज की जानकारी किसी के टेबल पर हाजिर हो जाएगी। आपकी ताकत और आपकी कमजोरी बाजार में बिकने वाली टैबलेट बन जाएगी।
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इस नये “एक_छत_के_नीचे_सभी_सस्ती_सेवा_पाईए” के बाजार में आपको संविधान में हासिल कई मूलाधिकार सहित “अभिव्यक्ति की आजादी” आपकी आजादी नहीं रह जाएगी। यह किसी पूँजीपति, नेता, नौकरशाह, डेटा प्रबंधन, हैकर के हाथों की रिमोट कंट्रोल बन जाएगी।
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यदि आप किसी नीति, अनीति, वृत्ति, पूँजी, संसाधनों के गलत उपयोग, दूरूपयोग की बात करेंगे, किसी नीति के जनविरोधी होने के विरोध में आवाज़ उठाएँगे तो आपकी जन्म कुण्डली एक मिनट में निकाल ली जाएगी और आपके विचार अनुकूल नहीं होंगे तो आप प्रतिकूल परिस्थिति में होंगे।
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नये काले कानूनों के तहत आपको बहुत सहजता से अवांछित तत्व घोषित कर दिए जा सकते हैं। उन्हें आरोप सिद्ध करने की जरूरत नहीं होगी, बल्कि आपको खुद को निर्दोष साबित करने के लिए पापड़ बेलने होंगे।
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सोचिए यदि आप सत्ता और अथाह पूँजी से जुड़े एक गैर-दयालू व्यक्ति हैं। तो आपके हाथों में क्या-क्या शक्ति केन्द्रीत होगी ?
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लोकतांत्रिक जनमत के सृजन, संचार के राजपथ में :- जब दोनों ही दिशाओं के लेन पर आपका नियंत्रण हो जाएगा तो आप लोकतांत्रिक स्वर्ग और नरक को संचारित करने वाले भगवान बन जाएँगे। आपकी मुट्ठी में देश के अधिकतर जनमत निर्माता मीडिया और जनसंचार सेवाएँ कैद हो जाएँगे, एक-एक व्यक्ति के चिंतन और अभिव्यक्ति कार्यकलाप पर आपके माऊस की पहुँच होगी, तो जाहिर है कि आपके सामने आम जनता की अभिव्यक्ति की आजादी बाजार में तेल लेने चली जाएगी।
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यदि ऐसी स्थिति में आप (वोटर) देश में जनकल्याणकारी, लोकतांत्रिक, उत्तरदायित्वपूर्ण सरकारी की अपेक्षा करेंगे तो यह आपका भोलापन होगा। सरकार किसी भी पार्टी या विधारधारा का हो, वह कभी दयालू और स्वार्थहीन नहीं होती है। वह सिर्फ जनभावना के दबाव में ही दयालू और स्वार्थहीन दीखने की कोशिश में लगी हुई होती है। भ्रष्टाचार सरकार का पाँचवा स्तंभ हो गया है। भ्रष्टाचार सभी प्रकार के भोजन का मुख्य आचार है। https://www.transparency.org/ की रिपोर्ट देख लें। अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि गरीब और अशिक्षित देशों की सरकारें निहित शक्तिशाली स्वार्थी तत्वों के प्रभावों से आजाद नहीं होती हैं।
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“सस्ती सेवा और एक छत पर मिलने वाली सुविधाजनक सेवा” कुछ लोगों के लिए किस्मत में लिखी हुई बम्पर मेवा साबित होगी। लेकिन देश के आम जनता के लिए यह “देवा रे देवा” साबित हो सकती है।
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क्या आप एक आजाद देश के “आजाद चिंतनशील-विचारधारा से परिपूर्ण नागरिक” बने रहना पसंद करेंगे या कुछ लोगों के मुट्ठी में कैद “बेचारे नागरिक ?” यह देश आपका है और निर्णय लेने की आजादी संविधान ने आपको दे ही रखा है। आगे आपकी मर्जी।

आवासीय पट्टा की कानूनी पहलू

#Kind_Attention_Dooars_Terai :-
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डुवार्स और तराई के करीबन 500 चाय बागान 140,000 हेक्टेयर भूमि में फैला हुआ है। अधिकतम भूमि का असली मालिक पश्चिम बंगाल सरकार है, और चाय बागानों को #चाय_की_खेती के लिए 30 वर्ष के लीज पर देती है। अनेक चाय बागान के मालिकों ने आदिवासी कृषकों को बहला-फुसला कर उनकी भूमि को बागान में मिला लिया है और उन्हें स्वतंत्र कृषक से चाय बागान का मजदूर बना दिया है। अनेक चाय बागान अपनी पूरी लीज जमीन में चाय की खेती करने में असमर्थ हैं, वहीं अनेक बागान लीज से अधिक भूमि पर चाय की खेती कर रहे हैं। जमीन लीज शर्तों के अनुसार यदि कोई कंपनी किसी लीज भूमि पर पाँच वर्षों के भीतर चाय की खेती नहीं कर पाता है तो वह जमीन अपने आप सरकार के खाते में चली जाएगी।
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राज्य सरकार की नीतियों के अनुसार सरकारी भूमि का अबंटन कृषि और आवास के लिए दिया जा सकता है।
आइए देखते हैं कि कानून में भूमि संबंधी क्या प्रावधान है ?
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आवासहीन, भूमिहीन, गरीब जनता, जिनका आवास के लिए अपना कोई भूमि नहीं है, इसके अलावा जिनके पास कृषि कार्य के लिए भी भूमि नहीं है, के लिए The West Bengal Land and Land Reforms Manual कहता है :-
(देखें West Bengal Land and Land Reforms Manual Chapter XIII- Settlement of agriculture at the disposal of government) Section 190 कहता है :-
“The area of land that may be settled with a person for the purpose of homestead having no homestead of his own shall not exceed 5 cottahs or 0.0335 hectare. अर्थात् जिस व्यक्ति के पास अपने आवास के उद्देश्य के लिए कोई आवासीय भूखण्ड नहीं है, उन्हें अधिकतम 5 कट्टा (5 cottahs or 0.0335 hectare) भूमि आबंटित किया जा सकता है।
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लेकिन इसी कानून के सेक्सन 193 के तहत कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति या ऐसे किसी भी व्यक्ति के परिवार के सदस्य के साथ जो किसी भी व्यवसाय, व्यापार, उपक्रम, निर्माण, कॉलिंग, सेवा या औद्योगिक व्यवसाय में लगे हुए हैं या कार्यरत हैं, को कोई भूमि आबंटित नहीं की जाएगी। हालांकि यह एक #खेतिहर_मजदूर, कारीगर या मछुआरों पर लागू नहीं होता है।
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Section 193 कहता है :- no land can be distributed under sections 49 (1) any person or with a member of the family of any such person who is engaged or employed in any business, trade, undertaking, manufacture, calling, service or industrial occupation. This does not, however, apply to an #agricultural_labourers, artisan or fishermen.
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चाय बागानों की सरकारी लीज भूमि के संभावित आबंटन के विरोधी West Bengal Land and Land Reforms Manual Chapter XIII के इस प्रावधान का तर्क देते हैं।
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वहीं राज्य West Bengal Estate Acquisition Act, 1953, के अनुसार —
“The land can only be leased out for #tea_cultivation. The lessee or the company, without reducing the Plantation Area, may use the land for horticulture and growing medicinal plants on an area not more than 3 per cent of the total grant area of the garden.
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अर्थात् #चाय_की_खेती के लिए भूमि को केवल पट्टे पर दिया जा सकता है। प्लांटेशन एरिया को कम किए बिना पट्टेदार या कंपनी, बागवानी के लिए भूमि का उपयोग कर सकती है और बगीचे के कुल अनुदान क्षेत्र का 3 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र पर औषधीय पौधों को नहीं बढ़ा सकती है।
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इस कानून में साफ कहा गया है कि सरकार #चाय_की_खेती के लिए भूमि को पट्टे पर देती है। यहाँ जमीन किसी व्यापार, व्यवसाय, विनिर्माण आदि के लिए नहीं दी जाती है। चाय बागान को चाय की खेती कहा गया है। चाय मजदूर भी चाय के खेतों में काम करने वाले #खेतीहर_मजदूर हैं।
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उपरोक्त दो अनुच्छेद से यह स्पष्ट है की चाय बागान के औद्योगिक कार्यकलापों को सरकार #एग्रीकल्चर_सेक्टर के कार्यकलाप मानती है। चाय बागान के लिए एरिया में 03% से अधिक भूमि में चाय के सिवाय और किसी भी अन्य नगदी फसलों को नहीं उगाया जा सकता है। 97 % चाय उत्पादन के लिए उपयोग करना बाध्यकारी रूल्स है।
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पुनः आईए देखते हैं कि पश्चिम बंगाल सरकार की नजरों में चाय बागान कौन से सेक्टर का कार्यकलाप है ?
30 जनवरी 2018 को पश्चिम बंगाल राज्य के वित्त मंत्री श्री अमित मित्र का पश्चिम बंगाल विधानसभा में राज्य बजट पेश करते समय दिए गए एक बयान पर गौर करें :-
in a bid to help revive the tea industry, the West Bengal government has fully exempted tea garden from #payment_of_agriculture income tax for two fiscal year (2019 and 2020).
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डुवार्स तराई के सभी मित्र इन्हें नोट करें कि पश्चिम बंगाल राज्य के वित्त मंत्री अमित मित्र जी चाय बागानों को #एग्रीकल्चर_इनकम टैक्स से छूट दे रहे हैं। मतलब चाय बागान Agriculture Sector है।
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उपरोक्त का संक्षिप्त अर्थ यह हुआ कि चाय बागान क्षेत्र #एग्रीकल्चर_सेक्टर क्षेत्र है और यह manufacture, service or industrial sector नहीं है।
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इसलिए चाय बागान के भूमिहीन आवास हीन मजदूरों को सरकारी भूमि को आवास बनाने के लिए प्राप्त करने का हक है और वह इसके पात्र हैं। इस मामले में किसी भी तरह की कोई कानूनी अड़चन नहीं है।
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ममता बनर्जी की सरकार ने चाय बागानों में रहने वाले भूमिहीन, आवासहीन चाय मजदूरों को आवास के लिए भूमि पट्टा देने का वादा किया हुआ है। ममता बनर्जी ने लोकसभा चुनाव के मौके पर सुभाषिनी चाय बागान में दिए अपने चुनावी भाषण में घोषणा की थी कि जल्द ही चाय बागान मजदूरों को आवासीय लीज दिए जाएँगे। इसके लिए ममता दीदी ने राज्य के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक समिति गठन करने का भी आदेश दिया था। लेकिन आश्चर्य की बात है कि सत्ताधारी नेतागण इस मामले में कानूनी अड़चन आड़े आने की बात करके इसे टालते रहे हैं।
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उपरोक्त जानकारी के आलोक में चाय मजदूर सरकार और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं से पूछ सकते हैं कि वे चाय मजदूरों को आवास अधिकार के तहत भूमि का पट्टा क्यों नहीं दे रहे हैं???
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चाय मजदूर 1868 से ही डुवार्स के चाय बागानों में बस गए हैं। The Plantation Labour Act 1951 के पूर्व चाय बागानों में क्वार्टर देने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं था। ब्रिटिश शासन के दौरान चाय मजदूर अपने झोपड़ियों का प्रबंधन खुद करते थे और इसके लिए वे चाय बागानों के बगल के जंगलों को साफ करके अपने गाँव बसाए थे। लेकिन The Plantation Labour Act 1951 में क्वार्टर देने के प्रावधान बन जाने के कारण मजदूरों की जमीन को अधिकृत करके चाय बागान मालिकों को सौप दिए गए और बागान प्रबंधन ने वहाँ मजदूर क्वार्टर बनाए। लेकिन 70 वर्ष बीत जाने के बावजूद सभी चाय मजदूरों को न तो क्वार्टर मिला और न ही बने क्वार्टरों का कोई रखरखाव किया गया। फलतः मजदूर बाध्य होकर अपने पैसों से घरों का रखरखाव करने लगे हैं।
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केन्द्र सरकार ने सन् 2022 तक सभी नागरिकों को आवास मुहैया करने का ऐलान किया है। राज्य सरकार भी विभिन्न आवास योजनाओं के माध्यम से गरीबों, बेघर वालों को आवास उपलब्ध करा रही है। चाय बागानों में स्थानीय सरकार अर्थात् त्रिस्तरीय पंचायत के माध्यम से नागरिक सुविधाएँ मिल रही है। चाय बागान प्रबंधन The Plantation Labour Act 1951 के प्रावधान से बंधे होने के कारण मजदूर बस्तियों के कर्तव्य से खुद को अलग नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में राज्य सरकार को इस संबंध में केन्द्र सरकार के साथ परामर्श करके तुरंत निर्णय लेकर चाय मजदूरों को आवासीय भूखंड उपलब्ध कराए।
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चाय बागानों के कुछ उत्साही और चिंतक शिक्षित इस विषय पर हस्ताक्षर अभियान शुरू कर रहे हैं। यह अभियान 10 लाख लोगों के नागरिक अधिकारों के लिए समर्पित है। रोटी कपड़ा और मकान बुनियादी जरूरत है। सभी को सम्मानजन जीवन जीने का हक मिले और देश में किसी के साथ लम्बे काल तक अन्याय न होने पाए, इसके लिए जरूरी है कि इस अभियान में सभी संबंधित पीडित व्यक्ति और परिवार तथा सभी नागरिक संगठन इसमें शामिल हों।नेह