विचारों की दुनिया

#नेह इंदवार 
∼प्रकृति में जन्म और मृत्यु एक प्राकृतिक नियम है। दुनिया के सभी नेचुरल और अर्टिफिशियल चीजों पर यह लागू होता है। यह नियम मल्टी यूनिवर्स, गैलेक्सी, तारे, ग्रह, समुद्र, पहाड़, नदी, झील, शहर, सरकार, सड़क, बिल्डिंग, परिवार, मनुष्य और मनुष्य के विचारों तक में लागू होता है। जो जन्म लेता है मृत्यु भी  होती है।
विचारों का जन्म और मृत्यु काल मनुष्य के जीवन काल से बड़ी या छोटी हो सकती है। किसी विचारों का जन्म और मृत्यु काल क्षणभंगुर होता है। लेकिन कई विचार कई सदियों तक जिंदा रहती है।
गैलेक्सी और ग्रहों की तरह ही विचारों का अपना परिवार, खानदान और संस्कृति होती है। विचारों का वर्ग और स्तर भी होता है। कोई  विचार शरीफ कहलाता है तो कोई खलनायक। किसी विचारों की चारों ओर धूम होती हैं, तो किसी विचारों पर लानत-मलानत भेजी जाती है।
✌️आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, मानसिक दुनिया से संबंधित विचार हमें बहुत प्रभावित करते हैं। विचारों के जन्म, शैशवकाल, जवानी, परिपक्वता, बृद्धाकाल आदि से सभी व्यक्ति, परिवार, समाज देश या देशों के समूह से इतने प्रभावित होते हैं कि सुबह बिस्तर छोड़ने और सोने के बीच की दुनिया में विचार के कार्यकलाप से व्यक्ति आजाद नहीं हो पाता है। जिस तरह बिना अक्सीजन के प्राणी जिंदा नहीं रहता है, वैसे ही व्यक्ति और समाज बिना विचारों के जिंदा नहीं हो सकते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि जो विचार अभी जिंदा और बुढ़ा होकर मर नहीं गया है, उसी विचार से ही व्यक्ति और समाज, सरकार संचालित होते हैं। जो विचार कभी जिंदा था, लेकिन नये विचारों के कारण उसकी पूछ जाती रही और वह मर गया। उन विचारों को हम इतिहास कहते हैं।
सम्राट अशोक, अकबर और चंगेजखान के जमाने के विचार कब के बुढ़े होकर मर खप गए। यदि आज उस जमाने का कोई विचार दिखाई भी देता है तो समझ जाईए कि वह हमशक्ल वाला विचार उसके डीएनए वाला कोई नया विचार ही है।
सुबह उठते ही परिवार धर्म, खानपान, परिधान, व्यवहार, शिक्षा, आर्थिक गतिविधियों, धार्मिक गतिविधियों से संबंधित विचारों से संचालित होना शुरू हो जाते हैं।
धर्म के जो विचार बुढ़े होकर मर गए हैं, उन विचारों को छोड़कर व्यक्ति धर्म के नये विचारों, प्रार्थनाओं, भंगिमाओं से धर्म के विचारों को ओढ़ता है। धर्म और संस्कृति के विचार भी मर खप जाते हैं। जो वर्तमान में दिखाई देते हैं। वे पुराने धर्म और संस्कृति के कंकाल ही होते  हैं।
शिक्षा के नये विचारों से प्रेरित बच्चे नये विचारों के अनुसार शिक्षा ग्रहण करते हैं। पुराने विचार शिक्षा संस्थाओं से विदा ले चुके होते हैं।  चार पीढ़ी पहले के खानपान के उलट व्यक्ति वर्तमान में तैर रहे विचारों के अनुसार अपना खानपान करता है। धोती और गमछा पहनने के बजाय नये विचारों से संचित नये ढंग के शर्ट्स, पैंट, साड़ी या सलवार पहन कर परिवार अपना दैनिक कार्य शुरू करता है।
राजनीति पार्टी से संबंधित व्यक्ति मर चुके राजनीति के बदले नये विचारों से संचालित राजनीति के अनुसार नई रणनीति बनाने में व्यस्त रहता है। धर्म और राजनीति के द्वारा नये विचारों से आर्थिक और सामाजिक लक्ष्य लेकर चल रहे व्यक्ति बिल्कुल नये विचारों के साथ नयी रणनीति बनाते हैं। वह वोटरों को नये विचारों के साथ प्रभावित करके अपने पक्ष में करने के लिए नये पैंतरे बनाते हैं। वह वोटरों को शिष्ट शांत बनाए रखने के बदले उत्तेजित, गर्म खून और उग्र विचारों के इंजेक्शन लगाने के लिए नये-नये पैंतरे और रणनीति बनाते हैं।
एक ही नाम की नई राजनैतिक पार्टियाँ भी खानदान के टाईटिल को ढोने वाली पार्टियाँ ही होती हैं। नई राजनीति पार्टियाँ चाहतीं हैं कि जनता जल्दी से जल्दी पुराने विचारों को त्याग दें और नये विचारों को अपना लें। वे नये जन्मे विचारों को जल्दी जवान और परिपक्व बनाने में उसी तरह की रणनीति बनाते हैं, जैसे पोल्ट्री फार्म वाले अपने मुर्गियों के वजन बढ़ाने के लिए इंजेक्शन और चारे में केमिकल देने की रणनीति अपनाते हैं।
सरकार प्रशासन के कार्य को नये विचारों और उससे संचालित नीतियों से चलाना चाहती है। उन विचारों और नीतियों को जनता का समर्थन प्राप्त हो इसलिए वह पुरानी नीतियों की निंदा करती है। यहाँ पुरानी नीति कहने का सीधा अर्थ है उन विचारों का जो जन्म लेकर बुढ़े होकर मर गए हैं। मरे विचार अनुपयुक्त हो जाते हैं। आज की प्रचलित विचारों की दुकान भी भविष्य में बंद हो जाएगी और आप जिन विचारों के लिए आज मरने-मारने, दंगा करने, षड़यंत्र करने में व्यस्त हैं, वह विचार और संस्कृति भी मर खप जाएंगी और वह भविष्य में आपको बुद्धु इंसान घोषित कर ही देंगी। इसलिए खलनायक विचारों से संचालित होने के बजाए शरीफ विचारों से संचालित होकर जिंदगी में सुख और शांति को प्राप्त कर पाएँगे।
राजनीति, आर्थिक, धर्म आदि में विचारों को आर्टिफिशियल ढंग से जन्म देना, उसे जल्दी जवान करने की जतन करना, उसे जनता पर थोपने की जल्दीबाजी दिखाना, थोपने के बाद उससे मनपसंद रिजल्ट पाने की रणनीति बनाना आदि कुछ ऐसे काम, नीति, रीति  है, जिसे हर जमाने में चालाक लोग करते रहते हैं।
क्या आप चालाक लोगों की श्रेणी में खुद को रखते हैं ?
जब चालाल लोग ऐसे कार्यों को अंजाम देते हैं तो जाहिर है कि ऐसी नीतियों, कार्यक्रमों को लागू करने के लिए कम चालाक मतलब बेवकूफ लोगों की भी आवश्यकता होती है। बेवकूफ लोगों की आबादी हमेशा बड़ी होती है।
आमतौर से आम नागरिक चालाकी की बारिकियों में नहीं जाते हैं। वे विश्लेषक नहीं होते हैं। न ही उनके पास इन चीजों को जाँचने परखने के उपकरण होते हैं। वे इन चीजों से दूर रहें, इसके लिए जरूरी है कि उन्हें हमेशा समस्याओं की टोकरियाँ थमाई जाए। वे समस्याएँ निपटाने में ही जिंदगी खपा देंगे। यूँ तो वे महज विचारों के उपभोक्ता होते हैं, जो विचार बाजार में आया उसे वे अपनी जरूरत के हिसाब से खरीद लेते हैं। उसका सेवन कर लेते हैं। उसे अपने जेब की पॉकेट में और घर के अलमारी में कैद कर लेते हैं।
शराब के बोतल में ऱखी शराब के सेवन से नशा ही होगा और कॉम्पलान के डब्बे में बच्चों को पौष्टकता देने के ही पदार्थ मिलेंगे। पान-तंबाखू खाने के बाद उसे थूक दिया जाता है। विचारों के साथ भी यही होता है। मतलब आप जिन विचारों के स्थायी ग्राहक बनेंगे, वे विचार आपको अपना स्थायी उपभोक्ता बना ही लेगा। यदि आपको बचपन से मक्के की रोटी और चने के साग खाने की आदत लगायी जाएगी तो आप उसके स्थायी उपभोक्ता बनेंगे। खाना खाने के बाद आपको छाछ, मिष्टी, दही, रसगुल्ले खाने की आदत लगाई जाएगी तो आप जिंदगी में उसके प्रशंसक बने बिना जिंदगी नहीं जी सकते हैं। सुबह उठ कर जिस प्रार्थना को आपको लटाया जाएगा, जिस ढंग से धर्म को अपनाने की आदत लगाई जाएगी, वह कालांतर में आपको उसका गुलाम बना देगा। गुलाम बनाने की प्रक्रिया ऐसी ही होती है।  इस प्रक्रिया को जन्म देने वाले भी नये विचारों के जन्मदाता ही होते हैं। मार्क्स, हिटलर, गाँधी, जॉर्ज वाशिंगटन, माओ आदि विचारों के शानदार माताएँ थे। उनके गर्भ में नये विचार पलते रहते थे।
विचारों का जन्म होता है। विचार धीरे-धीरे मोटे मजबूत या दूबले हो सकते हैं। वह जवान होकर परिवक्व होता है। फिर वह जवानी के खेल भी दिखाता है। वह इतिहास बनाता है। पुराने इतिहास को बिगाड़ता है। लेकिन अंततः प्राकृतिक नियमों के अनुसार मर खप जाता है।
कार्ल मार्क्स ने सर्वहारा की एकता, संगठन, उसकी शक्ति, सत्ता में हिस्सेदारी और पूरी दुनिया में साम्यवाद का एक विचार दिया था। जब वह विचार जवान हुआ तो दुनिया के चालिसेक  देश मार्क्सवाद के जवानी का आनंद ले रहे थे। लेकिन अंततः वह पूँजीवाद के विचारों से हार गया और हारने के बाद बुढ़ा भी हो गया। फिलहाल पूँजीवादी विचार भी मरन्नासन अवस्था में पहुँच गया है। भारत में यह पूरी तरह बीमार हो गया है। कोई नयी खूनी या पानी क्रांति जरूर होगी, जो उसे कब्र में पहुँचाने का काम करेगी।
बहुत लंबी लेख कोई पढ़ता नहीं यारों। इसलिए संक्षेप में :- विचारों का जन्म होता है और वह जवान भी होता है। आप किन विचारों के स्थायी ग्राहक है ? इस पर विवेक लगाएँ। कहीं आप ऐसे विचारों के ग्राहक तो नहीं है, जिसका चरित्र ही खलनायक का है और आपको एक उपकरण के रूप में यूज कर रहा है ? वह विचार किसी भी विषय से संबंधित हो सकता है। मतलब वह विचार सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक धार्मिक, शारीरिक और मानसिक कुछ भी हो सकता है। यदि आप इसे समझ नहीं पा रहे हैं तो इस पर तर्क करें, विचार करें, अध्ययन करें और इन सबके बाद आपने आपको चालाक और चतुर बनाएँ। यह विचार जरूर करें कि कहीं आप किन्हीं विचारों के हद से भी अधिक गुलाम तो नहीं हैं ? ?? यदि  गुलाम हैं तो इस नाचीज को याद कर लेना। यदि बहुत चालाक हैं तब तो जरूर याद कर लेना। आपका ही नवतुन- विचारदाता-मित्र-नेह। 😍

आदिवासी हिन्दू नहीं हैं

आदिवासी हिंदू नहीं है और कभी हिंदू बन भी नहीं सकता है। हिंदू होने के लिए हिन्दुओं के लिए दी गई संस्कार को पूरा करना होता है। बिना ये संस्कार किए कोई असली हिंदू नहीं बन सकता है। जाहिर है कि आदिवासियों को हिंदू बनाने का अभियान ब्राह्मण धर्म को आदिवासियों पर थोप कर उनका सामाजिक और आर्थिक शोषण करना ही मुख्य उद्देश्य है। उनके वोट, आय, स्वतंत्र सोच, आदिवासी इतिहास, वजूद पर कुंडलीमार कर उनका मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक शोषण करना मुख्य उद्देश्य है। इसीलिए आरएसएस के भागवत कहता है कि जनगणना में आदिवासी को हिन्दू लिखने का अभियान चलाया जाएगा। इससे इस देश में आदिवासी जनसंख्या को कमतर दिखाया जा सकेगा और आदिवासी के तमाम संवैधानिक अधिकारों को खत्म किया जा सकेगा।
जाने क्या हैं हिंदू धर्म अर्थात् ब्राह्मण धर्म के संस्कार ? –
नीचे की सामग्री को #मुक्त_ज्ञानकोश_विकिपीडिया से लिया गया है।
हिन्दू धर्म में सोलह संस्कारों (षोडश संस्कार) का उल्लेख किया जाता है जो मानव को उसके गर्भाधान संस्कार से लेकर अन्त्येष्टि क्रिया तक किए जाते हैं। [1]इनमें से विवाह, यज्ञोपवीत इत्यादि संस्कार बड़े धूमधाम से मनाये जाते हैं। वर्तमान समय में सनातन धर्म या हिन्दू धर्म के अनुयायी में गर्भाधन से मृत्यु तक १६ संस्कारों होते है।[2]
प्राचीन काल में प्रत्येक कार्य संस्कार से आरम्भ होता था। उस समय संस्कारों की संख्या भी लगभग चालीस थी। जैसे-जैसे समय बदलता गया तथा व्यस्तता बढती गई तो कुछ संस्कार स्वत: विलुप्त हो गये। इस प्रकार समयानुसार संशोधित होकर संस्कारों की संख्या निर्धारित होती गई। गौतम स्मृति में चालीस प्रकार के संस्कारों का उल्लेख है। [3]महर्षि अंगिरा ने इनका अंतर्भाव पच्चीस संस्कारों में किया। व्यास स्मृति में सोलह संस्कारों का वर्णन हुआ है। हमारे धर्मशास्त्रों में भी मुख्य रूप से सोलह संस्कारों की व्याख्या की गई है। इनमें पहला गर्भाधान संस्कार और मृत्यु के उपरांत अंत्येष्टि अंतिम संस्कार है। गर्भाधान के बाद पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण ये सभी संस्कार नवजात का दैवी जगत् से संबंध स्थापना के लिये किये जाते हैं।
नामकरण के बाद चूड़ाकर्म और यज्ञोपवीत संस्कार होता है। इसके बाद विवाह संस्कार होता है। यह गृहस्थ जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। हिन्दू धर्म में स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सबसे बडा संस्कार है, जो जन्म-जन्मान्तर का होता है।
विभिन्न धर्मग्रंथों में संस्कारों के क्रम में थोडा-बहुत अन्तर है, लेकिन प्रचलित संस्कारों के क्रम में गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, विद्यारंभ, कर्णवेध, यज्ञोपवीत, वेदारम्भ, केशान्त, समावर्तन, विवाह तथा अन्त्येष्टि ही मान्य है।
गर्भाधान से विद्यारंभ तक के संस्कारों को गर्भ संस्कार भी कहते हैं। इनमें पहले तीन (गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन) को अन्तर्गर्भ संस्कार तथा इसके बाद के छह संस्कारों को बहिर्गर्भ संस्कार कहते हैं। गर्भ संस्कार को दोष मार्जन अथवा शोधक संस्कार भी कहा जाता है। दोष मार्जन संस्कार का तात्पर्य यह है कि शिशु के पूर्व जन्मों से आये धर्म एवं कर्म से सम्बन्धित दोषों तथा गर्भ में आई विकृतियों के मार्जन के लिये संस्कार किये जाते हैं। बाद वाले छह संस्कारों को गुणाधान संस्कार कहा जाता है।

गर्भाधान

हमारे शास्त्रों में मान्य सोलह संस्कारों में गर्भाधान पहला है। गृहस्थ जीवन में प्रवेश के उपरान्त प्रथम क‌र्त्तव्य के रूप में इस संस्कार को मान्यता दी गई है। गार्हस्थ्य जीवन का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्ति है। उत्तम संतति की इच्छा रखनेवाले माता-पिता को गर्भाधान से पूर्व अपने तन और मन की पवित्रता के लिये यह संस्कार करना चाहिए। वैदिक काल में यह संस्कार अति महत्वपूर्ण समझा जाता था।

पुंसवन[संपादित करें]

गर्भस्थ शिशु के मानसिक विकास की दृष्टि से यह संस्कार उपयोगी समझा जाता है। गर्भाधान के दूसरे या तीसरे महीने में इस संस्कार को करने का विधान है। हमारे मनीषियों ने सन्तानोत्कर्ष के उद्देश्य से किये जाने वाले इस संस्कार को अनिवार्य माना है। गर्भस्थ शिशु से सम्बन्धित इस संस्कार को शुभ नक्षत्र में सम्पन्न किया जाता है। पुंसवन संस्कार का प्रयोजन स्वस्थ एवं उत्तम संतति को जन्म देना है। विशेष तिथि एवं ग्रहों की गणना के आधार पर ही गर्भधान करना उचित माना गया है।

सीमन्तोन्नयन

सीमन्तोन्नयन को सीमन्तकरण अथवा सीमन्त संस्कार भी कहते हैं। सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना। गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की मांग भरती हैं। यह संस्कार गर्भ धारण के छठे अथवा आठवें महीने में होता है।

जातकर्म

नवजात शिशु के नालच्छेदन से पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। इस दैवी जगत् से प्रत्यक्ष सम्पर्क में आनेवाले बालक को मेधा, बल एवं दीर्घायु के लिये स्वर्ण खण्ड से मधु एवं घृत वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ चटाया जाता है। यह संस्कार विशेष मन्त्रों एवं विधि से किया जाता है। दो बूंद घी तथा छह बूंद शहद का सम्मिश्रण अभिमंत्रित कर चटाने के बाद पिता यज्ञ करता है तथा नौ मन्त्रों का विशेष रूप से उच्चारण के बाद बालक के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की प्रार्थना करता है। इसके बाद माता बालक को स्तनपान कराती है।

नामकरण[संपादित करें]

एचएचजन्म के ग्यारहवें दिन यह संस्कार होता है। हमारे धर्माचार्यो ने जन्म के दस दिन तक अशौच (सूतक) माना है। इसलिये यह संस्कार ग्यारहवें दिन करने का विधान है। महर्षि याज्ञवल्क्य का भी यही मत है, लेकिन अनेक कर्मकाण्डी विद्वान इस संस्कार को शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना उचित मानते हैं।
नामकरण संस्कार का सनातन धर्म में अधिक महत्व है। हमारे मनीषियों ने नाम का प्रभाव इसलिये भी अधिक बताया है क्योंकि यह व्यक्तित्व के विकास में सहायक होता है। तभी तो यह कहा गया है राम से बड़ा राम का नाम हमारे धर्म विज्ञानियों ने बहुत शोध कर नामकरण संस्कार का आविष्कार किया। ज्योतिष विज्ञान तो नाम के आधार पर ही भविष्य की रूपरेखा तैयार करता है।

निष्क्रमण

दैवी जगत् से शिशु की प्रगाढ़ता बढ़े तथा ब्रह्माजी की सृष्टि से वह अच्छी तरह परिचित होकर दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करे यही इस संस्कार का मुख्य उद्दे निष्क्रमण का अभिप्राय है बाहर निकलना। इस संस्कार में शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है। भगवान भास्कर के तेज तथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है। इसके पीछे मनीषियों की शिशु को तेजस्वी तथा विनम्र बनाने की परिकल्पना होगी। उस दिन देवी-देवताओं के दर्शन तथा उनसे शिशु के दीर्घ एवं यशस्वी जीवन के लिये आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है। जन्म के चौथे महीने इस संस्कार को करने का विधान है। तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये प्राय: तीन मास तक उसे बहुत सावधानी से घर में रखना चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो।

अन्नप्राशन

इस संस्कार का उद्देश्य शिशु के शारीरिक व मानसिक विकास पर ध्यान केन्द्रित करना है। अन्नप्राशन का स्पष्ट अर्थ है कि शिशु जो अब तक पेय पदार्थो विशेषकर दूध पर आधारित था अब अन्न जिसे शास्त्रों में प्राण कहा गया है उसको ग्रहण कर शारीरिक व मानसिक रूप से अपने को बलवान व प्रबुद्ध बनाए। तन और मन को सुदृढ़ बनाने में अन्न का सर्वाधिक योगदान है। शुद्ध, सात्विक एवं पौष्टिक आहार से ही तन स्वस्थ रहता है और स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। आहार शुद्ध होने पर ही अन्त:करण शुद्ध होता है तथा मन, बुद्धि, आत्मा सबका पोषण होता है। इसलिये इस संस्कार का हमारे जीवन में विशेष महत्व है।
हमारे धर्माचार्यो ने अन्नप्राशन के लिये जन्म से छठे महीने को उपयुक्त माना है। छठे मास में शुभ नक्षत्र एवं शुभ दिन देखकर यह संस्कार करना चाहिए। खीर और मिठाई से शिशु के अन्नग्रहण को शुभ माना गया है। अमृत: क्षीरभोजनम् हमारे शास्त्रों में खीर को अमृत के समान उत्तम माना गया है।

चूड़ाकर्म

चूड़ाकर्म को मुंडन संस्कार भी कहा जाता है। हमारे आचार्यो ने बालक के पहले, तीसरे या पांचवें वर्ष में इस संस्कार को करने का विधान बताया है। इस संस्कार के पीछे शुाचिता और बौद्धिक विकास की परिकल्पना हमारे मनीषियों के मन में होगी। मुंडन संस्कार का अभिप्राय है कि जन्म के समय उत्पन्न अपवित्र बालों को हटाकर बालक को प्रखर बनाना है। नौ माह तक गर्भ में रहने के कारण कई दूषित किटाणु उसके बालों में रहते हैं। मुंडन संस्कार से इन दोषों का सफाया होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस संस्कार को शुभ मुहूर्त में करने का विधान है। वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ यह संस्कार सम्पन्न होता है।

विद्यारंभ

विद्यारम्भ संस्कार के क्रम के बारे में हमारे आचार्यो में मतभिन्नता है। कुछ आचार्यो का मत है कि अन्नप्राशन के बाद विद्यारम्भ संस्कार होना चाहिये तो कुछ चूड़ाकर्म के बाद इस संस्कार को उपयुक्त मानते हैं। मेरी राय में अन्नप्राशन के बाद ही शिशु बोलना शुरू करता है। इसलिये अन्नप्राशन के बाद ही विद्यारम्भ संस्कार उपयुक्त लगता है। विद्यारम्भ का अभिप्राय बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तो बालक को वेदाध्ययन के लिये भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था। माँ-बाप तथा गुरुजन पहले उसे मौखिक रूप से श्लोक, पौराणिक कथायें आदि का अभ्यास करा दिया करते थे ताकि गुरुकुल में कठिनाई न हो। हमारा शास्त्र विद्यानुरागी है। शास्त्र की उक्ति है सा विद्या या विमुक्तये अर्थात् विद्या वही है जो मुक्ति दिला सके। विद्या अथवा ज्ञान ही मनुष्य की आत्मिक उन्नति का साधन है। शुभ मुहूर्त में ही विद्यारम्भ संस्कार करना चाहिये।

कर्णवेध[संपादित करें]

हमारे मनीषियों ने सभी संस्कारों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के बाद ही प्रारम्भ किया है। कर्णवेध संस्कार का आधार बिल्कुल वैज्ञानिक है। बालक की शारीरिक व्याधि से रक्षा ही इस संस्कार का मूल उद्देश्य है। प्रकृति प्रदत्त इस शरीर के सारे अंग महत्वपूर्ण हैं। कान हमारे श्रवण द्वार हैं। कर्ण वेधन से व्याधियां दूर होती हैं तथा श्रवण शक्ति भी बढ़ती है। इसके साथ ही कानों में आभूषण हमारे सौन्दर्य बोध का परिचायक भी है।
यज्ञोपवीत के पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष के शुभ मुहूर्त में इस संस्कार का सम्पादन श्रेयस्कर है।

यज्ञोपवीत

यज्ञोपवीत अथवा उपनयन बौद्धिक विकास के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। धार्मिक और आधात्मिक उन्नति का इस संस्कार में पूर्णरूपेण समावेश है। हमारे मनीषियों ने इस संस्कार के माध्यम से वेदमाता गायत्री को आत्मसात करने का प्रावधान दिया है। आधुनिक युग में भी गायत्री मंत्र पर विशेष शोध हो चुका है। गायत्री सर्वाधिक शक्तिशाली मंत्र है।
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं अर्थात् यज्ञोपवीत जिसे जनेऊ भी कहा जाता है अत्यन्त पवित्र है। प्रजापति ने स्वाभाविक रूप से इसका निर्माण किया है। यह आयु को बढ़ानेवाला, बल और तेज प्रदान करनेवाला है। इस संस्कार के बारे में हमारे धर्मशास्त्रों में विशेष उल्लेख है। यज्ञोपवीत धारण का वैज्ञानिक महत्व भी है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी उस समय प्राय: आठ वर्ष की उम्र में यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न हो जाता था। इसके बाद बालक विशेष अध्ययन के लिये गुरुकुल जाता था। यज्ञोपवीत से ही बालक को ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी जाती थी जिसका पालन गृहस्थाश्रम में आने से पूर्व तक किया जाता था। इस संस्कार का उद्देश्य संयमित जीवन के साथ आत्मिक विकास में रत रहने के लिये बालक को प्रेरित करना है।

वेदारंभ

ज्ञानार्जन से सम्बन्धित है यह संस्कार। वेद का अर्थ होता है ज्ञान और वेदारम्भ के माध्यम से बालक अब ज्ञान को अपने अन्दर समाविष्ट करना शुरू करे यही अभिप्राय है इस संस्कार का। शास्त्रों में ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई प्रकाश नहीं समझा गया है। स्पष्ट है कि प्राचीन काल में यह संस्कार मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व रखता था। यज्ञोपवीत के बाद बालकों को वेदों का अध्ययन एवं विशिष्ट ज्ञान से परिचित होने के लिये योग्य आचार्यो के पास गुरुकुलों में भेजा जाता था। वेदारम्भ से पहले आचार्य अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने एवं संयमित जीवन जीने की प्रतिज्ञा कराते थे तथा उसकी परीक्षा लेने के बाद ही वेदाध्ययन कराते थे। असंयमित जीवन जीने वाले वेदाध्ययन के अधिकारी नहीं माने जाते थे। हमारे चारों वेद ज्ञान के अक्षुण्ण भंडार हैं। इस संस्कार को जन्म से 5वे या 7 वे वर्ष में किया जाता है। अधिक प्रामाणिक 5 वाँ वर्ष माना जाता है। यह संस्कार प्रायः वसन्त पंचमी को किया जाता है।

केशांत[संपादित करें]

गुरुकुल में वेदाध्ययन पूर्ण कर लेने पर आचार्य के समक्ष यह संस्कार सम्पन्न किया जाता था। वस्तुत: यह संस्कार गुरुकुल से विदाई लेने तथा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का उपक्रम है। वेद-पुराणों एवं विभिन्न विषयों में पारंगत होने के बाद ब्रह्मचारी के समावर्तन संस्कार के पूर्व बालों की सफाई की जाती थी तथा उसे स्नान कराकर स्नातक की उपाधि दी जाती थी। केशान्त संस्कार शुभ मुहूर्त में किया जाता था।

समावर्तन[संपादित

गुरुकुल से विदाई लेने से पूर्व शिष्य का समावर्तन संस्कार होता था। इस संस्कार से पूर्व ब्रह्मचारी का केशान्त संस्कार होता था और फिर उसे स्नान कराया जाता था। यह स्नान समावर्तन संस्कार के तहत होता था। इसमें सुगन्धित पदार्थो एवं औषधादि युक्त जल से भरे हुए वेदी के उत्तर भाग में आठ घड़ों के जल से स्नान करने का विधान है। यह स्नान विशेष मन्त्रोच्चारण के साथ होता था। इसके बाद ब्रह्मचारी मेखला व दण्ड को छोड़ देता था जिसे यज्ञोपवीत के समय धारण कराया जाता था। इस संस्कार के बाद उसे विद्या स्नातक की उपाधि आचार्य देते थे। इस उपाधि से वह सगर्व गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था। सुन्दर वस्त्र व आभूषण धारण करता था तथा आचार्यो एवं गुरुजनों से आशीर्वाद ग्रहण कर अपने घर के लिये विदा होता था।

विवाह

प्राचीन काल से ही स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यज्ञोपवीत से समावर्तन संस्कार तक ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का हमारे शास्त्रों में विधान है। वेदाध्ययन के बाद जब युवक में सामाजिक परम्परा निर्वाह करने की क्षमता व परिपक्वता आ जाती थी तो उसे गृर्हस्थ्य धर्म में प्रवेश कराया जाता था। लगभग पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का व्रत का पालन करने के बाद युवक परिणय सूत्र में बंधता था।
हमारे शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है- ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, आसुर, गन्धर्व, राक्षस एवं पैशाच। वैदिक काल में ये सभी प्रथाएं प्रचलित थीं। समय के अनुसार इनका स्वरूप बदलता गया। वैदिक काल से पूर्व जब हमारा समाज संगठित नहीं था तो उस समय उच्छृंखल यौनाचार था। हमारे मनीषियों ने इस उच्छृंखलता को समाप्त करने के लिये विवाह संस्कार की स्थापना करके समाज को संगठित एवं नियमबद्ध करने का प्रयास किया। आज उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि हमारा समाज सभ्य और सुसंस्कृत है।

अन्त्येष्टि

अन्त्येष्टि को अंतिम अथवा अग्नि परिग्रह संस्कार भी कहा जाता है। आत्मा में अग्नि का आधान करना ही अग्नि परिग्रह है। धर्म शास्त्रों की मान्यता है कि मृत शरीर की विधिवत् क्रिया करने से जीव की अतृप्त वासनायें शान्त हो जाती हैं। हमारे शास्त्रों में बहुत ही सहज ढंग से इहलोक और परलोक की परिकल्पना की गयी है। जब तक जीव शरीर धारण कर इहलोक में निवास करता है तो वह विभिन्न कर्मो से बंधा रहता है। प्राण छूटने पर वह इस लोक को छोड़ देता है। उसके बाद की परिकल्पना में विभिन्न लोकों के अलावा मोक्ष या निर्वाण है। मनुष्य अपने कर्मो के अनुसार फल भोगता है। इसी परिकल्पना के तहत मृत देह की विधिवत क्रिया होती है।

सकरात्मक विचारों को लिखें और करें प्रस्तुत

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संसार के प्रायः सभी मनुष्य का दिमाग नित नये विषयों पर सदा चलायमान रहता है। बड़े बुढ़ों से लेकर मासूम बच्चों तक का दिमाग किसी न किसी विषय पर केन्द्रित और चिंतनशील होता ही है। यदि चिंतन सकरात्मक हो तो वह व्यक्ति और समाज के लिए लाभजनक होता है। नकरात्मकता चिंतन व्यक्ति और समाज दोनों को हानि पहुँचाता है।

सभी अपनी-अपनी समस्याओं को जादू की छड़ी से सुलझाना चाहते हैं। व्यक्ति की कल्पना क्षमता की सीमा अनंत है। कल्पना की उड़ान सुदूर आकाश तक जाती है। समस्याओं पर केन्द्रति दिमाग ही हजारों, लाखों उलझनों के बीच एक-एक सिरे को मिला कर समस्या को सुलझाने का प्रयास करता है।लगातार चिंतन दिमाग को तेज प्रगामी चिंतक बनाता हैं। यही विशेष चिंतन-शोध मानवीय ज्ञान-विज्ञान-दुनिया का प्रथम सोपान होता है। यह एक प्राकृतिक और स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया ने ही विश्व सभ्यता को पहाड़ के कंदराओं से निकाल कर चाँद, सूरज, मंगल ग्रह और अंतहीन अंतरिक्ष तक पहुँचा दिया है।

चिंतनशीलता किसी खास व्यक्ति, समाज, धर्म या वर्ग की बपौती नहीं है। यह मानव मात्र को प्राप्त प्रकृति शक्ति है। हर आम और खास के दिमाग में हमेशा अनेक नई बातें जन्म लेतीं हैं। जो चिंतन के ताने-बाने को सुलझाते हुए उसे एक खास प्रारूप या ढाँचे में बाँधता है। वह अंततः उलझनों को सुलझाने का एक विशेष रास्ता तैयार करता हैं। ऐसे लाखों मनुष्यों ने ही विश्व को खरबों विषयों पर नये सृजनात्मक पहलुओं से परिचित कराया हैं। गोल पहिए की चलन गति और बिजली के सृजनात्मक प्रयोग के संयोग ने पूरे विश्व को ही बदल कर रख दिया है। यह दिमाग के चिंतनशील प्रक्रिया के द्वारा ही संभव हो सका है।

चिंतन प्रक्रिया कहीं भी चल सकती है। लेकिन खास समस्याओं को सुलझाने के लिए खास तरह की सोच का विकास और पोषण के लिए खास समर्पण की जरूरत भी होती है। समुद्री विज्ञान पर काम करने वाले अंतरिक्ष विज्ञान के लिए नये सिद्धांत नहीं गढ़ सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि हर दिमाग किसी खास लक्ष्य को लेकर चिंतन करे और खास समस्याओं को सुलझाने के लिए एकाग्रहता जुटाए।

एक मानव के दिमाग में चल रहे सकरात्मक सृजनात्मक चिंतन और शोध का असर पूरी मानव जाति पर हो सकता है। यदि ऐसे विद्वान व्यक्ति अपने विचारों को लिख कर प्रस्तुत करते हैं तो वह पूरे समाज और विश्व के लिए एक थाती बन जाता है। लेखन-रिकार्ड की स्वतंत्र लाईब्रेरी और अबाध सार्वजनिक विचार-विमर्श, मानवीय खोजी-अविष्कारक संस्कृति की पराकाष्ठा है। इस संस्कृति का हिस्सा हर शिक्षित व्यक्ति को होना चाहिए।

लेकिन यदि कोई अपने दिमाग में खोजे गए किसी खास सुलझन (Solution) को दिमाग से बाहर नहीं निकालता है और दिमाग में ही बंद रखता है तो उक्त व्यक्ति के संसार से कूच करने के साथ ही वह सृजनात्मक चिंतन हमेशा-हमेशा के लिए अंधकार में दफन हो जाता है।

कहा जाता है कि यूरोप में किसी शोधार्थी ने कपड़े की तरह मुड़ने वाला दर्पण का अविष्कार किया था, और उसे अपने राजा के लिए भेंट किया था। लेकिन ऐसा दर्पण किसी और के पास न पहुँचे यह सोच कर राजा ने अविष्कारक की हत्या करा दी। नकरात्मक सोच हमेशा नकरात्मक प्रतिफल ही देता है। उस दर्पण की खराबी के बाद नया दर्पण देने वाला और कोई अविष्कारक राजा के पास नहीं था। तब राजा को समझ में आया कि वह वास्तव में एक मूर्ख व्यक्ति है।

करीब तीस साल पहले अमेरिका में एक व्यक्ति ने एक लीटर पेट्रोल से 100 किलोमीटर चलने लायक मोटर इंजिन बनाया था। इसकी खबरें भारत में भी प्रकाशित हुआ था। लेकिन पेट्रोलियम में खरबों का लाभ कमा रहे कंपनियों ने इसे अपने लिए खतरा समझ कर उक्त खोज और व्यक्ति को ही गायब करा दिया। अंधाधुंध अतिरेक पेट्रोलियम के प्रयोग ने आज पृथ्वी को जलवायु तबाही (Climate Catastrophe) के मुहाने पर ला खड़ा है। सौ साल में पृथ्वी रहने लायक नहीं होगी। सत्ताधारी खरबपतियों का समूह अभी से ही अंतरिक्ष यान बना कर किसी अन्य ग्रह में जाने की जुगत भिड़ा रहा है। बंदर के हाथ में उस्तरा का मुहवरा इनके लिए ही बना है।

कई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि कई व्यक्तियों ने अजस्र ऊर्जा स्रोत (infinite energy source) की खोज कर ली है। अब बिना खर्च के ही हर घर रोशन होगा। प्रदुषण भूतकाल की बात हो जाएगी। लेकिन उन्हें एनर्जी लॉबी और टैक्स पर जिंदा रहने वाले सरकारों ने उसे आम जनता तक पहुँचने से रोक दिया है। बिजली से खरबों की कमाई और बिजली के द्वारा जनता के जीवन तक बनाई गई नियंत्रण व्यवस्था इससे चरमरा जाएगी। सरकार और बाजार की वर्चस्व जमींदारी बर्बाद हो जाएगी।

लेकिन यदि ऐसे व्यक्ति खतरों को भाँप कर अपने विशेष शोध और ज्ञान को
सार्वजनिक रूप से लाखों व्यक्तियों तक पहुँचा देते, तो उनका जीवन और ज्ञान दोनों ही बच जाता और मानव समाज का कल्याण हो जाता।

इसीलिए सार्वजनिक सृजनात्मक लेखन को मैं सबसे बडा इंसानी धर्म मानता हूँ। यह सभ्यता के विकास को गति देता है। यदि हर व्यक्ति अपने सृजनात्मक चिंतन को समाज के सामने लाता है, तो वह नये लाखों दिमाग को और अधिक गंभीर चिंतन करने के पथ दिखलाता है। लाखों लोगों को इससे प्रेरणा मिलती है और शोध के लिए एक पुख्ता पृष्टभूमि तैयार होता हैं। इंटरनेट ने समाज, शरीर और सोच पर नियंत्रण रखने के जंजीरों को तोड़ दिया है। वर्चस्ववादी, शोषकवादी जमींदारी प्रथा टूट सी गई है। लेकिन वह मरी नहीं है। नये-नये रूप में वह जिंदा होने की कोशिश में लगा हुआ है। वह आधुनिक मनुष्य को गुलाम बनाने की मानसिकता से उबर नहीं सकता है।

तो आईए आप कलम उठाईए, अपनी सकरात्मक चिंतन को शब्दों में पिरोईए और समाज के सामने पेश करें। सभ्यता के इमारत को तैयार करने में अपने हिस्से की एक ईंट तो दीवार में लगा ही दें। नेह 🙏👣

देश बेचने का मुखौटा है NRC, CAA

Neh Indwar

देशदमें निरंकुश, जिद्दी और अलोकतांत्रिक समूह का शासन चल रहा है। जब पूरा देश CAA और NRC, NPR के विरूद्ध में उठ खड़ा हुआ है तो गृह मंत्री कहते हैं कुछ भी कर लो हम यह कानून वापस नहीं लेंगे। यह बयान साबित करता है कि सरकार में अपरिवक्व बुद्धि के हद दर्जे की अलोकतांत्रिक शक्तियाँ काम कर रही है। लोकतांत्रिक देशों में ऐसे विषयों पर चुनाव और जनमत संग्रह के माध्यम से निर्णय लिए जाते हैं। लेकिन यहाँ तो मंत्री ही अलोकतांत्रिक आवाज़ में नारे लगा रहे हैं।
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ऐसा लगता है देश में संसाधनों की लूट के लिए CAA और NRC को मुखौटे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। जिस अंबानी की कंपनी एक महीने पहले बनी थी, उसे प्रधानमंत्री विदेश जाकर खुद लड़ाकू विमान के ऑफसेट पार्टनर बनाने के लिए विदेशी कंपनी को मजबूर करता है और 126 विमानों के बदले 36 विमान लेने के समझौता करते हैं और 60 हजार करोड़ देना मंजूर करते हैं। प्रधानमंत्री खुद जीओ को आगे बढ़ाने के लिए बीएसएनएल को 4G चालू करने नहीं देते हैं और बीएसएनएल को बीमार कंपनी में बदलने में कोई कोर कसर नहीं रखते हैं। आडानी की जिस कंपनी को काठ का नाव बनाने का अनुभव नहीं है, उसे रक्षा पनडुब्बी बनाने के ठेका दिया जा रहा है। इधर एयरपोर्ट, रेल्वे, कोयला और सरकारी कंपनियों को धड़ाधड़ प्राईवेट बनाने के काम को जल्दी-जल्दी निपटाया जा रहा है।
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ऐसा लगता है CAA और NRC बीजेपी सरकार का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि कुछेक पूँजीपतियों द्वारा देश की जनता का ध्यान बँटाने के लिए देश के सामने डाला गया एक चारा है। संसाधनों की लूट पर किसी का ध्यान न जाए और विरोध की आवाज़ उठाने का मौका ही हाथ न लगे, इसलिए बीजेपी पार्टी और सरकार को नाचने गवाने वाले अभिनेता-अभिनेत्री के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। गृहमंत्री जिस तरह से चुनौती के स्वर में देश भर में घूम-घूम कर इसके बारे प्रचार कर रहे हैं, उससे लगता है कि पूरा मंत्रिमंडल ही पूँजीपतियों के इशारों पर देश को फालतू के मुद्दों पर व्यस्त रख रहे हैं। दरअसल बीजेपी को देश भर में इतनी रैलियाँ करने की कोई जरूरत ही नहीं है। CAA कानून बन चुका है। नोटिफिकेशन भी जारी कर दी गई है। अब सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में इसकी संवैधानिकता की समीक्षा की जानी है। बाकी सरकार को सड़क पर उतरने की कोई जरूरत ही नहीं है। न ही आम जनता के साथ सख्ती से गुंडों की तरह पेश आने की जरूरत है। लेकिन सरकार अपनी ऊर्जा और समय विपक्ष की तरह प्रति-आंदोलन करने में लगा रही है। सरकार का यह व्यवहार ही सरकार के प्रति शक पैदा करने के लिए काफी है। आर्थिक मोर्चे पर देश को रसातल में पहुँचाने में सरकार हर बार सफल होते दिख रही है।

एक लोकतांत्रिक देश में जनता को हर तरीके से आंदोलन करने और अपनी आवाज़ को बुलंद करने का अधिकार है। विपक्ष का काम तो विरोध करना ही है। लेकिन असम में उठते हुए सवालों पर, नागरिकता के सबूती कागजातों पर वाजिब सवाल का सरकार के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री कोई जवाब न देकर सिर्फ थोथे मुँह से कह रहे हैं कि विपक्ष लोगों को भड़का रहा है। मंत्रियों के ऐसै बयान से लगता है पूरा मंत्रिमंडल ही अनपढ़ों का है।
अन्यथा वे देश को अनपढ़ों का झूंड नहीं समझते। आखिरकार सरकार कोई नौटिफिकेशन जारी करके क्यों यह स्पष्ट नहीं करती है कि भारतीय नागरिक को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए अंतिम रूप से क्या-क्या सबूत दिखाने होंगे ? जनता महीनों से आंदोलित है, लेकिन सरकार धमकी के स्वर में बयान तो जारी करती है, लेकिन कागजातों की कोई सूची को अंतिम बताना भी नहीं चाहती है। यह सरकार के बेईमान, कम दिमाग और बददिमाग होने का सबूत भी देता है। पूरी दुनिया के नजर में यह सरकार अर्बन नाजी सरकार के रूप में पहचान कायम कर ली है।
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असम में 13 लाख लोगों के मामले को अलग मामला बता कर देश की जनता को बेवकूफ बनाने की सरकारी कोशिश से भला कौन बेवकूफ बनेगा ? सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं है कि कैसे एनआरसी प्रक्रिया में एक ही परिवार के दो भाई एक भारतीय और एक विदेशी बन गया है। आखिर गलत कार्य करने वाले ब्यूरोक्रेसी के लिए सरकार क्यों सख्त सजा का ऐलान नहीं करती है ? गलत कार्य करके भारतीय नागरिकों की जिंदगी को नर्क बनाने वालों के उपर सरकार क्यों कोई कार्रवाई नहीं कर रही है ? देश को धर्म के आधार पर बाँटने के लिए कौन सच्चा भारतीय तैयार होगा ? ऐसा लगता है बीजेपी सरकार 1947 के पहले वाले परिस्थियों को फिर से पैदा करना चाहती है। गृह युद्ध के हालात पैदा करने की स्थिति क्यों पैदा कर रही है यह सरकार ?
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जिस तरह सरकार जन आंदोलनों के बीच देश की सम्पत्तियों को पूँजीपतियों को धड़ाधड़ बाँट रही है उससे लगता है यह सरकार हिन्दुओं के नाम पर लोगों को बेवकूफ बना कर मुट्ठी भर पूँजीपतियों को पूरा देश बेच रही है और उसकी इस बात पर विरोध का कोई स्वर न उठने पाए इसके लिए लोगों को व्यस्त रखने के लिए CAA और NRC, NPR पर देश भर में घूम-घूम कर रैलियाँ जा रही हैंं। देश के चंद पूँजीपति परिवारों के पास देश के बजट से भी अधिक की परिसंपत्ति होना इसी बात को साबित कर रहा है कि बीजेपी का यह सरकार वास्तविक रूप से पूँजीपतियों का पूँजीपतियों के द्वारा और सिर्फ पूँजीपतियों के लिए है।
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हिन्दुत्व का नारा तो बस काले करनामों को ढकने का एक नकाब है।

2021 तक सबको हिंदू बना देंगे-धर्म जागरण समिति

नेह इंदवार

CAA, NRC और NPR मोदी सरकार का देश के लिए बनाए गए विकास कार्यक्रम नहीं है। बल्कि यह विशुद्ध राष्टीय स्वयं सेवक संघ का एजेंडा है। मोदी सरकार तो उसे बस जी-जान से लागू करने की कोशिश कर रही है।

इसी एजेंडे को लागू करने के लिए लोकसभा चुनाव में ईवीएम का जबरदस्त खेल किया गया। ईवीएम के खेल में देश के कुछ चुनिंदा पूँजीपतियों का सक्रिय सहयोग था, जिसके फलस्वरूप उन्हें देश के अधिकतर संसाधनों पर कब्जा दिलाने का काम खूब जोरशोर से किया जा रहा है।

CAA, NRC और NPR की पृष्टभूमि को समझने के लिए नीचे शेयर किए गए “आजतक” के वीडियो को ध्यान से देखें। हो सके तो उसे डाउनलोड कर लें, क्योंकि उसे डीलिट किया जा सकता है।

2014 में ही धर्म जागरण समिति ने धर्मांतरण के मुद्दे को तूल देते हुए कहा था कि ’21 दिसंबर 2021 तक देश के सभी मुसलमानों और ईसाइयों को हिंदू बना दिया जाएगा. यही नहीं, राजेश्वर सिंह ने यह भी कहा था कि मुसलमानों और ईसाइयों को देश में रहने का हक भी नहीं है और 2021 तक इन्हें देश से निकाल दिया जाएगा। राजेश्वर सिंह किनकी ओर से बयान जारी कर रहा था ? उनके बयान के पीछे कौन से तत्व काम कर रहे थे ?

बकौल (aajtak.in [Edited By: महुआ बोस]
नई दिल्ली, 18 दिसंबर 2014, अपडेटेड 13:43 IST) लिंक https://aajtak.intoday.in/…/will-finish-christianity-and-is…
2014 के अगस्त में धर्म जागरण समिति और बजरंग दल ने मिल कर अलीगढ़ में 72 लोगों को ईसाई से और 8 दिसंबर 2014 को आगरा में 200 मुसलमानों की हिंदू धर्म में वापसी कराई थी। खबरों में इन संगठनों को आरएसएस का अनुषंगी बताया गया है।

इसका मतलब है कि CAA, NRC और NPR जैसे कार्यक्रमों का खाका बहुत दिनों से बनाई जा रही थी। इस पर काफी माथा-पच्ची की गई है। विशेषज्ञों की सहायता ली गई है। मतलब षड़यंत्र में सैकड़ों लोग शामिल है। ऐसे तमाम षड़यंत्रों का एक पहलू आर्थिक लाभ या लूट और अपनी जमींदारी स्थापना करना जरूर होता है। ऐसा लगता है वर्तमान लोकसभा कार्यकाल को इसके लिए अंतिम समयसीमा निर्धारित किया गया है। इसके लिए खरबपतियों से सहायता मांगी गई और ईवीएम के रास्ते इस लक्ष्य तक की दूरी की यात्रा निष्कंटक पूरी की गई। इसका मतलब यह है कि जैसे-जैसे CAA, NRC और NPR के कार्य या अफरा तफरी को बढ़ाया जाएगा, सरकारी और राष्ट्रीय संपदा की लूट भी बढ़ती जाएगी, और लक्षित हिंदू राष्ट्र में अघोषित रूप से देश के एक दर्जन पूँजीपति देश के मालिक भी बन जाएँगे। कोई एनर्जी सेक्टर पर कब्जा कर लेगा, कोई उत्पादन और वितरण पर तो कोई रक्षा और वैज्ञानिक विकास के तामझाम पर। सरकारी उद्यमशीलता और PSUs को खत्म कर दिया जाएगा और राष्ट्रीय एकाधिकार की ऐसी व्यवस्था तैयार कर ली जाएगी, कि कोई व्यक्ति तो क्या, कोई भी संगठन या आंदोलन इन व्यवस्थाओं को चुनौती नहीं दे सकेगा।

मतलब विराट हिंदू जनसंख्या दर्जन भर पूँजीपतियों के द्वारा परोक्ष रूप से शासित होगा। देश में सामंतवाद, राजा-राजवाड़े के राज फिर से फूनगियों में उग जाएगी और हिंदू जनता मंदिरों में भजन गाएगी या इन पूँजीपतियों के रहमो-करम पर जिंदगी जीएगी। पूँजीपतियों की लूट में आम जनता रोड़ा न बनें इसके लिए फिलहाल उन्हें हिन्दुत्व का लालीपोप चूसने के लिए दिया गया है। CAA, NRC और NPR के सपोर्ट में आकर जनता लालीपोप चूसती हुई दीख भी रही है।

गैर हिन्दू को हिंदू बनाने के लिए नागरिकता का मुद्दा एक तलवार है। वर्तमान आधुनिक राजनैतिक व्यवस्था में पूरे विश्व में कोई भी व्यक्ति जानवरों की तरह नागरिकविहीन मनुष्य नहीं हो सकता है। इस अति अनिवार्य नागरिकता के मुद्दे को ही धर्म की पोंगापंथी लक्ष्य को पूरा करने के लिए हथियार बनाया गया है। यह अत्यंत सोची-समझी चाल है। जाहिर है कि यह खतरनाक स्तर की बदमाशी, निकृष्टता, बेवकूफी और मानव विरोधी सोच पर आधारित है। इस विचारधारा में मेरा धर्म और संस्कृति ही श्रेष्ठ है जैसी झूठी अवधारणा गुंफित है। जबकि वास्तविकता तो यह है कि धर्म संस्कृति और उससे जुड़े विचार कभी एक से नहीं रहते हैं और उसमें निरंतर परिमर्जन की प्रक्रिया चलती रहती है। लेकिन साम्प्रदायिक सोच से नहाए लोगों को सिर्फ अपनी संकुचित सोच के वर्चस्व को बनाए रखने की धुन रहती है। चाहे इसके लिए कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।

तीन दिन पहले आई ग्लोबल लोकतंत्र सूचकांक की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में नागरिकों की आजादी की स्थिति एक साल में कम हुई है। लोकतांत्रिक सूची में यह गिरावट देश में नागरिक स्वतंत्रता के ह्रास के कारण आई है। सूची में चीन 153वें स्थान पर है। नार्वे शीर्ष पर व उत्तर कोरिया सबसे नीचे है। सूचकांक सरकार का कामकाज, चुनाव प्रक्रिया व बहुलतावाद, राजनीतिक भागीदारी, राजनीतिक संस्कृति और नागरिक स्वतंत्रता पर आधारित है।

यह रिपोर्ट बहुत कुछ कहता है। भारत बहुलतावादी देश है और लोकतंत्र और आजादी भारत की रीढ़ की हड्डी है। रीढ़ के कमजोर होने का मतलब आजादी और लोकतांत्रिक मूल्यों को धारण करने वाली सरकार, मीडिया, संसदीय परंपरा, न्याय प्रणालियों का कमजोर होना है। ये सूचकांक बहुत खराब स्थिति को इंगित करता है। मतलब यही है कि देश कुछ लोगों की धार्मिक पोंगापंथी की जिद्द से चरमरा रहा है और यही हाल रहा तो एक दिन भरभरा कर गिर जाएगा। तब स्थिति अफ्रीका और मिडिल इस्ट की किसी देश के जैसे हो जाएगा, और विश्व की तीसरी आर्थिक और मिलिटरी शक्ति होने के ख्वाब हवा में विलीन हो जाएँगे।

भारत में चल रहे वर्तमान संघर्ष के केन्द्रीय भाग में, मूल रूप में आस्तिकों के मध्य धर्म और संस्कृति का संघर्ष है। एक आस्तिक विचारधारा दूसरे आस्तिक विचारधारा को अपना दुश्मन समझता है और उसे कमजोर करने, वजूद से मिटा देने के लिए रास्ते तलाशता रहता है। आस्तिकों की इस लड़ाई में आध्यत्मिकता बिल्कुल नहीं है। धर्म और पोंगापंथी के इन रणनीतिक और संघर्ष में धार्मिक कट्टरपन ही एक दूसरे को लड़ाई के लिए उकसाता है। इस संघर्ष और दुश्मनी को विज्ञान और पॉपुलर कल्चर के विचारधारा से नष्ट किया जा सकता है। लेकिन ऐसी सोच देश में कितने के पास है ?

आस्तिकों (बिल्लियों) की लड़ाई में पूँजीपति (बंदर) अदूरदर्शी नेताओं, बाबुओं के सहारे पूरे देश के संसाधन, लोकतंत्र, आजादी, मानवीय और नागरिक अधिकारों को खा जाएँगे और फिर बिल्लीयों का झूँड़ अत्यंत शक्तिशाली बने बंदरों को निरीह आँखों से ताकने के सिवाय कुछ नहीं कर पाएँगे।

https://aajtak.intoday.in/video/i-will-make-everyone-hindu-says-rajeshwar-singh-1-792031.html?fbclid=IwAR1l0bNDQrIJHXR2gAp5GtWpLZKY_McNGAUlUKEfG0p_RccGkfJCAyRmgaU

आदिवासियों के साथ ममता सरकार का सौतेला व्यवहार

नेह इंदवार

बकौल उत्तरबंग संबाद (23 जनवरी 2020) ममता दीदी ने पहाड़ में डेवलपमेंट बोर्ड्स के लिए 2014-2017 के बीच लेप्चा, तमांग, शेरपा, मंगर, दमई, गुरूँग, कामी सहित 15 विकास बोर्ड्स को 480 करोड़ रूपये उपलब्ध कराया :- लेप्चा विकास बोर्ड- 130 करोड़, तमांग विकास बोर्ड 75 करोड़ सहित अन्य विकास बोर्ड को 25 से 30 करोड़ रूपये उपलब्ध कराया। इनमें से लेप्चा विकास बोर्ड के कार्यकलापों को छोड़कर अन्य विकास बोर्ड के कार्यकलापों पर अनेक प्रश्न चिह्न उठे हैं। इनमें से अधिकतर ने सरकार को Utilization Certificate अर्थात् कार्य सम्पन्न हुए ऐसा प्रमाण-पत्र जमा नहीं दिए हैं और सरकार का कहना है कि जब तक उसे यह प्रमाण-पत्र नहीं प्राप्त होगा, वह इन बोर्ड्स को और फण्ड उपलब्ध नहीं कराएगी।
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हम सरकार और पहाड़ के बोर्ड्स के बीच के मामलों में कुछ नहीं बोलेंगे। लेकिन डुवार्स के साथ सरकार का सौतेला व्यवहार बहुत स्पष्ट हो चला है। डुवार्स के लेप्चा, तमांग, शेरपा, मंगर, दमई, गुरूँग, कामी सहित 15 समुदायों को इन विकास बोर्ड्स के पैसों का कोई हिस्सा मिला या नहीं यह एक बड़ा प्रश्न है। उपरोक्त कई समुदायों में महज कुछ हजार ही परिवार हैं। उन परिवारों को इन फण्ड्स में से हिस्सा मिला या नहीं यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। कृपया आपलोग आरटीआई से ऐसे लोगों की सूची प्राप्त करें जिन्हें डुवार्स में उन पैसों में हिस्सेदारी मिली है।
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लेकिन बहुत बड़ा प्रश्न है कि सरकार ने क्यों पश्चिम बंगल आदिवासी विकास बोर्ड को नाममात्र का फण्ड उपलब्ध कराया ? पश्चिम बंगाल विकास बोर्ड को राज्य के 50 लाख आदिवासियों के लिए महज 5 करोड़ का फण्ड उपलब्ध कराया जाता था। लेकिन पहाड़ के विकास बोर्ड को इससे दुगुणी, तिगुणी फण्ड दिया जाता रहा है। लेकिन अब तो वह भी नसीब नहीं हो रहा है। यह स्पष्ट है कि डुवार्स-तराई के आदिवासियों के साथ सरकार जानबूझ कर सौतेला व्यवहार करती है। यह सिर्फ मामता सरकार की बात नहीं है। बल्कि हर सरकार ने यही किया है। लेकिन आदिवासी नेता अलग राज्य के मुद्दे या वोट के मुद्दे पर कोलकाता के नेताओं का ही समर्थन करते रहे हैं। लेकिन बदले में उन्हें पिछवाड़े में सरकार की लात मिलती रही है।
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सवाल है कि सरकार पहाड़ के विकास बोर्ड्स पर क्यों अधिक पैसा लुटाती है और डुवार्स तराई के विकास बोर्ड को पैसों के लिए तरसाती है? इसका एक ही उत्तर है, वह है पहाड़ के लोग अधिक शिक्षित हैं और वे अपने अधिकारों के लिए आंदोलित रहते हैं और अधिकार प्राप्ति के लिए अलग राज्य की मांग उठाते रहते हैं। पश्चिम बंगाल सरकार सिर्फ अलग राज्य की मांग की एकता को तोड़ने के लिए ही सरकारी पैसों को पहाड़ पर लुटा रही है। यदि डुवार्स में भी अलग राज्य की मांग की जाएगी तो जाहिर है डुवार्स के लोगों के उपर भी ममता या अन्य की ममता की बारिश होगी।
.🍀🌲कोलकाता की सरकार की पहली प्राथमिकता बंगाल सरकार में कोलकाता वासियों की वर्चस्व बनाए रखनने की है। वह चाय बागान के गैर-बंगला भाषी जनता को बंगाल की स्वाभाविक नागरिक नहीं सकती है। यह हजारों बार स्पष्ट हो चुका है। यह सरकार कितनी साम्प्रदायिक और जातिवादी है यह इस बात से भी स्पष्ट हो चुका है कि टी टूरिज्म के लिए एक दो पूँजीपतियों की मांग पर तुरंत कार्रवाई करते हुई टी टूरिज्म के लिए नई नीति लाई और इसमें उन मांगों को भी शामिल कर ली, जिसकी मांग ही किसी ने नहीं उठाया था। लेकिन चाय बागान मजदूरों के वेतन वृद्धि को चार साल में 14 बार मिटिंग करके भी ठण्डे बस्ते में रखा हुआ है। लोकसभा चुनाव में खुद ममता दीदी ने पाँच रैली में चाय मजदूरों को आवासीय पट्टा देने की घोषणा की, लेकिन वह तो केन्द्र सरकार के मोदी से भी बड़ा जुमलाबाज निकली।
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ममता सरकार ने टी टूरिज्म से चाय मजदूरों को चाय में डुबी हुई मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दी है और उन्हें टी टूरिज्म का कोई भी लाभ देने से पूरी तरह वंचित कर दी है। चाय मजदूर केवल टूरिस्टों के खिदमद करके या उनके सामने नाचनिया बन के ही कुछ भीख में पैसा कमा सकते हैं, बाकि उनके लिए कहीं कोई गुंजाईश नहीं रखी गई है। टी टूरिज्म में कैसे उनके साथ सौतेला व्यवहार किया गया, यह इतिहास में लिखा जाएगा। यह विकास बोर्ड में दिए जाने वाले 25-30 करोड़ की तरह मामूली बात नहीं है। बल्कि इसका वित्तीय असर लम्बे अरसे में खरबों रूपये का होगा। टी टूरिज्म चाय मजदूरों के शोषण का एक नया जाल साबित होगा।

सरकार ने जारी किया टी टूरिज्म नोटिफिकेशन

                                 नेह इंदवार

पश्चिम बंगाल सरकार ने टी टूरिज्म पर नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। इस विषय पर कुछ माह पहले लिखा हुआ एक लेख को फिर से शेयर कर रहा हूँ, ताकि इस विषय पर चर्चा को ताजा किया जा सके। ममता दीदी की सरकार ने सह्रदयता दिखा कर उन विषयों को भी टी टूरिज्म नीति में शामिल कर दिया है, जिनकी मांग किसी ने नहीं की थी। अब सवाल यह है कि जो बागान प्रबंधन चाय बागान में होटल आदि बनाएँगे, क्या वे बागान में लॉक आउट घोषण करेंगे तो क्या किसी चाय बागान में चल रहे अन्य उद्योग में भी लॉक आउट की घोषणा अपने आप हो जाएगी ? सवाल यह भी है कि एक चाय बागान प्रबंधन के अधीन लीज जमीन में क्या होटल आदि किसी अन्य कंपनी के नाम पर रजिस्ट्री की जाएगी ? यदि सरकार किसी अन्य कंपनी के नाम पर होटल खोलने देगी तो क्या होटल की जमीन को किसी अन्य नाम पर हस्तांतरित की जाएगी ? आखिर सरकार ने टी टूरिज्म के नाम में मजदूरों को अपने गृह आवास के खाली पड़ी जमीन, आंगन, सब्जी बारी में होटल या गेस्ट हाउस बनाने की अनुमति देने को क्यों शामिल नहीं किया ? मजदूर कोऑपरेटिव बना कर भी तो लॉज, होटल चला सकते हैं। उसकी अनुमति क्यों नहीं दी गई ? तो क्या यह टी टूरिज्म चाय मजदूर को होटल मजदूर बनाने की नई नीति है ? इन होटलों में 20 प्रतिशत कर्मचारी बाहर के होंगे तो उन्हें स्थायी रूप से बसाने की नीति भी मंजूर की जाएगी ? आखिर 80 प्रतिशत कर्मचारी के रूप में चाय मजदूर क्या-क्या काम करेंगे और उन्हें कौन सा वेतन दिया जाएगा ? सैकड़ों सवाल है। फिलहाल आपलोग इस विषय पर न्यूज क्लिप को पढ़ें और अपना कमेंट्स दें। आखिर यह टी टूरिज्म किनके हित में बनाई गई है ? मेरे पुराने लेख को पढ़ने के लिए नीचे के लिंक को क्लिक करें।https://madhubaganiar.wordpress.com/2019/11/10/%e0%a4%9f%e0%a5%80-%e0%a4%9f%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%af-%e0%a4%ae%e0%a4%9c%e0%a4%a6%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87/?fbclid=IwAR2AybqEpH966epl3BIY_oWRiPWZd1CRi9oNnADTJ1-NPyFg1tHyZi_5E-E

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