नोटा का बटन बनाएगा चाय मजदूर को विजेता

नेह इंदवार

डुवार्स तराई के दोस्तों के लिए :- यह लेख लंबी है, लेकिन चाय मजदूरों के संघर्ष की लड़ाई में यह मील का पत्थर साबित होगा। जिनके हृदय में चाय मजदूरों के संघर्ष के लिए हमदर्दी है वे इसे जरूर पढ़ें और अपनी राय जरूर व्यक्त करें।

भारत में प्रथम आम चुनाव 25 अक्तूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 के बीच हुआ था। अब 17वीं लोकसभा के लिए आम चुनाव अप्रैल-मई 2019 के महीने में होगा। अब तक चाय मजदूरों ने 16 बार लोकसभा के लिए वोट डाला है और इतनी ही बार राज्य विधानमंडल के चुनाव के लिए भी वोट डाला है। चाय बागानों में पंचायत चुनाव होने के बाद से सभी मजदूर अपना प्रथम कर्तव्य समझ कर पंचायत चुनाव में वोड डाल रहे हैं।

लेकिन सवाल है कि इतनी बार विभिन्न् राजनैतिक पार्टियों के पक्ष में वोट डालने के बाद भी चाय मजदूर को राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से क्या लाभ हुआ ? यह जानना इस लिए भी जरूरी है कि जिस चुनाव के लिए मजदूरों को उत्तेजित करके राजनैतिक पार्टियों के लिए वोट डलवाया जाता है, वोट पाने के बाद विजयी पार्टी और नेता या सरकार चाय मजदूरों के लिए क्या-क्या सौगात लेकर आते है?

चाय बागान मजदूरों के लिए आगामी लोकसभा के चुनाव या 2021 को राज्य विधान सभा के लिए होने वाले चुनाव का क्या मतलब होगा? क्या इन चुनावों से चाय बागान मजदूरों की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षिक स्थितियों में कोई बदलाव आएगा?

फिलहाल कुमारग्राम, अलिपुरद्वार,  कालचीनी, मदारीहाट, फालाकाटा, धुपगुड़ी, नागराकाटा, माल, जलपाईगुड़ी, फांसीदेवा, माटीगाढ़ा, सिलीगुड़ी, कार्सियांग, दार्जिलिंग, कलिम्पोंग आदि विधानसभा क्षेत्रों में चाय बागान के मतदाता रहते हैं और पिछले सभी चुनावों में उन्होंने भारतीय नागरिक के रूप में मतदान करके भारतीय जनतांत्रित व्यवस्था में अपना विश्वास व्यक्त किया था।

लेकिन भारतीय जनतांत्रिक व्यवस्था और उपरोक्त विधानसभाओं से विजयी उम्मीदवारों ने हमेशा चाय मजदूरों को निराशा ही दिया है। जिन वादों के साथ वे चुनाव प्रचार के लिए आते हैं। चुनाव जीतने के बाद वे कभी भी चाय मजदूरों के क्लासिकल अर्थात् स्थायी समस्याओं को सुलझाने के लिए कुछ करते नहीं।

भारतीय राजनीति व्यवस्था ने चाय मजदूरों के साथ हमेशा ठगी की है। उनकी ठगी का परिणाम ही है कि चाय मजदूर पूरे भारत में एक संगठित क्षेत्र में काम करते हुए भी सबसे अधिक गरीब, अनपढ़, विपन्न और बीमार समाज बना हुआ है। उपरोक्त विधानसभाओं से विधायक बने नेतागण चाय मजदूरों के वोट लेते रहे हैं। अधिकतर विधायक चाय मजदूर संगठनों के पदाधिकारी भी होते हैं या चाय मजदूरों के साथ रेगुलर रूप से संपर्क में भी रहते हैं। लेकिन उन्होंने उनके अधिकारों, उनके विकास के लिए कभी भी मुकम्मल रूप से काम नहीं किया। चाय मजदूर आज भी सुविधाहीन, अनपढ़ गरीब हैं और उनकी माली हालत और सामाजिक विकास के लिए किसी भी राजनैतिक नेता, विधायक, सरकार ने ठोस रूप से कोई काम नहीं किया। आज डेढ़ सौ वर्ष बीत जाने के बाद भी चाय मजदूरों का अपना घर, घर का पट्टा नहीं है। घर का पट्टा नहीं होने के कारण वे अपने आवास का मन मुताबिक मरम्मत भी नहीं कर सकते हैं। छोटे से आवास में ही माँ-बाप भाई-बहन और शादीसुदा बेटे-बेटियों को अमानवीय ढंग से रहना पड़ता है। वे न तो अपने घरों में कोई घरेलू उद्योग धंधे या लघु उद्योग धंधे कर सकते हैं और न घर का विस्तार। वे यदि किसी शिल्प में पारंगत हों तो भी अपने घर में लघु क्षेत्र के घरेलू कार्यों को लिए बैंक से कोई लोन नहीं ले सकते हैं।  

उन्हें सिर्फ इतनी ही मजदूरी दी जाती है कि वे दो शाम को रूखी सुखी भोजन कर सकें। स्वास्थ्यकर, संतुलित खानपान करने की वे सोच भी नहीं सकते हैं। जन्म, मरण, शादी, विवाह, स्तरीय पढ़ाई लिखाई, स्तरीय स्वास्थ्य, बीमा, वाहन आदि के लिए उनकी कमाई में कोई संभावना नही्ं है। वे अपने बच्चों को गणित, अंग्रेजी, भाषा, संगीत, गेम्स आदि के लिए ट्यूशन दिलवा सकें इतने पैसे कभी उनके पास नहीं होते हैं। जो भी वाहन, टीवी आदि खरीदी की जाती है या तो वे गाय बैल, बकरी को बेच कर करते हैं या प्रोविडेंड फंड और ग्रेच्युएगी के पैसे को लगा कर की जाती है।

भारतीय राजनीति और प्रशासन के द्वारा किया जा रहा ठगी, पक्षपात, निरंतर चलते रहा है और कितने भी चुनाव आते रहेंगे और जाते रहेंगे, लेकिन चाय बागान के मजदूरों के साथ नेताओं की ठगी, धोखेबाजी चलती ही रहेगी।

पिछले पाँच साल से चाय मजदूर न्यूनतम वेतन, अपने घर के लिए चाय बागान के अपने निवास के घर का पट्टा मांग रहे हैं। लेकिन उपरोक्त चुनाव क्षेत्रों से चुने गए नेताओं ने उनके हक, अधिकार और न्याय के लिए कुछ भी नहीं किया। उन्होंने दिखावा के काम तो खूब किया। खूब भाषण दिया और वादा किया। लेकिन चाय मजदूरों के क्लासिकल समस्या पर उपरोक्त विधानसभाओं के 15 विधायक और सांसद कुछ ठोस काम करने में पूरी तरह असफल रहे।

सवाल है कि मजदूरों के वोट से विधायक बने नेता अपने विशेषाधिकार (privilege) के साथ अपनी जिम्मवारी और  कर्तव्य कितना निर्वाहन किया? विधान सभा में कितने तारांकित और अतारांकित सवाल चाय मजदूरों से संबंधित था या है? क्या उन्होंने कभी चाय बागान मजदूरों के पक्ष में समिल्लित रूप से कोई बैठक की और उस बैठक में पारित प्रस्ताव को सरकार को सौंप कर उन पर कार्रवाई करने के लिए अनुरोध किया? चाय बागान के लोगों के पीएफ के खाते, पैसों, ग्रेज्युएटी के पैसों का गबन एक खुला रहस्या है। क्या उन्होंने इस संबंध में कभी प्रभावी कदम उठाया? क्या इन नेताओं ने कभी सम्मिलति रूप से पीएफ और ग्रेज्युएटी का गबन करने वालों के विरूद्ध एससीएसटी एक्ट या अन्य किसी भी एक्ट के तहत ठोस कार्रवाई करने के लिए पुलिस, प्रशासन या सरकार को लिखा ?  

‘इंदिरा आवास’,  ‘निज गृह निज भूमि’ आदि सरकारी नीति को चाय बागान में जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए ये विधायकगण अब तक क्या-क्या किए हैं ? भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय और 2001  हुए जनगणना रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम बंगाल में 2 करोड़ 54 लाख एकड़ जमीन (Households that received ceiling surplus land 2.54 million) Sources: G11vernment of India, M1mstry of Rural Development, 2001 and Census, 2001) गरीब भूमिहीन नागरिकों को बाँटी गई। लेकिन इनमें एक भी इंच जमीन चाय बागान मजदूर के हिस्से नहीं आयी।

पूरे भारत में भूमिहीन गरीबों को सरकारी जमीन बाँटी गई। लेकिन चाय मजदूरों को आवासीय पट्टा देने के लिए कभी भी विचार नहीं किया गया। जबकि चाय मजदूर बस्ती सरकारी जमीन पर बसी हुई है और The Plantation Labour Act के तहत उन्हें रहने के लिए आवास दिए गए हैं। वे आवासीय व्यवस्था कब का ध्वंस हो चुका है और आज यह मजदूर आवास बागान प्रबंधन की जमींदारी अत्याचार का रणक्षेत्र बना हुआ है। चाय बागान में बाहरी लोग आकर दूकान, मकान बना सकते हैं लेकिन जब चाय मजदूर अच्छा घर बनाना चाहें तो उसे लीज की जमीन पर अतिक्रमण साबित करके उसे ढहाया जाता है। चाय बागानों में यह एक गंभीर अत्याचार का कारण बना हुआ है। लेकिन कोई भी विधायक, सांसद, प्रशासन और सरकार चाय मजदूरों के साथ हो रहे इस अमानवीय अत्याचार पर अब तक कुछ करने के लिए सामने नहीं आए हैं। जब चाय प्रबंधन चाय मजदूरों को स्टैडर्ड, सरकार द्वारा स्वीकृत मानकों के अनुसार घर बना कर नहीं दे सकता है। घर के साथ पानी, पैखाना, बिजली, सड़क, नाली आदि बना कर नहीं दे सकता है तो मजदूर बस्ती को चाय बागान के लीज के अंदर रखने का क्या मतलब है ?

ऐसा लगता है मजदूर को सरकार और चाय मालिक टूटे फूटे क्वार्टर में बंदी बना कर रखने के लिए प्रतीज्ञा किए हुए हैं और किसी भी हालत में वे अपनी स्तरीय घर में न रह पाएँ उसके लिए उन्हें भूमि का पट्टा नहीं देने का प्रण किया हुआ है। इसीलिए पिछले पाँच- सात साल से मकान के लिए मांगी जा रही आधिकार को देने के लिए सरकार के कानों में जूँ भी नहीं रेंग रही है। विधायकों और सांसदों को भी मजदूरों के इन मांगों से कोई हमदर्दी नहीं है। वे आज तक इस विषय में दिखावा करने के सिवाय कोई ठोस कार्य किया किए हैं। मजदूरों को वैकल्पिक रोजगार देने या रोजगारमूलक प्रशिक्षण देने के लिए भी इन नेताओं को चिंता नहीं है। पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री अमित मित्र ने बजट में चाय उद्योग को कृषि क्षेत्र का उद्योग कहा है। इसलिए उद्योग क्षेत्र के मजदूरों को सरकारी भूमि नहीं करने का कानून यहाँ लागू हो नहीं होता है। फिर मजदूर सरकार से कोई नयी भूमि की मांग नहीं कर रहे हैं। बल्कि वे उसी भूमि के पट्टे की मांग कर रहे हैं, जिस पर उनके बाप-दादा और उनके बाप-दादा डेढ़ सौ वर्षों से रहते आ रहे हैं। पूरे भारत में तमाम शहरी क्षेत्रों या ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार ने उन भूमि का पट्टा उन परिवारों को दे दिया है जहाँ वे कई वर्षों या दशकों से रह रहे हैं। केन्द्र सरकार ने सभी नागरिकों को 2022 तक आवासीय सुविधा देने का लक्ष्य रखा है। लेकिन लगता है चाय बागान के मजदूर किसी अन्य ग्रह में रहते हैं और इसलिए उनके मौलिक अधिकारों का हनन लगातार किया जा रहा है।

विधायक क्षेत्र विकास परियोजना जिसे बंग्ला में  Bidhayak Elaka Unnayan Prakalpa (BEUP)कहा जाता है। इस परियोजना के लिए विधायक अपने विधान सभा क्षेत्र के विकास के लिए प्रति वर्ष 50 लाख रूपये के विकास योजनाओं के लिए सरकार को लिखता है और अपने इलाके में विकास योजनाओं को क्रियान्वित करता है। उपरोक्त विधान सभा के सभी विधायक बताएँ कि उन्होंने चाय मजदूरों के हित और लाभार्थ कौन-कौन से विकास कार्यक्रम को कार्यन्वित करवाएँ हैं? इसी तरह सांसद को भी अपने क्षेत्र में विकास योजनाओं में खर्च करने के लिए प्रति वर्ष 5 करोड़ रूपये का फंड मिलता है। अलिपुरद्वार, जलपाईगुड़ी, दार्जिलिंग के सांसद बताएँ कि चाय बागान मजदूरों के लिए उन्होंने अपने सांसद फंड का कितना पैसा चाय मजदूरों के हित और कल्याणार्थ व्यय किया है? कृपया वे लिखित में बताएँ। बहुत आश्चर्य की बात है कि न्यू माल रेल्वे स्टेशन के फर्स्ट क्लास प्रतीक्षालय में लगे कुर्सियाँ पर Members of Parliament Local Area Development Scheme (MPLADS).लिखे हुए हैं। आखिर रेलवे स्टेशन में (MPLADS). के फंड को क्यों खर्च किया गया? क्या (MPLADS) के फंड को रेलवे के लिए खर्च करके उसका दुरूपयोग किया जा सकता है ? अलिपुरद्वार के एमपी बताएं कि उन्होंने (MPLADS)  के फंड का व्यवहार कहाँ-कहाँ किया है और चाय मजदूरों को उससे क्या फायदा मिला है?

चाय मजदूर वोट देते हैं लेकिन वोट मिलने के बाद उन्हें न विधायक और सांसद याद करते हैं न सरकार। तो चाय मजदूर वोट क्यों देता है? क्या उन्हें वोट देना चाहिए ? यदि हाँ तो क्यों ? वे यदि न भी दें तो क्या फर्क पड़ेगा? उनके ऊपर कौन सा पहाड़ टूट कर गिरेगा? पिछले 76 सालों से वह वोट देता आ रहा है। अप्रैल मई महीने में होने वाले वोट में मतदान नहीं करेगा तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा?  कौन उम्मीदवार जीत कर उनके कौन सी समस्या का समाधान कर देगा?  यदि कोई नेता या पार्टी या सरकार प्रस्तावित चुनाव जीत कर ही समस्या का समाधान करने का वादा करता है तो सवाल है कि चुनाव के पूर्व इतने दिनों तक वह क्या करता रहा?  एक सांसद का कर्तव्य और जिम्मेदारी और विशेषाधिकार क्या-क्या है? क्या वह भारतीय शासन व्यवस्था में एक नुमाईश की तरह होता है या वह अपने विशेषाधिकार को प्रयोग में ला कर आम लोगों की समस्याओं को सुलझाने के लिए पहल भी कर सकता है और चल रहे परियोजनाओं पर पैनी नजर भी रख सकता है?

 चाय मजदूरों के किसी भी समस्या का समाधान किसी भी सरकार ने ईमानदारी से नहीं किया है और आगे भी कोई सरकार करेगी, यह आशा रखना मुगलते में रहने के बराबर ही है। चुनाव आता है और चला जाता है। लेकिन मजदूरों को कोई योग्य जनप्रतिनिधि नहीं मिल पाता है। राजनैतिक दल आरक्षित लोकसभा सीट या विधानसभा सीट से योग्य और फायरब्रांड नेताओं को चुनाव में जानबुझकर नहीं उतारते हैं। वे नहीं चाहते हैं कि आरक्षित सीट से कोई योग्य उम्मीदवार चुनाव लड़े और चुनाव जीतने के बाद वह चाय मजदूरों के पक्ष में अपने विशेषाधिकारों का उपयोग करके उनकी समस्याओं को राष्ट्रीय समस्या के रूप में सामने लाए। फिलहाल कोई भी ऐसा नेता दिखाई नहीं देता है, जिन्हें मजदूरों की वास्तविक फिक्र है और मजदूरों के लिए अपनी आवाज़ को बुलंद रूप से उठाएँ। उपरोक्त विधानसभा सीटों से कई विपक्षी पार्टियों के विधायक हैं लेकिन किसी ने भी चाय मजदूरों के लिए बुलंद आवाज उठायी है ऐसा किसी घटना से नहीं लगता है। सभी विधायक बनने के बाद अपनी छाप छोड़ने में असफल सिद्ध हुए हैं।

भारतीय चुनाव प्रणाली में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन में नोटा का बटन लाया गया है। यह बटन इसलिए लगाया गया है कि यदि चुनाव में कोई योग्य उम्मीदवार खड़ा न हुआ हो और किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में वोटर का विश्वास नहीं जम रहा हो तो वे उपरोक्त उम्मीदवारों में से किसी को भी नहीं चुनने के लिए मतलब सभी को रिजेक्ट करने के लिए नोटा बटन को दबा सकते हैं और सभी खड़े उम्मीदवार को पराजित कर सकते हैं। चाय मजदूरों ने हर चुनाव में हिस्सा लिया है लेकिन हर चुनाव के बाद उनके हिस्से में निराशा ही हाथ लगी है। जाहिर है कि अगले चुनाव में भी वोट देकर उनके हाथों में कुछ आने वाला नहीं है। न तृणमूल कांग्रस कुछ देने वाली है और न बीजेपी। इन दोनों पार्टियों से चाय मजदूरों को कुछ भी आशा नहीं रखनी चाहिए। ये यदि ईमानदार होते तो दोनों सत्ताधारी पार्टियाँ चाय मजदूरों के पक्ष में अब तक बहुत कुछ कदम उठा चुके होते। लेकिन वे न अब करने वाले हैं और न चुनाव बाद में। इसलिए उन पार्टियों के उम्मीदवारों को वोट देने का मतलब है अपने पैर में कुल्हाड़ी मारना। जाहिर है कि ये दोनों पार्टी अयोग्य उम्मीदवारों को पार्टी का उम्मीदवार बनाएँगे, जो इन पार्टियों के नेताओं के हुक्म का गुलाम होंगे और आम जनता के लिए चाह कर भी कुछ नहीं कर पाएँगे।

इन दोनों पार्टियों के उम्मीदवारों के सिवाय किसी और को वोट देने का मतलब ही है वोट की बर्बादी। इसलिए अब की बार नोटा के बटन दबाने से ही चाय मजदूरों को बहुत कुछ हासिल हो सकता है। चाय मजदूर अलग-अलग पार्टियों में बिखरे पड़े हैं, लेकिन नोटा का बटन उन्हें एकता के सूत्र में बाँध देगा। यहाँ किसी पार्टी की गुलामी करने की जरूरत भी नहीं होगी। इस चुनाव में चाय मजदूरों के वोट ही निर्णायक वोट है। यदि वे सभी नोटा के बटन को दबाएंगे तो सभी उम्मीदवार पराजित हो जाएँगे। नोटा की जीत से पूरे भारत की जनता, मीडिया, प्रशासन, और पार्लियामेंट को चाय मजदूरों के भारतीय जनतांत्रितक व्यवस्था में चाय मजदूरों की अविश्वास की बात का पता चल जाएगा। पूरी दुनिया की मीडिया और लोग चाय मजदूरों के साथ हो रहे अन्याय, अत्याचार, पक्षपात, गरीबी, अशिक्षा, विपन्नता को जान जाएँगे और राज्य सरकार और केन्द्र सरकार को झक मार कर चाय मजदूरों के कल्याण के लिए सामने आना पड़ेगा और उनकी अधिकतर मांगों की पूर्ति अपने आप हो जाएगी। अधिकतर समस्याओं का समाधान एक झटके में हो जाएगा। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि हम नोटा के ताकत को पहचाने और अपने चाय बागान में रहने वाले कई लाख लोगों के कल्याण और विकास के लिए नोटा के बटन को ही चुनाव का मुख्य काम समझें। मजदूर संघ और राजनैतिक पार्टियाँ हमें बाँटती है लेकिन नोटा हमें एकताबद्ध करती है। नेह इंदवार

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चाय मजदूर करे चुनाव में नोटा का इस्तेमाल

डुवार्स तराई के दोस्तों के लिए :- कृपया समय लेकर ध्यान से पढें।
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डुवार्स तराई के चाय मजदूरों के पास अपना कोई मीडिया नहीं है। गाहे- बगाहे उत्तरबंग सम्बाद में चाय संबंधी कुछ खबरें छप जाती है। हिंदी अखबार जागरण और जनपथ तथा भारत दर्पण के अपने स्वतंत्र पत्रकार नहीं हैं और उत्तरबंग सम्बाद में लिखने वाले बंगाला भाषी पत्रकार के रिपोर्ट को ही हिंदी अखबार अनुवाद करके छापते रहते हैं। उत्तरबंग सम्बाद को छोड़ दिया जाए तो बाकी के अखबार सिर्फ विज्ञापन से कमाई करने के लिए प्रकाशित की जाती है न कि उत्तर बंगाल की जनता के आर्थिक-राजनैतिक-सामाजिक-भाषाई-सांस्कृतिक संघर्ष में जनता की आवाज़ को साथ देने के लिए !! ले देकर मजदूरों के पास फेसबुक और व्हाट्सएप ही है। लेकिन फिर भी चाय मजदूरों के लिए बात करने वाले इन सोशल साईट्स पर नहीं आते हैं या अपनी बातें नहीं कहते हैं। इसका क्या मतलब निकाला जाए ? क्या उन्हें सोशल मीडिया की ताकत का अंदाजा नहीं है?
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न्यूनतम वेतन और बागान में आवास पट्टा के लिए छेड़ी गई संघर्ष में समाचार-मीडिया कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा ? ऐसा सोचना बहुत मासुमियत होगी। चाय मजदूरों के साथ वास्तविक रूप से कोई नहीं है। न तो तृणमूल कांग्रेस न ही भाजपा। सीपीएम और कांग्रेस बुढ़ा होकर हाँपती हुई नजर आती हैं। तृणमूल कांग्रेस सत्तासीन होने के कारण सीपीएम सरकार से अलग दिखने के लिए जरूर कुछ काम किया है लेकिन वह अनमने रूप से किया गया दिखावटी काम ही है। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा को चाय मजदूरों के वोट से मतलब है। तृणमूल सिर्फ इतना ही काम करना चाहती है कि वोट भाजपा या अन्य विपक्षी पार्टियों की ओर न खिसके। वहीं भाजपा दिखावटी रूप से अपनी उपस्थिति जताने के लिए कभी-कभी बेवकूफ बनाने के लिए मजदूरों के पक्ष में आवाज़ उठाने का नाटक करती है।
 
पश्चिम बंगाल में दोनों पार्टियों के पार्टी चंदे का स्रोत चाय बागान ही है। चाय बागान मालिकों से भाजपा को मोटी रकम मिलती है। आमतौर से भाजपा को सवर्ण पार्टी कहा जाता है और भाजपा के लोग खुलेआम कहते हुए भी पाए गए हैं कि यह पूँजीपति और व्यवसायियों की पार्टी है। चाय बागान पूँजीपतियों की है और भाजपा से इनकी नजदीकियाँ सार्वजनिक रूप से एक खुला हुआ रहस्य है। भाजपा चाय मजदूरों के मुद्दों पर कभी भी राज्य स्तर या राष्ट्रीय स्तर पर हमलावर रूख नहीं करती है। चाय मजदूरों को मुगलते में रखने के लिए निचले स्तर पर चाय बागानों से संबंधित लोगों को पार्टी में रखे हुए हैं। उपर निर्णय लेने वाले सभी कोलकाता के ही लोग हैं। वे चाय मजदूरों के लिए कभी भी निर्णायक कदम नहीं उठाएँगे। न तो पीएफ की लूट पर और न ही ग्रेज्युएटी पर। ये चाहते तो केन्द्र सरकार को पीएफ लूट पर अपराधिक मामले दायर करने के लिए कार्रवाई करवा सकते हैं। लेकिन अटल सत्य है ये यह काम कभी नहीं करेंगे। न्यूनतम वेतन के लिए निर्मला सीतारणन एक बार गौहाटी में जुमलेबाजी करके निकल गई और कभी इन तीन सालों में किसी भाजपा नेता का इस संबंध में जुमलेबाजी भी नजर नहीं आया। आखिर ये चाय मजदूर किस खेत की मूली हैं जिसके लिए भाजपा दुबला पतला होना पसंद करेगी। भाजपा बंगलादेशी घुसपैठियों के विरोध की बात करती है, लेकिन चाय अंचल में उनके विरूद्ध ये कभी भी कोई आंदोलन नहीं छेड़ेंगी। हाथी के दाँत खाने और दिखाने के अलग-अलग होते हैं। प्रधानमंत्री तक ने चाय मजदूरों के लिए अंगुठा दिखा दिया है। न्यूनतम वेतन के लिए केन्द्र सरकार का निर्देश भी दिलवा सकते थे। भाजपा का एक ही कार्यक्रम है – तृणमूल कांग्रेस के प्रति उठते असंतोष को वोट में कैसे परिवर्तन किया जाए और कैसे जीत हासिल की जाए ! बाकी मजदूर जाए भाड़ में।
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भाजपा की तरह ही तृणमूल भी कभी चाय मजदूरों के आर्थिक-सामाजिक, शैक्षिक काया-पलट में नाटकबाजी के सिवाय और कुछ नहीं करेगी। करना होता तो ये पिछले आठ वर्षों में कर चुके होते हैं। तृणमूल ईमानदार होती तो न्यूनतम वेतन सलाहकार समिति की अनुशंसा आ जाती और सरकार न्यूनतम वेतन की नोटिफिकेशन जारी कर चुकी होती। इस बीच सरकार चाहती तो आवास पट्टा के लिए कोई समिति का गठन कर लेती और समिति के अनुशंसा के अनुसार चाय मजदूरों के लिए आवास का पट्टा का आबंटन हो चुका होता।
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तृममूल सरकार ईमानदार होती तो डुवार्स-तराई के लोगों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए पंचायत के माध्यम से मिले कई सौ करोड़ रूपयों के खर्चों का ऑडिट कराती, विजिलेंस के द्वारा विकास की समीक्षा करती और चाय मजदूरों की जिंदगी को बेहतर बनाने वाले राशि के गबन के लिए भ्रष्टाचारियों को जेल भेजती। बंद बागानों को ईमानदारी पूर्वक खोेलती या कॉआपरेटिव में बागान चलाने के लिए आवेदन पत्रों पर तत्काल निर्णय लेती। संविधान के द्वारा संचालित शासन व्यवस्था में यही उचित कदम होता है। भ्रष्टाचारियों के कारण चाय बागानों में उन्नत होने वाले जीवन स्तर से चाय मजदूर वंचित हो गया है। यूरोप के शहरों और गाँवों में एक बार बने रोड, नाली, स्कूल, बिल्डिंग सौ सालों तक टिकता है और वहाँ भविष्य में आने वाले विकास की राशि से जिंदगी को अधिक खुशहाल बनाने के लिए अन्य महत्वपूर्ण कार्य में व्यय किया जाता है। लेकिन भ्रष्टाचारियों के कारण बागान का जीवन भयानक नरक में बदल गया है। पंचायत का लाभ सिर्फ पार्टी के भ्रष्टाचारी लोग उठा रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस का भी राजनैतिक चंदे का मुख्य स्रोत कोलकाता के पूँजीपति ही हैं। चाय बागान के मालिक न्यूनतम वेतन और आवास के पट्टा को रोकने के लिए सत्ताधारी पार्टी को ही चंदे देंगे, इसमें कोई दो राय नहीं है। कई हजार करोड़ रूपये चंदे के लिए कोई भी राजनैतिक पार्टियाँ चाय मजदूरों के मुद्दों पर कभी भी उनके साथ नहीं आएगा। राजनैतिक स्वार्थ की भेंट चाय मजदूर का हित चढ़ गया है।
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न मीडिया साथ देगा, न भाजपा साथ देगी और न तृणमूल कुछ करेगी। तब मजदूरों के पास लड़ाई का क्या हथियार है? आंदोलन करने का रास्ता तो जरूर है। नेताओं को आश्वसन देने के लिए तमाम जनप्रतिनिधि भी यही सलाह दे रहे हैं। लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि मजदूरों ने अपनी ओर से भरसक आंदोलन कर लिया है। यदि हमेशा मजदूरों को ही आंदोलन करने की जरूरत है तो ये एमएलए और एमपी किस काम के हैं? क्या ये नेतागण सचमुच सही सलाह दे रहे हैं? क्या वे आंदोलन में साथ निभाने के लिए अपनी सदस्यता से इस्तीफा देंगे? वे बताएँ कि विधानसभा या लोकसभा के किन-किन नियमों के तहत चाय बागानों के शोषण की बातों को सदन में उठाए थे ? क्या सदन के एश्योरेंस समिति या सरकारी विभागों में इनके उठाए गए मुद्दों पर कोई कार्रवाई हो रही है? आखिर इन्होने क्यों युनाइटेड फोरम के नेताओं को आंदोलन करने का सुझाव दिया ? तमाम नेतागण मिल कर मजदूरो के मुद्दों को कोर्ट में ले जाने की सलाह क्यों नहीं देते हैं ?
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सभी राजनैतिक नेताओं की सोच है कि चाय मजदूरों के लिए कुछ भी न करो फिर भी ये किसी न किसी को तो वोट देंगे। खसी भात खिला कर कुछ रूपये का लालच दे कर उनका वोट ले ही लिया जाएगा।
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क्या मजदूर मजबूर होकर वोट में नेताओं या किसी भी पार्टी को वोट देने के लिए मजबूर हैं ? भारतीय चुनाव पद्धति में के ईवीएम मशीन में NOTA (NON OF THE ABOVE) बटन होता है। इस बटन को दबा कर चाय मजदूर सभी पार्टयों के उम्मीदवारों को रिजेक्ट कर सकते हैं। यदि NOTA में किसी भी पार्टी के उम्मीदवार से अधिक वोट होता है तो उस केन्द्र का चुनाव को रद्द माना जाता है। नोटा के जीत वाले केन्द्र से कोई उम्मीदवार चुनाव नहीं जीतता है और वह सीट खाली रहता है। किसी केन्द्र में नोटा का वोट जीतना ऐतिहासिक और अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय घटना होती है। सरकार को झक मार कर देश को बताना पड़ता है कि उस केन्द्र के वोटरों ने क्यों सभी उम्मीदवारों को रिजेक्ट कर दिया। संसद में उन लोगों की शिकायत पर पूर्ण रूप से बहस होगी और वहाँ के लोगों की शिकायत को दूर करने के लिए सरकार आगे आएगी। यदि एक महीने के अंदर चाय मजदूरों को कुछ हासिल नहीं होता है तो अगले चुनाव में सभी को नोटा बटन का इस्तेमाल करना चाहिए। सभी नौजवानों को इस विषय पर आगे आना चाहिए और पार्टी की गुलामी को उखाड़ फेंकना चाहिए।
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नोटा का उपयोग चाय मजदूरों के मुद्दे को राष्ट्रीय मुद्दा बना देगा। लेकिन इसके लिए चाय मजदूरों को बताने के लिए सारे शिक्षित युवाओं को आगे आना होगा। कृपया इस लेख को हर बागान के लोगों के पास व्हाट्सएप के माध्यम से पहुँचाएँ। संघर्ष करने वाले की कभी हार नहीं होती है। हजारों रास्ते हैं, किसी रास्ते से तो मंजिल तक पहुँजेंगे ही। जोहार-नेह इंदवार

नई परिपेक्ष्य में धुमकुड़िया

                                                                     नेह अर्जुन इंदवार

पृष्टभूमि – धुमकुड़िया –आदिवासियों, विशेष कर उराँव समाज का पारंपारिक सामाजिक विद्यालय और प्रशिक्षण संस्थान रहा है। हजारों सालों के इतिहास में धुमकुड़िया ने सामाजिक सोच, विधारधारा, पारंपारिक प्रशिक्षण और शिक्षा की पारंपरा को बचाए रखा है।

भारतीय उपमहाद्वीप पर आदिवासी समाज की प्राचीनता अपने आप में स्वयं सिद्ध है। हिंदी का “आदिवासी” शब्द या अंग्रेजी का “Indigenous” शब्द की सार्थकता आदिवासी समाज की प्राचीनता से खुद अभिषित हो गया है। भारत में आदिवासी शब्द के उच्चारण मात्र से ही भील, संताल, गोंड, उराँव, मुण्डा, खड़िया, हो असूर, चेरो, बिरहोर, पहाड़िया, बैगा, इलुरू, कोडा आदि सैकड़ों आदिवासी समाज और उनके सदस्यों का भान हो जाता है। आदिवासी समाज पचासों हजार सालों से भारतीय उपमहाद्वीप में रहता रहा है। इसकी पुष्टि तमाम पुरात्विक शोध, खोज और अध्ययनों से हो चुका है।

हाल ही में हरियाणा के राखीगढ़ी में मिले प्राचीन कंकालों के डीएनए का अध्ययन किया गया। उक्त शोध-अध्ययन में कहा गया कि 4500 पूर्व के हड़प्पा कालीन कंकाल के डीएनए में यूरोशिया के घास के मैदान के वासियों और उनके वंशजों में मिलने वाले डीएऩए R1a1 नहीं मिले। (देखें Kai Friese  द्वारा लिखित लेख जो इंडिया टूडे के September 10, 2018 में प्रकाशित हुआ था)  यह शोध-अध्ययन पुणे के डेक्कन कॉलेज के पुरातत्वविद् डा. बसंत शिंदे की अगुवाई में हुई थी। शोध का आधार राखीगढ़ी के आसपास के प्राचीन पुरातात्विक अवशेष और उसके साथ मिले हड़प्पा कालीन सभ्यता (4500 ईस्वी पूर्व) के कंकाल रहे हैं, कंकालों के खोपड़ियों में अध्ययन लायक डीएनए प्राप्त हुए थे।  उक्त शोध में कहा गया है कि उक्त कंकाल में मिले डीएनए दक्षिण भारत के आदिवासियों के डीएनके के लक्षणों से मेल खाते हैं।

एक अनुमान के अनुसार देश में आदिवासियों का इतिहास 60-70 हजार वर्षों का है। वैज्ञानिकों के अनुसार सारी दुनिया में मानव का विस्थापन लगभग 1 लाख वर्ष पूर्व अफ्रिका से हुआ था। कुछ साल पूर्व ऑस्ट्रेलिया में हुई खुदाई में 45 हजार वर्ष पूर्व बसे मानव बस्तियाँ के चिन्ह् मिल चुके हैं। यद्यपि आज से पचास हजार वर्ष पूर्व ऑस्ट्रेलिया महादेश अफ्रिका से आज की तुलना में इतनी दूर नहीं था, तथापि अफ्रिका से आस्ट्रेलिया में मानव का आज की तरह सीधे जाना संभव नहीं था। अनुमान लगाया जाता है कि ऑस्ट्रेलिया जाने वाले मानव एशिया महादेश के स्थलों में कई हजार साल रहने या विचरण करने के बाद ऑस्ट्रलिया पहुँचे होंगे। मानव समाज का दूर देश में जाना आज की तरह एकबारगी नहीं होता था, बल्कि वे धारे-धीरे हजारों सालों में हजारों किलोमीटर दूरस्थ जगहों में विभिन्न कारणों से फैले। इसका सीधा अर्थ यह लगाया जाता है कि प्राचीन मानव भारतीय उपमहाद्वीप से दक्षिण पूर्व के देशों (स्थलों) से होकर ऑस्ट्रेलिया जैसे दूरस्थ देशों में गए होंगे। इस तरह अनुमान लगाया जाता है कि भारतीय धरा में 60-70 हजार वर्ष पूर्व ही मानव बस्तियाँ बस गई थीं और वे लगातार इस धरा पर इधर-उधर होकर बसते रहे थे। तब से हजारों सालों तक प्राचीन आदिवासी मानव भारतीय उपमहादेशों के विभिन्न जगहों में फैलते गए और नयी-नयी भाषाओं, संस्कृतियों, परंपराओं, तकनीकियों का विकास करते गए। वे हजारों सालों के कालांतर में इस धरा पर अलग-अलग समाज का निर्माण करते गए। आज के आदिवासी उन्हीं प्राचीन मानव समाज के रक्त से संचित समाज हैं। कालांतर में विशेष इलाकों में रहते हुए विशेष जीवन पद्धतियों का विकास करते गए। देश के विस्तृत इलाकों में फैले हुए प्राचीन मानव जाति के अवशेषों का आदिवासी दृष्टिकोण से शोध किए जाने पर अनेक बातें उद्घाटित हो सकती हैं।

आदिवासी सभ्यता विशेष कर उराँव एवं द्रविड़ समुदाय से संबंध रखने वाले गोंड आदि समुदायों में अविवाहित युवाओं का प्रशिक्षण धुमकुड़िया जैसी पारंपारिक संस्थाओं के माध्यम से किया जाता था। गोड़ आदि समुदाय में धुमकुड़िया को घोटूल तथा अन्य नामों से जाना जाता था। मुख्य रूप से यह आज की शिक्षा व्यवस्था का ही प्राचीन परंपरा शिक्षण व्यवस्था की कड़ी थी। आज यह व्यवस्था विलुप्ति के कागार पर है और आधुनिक सभ्यता ने इसे अनावश्यक रूप से दफनाने में अधिक तत्परता दिखाया है, जो आदिवासियों के इस प्राचीन संस्था को खत्म करने में मुख्य भूमिका निभाया है।

धुमकुड़िया के पारंपारिक शिक्षा का मुख्य काम युवाओं को समाज के जिम्मेदार सदस्य के रूप में तैयार करना होता था। युवाओं को समाज, सामाजिक व्यवहार, पारंपारिक कृषि और पुरखाओं के अनुभवों की शिक्षा दी जाती थी। धुमकुड़िया पुरखों के अनुभवों और ज्ञान को नयी पीढ़ी को रीति पूर्वक सौंपने का भी स्थली रहा है।  धुमकुड़िया में लैंगिक भेदभाव नहीं किया जाता था। इसको अपनी गैर आदिवासी दृष्टिकोण से देखने वाले इसे  युवाओं का उन्मुक्त यौन व्यवहार की संस्था के रूप में देखने की कोशिश की है और इसके बारे गैर आदिवासी विवरण में इसके बारे नकरात्मक विवरण पेश किए हैं। लेकिन यह आदिवासी समाज के लिए एक अत्यंत सकरात्मक और उपयोगी संस्था के रूप में युगों तक कार्य किया है और आज के युग में भी इसकी उपयोगी साबित होगी, यदि इसे आवश्यकतानुसार लचीलापन के साथ समाज में एक पारंपारिक संस्था के रूप में बचाया जाए।  

शिक्षा का मुख्य उद्देश्य सभ्यता की उन्नति के लिए व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास करना, उनके शारीरिक, बौद्धिक, भावनात्मक और मानवीयता को एक समुच्च में पिरो कर उसे मजबूत करना होता है। उपयोगी बातों को नयी पीढ़ी की भलाई, विकास के लिए सिस्टेमेटिक ढंग से इस प्रकार से परिचित कराना होता है कि शिक्षण के विषयों के द्वारा उनके दिमाग को सिस्टेमेटिक ढंग से सोचने, विश्लेषण करने की क्षमता और विवेकशीलता को बढ़ाई जाए। प्रत्येक सभ्यता के पारंपारिक शिक्षा व्यवस्था में नयी पीढ़ी को पुरानी और नयी तकनीकियों से परिचित करना भी होता है।

आदिवासी समाज अपने युवाओं को धुमकुड़िया के माध्यम से जो सिस्टेमेटिक शिक्षा देता था। उसमें भी युवाओं को समाज की भलाई के लिए पुरानी और नयी बातों को बताया जाता था। उन्हें धुमकुड़िया में नई तकनीकियों से भी परिचित कराया जाता था। धुमकुड़िया में एक आयु वर्ग के बीच प्रतिस्पर्धा, सहयोग, समंजस्य, मनोवैज्ञानिक व्यवहार, पुरानी सामाजिक घटनाओं और उनके प्रभाव, दंतकथाएँ आदि अनेक बातों से परिचित होने का अवसर मिलता था और वह युवाओं को एक जिम्मेदार, समझदार और कुशल सामाजिक सदस्य बनने में अत्यंत सहायक होता था।

आज आदिवासी समाज दूसरे समाज के साथ कदम से कदम मिला कर चल रहा है। उनकी प्राचीनतम परंपराएँ, शिक्षण व्यवस्था या सामाजिक रीति रिवाज बड़ी तेजी से विलुप्त होते जा रही है। नयी शिक्षा पद्धति आदिवासी समाज को अपनी परंपरा, रीति रिवाज, संस्कृति आदि से दूर ले कर जा रही है। आज नयी शिक्षा के बल कर आदिवासी आधुनिक सभ्यता का सदस्य बन गया है और जो दूर दराज के क्षेत्रों में रहते हुए अभी भी आदिवासी प्राचीन परंपरा से जुड़े हुए हैं वे भी शनै-शनै नयी सभ्यता के रंग में ढले जा रहे हैं।

ऐसे में पारंपारिक आदिवासी शिक्षण पद्धति को नयी शिक्षण पद्धति के संदर्भ में देखने, विश्लेषण करने, समीक्षा करने आदि की जरूरत है। आदिवासी समाज की कमजोरी और शक्ति को पहचानने और उस पर नयी दृष्टि से कार्य करने की जरूरत है।

दुनिया के समस्त समाज का विकास उसकी सोच और विचारधारा के साथ नयी तकनीक के उपयोग पर निर्भर करता है। नयी तकनीकियों के सपेक्ष चिंतन करने के लिए पर्याप्त स्तरीय शिक्षा और शिक्षण व्यवस्था की जरूरत से कोई भी इंकार नहीं कर सकता है। सभ्यता का विकास असल में तकनीकी का विकास ही है। चाहे वह स्थूल तकनीकी हो या मानसिक तकनीकी। स्थूल तकनीकी जहाँ क्रमःगत विकास आधारित होता है, वहीं मानसिक तकनीकी का विकास स्वतंत्र सोच के वातारण पर निर्भर करता है। स्वतंत्र सोच के लिए मकूल वातारण आदिवासी समाज में विपुलता से उपलब्ध है। स्थूल तकनीकी का विकास पूर्णतः मानसिक विकास पर ही आधारित होता है।  

दुनिया के तमाम समाजों या सभ्यताओं की सोच का आधार और नींव अधिकांशतः धार्मिक परांपरा पर आधारित होता है। बच्चे को जन्म लेने के बाद से ही धार्मिक कर्मकांडों का गुलाम बनाया जाता है। लगातार स्थायी रूप से बच्चे के अबोध दिमाग को रूढ़ और सीमित सोच से बंधे धार्मिक सोच, विचारधारा और विषयों का आदी बनाया जाता है। धार्मिक रूढ़िवादिता, सिद्धांत, परंपरा, दर्शन, मनोविज्ञान, चिंतन और चिंतन धारा जो किसी धर्म के नाम पर बनाई हुई होती है, उसके सदस्यों को घुट्टी से पिलाया जाता है। बच्चे, किशोर और युवावस्था में लगातार धार्मिक बंधनों में बंधने के कारण दिमाग नैसर्गिक रूप से स्वतंत्र वैचारिकी का यात्री नहीं रह जाता है।  यहाँ पर नैसर्गिक रूप से स्वतंत्र दिमाग को स्वतंत्र ढंग से चिंतन करने का मौका नहीं मिलता है। यदि दिमाग को किसी खास दशा और दिशा का यात्री बनाया गया हो तो उसे किसी स्वतंत्र दशा और दिशा में जाने के पूर्व उसे पहले से दिमाग में ढाले गए एकपक्षीय पूर्वाग्रह को दिमाग से पूरी तरह मुँछने की जरूरत होती है। जब मुँछने या पोंछने की प्रक्रिया पूरी तरह खत्म होती है तब वह दिमाग स्वतंत्र सोच, चिंतन के लिए तैयार होता है। इसीलिए धर्म के बंद वातावरण से सर्वभौमिक कल्याण की बातें पूर्वाग्रहहीन रूप से बाहर नहीं आ पाती है और धार्मिक पूर्वाग्रह के बोझ से लदे व्यक्ति सभ्यता के सर्वकालिक निष्पक्ष सृजनशीलता का शिल्पी बन नहीं पाता है। दुनिया में जितने भी विश्व स्तर के किसी भी विषय या क्षेत्र के मनीषियों का उदय हुआ है, वे धर्म के खूँटे से बँधे हुए लोग नहीं रहे हैं। विश्व स्तरीय मनीषी बनने के लिए अत्यंत स्वतंत्र सोच और चिंतन का मनुष्य होना पहली शर्त है। यह एक नैसर्गिक शर्त है। निष्पक्ष प्राकृतिक सभी के लिए हवा पानी और भोजन का व्यवस्था करता है। प्राकृतिक रूप से प्राकृतिक वातावरण में विचरण करने वाला मानव भी सर्वभौमिक मानव होता है।

आदिवासी समाज प्राकृतिक के पुजारी है और वह तमाम अगड़ी समझे जाने वाले धार्मिक सभ्यताओं से अलग गैर धार्मिक वातावरण में अपने बच्चों को उन्मुक्त स्वतंत्र चिंतन के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से खुला वातावरण प्रदान करता है। आदिवासी बच्चे को जन्म के बाद किसी धार्मिक दर्शन और किसी कट्टर विचार धारा का गुलाम नहीं बनाया जाता है। यह आदिवासियों के बच्चों को मिलने वाला सबसे सर्वोच्च और सर्वोतम मानवीय अधिकार प्रद्त परिस्थिति है। इस परिस्थिति को उसे सौंपने वाला उसका प्राचीन आदिवासी परंपरा और विचारधारा है। किसी भी पूर्वाग्रह से मुक्त आदिवासी दिमाग स्वतंत्र चिंतन के लिए सर्वधा उपयुक्त दिमाग होता है। धार्मिक समाज अपने बच्चों के दिमाग को स्वतंत्र चिंतन करने देने के लिए तैयार नहीं होते हैं। जबकि आदिवासी बच्चों को स्वतंत्र चिंतन करने के लिए इतना खूलापन मिलता है कि उस खूलापन की सीमा अंतहीन आकाश और समुद्र की तरह बड़ा है।

सभ्यता के विकास में बौद्धिक खुलापन सृजनशीलता का महौल का निर्माण करता है। संक्षेप में खुलापन के उदाहरण पर विचार करने के लिए हम यूरोप में हुए पुनर्जागरण काल को ले सकते हैं। बैंजेंटाईन साम्राज्यवाद के अधीन कांस्टेंटिनोपल (क़ुस्तुंतुनिया) तत्कालीन दुनिया के कला, कौशल, बौद्धिक विमर्श, दर्शन, सृजनात्मक सांस्कृतिक कार्यकलापों, लेखन, इतिहास के प्रखर विद्वानों की वैश्विक राजधानी थी। लेकिन तुर्कों के द्वारा इसकी राजधानी को 1453 में कब्जा कर लेने के बाद बौद्धिक खुलापन की कमी के कारण अधिकतर विद्वान वहाँ से इटली चले गए। वहाँ उन्होंने पुनर्जनवजागरण की नींव डाली, जो क्रमतर पूरे विश्व में नवीन विचारों को फैलाने की पृष्टभूमि तैयार की। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद यूरोप के अधिकांश उर्वरा दिमागों का स्वागत अमेरिकी धरती पर हुई और अमेरिका आज उन्हीं के बलबुते संसार का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र बन बैठा है। संसार में जहाँ भी खुलापन, समानता और नयेपन के स्वागत का महौल होगा, वहाँ सृजनशीलता अपने आप ही पल्लवित होगा।
आदिवासी समाज प्राचीन काल से ही एक स्वतंत्र पसंद समाज रहा है। यदि आदिवासी बच्चे और युवा के दिमाग को सार्वजनिक सामाजिक तनाव और ऊँच-नीच से बचाया जाए और उसे पर्याप्त स्तरीय आधुनिक शिक्षण का वातावरण प्रदान किया जाए तो वे विश्व स्तरीय चिंतक और मनीषी बन कर समाज के सामने प्रस्तुत होंगे और एक नवीन नवजागरण का आगाज होगा।  
 घुमकुड़िया इस क्षेत्र में अपनी प्राचीनता और प्राचीन मूल्यों को साथ में लेकर यदि आधुनिक तकनीकियों के माध्यम से नयी तकनीकी के साथ आदिवासी युवाओं को उच्च और स्तरीय शिक्षा, पारंपारिक मूल्यों के साथ दे तो वे स्वतंत्र चिंतन के मामले में किसी भी समाज के सामने बीस ही साबित होंगे। लेकिन इसके लिए नयी सोच, और गंभीरतापूर्वक विचारित शिक्षा और सांस्कृतिक दूरगामी कार्यक्रम की जरूरत है।

बीजेपी के अक्षम नेतागण

नेह इंदवार
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आज दिनांक 8 फरवरी 2019 को  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जलपाईगुड़ी आए और करीब 38 मिनट तक विभिन्न विषयों पर भाषण दिए। मुझे अभी-अभी उनके भाषण की रिकार्डिंग सुन कर बड़ी निराशा हुई। 38 मिनट के भाषण में उन्होंने कुछ चार पाँच वाक्य चाय बागानों के मजदूरों के लिए प्रयोग किया। उन्होंने चाय उद्योग के मजदूरों के लिए सीधे रूप से कुछ भी नहीं कहा।
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प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि केन्द्र सरकार ने बंद चाय बागानों को खोला। इस विषय पर बीजेपी के स्थानीय नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी को पूरी तरह से मिसगाईड किया और गलत बयानबाजी करवाया। आखिर केन्द्र सरकार ने कौन सा बागान को खुलवाया ? क्या बीजेपी के नेतागण इसका जवाब दे सकते हैं ? पिछले कई वर्षों से डुवार्स तराई में कुल 31 चाय बागान या तो पूरी तरह बंद है या रूग्ण रूप से चल रहे हैं या लूज कनेक्शन के बल्ब की तरह ऑन-ऑफ होता रहते हैं।

2016 में डंकन्स के कुछ चाय बागानों को टी बोर्ड के तहत अधिग्रहण करने की बात चली थी। बात कोर्ट में चल रही थी और राज्य और केन्द्र सरकार दोनों अपने अपने दाँव चल रहे थे। तब केन्द्रीय मंत्री अहलुवालिय और निर्मला सीतारमण ने कुछ चाय बागानोे का परिदर्शन भी किया था। लेकिन तमाम दावे जुमलेबाजी सिद्ध हुई। किसी भी बागान का अधिग्रहण किसी भी सरकार द्वारा नहीं की गई।  दो चार दिन पूर्व मैंने बीजेपी वालों से पूछा था कि प्रधानमंत्री मोदी जलपाईगुड़ी के दौरे पर चाय बागानों के लिए क्या घोषणा करेंगे। बीजेपी नेताओं ने कहा था कि चाय बागानों से जुडे नेता दिल्ली का दौरा करके चाय समस्याओं पर सरकार को अगवत कराया है।
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चाय उद्योग देश का एक महत्वपूर्ण उद्योग है और कुछ मिलाकर देश भर में इससे 20 लाख से अधिक लोग जुड़े हुए हैं। चाय उद्योग मजदूरों का वीभत्स शोषण करने में अग्रणी है और पश्चिम बंगाल के चाय मजदूर पिछले पाँच वर्षों से न्यूनतम वेतन और आवासीय पट्टे के लिए आंदोलित हैं। उन्हें आंदोलन से विरत रखने के लिए राज्य सरकार ने एक सलाहकार समिति का गठन किया है लेकिन सरकार को उसकी सलाह की कोई जल्दी नहीं है और वह उसे बहाने लेने के लिए उपयोग करती रही है।  लेकिन प्रधानमंत्री उनके आंगन में आकर भी उनके जीवन-मरण के प्रश्न पर कुछ नहीं कहा और मजदूरों को नयी पेंशन योजना का पाठ पढ़ा कर निकल गए। नयी पेेशन योजना से आज के संघर्षरत मजदूरों को कोई लाभ नहीं होने वाला है। कई वर्षों के तक अपनी खून-पसीने की कमाई को पेंशन योजना में निवेश करने के बाद मजदूरों को अगले अनेक सालों के बाद पेंशन प्राप्त होना शुरू होगा।
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डुवार्स तराई में बीजेपी मजदूरों के वोट लेने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रही है। लेकिन आज पार्टी के सर्वोच्च स्तर के नेता के भाषण से इतना स्पष्ट हो गया है कि बीजेपी चाय मजदूरों को तनिक भी तवज्जो नहीं देती है। स्थानीय नेतागण सिर्फ वोट पाने के लिए मजदूरों को अपनी रैली मे पैसे और भोजन देकर ले जाती है। लेकिन नीतिगत मामले में वे न तो केन्द्र सरकार से मजदूरों के लिए कोई बात करते हैं और न केन्द्र सरकार की शक्तियों को मजदूरों के भलाई के लिए लगाने का प्रयास करते हैं। ऐसा लगता है वे मजदूरों की समस्या को सुलझाने लायक योग्यता से रहित हैं और ममता सरकार से मजदूरों की नराजगी का फायदा उठा कर उनके वोट लेने के फेरे में हैं।
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पश्चिम बंगाल में तृणमूल की तरह ही बीजेपी भी कोलकाता के नेताओं के द्वारा संचालित पार्टी है और कोलकाता के नेताओं को राज्य का सत्ता चाहिए न कि चाय मजदूरों के समस्याओं का समाधान। फिलहाल लोकसभा के चुनाव का ऐलान नहीं हुआ है और मोदी जलपाईगुड़ी में एक पार्टी नेता के रूप में नहीं बल्कि एक प्रधानमंत्री के रूप में जनता को संबोधित किया। एक प्रधानमंत्री के उद्घोष और बयान को शासन के अधिकारी नीतिगत घोषणा के रूप में लेते हैं और प्रधानमंत्री के भाषण को जमीनी स्तर पर कार्यान्वित करने के लिए तुरंत कदम उठाते हैं।
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यदि उत्तर बंगाल या पश्चिम बंगाल के नेतागणों के प्राथमिक सूची में चाय मजदूर होते तो वे चाय बागानों में डेढ़ सौ करोड़ के पीएफ बकाया, आवासीय पट्टे, बंद बागान, ऑन-ऑफ होने वाले बागान, चाय बागानों की बेरोजगारी, प्रशिक्षण संस्थानों और कालेजों की कमी के बारे प्रधानमंत्री को विशेष रूप से बताते और उन पर भाषण दिलाकर राज्य सरकार को बैकफूट पर लाने का काम कराते और परोक्ष रूप से चाय बागान की समस्या को सुलझाने का रास्ता तैयार करते। लेकिन बीजेपी के नेतागणों ने आज साबित कर दिया कि वे भयानक रूप से अयोग्य और चाय मजदूरों के प्रति असंवेदनशील हैं और वे सिर्फ चाय मजदूरों को बेवकूफ बना कर उनके वोट लेने के फेरे में हैं।
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मुझे न तो तृणमूल से कोई प्यार है और न बीजेपी से प्रेम। डुवार्स तराई के चाय मजदूरों के शोषण से मुझे एक भारतीय होने के नाते बहुत दुख है। चाय मजदूरों के साथ राजनैतिक खेल करते घटिया राजनीति के खिलाड़ियों पर लिखना मैं अपना परम कर्तव्य समझता हूँ। आज साबित हो गया कि चाय मजदूरों को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी और देशद्रोही अमानवीय राजनैतिक पार्टियों से उन्हें कोई आशा नहीं रखनी चाहिए।

मोदी ने आज अपनी भाषण में क्या कहा इसे सुनने के लिए नीचे के लिंक को क्लिक करें।

https://www.thequint.com/news/india/pm-narendra-modi-addresses-rally-in-bengal-jalpaiguri?fbclid=IwAR1OdbcuPmUE46yfL1z6zvjoM8RdNIR5Ohfx2T7OYaTUVobrAUZqecbP6cs#gs.MGQG0ByY

डुवार्स में जरूरी है अंग्रेजी शिक्षा

डुवार्स और तराई के दोस्तों के लिए :- उत्तम शिक्षा ही विकास के राजपथ में दौड़ने में मदद करता है।

पश्चिम बंगाल में सरकारी सहायता प्राप्त चुनिंदा बंगला माध्यमों के स्कूलों के प्राईमरी कक्षाओं में अंग्रेजी स्कूलों की शुरूआत 2017 के अप्रैल महीने से ही हो गया है। नदिया जिले के चाकदह के मदनपुर में 2017 के अप्रैल महीने से तीन शिक्षकों और 60 विद्यार्थियों के साथ बंगला स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई शुरू हुई।

उत्तम और स्तरीय शिक्षा बिना किसी समाज में बौद्धिकता का विकास संभव नहीं है। स्वतंत्र सोच की धारा विकसित किए बिना कोई समाज वास्तविक रूप से स्वतंत्र समाज नहीं होता है। आदिवासी भाषाओं में आधुनिक शिक्षा की शुरूआत फिलहाल आकाश कुसुम है।

आदिवासी इलाकों में उत्तम स्तरीय शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। जो भी शिक्षा की व्यवस्था है वह वैश्विक स्तर की शिक्षा में कहीं नहीं ठहरता है। डुवार्स तराई में आदिवासी बच्चे हिंदी और बंग्ला माध्यम के स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। हिंदी और बंग्ला भाषाओं में पारंगत होने के बावजूद ऐसे आदिवासी युवा अंग्रेजी भाषा में अपर्याप्त स्तरीय शिक्षा के कारण बौद्धिक प्रतिस्पर्धा और रोजगार में पिछड़ते रहे हैं।

पश्चिम बंगाल के Public Service Commission,  Union Public Service Commission, Education Departments, Police Departments, Health Department, Engineering Department, Agriculture Department, IT Sector,   आदि सैकड़ों विभागों में डुवार्स और तराई के युवा कहीं दिखाई नहीं पड़ते हैं। यदि वे इन विभागों में पहुँचे हैं तो भी उनकी संख्या उंगलियों में गिनी जा सकती है।

चाय बागान के पृष्टभूमि के जनसंख्या को उचित और स्तरीय शिक्षा न मिले और वे चाय उद्य़ोग में सस्ते मजदूर के रूप में भारी संख्या में उपलब्ध होते रहें। ऐसी कोशिश न सिर्फ चाय बागान से मुनाफा कमाने वालों ने की थी, बल्कि सरकारी स्तर पर भी की गई थी। आज भी सरकारी आशीर्बाद और बजट से ही निम्न स्तरीय आंगनबाड़ी स्कूल चलाए जा रहे हैं। इन स्कूलों में बच्चों के तीन चार साल बिना कुछ सीखे खिचड़ी खाते निकल जाते हैं।

वहीं ऐसे स्कूलों से दूर रहने वाले तथा अच्छे स्तरीय स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करने वाले बच्चे तीन चार सालों की अवधि में प्राईमरी की किताबों को धड़धड़ा कर पढ़ने की काबिलियत प्राप्त कर लेते हैं। प्राईमरी स्तर में स्तरीय शिक्षा प्राप्त करने में असफल रहने वाले बच्चे आगे की कक्षाओं में जा कर भी अनेक विषयों में फिसड्डी रहते हैं और ऐसे बच्चे ही अंततः ड्रॉप आउट स्टूडेंट बन जाते हैं। डुवार्स तराई में मैट्रिक फेल युवाओं की संख्या कई लाख है। जो न तो जिंदगी में आगे जा सकते हैं और न मन से बागान के मजदूर बन सकते हैं।

फिलहाल पश्चिम बंगाल के अनेक जिलों के स्कूल धड़ाधड़ प्राईमरी सेक्सन में अंग्रेजी माध्यम की शुरूआत कर रहे हैं। राज्य सरकार के शिक्षा विभाग के इसके लिए सैकड़ों आवेदन मिल रहे हैं और सरकार आवेदित स्कूलों में अंग्रेजी की शुरूआत के लिए अनुमोदन दे रही है। यद्यपि अंग्रेजी माध्यम स्तरीय शिक्षा का विकल्प नहीं है। स्तरीय शिक्षा किसी भी माध्यम से हो सकती है। लेकिन भारत में अंग्रेजी ज्ञान के बिना कोई भी आदमी न तो अफसर बन सकता है और न ही जीवन के अधिकांश क्षेत्र में आगे बढ़ने के ख्वाब देख सकता है।  लेकिन प्राईमरी लेवल से अंग्रेजी की पढ़ाई बच्चों में अंग्रेजी के प्रति एक विश्वास को सृजित करने में कामयाब हो जाता है। अंग्रेजी माध्यम में सहजता के कारण वे आगे की पढ़ाई आत्मविश्वास के साथ पूरी कर सकते हैं।

पश्चिम बंगाल सरकार सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम की शुरूआत करने की नीति बनाई है तो उसका लाभ डुवार्स तराई के चाय अंचल के बच्चों को भी मिले इसके लिए आवाज़ उठाई जा सकती है। चाय बागानों के शिक्षित, एनजीओ, मजदूर संघ, एमएलए, एमपी, सामाजिक कार्यकर्ता सरकार को इस बारे लिख सकते हैं। लोकसभा चुनाव के पहले इस तरह की मांग को सरकार सकरात्मक ढंग से लेगी, ऐसी उम्मीद रखनी चाहिए।

आज पूरा विश्व ही Global Village बन गया है। इस ग्लोबल विलेज की भाषा अंग्रेजी है। विज्ञान विकसित होकर आज Artificial Language के युग में पहुँच गया है। Artificial Language की आधारशिला अंग्रेजी भाषा है। जब पूरी दुनिया अंग्रेजी सीख कर विकास के राजपथ पर दौड़ रही है तब आदिवासी या मजदूर के बच्चे क्यों पीछे रहे?  नेह इंदवार  

चाय मजदूरों के लिए क्या है आंदोलन का विकल्प

बंगाल के चाय मजदूरों के लिए राज्य सरकार ने जनवरी 2018 में 17.50 रूपये वेतन की घोषणा है। सरकार इसे अंतरकालीन वेतन वृद्धि कह रही है। अब मजदूरों को 150 रूपये मिलेंगे और उनकी आर्थिक दशा सुधरेगी, यह कहना है सरकार का।
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पश्चिम बंगाल के चाय बागान के मजदूर पिछले पाँच साल से न्यूनतम अधिनियम 1948 के तहत आंदोलनरत हैं और ममता सरकार ने इस विषय पर विचार विमर्श करने के लिए एक सलाहकार समिति का गठन भी कर दिया है। समिति की आठ बार दिखावटी बैठक हो चुकी है। सरकार बीच-बीच में अंतरकालीन वेतन वृद्धि का प्रस्ताव पहले भी दे चुकी थी, जिसे मजदूरों ने ठूकरा दिया था।
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लेकिन नये साल के सर्द जनवरी में सरकार ने मजदूरों से बिना चर्चा किए ही अंतरकालीन मजदूरी के लिए 17.50 रूपये वृद्धि का आदेश जारी कर दिया है। सरकार का यह कदम मजदूरों को बेवकूफ बनाने के चालाकी भरा कदम के सिवाय और कुछ नहीं है। यह मजदूरों के प्रति सरकार की क्रुर सोच को भी दर्शाती है।
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आखिर सरकार चाहती क्या है ? वह न्यूनतम मजदूरी के लिए बनायी गई समिति को बंद करना चाहती है ? उसे निष्क्रिय करके मालिकों के मर्जी के मुताबिक न्यूनतम वेतन के मुहिम को सिर से खत्म करना चाहती है ?
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आर्थिक और सामाजिक शोषण का ताजमहल बन चुके चाय बागान में न्यूनतम वेतन मुहिम को चाय बागान मालिक फूटी आँख भी देखना नहीं चाहते हैं। वे हमेशा मजदूरों के शोषण के लिए नये-नये रास्ते तलाशते रहे हैं। आर्थिक शोषण को बनाए रखने के लिए वे मजदूर संघों के नेताओं, राजनैतिक दलों के नेताओं की मुट्ठी गर्म करके रखते रहे हैं और वे चाय बागानों में किसी भी सुधारात्मक कदमों को कामयाब होने से रोकने की पूरी कोशिश करते हैं।
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पश्चिम बंगाल सरकार ने जिस तरह न्यूनतम वेतन के लिए बनी समिति को नजरांदाज करते हुए अपनी ओर से एकतरफा कदम उठाते हुए अंतरकालीन मजदूरी देने के लिए आदेश जारी किया है, उससे यही प्रतीत होता है कि राज्य सरकार पूरी तरह चाय बागान मालिकों के चंगुल में फंस चुकी है और सरकार बागान मालिकों के दिशा-निर्देशन के अधीन काम कर रही है। माँ, मानुष और माटी के लिए काम करने का दावा करने वाली सरकार के लिए यह चुल्लू भर पानी में डुब मरने के बराबर शर्म की बात बन गयी है। क्यों शर्म से मरने तक के लिए सरकार तैयार है, लेकिन मजदूरों को न्याय देने के लिए तैयार नहीं ?
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जब कानून के मुताबिक गठित न्यूनतम वेतन सलाहकार समिति का गठन किया गया है तो सरकार को उसी सलाहकार समिति की बैठक हर सप्ताह बुला कर समस्या का समाधान निकालना चाहिए था। समिति के निर्णय को लागू करती। लेकिन वह ऐसा नहीं कर पायी, क्यों ?
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इस समिति की बैठक साल भर में एक दो बार की जाती है और जानबुझ कर षड़यंत्रपूर्वक समस्या को दीर्घकालीन सुस्त चाल का शिकार बनाया जा रहा है।
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यह सरकार की मजदूर विरोधी मंशा को स्पष्ट करता है। ऐसा लगता है प्रदेश का श्रम मंत्रालय चाय बागान मालिकों के मुनाफे लिए काम करने में व्यस्त है, या फिर इसके मंत्री और आईएएस अफसरों में इतनी काबिलियत नहीं है कि वे डेढ़ सौ साल से चल रहे शोषण के चक्र को खत्म करने लिए कोई ऐतिहासिक कदम उठाएँ।
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लगता है माँ माँटी मनुष्य का सरकार सामंतवादी मानसिकता से ग्रस्त लोगों की सरकार है जिसे राज्य के नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन, शोषण, अत्याचार, अनाचार, भेदभाव से कोई मतलब नहीं है। सरकार की आंख चाय बागानों में भारतीय संविधान के भाग तीन में उल्लेखित आर्टिकल्स 12 से 35 के धारावाहिक उल्लंघन पर बिल्कुल बंद है। सरकार की सारी मशीनरी चाय मजदूरों के साथ हो रहे लगातार भेदभाव और शोषण के बारे रिपोर्ट देने में असफल है।
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यह ऐसा भी हो सकता है कि सरकार चाय मजदूरों को शोषण को लगातार जारी रखने के लिए कृतसंकल्प हो और वे शोषण के नये-नये तरीके पर विचार-विमर्श करने में अपनी उर्जा लगा रही हो।
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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हर दो तीन महीने में उत्तर बंगाल की दौरा करतीं हैं। लेकिन वे चाय मजदूरों के मौलिक समस्याओं पर कभी भी बात नहीं करती है। यदि कभी सतही तौर से बात भी करती हैं तो गंभीर होकर कभी कोई कदम नहीं उठाती है। कोलकाता के सत्ताधारियों का चाय बागान मजदूरों के प्रति यह प्रतिकूल नजिरिया नया नहीं है। चाहे कोई भी पार्टी हो कलकत्ता में काबिज होने के बाद वे चाय बागान मालिकों से नये-नये तरीके से चंदा लेने की जुगाड़ में लग जाती है। चाय मजदूरों को वे बाहरी मानती है और वे उन पर अपनी भाषा, संस्कृति, प्रभाव, सामंती नीतियाँ थोपने में कभी भी पीछे नहीं रहते हैं। ममता सरकार का चरित्र भी इस दकियानुसी परंपरा और विचारधारा से अलग नहीं है।
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जब सरकार बिना सलाहकार समिति बनाए ही बीटीएफ (Bought Leaf factory) के मजदूरों के लिए न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के तहत वेतन निर्धारित करने का नोटिफिकेशन निकाल सकती है तो वह सलाहकार समिति के कार्यकाल का निर्धारण क्यों नहीं सकती है ? क्या उनके पास शक्ति नहीं है या इरादा नहीं है ? वह चाहे तो सलाहकार समिति में लेबर कोर्ट के न्यायाधीश को भी शामिल करके उसे जल्द फैसला करने के लिए कह सकता है। यदि समिति फैसला लेने में असफल रहती है तो वह मामले को खुद ही उच्च न्यायालय में ले जा सकती है। लेकिन वह किसी भी अन्य विकल्प को नहीं अपना रही है।
.आखिर वह किस मुख से चाय बागान मजदूरों का हितैशी होने का दावा करती है ?
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डुवार्स और तराई के दस लाख लोगों को मुर्ख बनाने के लिए सरकार दिखावटी काम कर रही है। वह चार पाँच करोड़ का दिखावटी काम करके वाहवाही लुटना चाहती है।
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क्या दो लाख लोगों के संवैधानिक अधिकारों का हनन करके बदले में सौ आदिवासी और नेपाली मजदूरों को घर बना कर देना बहुत बहादुरी का काम है ? क्या करम के नाम पर दो चार नदियों के किनारे चार-पाँच लाख रूपये खर्च करके विकास कार्य करना, दो चार मिटिंग रूम बना कर देना चाय मजदूरों के कल्याण के कार्य हैं ? मजदूरों के अरबों रूपये बकाया के बदले पाँच करोड़ रूपये की विकास राशि डुवार्स और तराई के लोगों के दिल जीतने के लिए बहुत बड़ी राशि है ? क्या जनता इतनी मुर्ख है ?
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क्या पच्चीस तीस लखपति और करोड़पतियों, जो अधिकतर कोलकाता, दिल्ली, मुंबई के व्यापारी हैं, के होटल, गेस्ट हाउस, गाड़ियों के लिए टूरिज्म की नीति बनाना डुवार्स और तराई का विकास है ?
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आज राष्ट्रपति को तीन लाख रूपये मिलते हैं। न्यूनतम वेतन पाने वाला सरकारी कर्मचारी का रोज का वेतन 15 सौ रूपये है। वहीं चाय मजदूरों को प्रोविडेंट फंड काट कर 119 रूपये मजदूरी मिलती है। माँ, मनुष्य माटी की सरकार किस तरह से चाय मजदूरों का कल्याण करना चाहती है और आखिर वह किसे सिर उठा कर इज्जत से जीना समझती है ?
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पिछले चार साल में मजदूरों को न्यूनतम वेतन नहीं मिलने से मजदूरों का करीबन 52 अरब रूपये चाय बागान मालिकों पर बकाया चढ़ गया है।
जो मालिक बोनस के पाँच, दस हजार रूपये को किश्त में चुकाने के लिए गिड़गिड़ता है वह प्रत्येक मजदूरों के दो-तीन लाख रूपये का बकाया कैसे चुकाएगा ? आखिर चाय मजदूरों के प्रति सरकार की वास्तविक नीति क्या है ? क्या सरकार कभी इस पर कोई श्वेत पत्र जारी करेगी ?
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सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों के कारण पिछले आठ दस साल में चाय बागानों की हालत खस्ता हो गयी है और मजदूरों को चाय बागान रोजगार के क्षेत्र न लग कर शोषण का सरकारी मान्यता प्राप्त क्षेत्र लगता है और धीरे-धीरे उनकी दिलचस्पी बागानों पर से खत्म होते जा रही है। लेकिन सामंतवादी मानसिकता के शिकार कोलकाता के सत्ताधारी नेता और अफसरों चैन की नींद सो रहे हैं।
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जब सरकार ही मजदूरों का शोषण करने के लिए कमर कस ली है तो मजदूरों के पास क्या-क्या विकल्प बचता है?
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मजदूर आंदोलन करेंगे, लेकिन सरकार के कानों में जूँ तक नहीं रेंगेगी। बस सरकार एक दो मिटिंग बुला कर लोगों को मुर्ख बनाने की कोशिश करेगी ?
मजदूर हड़ताल करेगी, लेकिन मालिक और सरकार इसे रविवार की छुट्टी की तरह स्वीकार कर लेगी?
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गेड मिटिंग करने से बागान मालिकों के चेहरे पर मुस्कान तैर जाते हैं। जानते हैं इसका कोई मतलब नहीं है, बस मजदूरों का गुस्सा निकल जाता है और एक नकली समाधान की आशा में मजदूर दूसरे दिन काम में ज्वाईन करते हैं।
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तृणमूल कांग्रेस पार्टी ने अधिकतर चाय बागानों के कार्यकर्ताओं को अपने पाले में कर लिए हैं, कुछ लोगों को कुछ सुविधाएँ दे दी गई हैं इसलिए कितना भी शोषण करो, भेदभाव करो, अन्याय करो, वोट तो बस उन्हें ही मिलेगा। जो तृणमूल से दूर हैं उन्हें किसी न किसी तरह से मना लिया जाएगा। आखिर मजदूर करेंगे क्या ? उन्हें न्यूनतम वेतन से वंचित करके उस रूपयों को चंदे के रूप में सत्ताधारी पार्टियों तक पहुँचाऩे की व्यवस्था कर ही लिया जाएगा।
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मुख्य बात है मजदूरों को न्यूनतम वेतन मिलने से उन्हें डीए भी मिलेगा। इससे उनके माली हालात में सुधार होगा और वे अपने बच्चों को हिंदी और अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में पढ़ाएँगे। इससे वे विकसित हो जाएँगे। उनका विकास रोकना है इसलिए उन्हें किसी भी तरह से कानूनन मान्यता प्राप्त मजदूरी न दिया जाए। उन्हें मजदूर बनाए रखे के लिए हर संभव काम किया जाए। उनके नेता तो एक दो हजार में बिकते हैं उन्हें खरीद लिया जाए। आखिर मजदूर क्या करेंगे, दूसरे राज्यों में जाएँगे, सूखी रोटी खाएँगे और चाय बागानों में काम करेंगे, कैसे भी हो यह उनसे कराया जाए, वे दूसरे राज्य के बासिंदें हैं, उनकी भाषा, संस्कृति अलग है और उनके विकास से राज्य के लोगों को कोई लेना देना नहीं है। मजदूरों के शोषण के पीछे यही असली कहानी है।
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लेकिन यदि मजदूर चाहें तो संघर्ष जारी रखा जा सकता है। राजनैतिक पार्टियों को बागानों से भगा दिया जाए। किसी को भी बागानों में मिटिंग न करने दिया जाए। सत्ताधारी पार्टी में शामिल तमाम लोगों का वोट होने तक सामाजिक बाहिष्कार किया जाए। चाय बागानों से तैयार चाय को बाहर भेजने से रोक दिया जाए। सत्ताधारी पार्टी के गुलाम बने स्थानीय और चाय बागान से जुड़े नेताओं को कोई भी मिटिंग न करने दिया जाए। बागानों को खुद चलाने के लिए कॉओपरेटिव की स्थापना की जाए। तमाम कानूनों के जानने के लिए मजदूरों द्वारा टास्कफोर्स बनाया जाए। लेबर कोर्ट और हाईकोर्ट में मामला दायर किया जाए। रोड और रेल को रोक दिया जाए। यदि सरकार अपनी रवैये में कोई परिवर्तन नहीं लाए और शोषण चक्र को जारी रखना चाहे तो जाहिर है कि पश्चिम बंगाल से अलग राज्य के लिए आंदोलन छेड़ा जाए। नेह इंदवार

चाय मजदूरों का शत्रु ममता सरकार !

क्या  पश्चिम बंगाल में चाय मजदूरों का सबसे बड़ा शत्रु पश्चिम बंगाल का सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस बन रही है ?  क्या यह चाय मजदूरों को बाहरी मानती है और जितना मजदूरों के विरूद्ध में शोषण मूलक नीति बना सकती है या कदम उठा सकती है, बेशर्मी की हद तक जा कर उठा रही है ?
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उत्तर बंग सम्वाद के 10 जनवरी 2018 के समाचार यदि सही है तो यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि तृणमूल कांग्रेस पार्टी चाय मजदूरों पर अन्याय करने के लिए चाय बागान मालिकों से मिल गई है और वे मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी की मांग और उनके आंदोलनों को खत्म करने के लिए षड्यंत्र रच रही है।
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चाय मजदूर न्यूनतम मजदूरी के लिए 2013 से आंदोलनरत हैं। वे 2014 से लागू होने वाले समझौते की तारीख से कानून सम्मत न्यूनतम मजदूरी मांग रहे हैं । लेकिन उक्त अखबार के अनुसार पश्चिम बंगाल के श्रम मंत्री मलय घटक ने कहा है कि यदि न्यूनतम मजदूरी समझौता होता है तो मजदूर मजदूरों को “गत” अप्रैल से बकाया अर्थात् एरियर मिलेगा। क्या मलय घटक का “गत” अप्रैल का मतलब 2017 का अप्रैल है ?? क्या उन्हें मालूम नहीं है कि चाय मजदूर 2014 की अप्रैल से न्यूनतम मजदूरी के लिए संघर्षरत हैं ??

यदि मलय घटक का “गत अप्रैल”’ 2017 की अप्रैल है तो मजदूरों को कितना नुकसान होगा, क्या उन्हें मालूम है ?? आईए जरा हिसाब लगाते हैं —
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2014 के 1 अप्रैल को 300 रुपये मिले तो वर्तमान के 131 रूपये कट कर 269 रूपये प्रतिदिन बकाया बनता है। हर महीने में 26 दिन काम होता है मतलब 26×269= 6994 रूपये हर महीने। तीन साल में 36 महीने होते हैं। मतलब तीन साल का एरियर 36×6994=251784 रूपये होते हैं।
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डुवार्स तराई में दो लाख स्थायी मजदूर हैं । उनका कुल हिसाब कुछ यूँ होगा —
200000×251784 = 50356800000 रूपये।
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इस गणना में 2016 के फरवरी से बंद हुए राशन जो मजदूरी का ही एक भाग है और जो पूरे भारत में सभी को मिलने वाले राशन को, चाय मजदूरों को भी दिया जाना शुरू हुआ और बागान राशन तब से बंद है, के रूपयों में होने वाले गणना जो करीबन 600 रूपये होते हैं, को शामिल नहीं किया गया है।
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करीबन 51 अरब रूपयों से मजदूरों को वंचित करने की षड़यंत्र तृणमूल कांग्रेस रच रही है।
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अभी तक न्यूनतम वेतन पर आठ बार बैठक हो चुकी है। लेकिन कोई निर्णय नहीं हुआ है, क्योंकि सरकार मालिकों के साथ मिल गई है और वह कोई निर्णय नहीं लेना चाहती है।
कानूनन संविधान के अधिकार क्षेत्र में सरकार को उचित निर्णय लेने से कोई रोक नहीं सकता है। ये चाय मालिक किस खेत की मूली हैं ?? सरकार अपने संवैधानिक अधिकार के तहत चाय पती खरीद कर चाय बनाने वाले कारखानों में काम करने वाले मजदूरों के लिए पहले ही बिना किसी से बात किए न्यूनतम मजदूरी की घोषणा करके नोटिफिकेशन भी जारी कर चुकी है। वह सिर्फ आदिवासी और नेपाली मजदूरों के लिए अपने अधिकार का उपयोग नहीं करना चाहती है, क्योंकि वह उन्हें बाहरी मानती है और उनके शोषणचक्र को बनाए रखना चाहती है, ताकि वे विकास की राह में पीछे रहें।

सरकार की संविधानिक शक्ति क्या होती है ??

संवैधानिक शक्ति को प्रयोग करते हुए पश्चिम बंगाल का श्रम मंत्रालय ने दो दिन पूर्व चाय बागान मालिकों से कहा है कि वे अंतरकालीन मजदूरी के रूप में मजदूरों को रूपये 17.50 अधिक मजदूरी दें। यह उनका आदेश है, अनुरोध नहीं। वे इसका विरोध न्यायालय जाकर ही कर सकते हैं, यूँ ही इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
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ऐसा लगता है तृणमूल की नजर 51 अरब रूपये पर है, जिसे वे मजदूरों से छीन कर चंदे के रूप से मालिकों से लेगी!! यह मजदूरों की आर्थिक, सामाजिक हत्या होगी।
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. तृणमूल सरकार ने Company Social Responsibility के करोड़ों रूपये से भी मजदूरों को वंचित किया हुआ है। जबकि इस पैसे से मजदूरों का कायाकल्प हो सकता है। यह जानबूझ कर मजदूरों को घर का पट्टा नहीं दे रही है।
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क्या तृणमूल को आप गरीबों, माँ माटी की सरकार समझते हैं ???